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महाराष्ट्र में वसूली अघाड़ीः शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस ने मंदिर तक आपस में बांट लिए

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jun 25, 2021, 02:51 pm IST
in महाराष्ट्र

मृदुल त्यागी

महाराष्ट्र की महा विकास (पढ़ें-वसूली) अघाड़ी (एमवीए) सरकार ने अब मंदिरों को लूटने का साझा कार्यक्रम तैयार कर लिया है. मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र के तीन सबसे अमीर मंदिरों का बंटवारा गठबंधन की तीन पार्टियों के बीच कर लिया है. बंटवारे का सारांश ये है कि इन तीन मंदिरों की कमान शिवसेना, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के बीच बंट जाएगी.

महाराष्ट्र की महा विकास (पढ़ें-वसूली) अघाड़ी (एमवीए) सरकार ने अब मंदिरों को लूटने का साझा कार्यक्रम तैयार कर लिया है. मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र के तीन सबसे अमीर मंदिरों का बंटवारा गठबंधन की तीन पार्टियों के बीच कर लिया है. बंटवारे का सारांश ये है कि इन तीन मंदिरों की कमान शिवसेना, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के बीच बंट जाएगी. और सौ करोड़ रुपये महीने की वसूली खुलेआम करने वाली इस सरकार का इरादा मंदिरों को लूटने के अलावा क्या हो सकता है. हिंदू आस्था केंद्र वैसे भी इन सेकुलर दलों के लिए लूट का जरिया भर ही तो रहे हैं.

लोकतंत्र में भ्रष्टाचार एक हकीकत है. लेकिन बेशर्मी के साथ लूट के कीर्तिमान महाराष्ट्र की उद्धव सरकार ने ही स्थापित किए हैं. रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी को डराने के लिए उनके घर के बाहर महाराष्ट्र की पुलिस बम प्लांट कर देती है. इरादा वसूली ही था. जब इस कांड का सूत्रधार और उद्धव की आंखों का तारा सचिन वाझे गिरफ्तार होता है, तो पता चलता है कि लूट का टारगेट तो उसे महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने दिया था. देशमुख का फरमान था कि मुंबई के सभी बार, क्लब, होटल से कम से कम सौ करोड़ रुपये की वसूली करके उसे सौंपी जाए. राजनीति के स्वयंभू चाणक्य (वास्तव में मौकापरस्त) शरद पवार बेशर्मी के साथ देशमुख का तब तक बचाव करते रहे, जब तक अदालत में छिछालेदार न हो गई. लेकिन जहां, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस हो… हर शाख पर ऐसे ही देशमुख बैठे हैं. और इस मंडली के सरताज होने के कारण उद्धव भी अब उसी रंग में पूरी तरह रंग चुके हैं. कभी भगवा, भवानी और शिवाजी की राजनीति करने वाली शिवसेना कहां तक गिर चुकी है, इसका अंदाजा जरा ताजा फरमान से लगाइये.

इस महावसूली सरकार ने तीन मंदिरों का नियंत्रण घटक दलों के बीच बांट लिया है. मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर का चेयरमैन शिवसेना से होगा. शिरडी सांई बाबा मंदिर ट्रस्ट की कमान राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को दी गई है. पंढरपुर के विट्ठल रुकमणी मंदिर का नियंत्रण कांग्रेस के हाथ में रहेगा. अब सोचने वाली, सवाल उठाने वाली बात ये है कि मंदिरों के नियंत्रण की बंदरबांट क्यों ? जवाब भी स्वाभाविक है, लूट. चूंकि साझा सरकार है, तो लूट में सबका हिस्सा है.

शिवसेना के हिस्से में मुंबई के प्रभादेवी में स्थित श्री सिद्धिविनायक मंदिर है. यह देश में स्थित सबसे प्रमुख मंदिरों में से एक है. यह मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है. मंदिर का निर्माण 1801 में विट्ठु और देउबाई पाटिल ने किया था. यहां गणेशजी की प्रतिमा के ऊपर बना छज्जा 3.7 किलो सोने का बना हुआ है. इसे कोलकाता के एक व्यापारी ने दान किया था. इस मंदिर की सालाना आमदनी 48 करोड़ रुपए से अधिक है. मंदिर के नाम पर 125 करोड़ रुपए फिक्सड डिपोजिट के रूप में जमा हैं. अब आप समझ सकते हैं कि क्यों इस मंदिर का नियंत्रण महत्वपूर्ण है.  

शरद पवार के हिस्से में साईं बाबा ट्रस्ट आया है. पिछले कुछ दशकों में शिरडी के साईं बाबा मंदिर ने काफी वैभव अर्जित किया है. इस मंदिर में हर धर्म के लोग पहुंचते हैं. इस मंदिर की संपत्ति में सोने और चांदी के गहने शामिल हैं जिनकी कीमत 32 करोड़ रुपए से अधिक है. इस मंदिर को लगभग 350 करोड़ रुपए हर साल दान में मिलते हैं. मंदिर को देश-विदेश से हर साल औसतन ढाई करोड़ लोग दान व भेंट देते हैं. गुरुवार और अन्य छुट्टियों के दिनों में यहां श्रद्धालुओं की संख्या प्रतिदिन बीस हजार तक पहुंच जाती है. जाहिर है, यहां भी लूट की काफी संभावनाएं हैं. इसी तरह पंढरपुर में भगवान श्री विट्ठल और रुकमणी के विग्रह हैं. यहां भी हजारों की तादाद में श्रद्धालु रोज दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मराठी समाज में इस मंदिर की बहुत महिमा है. इसकी आय भी हर माह लाखों में है. हालांकि कांग्रेस के हाथ वैसी मलाई नहीं लगी है, जैसी शिवसेना और राकांपा ने आपस में बांट ली है.

यही हाल अन्य राज्यों का है. देश के सबसे बड़े आस्था केंद्रों में से एक तिरुमला तिरुपति देवस्थान की देश भर में फैली पचास संपत्तियों को 2020 में नीलाम करने की तैयारी कर ली गई थी. भारी विरोध के बीच ये फैसला वापस लिया गया. वैसे भी आंध्र प्रदेश में वाई.एस. जगनमोहन की सरकार है. जगनमोहन खुद ईसाई हैं और इस समय वहां मिशनरी हिंदू मंदिरों को निशाना बनाए हुए हैं. तिरुमला तिरुपति देवस्थानम बोर्ड (टीटीडी) देश के सबसे अमीर धर्मस्थल प्रबंधन बोर्ड में से एक है. इस समय वाईवी सुब्बा रेड्डी इसके चेयरमैन हैं, जो कि जगनमोहन के मामा हैं. इनके बारे में कहा जाता है कि यह सिर्फ दिखावे के हिंदू हैं. जगनमोहन की तरह यह भी ईसाई बन चुके हैं. लोकसभा चुनाव के दौरान तिरुमाला का 1381 किलो सोना पुलिस ने जब्त किया था. तब यह बिना कागजात के एक वाहन में ले जाया जा रहा था. इस पर भी जगनमोहन सरकार ने लीपापोती कर दी थी.

पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के हिंदू विरोध और मुस्लिम प्रेम से तो सब वाकिफ हैं ही. ये मोहतरमा तो एक कदम आगे बढ़ गई. हुगली जिले के प्रसिद्ध तारकेश्वर मंदिर के बोर्ड का अध्यक्ष एक मुसलमान को बना दिया गया. 2017 में ये नियुक्ति हुई. अध्यक्ष बनाए गए ममता के खास दुलारे फिरहाद हकीम राज्य सरकार में मंत्री भी थे. ये वही फिरहाद हैं, जो पाकिस्तानी चैनल पर कोलकाता के एक विधानसभा क्षेत्र को मिनी पाकिस्तान बता चुके हैं.

इस गोरखधंधे की शुरुआत 1951 में हुई. तत्कालीन मद्रास सरकार ने हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडावमेंट एक्ट के रास्ते मंदिरों का नियंत्रण एवं खजाने पर कब्जा करना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे हर राज्य सरकार ने इस मॉडल को अपना लिया. आंध्र प्रदेश में पुजारियों की नियुक्ति से लेकर धार्मिक अनुष्ठानों तक पर राज्य सरकार ने नियंत्रण हासिल कर लिया था.
 

कुछ तथ्य

  •  भारत सरकार के बाद दूसरा सबसे बड़ा लैंड बैंक कैथोलिक चर्च के पास है.

  •  अचल—संपत्ति के मामले में वक्फ बोर्ड तीसरे नंबर पर है.

  • इनकी संपत्ति, आय, कार्यक्रम, विस्तार, गतिविधियों पर सरकार का किसी तरह का नियंत्रण नहीं है.

  • सीरो-मालाबार चर्च की कुल हैसियत भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों से भी अधिक है.

  • उत्तराखंड में भाजपा सरकार ने 51 प्रमुख मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया है।

  •  इस समय चार लाख से अधिक मंदिरों पर राज्य सरकारों का कब्जा है. इनका प्रशासन सरकारी बाबू चलाते हैं.

  •  सरकारी नियंत्रण के कारण राज्य सरकारें सर्विस टैक्स वसूलती हैं. चढ़ावे का 65 से 70 प्रतिशत तक राज्य सरकारें कब्जा लेती हैं और इनका मनमाना खर्च करती हैं. एक रुपया भी उन मंदिरों में नहीं लगता.

  • चर्च या मस्जिद या खानकाह या किसी मजार पर न तो ऐसा नियंत्रण है और न ही वहां के चंदे से सरकार कुछ वसूलती है.  

क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने

सुप्रीम कोर्ट ने 6 जनवरी, 2014 को एक ऐतिहासिक फैसला दिया था. इसमें कहा गया था कि मंदिरों का मैनेजमेंट अपने हाथ में रखने का किसी भी सरकार के पास एकाधिकार नहीं है. न्यायालय ने कहा था कि हम ये नहीं समझ पा रहे कि राज्य सरकारें अपने अफसरों से मंदिर का प्रबंधन क्यों कराना चाहती हैं. लेकिन ये आदेश कागजों पर है और सभी मंदिर ट्रस्टों पर राज्य सरकारों का कब्जा है. आदेश के बावजूद इन्हें हिंदुओं को नहीं सौंपा जा रहा है

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