कर्नाटक में कन्‍वर्जन विरोधी कानून से ईसाई समाज में डर क्यों?
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होम भारत

कर्नाटक में कन्‍वर्जन विरोधी कानून से ईसाई समाज में डर क्यों?

Written byआर एल फ्रांसिसआर एल फ्रांसिस
Dec 17, 2021, 02:07 pm IST
in भारत, मत अभिमत, दिल्ली
चर्च अनुसूचित जातियों से कन्‍वर्टेड लाेगाें काे हिंदू दलितों की श्रेणी में रहने काे मूक समर्थन देता है।

चर्च अनुसूचित जातियों से कन्‍वर्टेड लाेगाें काे हिंदू दलितों की श्रेणी में रहने काे मूक समर्थन देता है।

कर्नाटक सरकार का मानना है कि कन्‍वर्जन के खिलाफ मौजूदा कानून असरदार नहीं है, इसे लागू करना कठिन है। दिलचस्प बात यह है कि प्रस्तावित कानून से मुसलमान या सिख या जैन जैसे अल्पसंख्यक समूह चिंतित नहीं हैं। केवल ईसाई मिशनरी ही चिंतित हैं। कुछ साल पहले अपने काे हिंदू समाज से अलग बताने और अपने लिए अल्पसंख्यक का दर्जा मांगने वाला लिंगायत समुदाय भी राज्य में कन्‍वर्जन विरोधी कानून बनाने के समर्थन में है। 

कर्नाटक में कन्‍वर्जन विरोधी विधेयक को लेकर चर्च नेतृत्व ने भाजपा की बसवराज बोम्मई सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है। जिस तरह भाजपा शासित राज्‍यों की सरकारें कन्‍वर्जन विरोधी कानून ला रही हैं, उससे चर्च नेतृत्व में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। वे इसे ईसाई समाज विरोधी बता रहे हैं। वहीं, कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार ने बार-बार दोहराया है कि यह विधेयक अल्पसंख्यक विरोधी है।

बेंगलुरू डायसिस के आर्चबिशप और कर्नाटक रीजनल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल के अध्यक्ष डॉ. पीटर मचाडो का कहना है कि नया कानून केवल अल्पसंख्यकों को परेशान करने और उन पर हो रहे हमलों को प्रोत्साहित करने के लिए है। इनका तर्क है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में कन्‍वर्जन विरोधी विधेयक के आते ही वहां के अल्पसंख्यक समूहों पर हमले बढ़ गए थे। उत्तर प्रदेश में इस साल मार्च में कन्‍वर्जन विरोधी कानून बनाया गया था। उससे पहले नवंबर 2020 में राज्य की भाजपा सरकार इस संबंध में एक अध्यादेश लेकर आई थी। देश के 65,000 चर्चों के समूह और ईसाइयों के तीसरे सबसे बड़े संप्रदाय 'द इवैंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया' (ईएफआई) ने डॉ. पीटर मचाडो के विचार पर अपना समर्थन जताया है।

कर्नाटक सरकार का मानना है कि कन्‍वर्जन के खिलाफ मौजूदा कानून असरदार नहीं है, इसे लागू करना कठिन है। दिलचस्प बात यह है कि प्रस्तावित कानून से मुसलमान या सिख या जैन जैसे अल्पसंख्यक समूह चिंतित नहीं हैं। केवल ईसाई मिशनरी ही चिंतित हैं। कुछ साल पहले अपने काे हिंदू समाज से अलग बताने और अपने लिए अल्पसंख्यक का दर्जा मांगने वाला लिंगायत समुदाय भी राज्य में कन्‍वर्जन विरोधी कानून बनाने के समर्थन में है। कर्नाटक सरकार का मानना है कि कन्‍वर्जन केवल उत्तरी कर्नाटक के जिलों में ही नहीं हो रहा, बल्कि पूरे राज्य में हो रहा है। वहीं, चर्च नेतृत्व का मत है कि भारत में ईसाइयों की आबादी सिर्फ 2.1 प्रतिशत है, जबकि कर्नाटक में यह 1.87 प्रतिशत से भी कम है। अगर कन्‍वर्जन हाे रहा है, ताे हम बढ़ क्यों नहीं रहे हैं।

हालांकि चर्च के इस दावे में ज्यादा दम नही है। भारत में कैथोलिक चर्च के अनुयायियों का आधिकारिक आंकड़ा लगभग दो करोड़ है। कैथोलिक चर्च ने अपने प्रशासनिक ढांचे काे 200 के लगभग डायसिस और 29 पांथिक– प्रांतों में बांट रखा है। अगर सरकारी जनगणना काे ही सही माने, तो दाे करोड़ कैथोलिक हैं, बाकी प्रोटोस्टेंट या दूसरे डिनोमिनेशन, स्वतंत्र कलीसिया केवल कुछ लाख ही हैं, जबकि इससे कई गुना ज्यादा संख्या तो उसमें कार्य करने वाले और पांथिक प्रचारकों की ही हाेगी। प्रोटोस्टेंट या दूसरे डिनोमिनेशन, स्वतंत्र कलीसियाओं से जुड़े अनुयायियों की संख्या कैथोलिक से दोगुनी-तिगुनी होगी।

दरअसल, एक रणनीति के तहत चर्च अनुसूचित जातियों से कन्‍वर्टेड लाेगाें काे हिंदू दलितों की श्रेणी में रहने काे मूक-समर्थन देता है। ऐसे लोग ईसाइयत में दीक्षित होने के बाद वचन, आस्था और कर्म से ताे ईसाई हैं, लेकिन जनगणना में जानबूझकर खुद को ईसाई घोषित नहीं करते। अब तो प्रोटोस्टेंट या स्वतंत्र कलीसियाओं की स्थापना करने वाले अधिकतर प्रचारक, स्वतंत्र पादरी अपना ईसाई नाम भी नहीं रखते। उतर भारत में सिंह, चौधरी, बिहारी, यादव, तिवारी, शर्मा, मुखर्जी, बनर्जी जैसे कई नामों वाले पादरियाें की बाढ़ आई हुई है। पंजाब में पगड़ी वाले और कई जगह भगवाधारी पादरी आम हैं, जो गैर-ईसाइयों काे आसानी से ईसाइयत की तरफ आकर्षित करते है।

चर्च नेतृत्व का मानना है कि टेक्स्ट या परचे बांटना कोई अवैध काम नहीं है। संविधान मत प्रचार की अनुमति देता है। इसके लिए संविधान में प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गई और अपने मत के प्रचार-प्रसार की छूट दी गई। मगर यह भी व्यवस्था की गई कि किसी भी धर्म को मानने या उसे परिवर्तित करने की छूट भी उसे मिले, जिसमें राज्य का हस्तक्षेप न हो।

यह सही है कि भारत का संविधान किसी भी धर्म-पंथ का अनुसरण करने की आजादी देता है। उसमें निहित पांथिक प्रचार को भी मान्यता देता है। लेकिन मत-मजहब प्रचार और कन्‍वर्जन के बीच एक लक्ष्मण रेखा भी है। कन्‍वर्जन कराने का उद्देश्य लेकर घूमने वाले संसाधनों से लैस संगठित संगठनों को रोकने के लिए राज्य को हस्तक्षेप करना ही चाहिए। जहां भी अधिक संख्या में कन्‍वर्जन हुए है, वहां सामाजिक तनाव में वृद्धि हुई है। जनजातियों में कन्‍वर्जन के बढ़ते मामलों के कारण कई राज्यों में शांत ग्रामीण वातावरण दूषित हो रहा है। इन घटनाओं ने हिन्दू उपदेशकाें का ध्यान आकर्षित किया है जो अब कन्‍वर्टेड लोगों के घर वापसी के लिए जनजातीय क्षेत्रों में अभियान चला रहे हैं।

चर्च नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, झारखंड और हिमाचल प्रदेश में बने इसी तरह के कन्‍वर्जन विरोधी कानूनों को देश की अदालतों में चुनौती दी है। चर्च नेतृत्व का मानना है कि उत्तर प्रदेश का कानून भावना और चरित्र दोनों लिहाज से असंवैधानिक है। पूर्व के कन्‍वर्जन विरोधी कानून कन्‍वर्जन करवाने वाले के लिहाज से बने हुए थे, लेकिन हिमाचल प्रदेश और गुजरात में बने नए कानून कन्‍वर्जन कराने वालों से सवाल पूछते हैं। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश के नए कानून के अनुसार यदि कोई कन्‍वर्जन पर आपत्ति दर्ज करता है तो धर्म में बदलाव नहीं माना जाएगा। 

करीब एक दशक पूर्व उच्चतम न्यायालय ने ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस की हत्या पर एक महत्‍वपूर्ण फैसला दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि किसी भी व्यक्ति की आस्था-विश्वास में हस्तक्षेप करना, इसके लिए छल-बल प्रयोग करना, लालच देना या झूठा भरोसा दिलाना कि उनका मत-मजहब दूसरे धर्म-पंथ से अच्छा है और ऐसे तरीकों का इस्तेमाल करते हुए किसी व्यक्ति का कन्‍वर्जन करना किसी भी आधार पर न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। अदालत ने यह भी कहा था कि इस प्रकार के कन्‍वर्जन से हमारे समाज की उस संरचना पर चोट होती है जिसकी रचना संविधान निर्माताओं ने की थी। विद्वान न्यायाधीशों ने कहा कि हम उम्मीद करते है कि महात्मा गांधी का जो स्वप्न था कि धर्म राष्ट्र के विकास में एक सकारात्मक भूमिका निभाएगा वो पूरा होगा। किसी की आस्था को जबरदस्ती बदलना या यह दलील देना कि एक मत-मजहब दूसरे से बेहतर है, उचित नहीं है।

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