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प्राचीन शासन विधान मंत्रिपरिषद व शासकीय कार्यविधियां

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 11, 2021, 11:59 am IST
inधर्म-संस्कृति, दिल्ली

प्रो. भगवती प्रकाश
 


राजाओं के लिए प्राचीन काल में शासन और निर्णय संबंधी विधानों व नियमावलियों का पालन बाध्यकारी होता था। प्राचीन भारतीय वाग्यमय में विस्तार से मन्त्रिमण्डल की संरचना, कार्य विधान, योग्यता, निर्णय पद्धति, सबका उल्लेख है


संविधान आधारित लोकतंत्र में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित सभी शासकीय विविध अधिकारियों के अधिकार, उनके विभागों की कार्य पद्धतियां आदि लिखित विधानों व स्थापित परम्परानुसार संचालित होते हैं। प्राचीन वैदिक व अन्य संस्कृत ग्रन्थों में आज से भी अधिक विस्तृत, विधान एवं उनकी अनिवार्य पालना के प्रचुर विमर्श हैं। राजाओं के लिए प्राचीन काल में इन विधानों व नियमावलियों का पालन बाध्यकारी होता था। इन प्राचीन विधानों, नियमों व नीति-निदेर्शों का राजशास्त्र सम्बन्धी प्राचीन ग्रन्थों में कई हजार पृष्ठों में विस्तार है।

मन्त्रिमण्डल : संरचना व कार्य विधान
राजा के मन्त्रिमण्डल की संरचना में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व, मन्त्रिमण्डलीय परामर्श के अनुसरण की बाध्यता, मन्त्रियों की योग्यता व संख्या आदि का विस्तृत विवेचन कई सहस्त्राब्दी पूर्व ही महाभारत, गृह्य सूत्रों, नीति ग्रन्थों व ब्राह्मण ग्रन्थों सहित राज शास्त्र के शताधिक ग्रन्थों में है। इनमें हमारी अति उन्नत प्राचीन सभ्यता व उत्कृष्ट अर्थशास्त्र, राज-शास्त्र, न्याय शास्त्र, अंतरराष्ट्रीय राजनय के प्रचुर विमर्श हैं।

चारों वर्णों से युक्त मन्त्रिमण्डल : महाभारत सहित कई ग्रन्थों में मन्त्रिमण्डल में चारों वर्णों के समावेश को आवश्यक बताया गया है। महाभारत शान्ति पर्व (85/7/9) में 37 सदस्यीय मन्त्रिमण्डल में 3 शूद्र व 1 सूत आवश्यक बताए गए हैं। महाभारत के इस श्लोक के अनुसार मन्त्रिमण्डल की संरचना में 4 विद्वान साहसी ब्राह्मण, 8 वीर क्षत्रिय, 21 धनी वैश्य, 3 शूद्र व पुराणों में पारंगत 1 सूत की संख्या अनिवार्य बताई गई है। यहां शूद्र व सूत की संयुक्त संख्या 4 है और मन्त्रिमण्डल में ब्राह्मण भी 4 ही सुझाए गए हैं। कई ग्रन्थों में कर्षक अर्थात् किसानों व शिल्पकारों के प्रतिनिधियों को भी मन्त्रिमण्डल से जोड़ने का विधान है। कामन्दक आदि ने राज्य की आर्थिक समृद्धि के लिए शूद्रों को मूलाधार माना है क्योंकि वह विविध प्रकार की मूल्यवान वस्तुओं का उत्पादक वर्ग था। वैदिक व्युत्पत्ति में ‘श्रमस्य स्वेदेन उत्पादनरतैव शूद्र:’ के अनुसार शूद्र्र मूल्यवान वस्तुओं का उत्पादक था।

मन्त्रियों की योग्यताएं और स्वहित में निर्णय-निषेध : मन्त्रियों द्वारा स्वहित के निर्णयों से स्वयं को पृथक रखने की आवश्यकता जैसे विषयों पर प्राचीन ग्रन्थों में प्रचुर सामग्री है। भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों के अंतर्गत नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों में स्पष्ट उल्लेख है कि ‘कोई व्यक्ति स्वहित में निर्णायक नहीं हो सकता है।’ ऐसे निषेध हमारे प्राचीन ग्रन्थों में प्रचुरता में हैं। यथा- मत्स्य पुराण (215/83-74) एवं अग्निपुराण (220/16-17) व विष्णुधर्मोत्तर सूत्र (2/24/55/56) के अनुसार मन्त्रियों को अपने दायादों के निर्णय अपने हाथ में नहीं लेने चाहिए।

कौटिल्य (1/9), मनु(7/54), याज्ञवल्कय (1/312), कामन्दक (4/25-30), महाभारत शान्तिपर्व (118/2/3) में मन्त्रियों के 14 गुणों का वर्णन है, शान्ति. ( 80/25-18), बालकाण्ड 2 (7/7-18), अयोध्याकाण्ड (100/15), मेधातिथि (मनु 7/54 ), अग्निपुराण (239/11-15), कामन्दक (4/25 एवं 28-31), राजनीतिरत्नाकर (पृ. 13-14), राजनीतिप्रकाश (पृ. 174-178), राजधर्मकौस्तुभ (पृ. 251-254), बुधभूषण (पृ. 32/57-58) ने मन्त्रियों के गुण बताये हैं। मन्त्री देशवासी, ज्ञात कुल व पृष्ठभूमि का, प्रभावशाली, कला निपुण, दूरदर्शी, समझदार, अच्छी स्मृति वाला, सतत जागरूक, अच्छा वक्ता, निर्भीक, मेघावी, उत्साह एवं प्रताप से परिपूर्ण, धैर्यवान (मन-कर्म से), पवित्र, विनयशील (राजा के प्रति), अटूट श्रद्धावान, चरित्र, बल, स्वास्थ्य एवं तेजस्विता से परिपूर्ण, हठवादिता एवं चाञ्चल्य से दूर, स्नेहवान्, ईर्ष्या से दूर हो। महाभारत (शान्तिपर्व 83/35-40) में दुर्गुणों का उल्लेख कर श्लोक 41 से 46 में उसे पौरों एवं जनपदों का विश्वास प्राप्त होना बताया है।

मन्त्रिमण्डलीय मन्त्रणा व मन्त्रियों की सम्मति की अनिवार्यता
मनु (7/58-59) के अनुसार यथा— शान्ति एवं युद्ध, स्थान (सेना, कोष, राजधानी एवं राष्ट्र या देश), कर के उद्गम, रक्षा (राजा एवं देश की रक्षा), पाए हुए धन को रखना या उसके वितरण पर मन्त्रियों से मन्त्रणा आवश्यक है। राजा को मन्त्रियों की पृथक-पृथक या सम्मिलित रूप में सम्मति लेकर, जो लाभप्रद हो, वही करना चाहिए। कामन्दक (13/23-24) व अग्निपुराण (241/16-18) के अनुसार मन्त्रियों के मुख्य कार्य- मन्त्र अर्थात् रीति-नीति या स्ट्रेटेजी निर्धारण, किसी देश को जीतना या रक्षा करना, राज्य के कार्य करना, किसी किए जाने वाले कार्य के अच्छे या बुरे प्रभावों के विषय में भविष्यवाणी करना, आय एवं व्यय, शासन (दण्डनीय को दण्ड देना), शत्रुओं को दबाना, अकाल जैसी विपत्तियों के समय उपाय करना, राजा एवं राज्य की रक्षा करना।

श्लोक : – मन्त्रो मन्त्रफलावाप्ति: कायार्नुष्ठानमायति:। आयव्ययौ दण्डनीतिरमित्रप्रतिषेधनम्।। व्यसनस्य प्रतीकारो राज राज्याभिरक्षणम्। इत्यमात्यस्य कमेर्दं हन्ति स व्यसनान्वित: ।। (कामन्दक 13/23-24 = अग्नि० 241/16-18);
आयो व्यय: स्वामिरक्षा तन्त्रपोषण चामात्यानामधिकार:। नीतिवाक्यामृत (अमात्यसमुद्देश), पृ० 185।
राजा मन्त्रिपरिषद् की बैठकों का अध्यक्ष होता था। उसकी अनुपस्थिति में प्रधानमन्त्री होता था (मनु. 7/141)। मालविकाग्निमित्र (5) के अनुसार राजा का द्वैराज्य सम्बन्धी निर्णय मन्त्रिपरिषद् को भेजा जाता था और प्रधान अमात्य (अर्थात् प्रधानमन्त्री) के यह कहने पर कि परिषद् ने आपकी बात मान ली है, तब राजा ने मन्त्री सेनापति वीरसेन को प्रस्ताव लागू करने को भेजा। कौटिल्य (1/15) के अनुसार सभी कार्य मन्त्रियों की उपस्थिति में होने चाहिए, यदि कोई अनुपस्थित रहे तो उसकी सम्मति पत्र लिखकर मांग लेनी चाहिए। आकस्मिक भय के समय राजा को अपनी छोटी एवं बड़ी मन्त्रिपरिषदों को बुला बहुमत से निर्णय करना चाहिए।

कार्य प्रतिपालक अर्थात प्राचीन संवैधानिक अधिकारी
राज्य शासन में व्यापक अधिकार युक्त प्रतिपालक व 11 रत्नी भी सम्मिलित होते हैं यथा- सेनापति, पुरोहित, बड़ी रानी, सूत ग्रामणी (मुखिया), क्षत्ता (कंचुकी), संगृहीता (कोषाध्यक्ष), अक्षावाप (लेखाध्यक्ष); भागदुध (करादाता), गोविकर्तन, दूत, परिवृक्ति (त्यागी हुई रानी) (शतपथ ब्राह्मण 5/3/2)। तैत्तिरीय ब्राह्मण (1/7/3) में इन रत्नियों को राष्ट्र के दाता व निर्णयों का सूत्रधार कहा है (एते वै राष्ट्रस्य प्रदातार:)। शतपथ ब्राह्मण (5/3/2/2) के अनुसार सेनापति एवं गोविकर्तन-जैसे रत्नी लोग प्रतापी शूद्र थे। कल्हण की राजतरंगिणी (5/63) के अनुसार किसी भी वर्ण या कुल का व्यक्ति मन्त्री-पद का पात्र हो सकता हैं। अवन्तिवर्मा का अभियन्ता एक सुयोग्य शूद्र था और एक शूद्र वर्णीय चौकीदार आगे चलकर मुख्यमंत्री बना (7/207)।

श्लोक:-     कच्चिदष्टादशान्येषु स्वपक्षे दश पञ्च च। त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैवेंत्सि तीर्थानि चारकै:।। अयोध्या० 100/36 = सभा० 5/28 = नीतिप्रकाशिका 1/52।
प्राचीन शासकीय कार्य पद्धति

फाइलों पर टिप्पणी लेखन पर शुक्रनीतिसार (2/362-370) अच्छा मार्गदर्शन है। यथा- सर्वप्रथम मन्त्री, प्राविवाक (मुख्य न्यायाधीश), पण्डित (धर्माध्यक्ष) एवं दूत अपने विभागों से सम्बन्धित सम्मति या अनुशंसा लिखते हैं। इस पर अमात्य उस पर ‘‘साधु लेखनमस्ति’’ (अच्छा लिखा है) लिख सकता है। उस पर सुमन्त ‘‘सम्यग् विचारितम’’(ठीक से सोचा-विचारा गया है) लिख देता है, तब प्रधान लिखता है- ‘सत्यं यथार्थम्’ (यह सही व मान्य है और कार्य के अनुकूल है), तदुपरान्त प्रतिनिधि लिखेगा- ‘अंगीकतु योग्यम्’ (स्वीकार करने योग्य है), उस पर युवराज लिखता है- ‘‘अंगीकर्तव्यम्’ (यह स्वीकार कर लिया जाए), तब पुरोहित लिखता है- ‘लेख्य स्वाभिमतम्’ (मैं इसका अनुमोदन करता हूँ)। सभी लोग ऐसा लिखकर अपनी विहित मुहर लगाएंगे और तब राजा लिखता है- ‘‘अंगीकृतम्’’ अर्थात् स्वीकृत हो गया या अनुमोदित और अपनी मुहर लगा देता है।

निष्कर्ष
इस प्रकार कई सहस्त्राब्दी प्राचीन भारतीय शासन विधान, मन्त्रिपरिषद की संरचना व गठन, विभागों की कार्य पद्धति, कार्यालयीन पद्धतियां आदि आज के शासन विधान व पद्धतियों की तुलना में किसी दृष्टि से अल्पविकसित या कबीलाई श्रेणी की निर्णय प्रणाली जैसी नहीं थीं। महाभारत व शुक्रनीति आदि का रचनाकाल 5000 वर्ष प्राचीन होने से स्पष्ट है कि भारत में उन्नत शासन विधान की अति प्राचीन परम्परा है।

    (लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)

 

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