मकर संक्रांति : समता व नवोत्कर्ष का पर्व
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होम भारत

मकर संक्रांति : समता व नवोत्कर्ष का पर्व

Written byप्रो. भगवती प्रकाशप्रो. भगवती प्रकाश
Jan 14, 2022, 09:20 am IST
in भारत, दिल्ली
सूर्य को जल चढ़ाते हुए

सूर्य को जल चढ़ाते हुए

भारत वर्ष में मकर संक्रांति की अत्यंत प्राचीन परम्परा रही है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश पर यह पर्व मनाया जाता है। संक्रांति मनाने की परंपरा सार्वभौम है। इस दिन होने वाले खेल व संगीत के आयोजन सामाजिक जुड़ाव का भी आधार बनते हैं। तिल व गुड़ के व्यंजन भी समरसता व सामाजिक एकजुटाव का संदेश देते हैं। यह सम्पूर्ण समाज के लिए समरस एकात्मता का संदेश लिये रहते हैं

 

प्रो. भगवती प्रकाश
 

सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के पर्व मकर संक्रांति को सम्पूर्ण देश व विदेशों में भी मनाया जाता है। सूर्य की दो अयन संक्रांतियों में मकर संक्रांति को उत्तरायण संक्रांति व कर्क संक्रान्ति को दक्षिणायन संक्रांति भी कहा जाता है। विगत 60 वर्षों से निरयन मकर राशि में सूर्य का प्रवेश 14 जनवरी को होता रहा है। उसके पूर्व यह 13 जनवरी, उसके पहले 12 जनवरी को आती थी। लगभग 1700 वर्ष पूर्व यह 22 दिसम्बर को आती थी। सूक्ष्य खगोलीय अयन चलन के कारण प्रति 70 वर्षों में निरयन मकर संक्रांन्ति का पर्व एक-एक दिन आगे बढ़ता है। बारह राशियों में सूर्य द्वारा औसत एक माह में एक बार राशि परिवर्तन करने से वर्ष में बारह संक्रान्तियां आती हैं। सूर्य के मेषादि बारह राशियों में प्रवेश को उस राशि की संक्रान्ति के नाम से सम्बोधित किया जाता है। यथा मेष संक्रान्ति, वृष संक्रान्ति, मिथुन संक्रान्ति, कर्क संक्रान्ति आदि।

कर्क व मकर संक्रान्ति को अयन संक्रान्ति कहा जाता है। सूर्य की सायन कर्क व मकर संक्रान्तियां क्रमश: 22 दिसम्बर व 21 जून को मानी जाती हैं। संकल्प आदि में सायन कर्क संक्रान्ति से दक्षिणायन एवं सायन मकर संक्रान्ति से उत्तरायण माना जाता है। पृथ्वी के घूर्णन से उनकी धुरि में जो वृत्ताकार दोलन होता है, उसकी 25771 वर्षों में एक आवृत्ति होती है। इस दोलन से होने वाले विचलन को ही भारतीय खगोलविदों ने अयन चलन कहा है। इसी दोलन के कारण प्रति 70 वर्षों में संक्रान्ति 1-1 दिन आगे बढ़ती जाती है। पाश्चात्य खगोलविदों को पूर्व काल में इस अयन चलन की जानकारी नहीं थी। अब उन्होंने भी अयन चलन की प्राचीन भारतीय गणना को स्वीकार लिया है।

 
भारतीय धर्मशास्त्रों में संक्रान्तियां
ऋग्वेद (1.12.48 व 1.164.11) में सूर्य के बारह राशियों में भ्रमण व छह ऋतुओं के परिवर्तन का वर्णन है। कालनिर्णयकारिका, कृत्य रत्नाकर, हेमाद्रि (काल), समय मयूख में सूर्य के उत्तरायण व दक्षिणायन के पर्वों को मनाने, करणीय कामों की सूची और अयन व्रत की विस्तृत विधियां हैं। संक्रान्तियों पर गंगा स्नान, तैल रहित भोजन, या तिल युक्त जल से स्नान, पितरों के श्राद्ध व तर्पण और अन्न दान आदि के निर्देश हैं। बारह राशियों में भ्रमण से वर्ष में 12 संक्रान्तियां होती हैं। 

भविष्य पुराण व वर्ष क्रिया कौमुदी (पृष्ठ 514) के अनुसार संक्रान्ति, ग्रहण अमावस्या व पूर्णिमा को गंगा स्नान एवं नदी व सरोवरों में स्नान को महापुण्यदायी व मोक्षदायक कहा है। इस पर्वों में जरूरतमन्द लोगों की सभी प्रकार से यथाशक्ति सहायता करनी चाहिए। संक्रान्ति के दिन मांस रहित भोजन करना चाहिए।
श्लोक: संक्रान्त्यां पक्षयोरन्ते ग्रहणे चन्द्रसूर्ययो:।
गंगास्नातो नर: कामाद् ब्राह्मण: सदनं व्रजेत।।
(भविष्य पु./वर्ष क्रिया कौमुदी पृ. 514)

भारत में मकर सक्रान्ति
भारत में मकर सक्रान्ति को सभी प्रदेशों में उल्लास के साथ मनाया जाता है। छत्तीसगढ़, गोवा, उड़ीसा, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल, गुजरात और जम्मू में इसे मकर संक्रांति नाम से ही मनाया जाता है।
मकर सक्रान्ति के प्रादेशिक नाम:-देश के कई प्रदेशों में मकर संक्रांति के प्रादेशिक नाम भी अग्रानुसार प्रचलित हैं-

  • ताइ पोंगल, उझवर तिरुनल: तमिलनाडु 
  • भोगाली बिहू : असम
  • उत्तरायण:गुजरात, उत्तराखण्ड 
  • खिचड़ी: उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार
  • उत्तरैन, माघी संगरांद: जम्मू 
  • पौष संक्रान्ति:पश्चिम बंगाल
  •  शिशुर सेंक्रंत: कश्मीर घाटी 
  •  मकर संक्रमण: कर्नाटक
  • माघी: हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब
  • वृहत्तर भारत स्थित अन्य एशियाई देशों में मकर सक्रान्ति:
  • बांग्लादेश : शक्रैन/पौष संक्रान्ति
  • नेपाल : माघे संक्रान्ति, ‘माघी संक्रान्ति’ ‘खिचड़ी संक्रान्ति’
  • थाईलैण्ड : सोंगकरन
  •  लाओस : पि मा लगाओ
  • म्यांमार : थिंयान
  • कम्बोडिया : मोहा संगक्रान
  • श्रीलंका : पोंगल, उझवर तिरुनल  

भारतीय पारम्परिक पर्व का सार्वभौम प्रसार
भारत में सूर्यदेव की उपासना के साथ ही सभी धार्मिक कृत्यों में सूर्य के अयन व उत्तर व दक्षिण गोल में स्थित होने के सन्दर्भ भी अनिवार्यत: रहते हैं। ईसा व इस्लाम पूर्व काल के इन वैदिक सूयोर्पासना पर्वों का ही न्यूनाधिक अन्तर के साथ मनाने का सार्वभौम प्रसार रहा है। दोनों अयन संक्रांतियों व विषुव संक्रांन्तियों में से एक या दो के पर्व कई देशों में चलन में हैं।

यूरोपीय व अमेरिकी देशों में संक्रान्ति के सूयोर्पासना स्थल: ईसापूर्व काल के कई प्राचीन सामूहिक संक्रान्ति उत्सव स्थल आज भी विद्यमान हैं जहां कर्क या मकर संक्रांति को किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। इंग्लैण्ड का स्टोनहेंज, एरिजोना में सॉयल उत्सव स्थल, रोम में सेटर्नालिया, पेरू में इंका लोगों का इति रेमी उत्सव स्थल, पारसी त्यौहार याल्दा, एण्टार्कटिका का मिडविण्टर, स्कैण्डिनेविया का नोर्स साल्टरिस, चीनी व दक्षिण कोरियाई पर्व ‘डांग झी’, न्यू मेक्सिको का ‘चाकों केन्योन’, आयरलैण्ड का न्यू ग्रेंज, जापान का ‘तोजी’, वैंकूवर का लालटेन महोत्सव (लैण्टेर्स फेस्टीवल), ग्वाटेमाला की माया की सभ्यता का अयनान्त उत्सव ‘सेण्टो टोमस’, इंग्लैण्ड के ब्राइटन नगर का अयानान्त, इंग्लैण्ड में ही कॉर्नवाल नगर का मेण्टोल उत्सव (मोण्टाल फेस्टिवल) आदि जैसे सैंकड़ों स्थानों पर अयानान्त अर्थात दक्षिणायन व उत्तरायण सक्रान्ति को मनाने की सुदीर्घ व ईसापूर्व कालीन सांस्कृतिक परम्परा पूर्ववत है। यूरोप के दक्षिणायन अर्था कर्क संक्रान्ति का विशेष चलन रहा है।

स्वीडन में मकर संक्रान्ति नहीं, कर्क संक्रान्ति को ‘मिड सोमर’ कहते हैं और वहां ग्रीष्म अयनान्त का अवकाश रहता है। यह भव्य सजावटपूर्वक राजधानी स्टाकहॉम सहित पूरे स्वीडन में और नार्वे आदि स्कैण्डिनेवियन देशों में मनाया जाता है। 
अमेरिकी राज्य अलास्का में 9 स्थानों पर खेल व संगीत महोत्सव आदि के 2-3 दिवसीय आयोजन होते हैं।  
कनाडा में यह उत्सव यूरोपीय आप्रवासियों के आने से पहले तक वहां मूल निवासियों द्वारा मनाया जाता रहा है। इस अवसर पर कनाडा के मूल निवासियों के पारम्परिक वाद्य, संगीत, खाद्य की धूम रहती है।  

इग्लैण्ड व आयरलैण्ड में ईसाईयत के प्रसार के पूर्व के पागान पंथों द्वारा अयनान्त उत्सव मनाया जाता रहा है। शेक्सपीयर की रचना ‘‘मिडसमर नाइट्स ड्रीम’’ भी इससे प्रभावित है।  

क्रोएशिया में दक्षिणायन का आयोजन यूरोप में सर्वाधिक भव्य होता है, जहां सूर्य की दो दिन तक आराधना व अर्ध्य आदि की परम्परा है। इस एस्ट्रोफेस्ट में सूर्य के सम्मान मे भोज भी होता है। 

आस्ट्रिया के दक्षिणी क्षेत्र में टायटॉल में सूर्य के दक्षिणायन को भव्य होलिका-उत्सव के रूप में मनाया जाता है। पर्वत शिखरों पर होलिका दहन उत्सव पूर्वक मनाया जाने का विहंगम दृश्य अत्यन्त रोमांचक होता है। 
लाटविया में कुलडिगा, आइसलैण्ड, रूस के सैण्टपीटर्सबर्ग एवं स्कॉटलैण्ड आदि कई स्थानों पर दक्षिणायन सक्रान्ति, सूर्य के प्रति सम्मान अभिव्यक्ति का पर्व है। 

अयानान्त पर पेरू में सूर्य के प्रति आस्था का प्रदर्शन: दक्षिणी अमेरिका स्थित पेरू दक्षिणी गोलार्द्ध में होने से उत्तरी गोलार्द्ध के ग्रीष्म अयनान्त के समय पर जून में शीतकालीन सक्रान्ति होती है। वहां सक्रान्ति के अवसर पर सूर्य-उत्सव (इण्टी रेमी) या क्वेशुआ सूर्य देवता के प्रति सम्मान व श्रद्धा अभिव्यक्त करने हेतु मनाया जाता रहा है। 

रोमन सेटर्नालिया अर्थात शनिचरालय एक पौराणिक पर्व: सेटर्नालिया रोम का अति प्राचीन उत्तरायण उत्सव है। ईसापूर्व काल में रोम में सर्वत्र मित्र सम्प्रदाय अर्थात सूयोर्पासक सम्प्रदायों के होने से सूर्य के उत्तरायण के अवसर पर कई दिनों तक खेलों व सामूहिक भोजों का आयोजन होते रहे हैं। पुराणों व भारतीय ज्योतिष के अनुसार मकर राषि पर शनिदेव का अधिपत्य होने से सूर्य के शनि की राशि मकर में प्रवेश को शनि के घर सूर्य का आगमन माना जाता है। इसलिए रोम में यह पर्व शनिचरालय अर्थात सेटर्नालिया कहलाता है। रोम (इटली) में भव्य शनि मन्दिर में यह पर्व मनाया जाता रहा है।

पौराणिक व धर्मशास्त्र विहित कृत्य
मकर संक्रान्ति के दिन उपवास करने, तिल मिश्रित जल से स्नान करने, तिल युक्त भोजन व खाद्य सेवन करने, तिल दान करने, तिल मिश्रित जल से पितरों का तर्पण करने, तिल का हवन करने का अनन्त पुण्यफल कहा गया है। संक्रान्ति को देवों को हव्य व पितरों को कव्य व जरूरतमन्दों को उनकी आवश्यकता की वस्तुएं प्रदान करने से आयु, राज्य सुख, पुत्र लाभ व परिवार में सुख-समृद्धि आती है। देवी भागवत पुराण, मत्स्य पुराण, कृत्यकल्प, हेमाद्रि कालनिर्णय, निर्णय सिन्धु व धर्म सिन्धु आदि में संक्रान्ति के स्वरूप, भविष्य कथन, पूजा विधान आदि पर अत्यंत विस्तृत जानकारी दी गई है। विष्णु धर्मसूत्र के अनुसार इस दिन ब्रह्मचर्य पालन व मांस का निषेध परम आवश्यक कहा है। संक्रान्ति का पुण्यकाल सूर्य के मकर में संक्रमण से 16 घटी (6 घण्टा 24 मिनिट) आगे व पीछे बतलाया है। द्वादश संक्रान्तियों के वार, नक्षत्र, तिथि आदि से उसका नामकरण, वाहन, उपवाहन, दृष्टि, पुष्प, आहार व आभूषण आदि के निर्धारण के साथ भविष्य का भी आकलन किया जाता है।

संक्रान्तियों के चार प्रकार
वर्ष भर की 12 संक्रान्तियों में दो अयन संक्रातियां – मकर-संक्रान्ति दो विषुव संक्रान्तियां – अर्थात मेष एवं तुला संक्रान्तियां होती हैं, जब रात्रि एवं दिन बराबर होते हैं। चार संक्रान्तियां, जिन्हें षडशीति मुख (अर्थात मिथुन, कन्या, धनु एवं मीन) कहा जाता है तथा चार विष्णुपदी (अर्थात वृषभ, सिंह वृश्चिक एवं कुम्भ) नामक संक्रान्तियां होती हैं। (पंचसिद्धान्तिका (3/23-24), हेमाद्रि काल पृ. 407)
श्लोक: पंचसिद्धान्तिका (3121-24, पृ. 1) ने परिभाषा की है-
मेषतुलादौ विषुवत षडशीतिमुखं तुलादिभागेषु।
षडशीतिमुखेषु रवे: पितृदिवसा येवशेषा: स्यु:।।
षडशीतिमुखं कन्याचतुर्दशेऽष्टादशे च मिथुनस्य।
मीनस्य द्वाविंशे षड्विंशे कार्मुकस्यांशे।।

अयन चलन से सायन व निरयन संक्रान्तियां
पृथ्वी के घूमने की धुरी में एक वृत्ताकार गति होती है। इस गति का एक चक्र 25,771 वर्ष में पूरा होता है। यह गणना केवल भारत में ही प्रचलित रही है। प्राचीन काल में इसका ज्ञान केवल भारतीय ऋषियों को ही था। पृथ्वी की धुरी या अक्ष को अन्तरिक्ष में बढ़ाने पर वह पृथ्वी से 434 प्रकाश वर्ष दूर स्थित ध्रुव तारे पर पहुंचती है। इस चक्रकार आवृत्ति को दृष्टिगत रखकर वैदिक साहित्य में इसे अयन चलन या अयनांश कहा गया है। पृथ्वी की इस धुरी को ही वास्तविक उत्तर या ट्रू नॉर्थ कहा गया है। ट्रू नॉर्थ ही वास्तविक उत्तर होता है। 

भौगोलिक उत्तर अर्थात भू अक्ष या पृथ्वी की धुरी आधारित ट्रू नार्थ व तदनुरूप कार्डिनल दिशाओं के निर्धारण की पुराणों व वैदिक साहित्य की परम्परा का चलन आधुनिक जगत में 1860 के बाद प्रारम्भ हुआ है।

भारतीय वैदिक उत्तर दिशा व संक्रान्तियों की सूर्य की प्रथम किरण का सार्वभौम महत्व – इसी वैदिक परम्परानुसार दिशा साधन के कारण ही कोणार्क, झांसी, ग्वालियर, श्रीकाकुलम व कश्मीर के सूर्य मन्दिरों, कम्बोडियाई अंकोरवाट, मिश्र के फरोहा मन्दिरों, लेबनान के बालबेक स्थित मन्दिरों, यूरोपीय ग्रीको-रोमन मन्दिरों, संक्रान्ति उत्सव स्थलों एवं प्राचीन माया आदि अमेरिकी सभ्यताओं के मन्दिरों के गर्भ गृह में पूर्व निर्धारित दिवस पर सूर्योदय की पहली किरण निर्बाध पहुंचती है। अयन संक्रान्तियों से आशय उत्तरायण व दक्षिणायन संक्रान्तियों से है और दिन व रात्रि एक समान होने पर वह विषुव संक्रान्ति कहलाती है।

सामाजिक उल्लास व समता का पर्व
मकर संक्रान्ति के दिन सारे भेदभाव भुलाकर पतंग प्रतियोगिता, गेंद से सतोलिया से लेकर क्रिकेट, फुटबाल, वालीबाल, हैण्डबॉल, बैलों की दौड़, घुड़दौड़ जैसे कई आयोजन एक सामाजिक जुड़ाव का भी आधार बनते हैं। तिल व गुड़ के व्यंजन भी समरसता व सामाजिक एकजुटाव का संदेश देते हैं। तिल के बिखरे कण, गुड़ व चीनी अपने मिठास व जोड़ने की क्षमता से तिल को जोड़े रखते हैं। यह सम्पूर्ण समाज के लिए समरस एकात्मता का संदेश लिये रहते हैं। 
प्रादेशिक विविधताओं की दृष्टि से बिहार में मकर संक्रान्ति की खिचड़ी खाई जाती है। उड़द चावल, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र कम्बल आदि दान करते हैं। महाराष्ट्र में लोग एक-दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं ‘‘तिळ गूळ घ्या आणि गोड़ गोड़ बोला’’ अर्थात तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो।

बंगाल में इस पर्व पर स्नान के पश्चात तिल दान करने की प्रथा है। यहां गंगासागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगा जी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। इस दिन यशोदा ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए व्रत किया था। इस दिन गंगासागर में स्नान-दान के लिए लाखों की भीड़ होती है। कहा जाता है सारे तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार।

तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाते हैं। पहले दिन कूड़ा-करकट इकट्ठा कर जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। चौथे दिन खीर बनाई जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। उसका सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ा प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक राज्य व संभाग में अनेक विविधताएं पाई जाती हैं।
(लेखक उदयपुर में पैसिफिक विश्वविद्यालय समूह के अध्यक्ष-आयोजना व नियंत्रण हैं)

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