त्रिपुरा सबक है, इतना भी न इतराएं आंदोलनजीवी
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होम भारत

त्रिपुरा सबक है, इतना भी न इतराएं आंदोलनजीवी

Written byमृदुल त्यागीमृदुल त्यागी
Dec 1, 2021, 01:11 pm IST
in भारत, दिल्ली
कृषि कानूनों के रूप में मिला हथियार नक्सलियों और आंदोलनजीवियों के हाथ से छिन गया है. विदेश में छुट्टी मना रहे राहुल गांधी परिदृश्य पर लौट आए हैं. जिस तरह के नुकसान वह गिना रहे हैं, उसमें उनकी बौखलाहट छिपी है. राकेश टिकैत आंदोलन को वेंटीलेटर से निकालने की कोशिश कर रहे हैं, उससे भी साफ हो जाता है कि दिल्ली बॉर्डर के अलावा कहीं उनकी वापसी का स्थान नहीं है.

 

 केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस ले लिए. संसद से मोहर लग गई. राहुल गांधी, किसान वेशधारी आंदोलनजीवी, वामपंथी, नक्सल, कथित सेकुलर बुद्धिजीवी ताली बजाकर कह रहे हैं- मोदी सरकार हार गई. लेकिन गत रविवार को त्रिपुरा में स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजे आए. कुल 336 में से 329 स्थानों पर प्रचंड विजय भारतीय जनता पार्टी को मिली. ये जनता के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की अभूतपूर्व विजय है.

इन दो उदाहरणों में जो विरोधाभास है, वही भारतीय राजनीति का सत्य है. इस देश में ओपोनियन (आम राय) पर हमेशा दिल्ली में बैठे डिसीजन (निर्णय) मेकिंग लॉबी हो जाती है. तीन कृषि कानून बनने के बाद एक कृत्रिम आंदोलन दिल्ली के चारों तरफ हुआ. मामला खेती का था, किसान का था. लेकिन किसी गांव में आंदोलन नहीं हो रहा था. सिर्फ पंजाब के आढ़तियों और बड़े कास्तकारों, खालिस्तान समर्थकों के अलावा कहीं कोई बड़ा विरोध पूरे देश में नहीं हुआ. किसी चौपाल या पंचायत पर अनिश्चितकालीन धरना नहीं हुआ. हुआ, तो दिल्ली के दरवाजे पर. क्यों… इसलिए कि दिल्ली में बैठी एक लॉबी खुद को बाकी देश से ऊपर, बेहतर मानती है. आजादी के पहले से ही एक अभिजात्य तबका देश की डिसीजन मेकिंग (फैसले तय करना) पर हॉवी था. आजादी (सत्ता हस्तांतरण) कैसे किया जाए, देश बांट लिया जाए, बंटवारे के बाद अस्तित्व में आए शेष भारत का राजनीतिक स्वरूप क्या होगा आदि जैसे विषयों पर आज तक विवाद है, क्योंकि इन निर्णयों पर भी देशवासी का दिल नहीं, दिल्ली हावी थी.

वही दिल्ली (यहां दिल्ली का मतलब राज्य नहीं, वह सोच है जो खुद को शेष भारत से श्रेष्ठ समझती है) जो कभी राफेल युद्धक विमानों के खिलाफ हो जाती है (या किसी यूरोपीय एअऱक्राफ्ट के लिए लॉबिंग करने लगती है). वही दिल्ली जो नागरिकता संशोधन कानून को अचानक मुसलमान विरोधी करार दे देती है. ये भी वही दिल्ली है, जिसे जम्मू-कश्मीर के अनुच्छेद—370 से बाहर आकर भारतीय संघ में शामिल होने से परेशानी होती है. वही दिल्ली योगेंद्र यादव जैसे इच्छाधारी आंदोलनजीवी, राकेश टिकैत जैसे विफल नेता, गुरनाम सिंह चढ़ूनी जैसे अराजकतावादी, हन्नान मौला जैसे विषैले वामपंथी के कंधे पर लादकर एक छद्म किसान आंदोलन को दिल्ली की दहलीज पर ला पटकती है. दिल्ली की सीमा पर ये कथित नाकाबंदी ही नहीं हुई. और भी बहुत कुछ हुआ. यहां सरेआम टुकड़े करके किसान की लाश टांग दी गई. टैंटों में बलात्कार हुए. किसान को जिंदा जला दिया गया. पंजाब के चिट्टा का कारोबार दिल्ली बार्डर पर आ गया. लेकिन दिल्ली की जिद है. आप वही देखें, जिसे वह दिखाना चाहती है. वह नहीं चाहती, आप चेन्नई के उस किसान को देखें, जिसका नारियल ट्रेन में लदकर दिल्ली आता है और वह किसान कई गुना ज्यादा कमाता है. दिल्ली चाहती है आप किसान के रूप में सिर्फ राकेश टिकैत को देखें.

कांग्रेस ने दिल्ली में एक इकोसिस्टम तैयार किया है. आजादी के बाद से नेहरू के समाजवादी प्रेम ने आंदोलनजीवी, तथाकथित सेकुलर बुद्धिजीवी, जिहादी, अर्बन नक्सल, एनजीओ, अलगाववादियों (चाहे वह नार्थ ईस्ट हो या कश्मीर या फिर पंजाब), पाकिस्तान परस्तों का एक गैंग तैयार कर दिया था. इसी का जिक्र जब मोदी खान मार्केट गैंग के रूप में करते हैं, तो खलबली मचती है. यह गैंग अपनी पंसद को देश की पसंद के रूप में थोपता आया है. हद तक हुई, जब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के राज में सुपर पीएम के तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एनएसी के नाम पर सुपर मंत्रिमंडल का गठन कर डाला. यह पूरा गैंग 2014 से आज तक इस बात को हजम नहीं कर पाया है कि कैसे उनकी इच्छा के विरुद्ध राष्ट्र, हिंदू व जनाकांक्षा का प्रतीक बनकर नरेंद्र मोदी दिल्ली की कुर्सी पर आ बैठे. न सिर्फ आ बैठे हैं, बल्कि सात साल से जमे हुए हैं. ऐसा व्यक्ति जो दिल्ली के बाहर देखता है. भारत के सुदूर पूर्वी कोने से लेकर पश्चिम के छोर तक. दक्षिण में कन्याकुमारी से लेकर लद्दाख की सीमा तक. जिसके एजेंडे में शौचालय है. गरीबों के लिए पक्का मकान है. फ्री राशन है. फ्री इलाज है. फ्री सिलेंडर है. घर-घर बिजली पहुंचाने का जुनून है. यह आखिरी आदमी के चूल्हे तक पहुंचा विकास ही इस गैंग की बेचैनी है.

प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद भी एक स्थिति ज्यों की त्यों है. यह गैंग देश को जो दिखाना चाहता है, देश वही देखता है. देश नहीं देखता कि सरसों बाजार भाव बढ़ने से किसान को पांच साल पहले के मुकाबले दोगुना भाव मिला है. लेकिन देश को दिखाया जाता है कि सरसों का तेल महंगा हो गया है. सोयाबीन से लेकर मूंगफली के बाजार भाव से किसान को होने वाले लाभ की जगह रिफाइंड के महंगे होने की तस्वीर देश देखता है. इसी तरह किसान आंदोलन के मामले में भी गैंग कामयाब रहा. इसने तस्वीर पेश की कि कानून काले हैं. किसान बर्बाद हो जाएगा. किसान आंदोलन कर रहा है. किसान मर रहा है. इनका नैरेटिव (कथ्य) इसलिए मजबूत है कि ये सवाल भी खुद उठाते हैं, जवाब भी खुद देते हैं. जैसे इनके मुताबिक इस आंदोलन में साढ़े सात सौ किसान मर गए. जिन्हें ये शहीद बताते हैं. लेकिन ये नहीं बताते कि न कहीं लाठी चली, न गोली चली. फिर ये किसान कैसे शहीद हुए. कहां हुए. लेकिन आप इन्हें शहीद मानिए. इसलिए मानिए कि दिल्ली गैंग ने इन्हें शहीद करार दे दिया है. यही गैंग है, जो उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में हुई पांच लोगों की हत्या को सामंती हमला बताता है. देश देखता है कि प्रियंका गांधी वाड्रा दलितों के साथ मजबूती से कंधा मिलाकर खड़ी हैं. दलितों पर जुल्म हो रहा है. लेकिन जब ये सामने आता है कि प्रयागराज में हुए हत्याकांड के अभियुक्त दलित हैं, तो यह समाचार गायब हो जाता है.  

प्रधानमंत्री बनने से पहले जब नरेंद्र मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी मिली, वह तभी से इन साजिशों से मुकाबला कर रहे हैं. उन्होंने गुजरात में मुख्यमंत्री रहकर हर चक्रव्यूह तोड़ा. उन्होंने सांप्रदायिक हिंसा के आरोपों का जवाब विकास से दिया. सीबीआई के सामने तक अडिग रहे. एक वीजा को लेकर अमेरिका तक जो लॉबिंग की गई, उसे अविचल रहे. और फिर अमेरिका गए, तो उस हैसियत में जहां, वीजा की दरकार ही नहीं है. इन चक्रव्यूहों को बेधकर मोदी दिल्ली पहुंचे हैं. उन्हें इस बात का बखूबी अहसास था कि तीनों कृषि कानूनों की आड़ में क्या हो रहा था. वह इंदिरा गांधी की तरह न तो हठी हैं, न ही आत्ममुग्ध. उन्होंने पंजाब में खालिस्तान की चिंगारी देखी. उन्होंने देखा कि कैसे अमेरिका और यूरोप में विदेशी अलगाववादी ताकतें सिखों के बीच में आग जला रही हैं. उन्होंने ये भी देखा होगा कि किसान को बहलाकर एक ओर अलगाव की ओर ले जाया जा रहा है और दूसरी ओर नक्सल हिंसा का मुखौटा बनाया जा सकता है. वह यह भी समझे होंगे कि किसान का हित जरूरी है, लेकिन आंतरिक सुरक्षा की कीमत पर नहीं. उन्होंने क्षमा मांगी. कृषि कानून वापस लिए. लेकिन कहीं भी ये नहीं कहा कि ये सुधार जरूरी नहीं थे या फिर गलत थे.

कुल मिलाकर कृषि कानूनों के रूप में मिला हथियार नक्सलियों और आंदोलनजीवियों के हाथ से छिन गया है. विदेश में छुट्टी मना रहे राहुल गांधी परिदृश्य पर लौट आए हैं. जिस तरह के नुकसान वह गिना रहे हैं, उसमें उनकी बौखलाहट छिपी है. राकेश टिकैत जिस तरह से न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम पर आंदोलन को वेंटीलेटर से निकालने की कोशिश कर रहे हैं, उससे भी साफ हो जाता है कि दिल्ली बॉर्डर के अलावा कहीं उनकी वापसी का स्थान नहीं है. अभी एक अध्याय समाप्त हुआ है. लेकिन चक्रव्यूह बेधन का कार्य जारी है. ये विध्वंसकारी, अलगाववादी, नक्सली, जिहादी, आंदोलनजीवी फिर नए बहाने ढूंढेंगे. इसलिए ढूंढेगे कि समर्थ, शक्तिशाली, समृद्ध भारत इनकी मृत्यु का कारण बन सकता है. फिर भी इनको समझना होगा कि सुदूर पूर्वी भारत के एक राज्य में भारतीय जनता पार्टी सभी दलों का सूपड़ा साफ कर देती है. दिल्ली में माहौल बनाकर आप अब देश को नहीं हांक सकते. विकास के आकांक्षी भारत के हर नागरिक के पास अब अपना एजेंडा है.  

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