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वैदिक वाङ्मय में लोकतंत्र और निर्वाचन

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jun 18, 2021, 11:09 am IST
in धर्म-संस्कृति, दिल्ली

 प्रो. भगवती प्रकाश

 

    आज से हजारों वर्ष पहले जब दुनिया में लोग कबीलों की तरह रहते थे, उस समय भारत में गणराज्य, लोकतंत्र जैसे शासन के उन्नत विचार वैदिक साहित्य में संकलित कर लिए गए थ

    वेदों में राष्ट्र, लोकतंत्र, राष्ट्राध्यक्ष या राजा के निर्वाचन और निर्वाचित संस्थाओं के प्रति उसकी उत्तरदेयताओं के कई संदर्भ मिलते हैं। वेद, वेदांग, रामायण, महाभारत, पुराणों, नीति शास्त्रों, सूत्र ग्रंथों, कौटिल्य व कामन्दक आदि ग्रंथों में गणराज्य, सार्वभौम शासन विधान अर्थात ग्लोबल गवर्नेंस व निर्वाचित प्रतिनिधि को वापस बुलाने जैसी अवधारणाएं भी विद्यमान हैं। राजशास्त्र के सभी प्राचीन प्रणेताओं ने राजधर्म को सभी धर्मों का तत्व या सार तत्व, राष्ट्र को राजधर्म का आधार और गणतंत्र को राजधर्म का साधन बतलाया है।

 

    भारतीय वाङ्मय में गणतंत्र

    कई सहस्राब्दी पूर्व विश्व में जब आखेट से जीवन-यापन व पेड़ की छाल से शरीर ढकने वाले कबीलों की प्रधानता थी, तब भारतीय वैदिक साहित्य में गणराज्य, लोकतंत्र और राष्ट्र की भौगोलिक, भू-सांस्कृतिक, भू-राजनैतिक और सार्वभौम शासन के उन्नत विमर्श संकलित कर लिए गए थे। ऋग्वेद में 40 स्थानों पर, अथर्ववेद में 9 स्थानों पर, ब्राह्मण ग्रंथों में कई स्थानों पर गणतंत्र व राष्ट्र के कई संदर्भ हैं। महाभारत के बाद बौद्ध काल में (450 ईसा पूर्व से 450 ई. तक) अनेक गणतंत्र रहे हैं। पिप्पली वन का मौर्य, कुशीनगर और काशी के मल्ल, कपिलवस्तु का शाक्य, मिथिला का विदेह और वैशाली का लिच्छवी गणराज्य प्रमुख रहे हैं। इसके परवर्ती काल में अटल, अराट, मालव और मिसोई गणराज्य प्रमुख थे। बौद्ध काल के वज्जी, लिच्छवी, वैशाली, बृजक, मल्लक, मदक, सोमबस्ती और कम्बोज जैसे गणतंत्र लोकतांत्रिक संघीय व्यवस्था के कुछ उदाहरण हैं। वैशाली में राजा का विशाल चुनाव हुआ था।

    गणतंत्र से आशय: गणतंत्र या गणराज्य में राष्ट्र के अध्यक्ष का चुनाव होता है। भारत में राष्ट्रपति का चुनाव होता है। इंग्लैण्ड व कई राष्ट्रमंडल देशों जैसे कनाडा, आॅस्ट्रेलिया आदि में महारानी (इंग्लैंड की महारानी) राष्ट्राध्यक्ष होती हैं। इसलिए वहां लोकतंत्र होने और प्रधानमंत्री का चुनाव होने पर भी वे गणराज्य नहीं कहलाते हैं

 

    वेदों में चुनाव एवं लोकतंत्र के संदर्भ: वैदिक काल में चुनाव, चुने हुए राजा व राष्ट्राधिपति को पदमुक्त किए जाने तक के संदर्भ हैं। सभा, समिति, विष, पंचजना जैसी लोकतंत्रिक संस्थाओं के चुनावों की परंपरा भी अति प्राचीन है। ऋग्वेद के मंत्र क्रमांक 10-173-1 के अनुसार वैदिक युग में भी देश में राजा या राष्ट्र के अधिपति के चुनाव होते रहे हैं और राष्ट्राधिपति से शासन में स्थायित्व एवं स्वयं जनप्रिय बने रहने की अपेक्षा की गई है। यथा-

    आत्वा हर्षिमंतरेधि ध्रुव स्तिष्ठा विचाचलि: विशरत्वा सर्वा वांछतु मात्वधं राष्ट्रमदि भ्रशत। (ऋ. 10-174-1)

    भावार्थ-हे राष्ट्र के अधिपति! मैं तुझे चुनकर लाया हूं। तू सभा के अंदर आ, स्थिरता रख, चंचल मत बन, घबरा मत, तुझे सब प्रजा चाहे। तेरे द्वारा राज्य पतित नहीं हो।

 

    उक्त मंत्र से विदित होता है कि राष्ट्राधिपति को संसद जैसी किसी सभा में आना पड़ता था। स्थानीय स्वशासन हेतु नगरों, ग्राम व प्रांतों की पंचायतें होती थीं। इनसे भी उस चुने हुए राष्ट्राधिपति का अनुमोदन आवश्यक था, ऐसा प्रतीत होता है। ये पंचायतें शायद राष्ट्राधिपति को हटाने में भी सक्षम थीं। इसके अतिरिक्त राष्ट्राधिपति का चुनाव तो प्रत्यक्ष प्रणाली से होता होगा। ऐसा अथर्ववेद में मंत्र क्रमांक 3-4-2 से लगता है कि ‘देश में बसनेवाली प्रजाएं तुझे चुनें।’ ये ग्राम या नगर या प्रादेशिक पंचायतें जनता द्वारा चुनी विद्वत परिषदों के रूप में रही होंगी। यथा- त्वां विशेष वृणता राज्याय त्वामिमा: प्रदिश: पंचदेवी:। वष्मन राष्ट्रस्य कुकदि श्रयस्व ततो व उग्रो विमजा वसूनि। (अथर्ववेद 3-4-2)

    भावार्थ-देश में बसनेवाली प्रजाएं शासन के लिए तुझको राष्ट्रपति या प्रतिनिधि चुनें। ये विद्वानों की बनी हुई उत्तम मार्गदर्शक, दिव्य पंचदेवी (पंचायतें) तेरा वरण करें अर्थात् अनुमोदन करें। तत्पश्चात तू उग्र तेजस्वी व प्रभावशाली दंड को न्याय बल के साथ संभाल और हमको जीवनोपयोगी वनों एवं अधिकारों का न्यायपूर्वक समान रूप से विभाजन कर।

    चुने हुए राजा या राष्ट्राध्यक्ष की मातृभूमि पर सर्वस्व अर्पण का शपथ: चुने हुए राष्ट्र के अधिपति या राष्ट्राध्यक्ष या राजा को चुनने के उपरांत शपथ की परंपरा भी वेदकालीन है। वेदों व ब्राह्मण ग्रंथों अर्थात शतपथ ऐतरेय, ताण्ड्य व गोपथ आदि ईसा पूर्व 3-5 सहस्राब्दि प्राचीन ब्राह्मण ग्रंथों में इसका बहुत विस्तार है। इसके दो उदाहरण निम्न हैं:-

    अहमास्मि सहमान उत्तरोनाम भूम्याम्।

    अभिषास्मि विष्वाषाडाशामशां विषासहि॥

                         (अथर्ववेद 12/1/54)

    अर्थ-मैं अपनी मातृभूमि, उसके दु:ख व कष्टों के विमोचन या दु:ख व कष्ट से मुक्ति के लिए स्वयं सब प्रकार के कष्ट सहने को तत्पर हूं। वे कष्ट कैसे भी, कहीं से आवें और कब आवें मुझे इसकी कोई चिंता या भय नहीं है। आगे कहा है-‘व्यचिष्ठे बहुपारये यते महिस्वराज्घ्ये।’ बहुमत से अर्जित इस सुविस्तीर्ण स्वराज्य के हितार्थ हम अर्थात राजा व प्रजा मिलकर अथक यत्न करते रहेंगे। इस मातृभूमि रूपी पृथ्वी का बीज बोने, खनिज निकालने, कुआं, तालाब आदि खोदने हेतु न्यूनतम उत्पीड़न हो, उसके मर्म को न्यूनतम क्षति हो और इसकी पूरी चिंता करेंगे व प्रयत्न करेंगे कि उसकी शीघ्र प्रतिपूर्ति हो।

                                       (अथर्ववेद 12/1/35)

    यत्तेभूमे विष्वनामि क्षिप्रं तदापि रोहतु।

    मा ते मर्म विमृग्वारि मा ते हृदयमार्देदम॥

                      (अथर्ववेद 12/1/35)

    प्रतिज्ञा में तीनों प्रकार की लोकतांत्रिक संस्थाओं के निदेर्शानुसार लोकहित साधन का भी विधान रहा है। यथा- हम राजा व प्रजा मिलकर तीनों सभाओं यथा विद्या सभा, धर्म सभा व राज सभा के विधायी निदेर्शानुसार विद्या, धर्म व शासन कार्य का नीति संबंधी निदेर्शों एवं राज्य संचालन के विधायी निर्णयों के अनुरूप आचरण करें।

    मंत्र:- त्रीणि राजाना विदथे पुरूणि परि विष्वानि भूषथ: सदासि।

    अपश्यमत्र मनसा जगन्वान्व्रते गनवां अपि वायुकेशान॥

                                                    (ऋग्वेद 3/38/6)

    भावार्थ: हे मनुष्यो/प्रजाजनो! मैं आप द्वारा निर्वाचित राजा उत्तम गुण कर्म और स्वभावयुत सत्यनिष्ठ विद्वान पुरुषों की राजसभा, विद्यासभा और धर्मसभा द्वारा नियत सिद्धांतों का अनुपालन करते हुए संपूर्ण राज्य संबंधी कर्मों को यथायोग्य सकल प्रजा के निरंतर सुख के अनुरूप संपन्न करूंगा॥

                                                (ऋग्वेद 3/38/6)

    आज की संसद व नियामक प्राधिकरणों की भांति इन तीनों सभाओं विद्या सभा, धर्म सभा व राजसभा के प्रति राजा, सेना व अधिकारियों की उत्तरदेयता होती थी। राजा, सेना व रक्षादि के अधिकारी इन सभाओं से विधेयित कर्तव्यों का पालन करें।

    मंत्र:- तं सभा च समितिश्च सेना च॥ (अथर्ववेद 15/2,9/2)

    इस प्रकार वेद काल में राजा या निर्वाचित राष्ट्राध्यक्ष का नियमन विविध सभाओं, परिषदों व समितियों द्वारा किया जाता था। अथर्ववेद के मंत्र 15/9/1-3 के अनुसार राजा के लिए आवश्यक था कि सभा व समितियां उसके अधीन हों, यह भी आवश्यक था कि राजा सदैव उनका आदर करे। समुचित आदर न होने पर वे ठीक से कार्य नहीं कर पाएंगी।

    मंत्र:- स विशोऽनु व्यचलत॥1॥

    तं सभा च समितिश्च सेना च सुरा चानुव्यचलन॥2॥

    सभायाश्च वै स समितेश्च सेनायाश्च सुरायाश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद। (अथर्ववेद 15/9/1-3)

    न्याय व प्रायश्चित विधान हेतु मनु ने भी परिषदों, उनकी संरचना व कार्य पद्धति का वर्णन किया है। इस संबंध में स्पष्ट निर्देश है कि ‘‘ते उभे चतुर्पदे सम्प्रसारयाव॥’’ इसका अर्थ है कि वे दोनों अर्थात राजा व सभा मिलकर राष्ट्र में चारों पुरुषार्थों का प्रसार करें।       

        (लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)

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