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सामयिक : सनातन ज्ञान और विज्ञान

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 2, 2021, 12:15 pm IST
in भारत, धर्म-संस्कृति, दिल्ली

आराधना शरण
 


हिंदुत्व की जो चिरंतन परंपरा और सारगर्भित जीवन दर्शन एक सभ्य समाज की संरचना और मानवीय मूल्यों के विकास और पोषण के लिए गढ़ा गया, उसे उथले, सतही और अज्ञान के अंधकार में डूबे लोग आधारहीन व्याख्या करके मलिन कर रहे। रटगज विश्वविद्यालय के छात्रों के मुक्त पत्र को पढ़ें जिसमें उन्होंने विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ट्रुश्के और प्रो. डानिगर के बारे में तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है जो हमारी महान परंपरा के धरोहर ग्रन्थों के अर्थ का अनर्थ कर विकृत व्याख्या परोस रहे हैं
 


हिंदुत्व शब्द जिस दर्शन को परिभाषित करता है, उसे वर्तमान समाज और माहौल में अधिकांश लोग सकारात्मक स्वरूप में नहीं देखते। एक अजीब-सा दौर है। जो चिरंतन परंपरा और सारगर्भित जीवन दर्शन एक सभ्य समाज की संरचना और मानवीय मूल्यों के विकास और पोषण के लिए गढ़ा गया, उन्हें उथले, सतही और अज्ञान के अंधकार में भटकते लोग तर्क-कुतर्क और आधारहीन व्याख्या करके मलिन कर रहे हैं। यह सिलसिला दशकों से निरंतर जारी रहा है और हमारे धर्मग्रन्थों और लोकजीवन शैली  में पिरोए ज्ञान से उलट एक कुरूप व्याख्या प्रसारित होती रही। न सिर्फ हमारी जमीन पर, बल्कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर कई परिसरों में हमारे हिंदू दर्शन की गरिमा को धूमिल करने के षड्यंत्र चल रहे हैं।

मिसाल के तौर पर रटगज यूनिवर्सिटी  के छात्रों के ओपेन लेटर को पढ़ें जिसमें उन्होंने यूनिविर्सटी के प्रोफेसर ट्रुश्के और प्रो. डानिगर के बारे में तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है जो हमारी महान परंपरा के धरोहर ग्रन्थों को न जाने किसी चश्मे या बुद्धि से पढ़ रहे हैं कि सारे अर्थ का अनर्थ कर ऐसी विकृत व्याख्या परोस रहे हैं, जो किसी भी स्वाभिमानी हिंदुस्तानी की कलम को उन्हें हिंदू दर्शन का सही और सटीक पाठ पढ़ाने के लिए उद्धत कर देगी।

हिंदुत्व वह तत्व है जो हिंदू दर्शन का मूल सार प्रस्तुत करे। हमारे सनातन धर्म में व्यक्ति को संयम, सहिष्णुता और अन्य धर्म परंपराओं का आदर करने का पाठ दिया गया है और अनुशासित सामाजिक व्यवस्था और वसुधैव कुटुबंकम् की स्थापना की जिम्मेदारी दी गई है। इसे जन-जन में सरल-सहज रूप से प्रसारित करने के लिए पुराणों, उपनिषदों और धर्मग्रन्थों में विभिन्न तेजस्वी और अलौकिक छवियों की गाथा रची गई। ये सब हमारे लिए परम वंदनीय और प्रेरणा के स्त्रोत और मार्गदर्शक हैं।

पर कुछ अजीब सा उभर रहा है आसपास, जो बेचैन कर रहा है। हमारे पूजनीय प्रतीकों को मलिन करने, हमारी महान परंपरा और दर्शन को धूमिल करने के प्रयास हो रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि उस पर गहन अध्ययन कर उन्हें समझने और सही विश्लेषण करने के बजाय बस उथले ज्ञान के मलिन प्रकाश में उसे देखने-समझने का दंभ भरकर उन पर कीचड़ उछाला जा रहा है।

अगर कुछ गलत है तो आपको उसे अनुचित कहने का पूरा अधिकार है, आखिर हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का हिस्सा हैं। पर अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हम अपनी परंपराओं को मलिन करें, यह कहां तक सही है। धर्म एक संवेदनशील विषय है। आप विश्व के सभी धर्मों की कोमल भावनाओं का आदर करने के लिए तत्पर रहें और हिंदू धर्म के सभी प्रतीकों और परंपराओं के बारे में बेधड़क अनुचित और अपमानजनक बातें कह जाएं, यह अक्षम्य है।
दुनिया भर में जितने भी धर्म हैं, उनके विरुद्ध कोई भी टिप्पणी करने की हिम्मत नहीं करता, क्योंकि उसके परिणाम खतरनाक होंगे, पर हिंदू धर्म की परंपराओं और प्रतीकों या धर्मग्रन्थों में उल्लिखित देवी-देवताओं पर कोई भी, कुछ भी टिप्पणी करने से नहीं हिचकता और फिर कोई प्रतिकार करे तो इनटॉलरेंस का ठप्पा लगा दिया जाता है जबकि हिंदू धर्म के मूल में ही सहनशीलता का पाठ निहित है।

हिंदू परंपरा के मूल में सहिष्णुता
हमारी धार्मिक परंपरा के मूल में सहिष्णुता है, इसकी सबसे सशक्त अभिव्यक्ति स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका की धरती पर शिकागो में 11 सितम्बर 1893 को हुई विश्व धर्म संसद में भारत और हिंदुत्व के प्रतिनिधि के तौर पर दी थी। सभागार में मौजूद लोगों को भाइयो एवं बहनो के स्नेहपूर्ण संबोधन से उन्होंने सबका दिल जीत लिया था। अपनी ओजस्वी वाणी में उन्होंने कहा कि ‘मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया। हम केवल सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं करते हैं, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं।’ उनका मानना था कि अगर हम भगवान को हर इनसान और खुद में नहीं देख सकते तो हम उसे ढूंढ़ने कहां जा सकते हैं?

उन्होंने हिंदू धर्म का सार पेश किया और यही हमारी विचारधारा का आधार रहना चाहिए। विवेकानंद जी ने मनुष्य के चुने गए धर्ममार्ग की नदियों से तुलना की है और कहा है कि अंतत: सभी भगवान तक ही पहुंचते हैं।

उन्होंने कहा, ‘सांप्रदायिकताएं, कट्टरताएं और इनकी भयानक वंशज हठधर्मिता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी ही बार यह धरती खून से लाल हुई है, कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं। अगर ये भयानक राक्षस न होते, तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता।’

आज भी समय कुछ ऐसा ही है। स्वामी विवेकानंद जी ने 1893 में धर्म संसद में एक ऐसे शंखनाद का आह्वान किया था जो सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करे। तभी एक सुव्यवस्थित समाज की स्थापना हो सकेगी। इसलिए आज उन नकारात्मक और कुप्रसारित तथ्यों का जवाब देने का समय सामने आ चुका है।

रटगज विवि के दो प्रोफेसरों की मूढ़ता
रटगज यूनिवर्सिटी (फ४३ॅी१२ वल्ल्र५ी१२्र३८) के हिंदू छात्रों के ओपेन लेटर में बताया गया है कि यूनिवर्सिटी के प्रो. डानिगर और ट्रुश्की हिंदू धर्म पर कैसे कुत्सित प्रहार कर रहे हैं। इन दोनों प्रोफेसरों ने हमारे पूजनीय ग्रन्थ श्रीमदभगवद् गीता, रामायण और महाभारत, सीता और द्रौपदी, राम-कृष्ण, वेद सिद्धान्तों और सूत्रों आदि पर अशोभनीय टिप्पणी की है। उन्हें समझाना होगा कि वे कितने अज्ञानी हैं। उन्हें पता ही नहीं कि हमारे धर्म शास्त्रों में वर्णित ये किरदार प्रतीकात्मक रूप से किस तात्विक विवेचना को प्रस्तुत कर रहे हैं और किस उत्कृष्ट दर्शन की अभिव्यक्ति हैं।

डानिगर लिखते हैं कि कृष्ण नरसंहार और आत्महंता प्रवृत्ति का पोषण करते हैं। गीता को वह एक अनुचित ग्रन्थ ठहराते हैं। वही प्रो. ट्रुश्की द्र्रौपदी के चीरहरण को भारत के रेप कल्चर का जनक बताती हैं। हैरानी होती है उनकी बुद्धि पर कि उन्होंने कैसी शिक्षा हासिल की है? उन्हें क्या पता कि चीरहरण महाभारत का एक ऐसा उद्धरण है जहां स्त्री के स्वाभिमान की एक ऐसी अग्नि प्रज्ज्वलित होती है जो उसकी शुचिता के तेज को प्रतिष्ठित करने के साथ उन अपराधियों के यथोचित दंड की भूमिका भी तैयार करती है जो महाभारत के अंत में एक अनुशासित समाज की स्थापना के साथ संपन्न होता है। जहां तक प्रोफेसर डानिगर की कृष्ण पर की गई टिप्पणी का स्वाल है तो जिन्हें कृष्ण का ज्ञान नहीं, वे कृष्ण के गीता में उद्बोधन को कहां समझा पाएगा। कृष्ण का यह कहना कि मारने वाला मैं ही हूं, जीवन-मृत्यु के उस शाश्वत चक्र का प्रतिबिंब है जिसे काल यानी समय संचालित करता है और काल कृष्ण स्वरूप है-

‘अहमेवाक्षय: कालो धाताहं विश्वतोमुख:।।’
कृष्ण ही ब्रह्मस्वरूप हैं जो प्रकृति के सभी, समस्त जीवों को उनके कर्मों के अनुसार बार-बार शरीर प्रदान करते हैं और उसी के अनुसार उनकी मृत्यु का समय भी निर्धारित होता है।

‘प्रकृतिम स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुन: पुन:।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशम प्रकृतेर्वशात॥’

मृत्यु की घटना में जीव वर्तमान काया को त्याग कर नए शरीर को धारण करता है पर उसकी आत्मा नही मरती-
‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
 न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।।’
चेतना के रूप में मस्तिष्क में है आत्मा का निवास

हिंदू धर्मग्रंथ और वेदों में लिखा है कि आत्मा मूलत: चेतना के रूप में मस्तिष्क में निवास करती है जो मृत्यु के बाद ब्रहमांड में विलीन हो जाती है। आज विज्ञान ने भी साबित किया है कि मस्तिष्क में क्वांटम कंप्यूटर के लिए चेतना एक प्रोग्राम की तरह काम करती है। हमारी आत्मा का मूल स्थान मस्तिष्क की कोशिकाओं के अंदर बने ढांचों में होता है जिसे माइक्रोटयूबुल्स कहते हैं जिस पर क्वांटम गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के कारण हमें चेतनता का अनुभव होता है। माइक्रोटयूबुल्स में क्वांटम सूचनाएं नष्ट नहीं होतीं बल्कि व्यापक ब्रह्मांड में वितरित और विलीन हो जाती हैं। विज्ञान के आर्वेक्स्ट्रेड आॅब्जेक्टिव रिडक्शन सिद्धान्त के अनुसार हमारी आत्मा मस्तिष्क में न्यूरॉन के बीच होने वाले संबंध से कहीं व्यापक है। इसका निर्माण उन्हीं तंतुओं से हुआ जिससे ब्रह्मांड बना था और कृष्ण में ही ब्रह्मांड है।

अब आप सोचिए कि व्यास रचित महाभारत में व्यक्त गीता में कृष्ण के जरिए क्या इसी चेतनता के सिद्धान्त को प्रस्तुत नहीं किया गया?
हमारी परंपरा में निहित राम-कृष्ण चिंतन मयार्दापूर्ण और धर्मनिष्ठ कर्म का प्रतीक है। वाल्मीकि रामायण में वर्णित सीता की अग्निपरीक्षा का प्रसंग रावण के अतीत में स्त्री के साथ किए अमर्यादित व्यवहार पर मिले शाप के कारण उसकी मृत्यु की भूमिका रचने का एक संदर्भ है, न कि सीता के सतीत्व पर प्रश्न। सीता तो इतनी पवित्र हैं कि उनके स्पर्श से कलुषता भी पावन हो जाए। अत: महामुनि व्यास अपने अध्यात्म रामायण में राम की लीला दिखाते हुए दर्शाते हैं कि राम अग्नि से उस वास्तविक सीता को लाने के लिए उन्हें अग्नि में प्रवेश करने के लिए कहते हैं जिससे सीता का माया रूप, जो रावण ले गया था, वह वापस अग्नि में समा जाए और वास्तविक सीता वापस आ जाएं।

खुद अग्निदेव वास्तविक सीता को वापस करते हुए कहते हैं कि हे रघुबीर, पहले तपोवन में मुझे सौंपी हुई देवी जानकी को अब ग्रहण कीजिए।
‘रक्ताम्बरां दिव्यविभूषणान्विताम।।19।।
प्रोवाच साक्षी जगतां रघूत्तमं प्रपन्न्सर्वांर्तिहरं हुताशन:।।20।।
ङ्घतिरोहिता सा प्रतिबिम्बरूपिणी कृता यदर्थंकृतकृत्यतां गता।

वह प्रतिबिम्ब रूपी माया सीता, जिस उद्देश्य के लिए रची गई थीं, उसे संपन्न करके अदृश्य हो गई हैं। प्रो. ट्रुश्के को यह समझने की जरूरत है कि हिंदू धर्मग्रन्थों से जिन उदाहरणों को लेकर उन्होंने हिंदू समाज को स्त्री विरोधी, या रेप कल्चर को बढ़ावा देने वाला, नरसंहार को प्रोत्साहित करने वाला आदि कह कर धूमिल करने की कोशिश की, उसका मूल सार तत्व वह कभी नहीं समझ सकते। हिंदू दर्शन एक कालजयी धारा है, किसी एक कालखंड में घट रही घटना नहीं। किसी भी प्रसंग या पाठ को आप क्षण मात्र न तो आंक सकते हैं, न ही समझ सकते हैं। इसके लिए गहरी दृष्टि और गहन अनुसंधान और अध्ययन की जरूरत है।

हमारे हिंदू धर्म दर्शन में जीवन को एक काल खंड की घटना नहीं माना गया है, बल्कि यह चिरंतन चल रही यात्रा है जिसमें विभिन्न अनुभव एक जन्म के पड़ाव की कहानी बांचते हैं। यह निरंतर विकास कर रही सभ्यता की गाथा है जिसमें उपयुक्त, उचित और न्यायसंगत सिद्धान्तों की स्थापना का सतत कर्म जारी है। पुराणों-उपनिषदों में बताए गए ज्ञान को जन-जन को सहज-सरल और आसानी से समझाने के लिए प्रतीकों और किरदारों का उपयोग हुआ है। दुनिया के किसी कोने में बैठा कोई मूर्ख व्यक्ति कुछ भी व्याख्या पेश कर दे और हम मौन रहें, ऐसा अब नहीं होगा।

नवंबर 2000 को डानिगर ने श्रीमदभगवद् गीता पर अशोभनीय टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘यह युद्ध को न्यायसंगत ठहराती है।’ उनकी बातों से उनकी अज्ञानता और मूढ़ता ही झलकती है। वास्तविकता तो यह है कि गीता का आदेश धर्म और नीति का मार्ग है जो एक व्यवस्थित समाज के लिए निहायत जरूरी है।

हिंदू धर्म का यही बुनियादी आधार है। पर हजारों साल प्राचीन हमारी सनातन परंपरा और समृद्ध धरती के स्वर्णिम स्वरूप की मूल संयोजना बदलती चली गई जब इस पर विदेशी हमलावरों के पैर पड़ने लगे और उन्होंने यहां अपना साम्राज्य खड़ा किया। धीरे-धीरे हमारे ग्रन्थों-पुराणों में संजोए ज्ञान को सुनियोजित तरीके से ध्वस्त करने का कार्य शुरू हुआ जो सैकड़ों साल निरंतर जारी रहा और आज हमारे रीति-रिवाजों, धर्मग्रन्थों के ज्ञान और उपदेशों को उनकी मूल व्याख्या से भटका कर एक कुरूप और विकृत स्वरूप दे दिया गया। अब समय है कि उसकी गरिमा को फिर से स्थापित किया जाए।

 

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