स्मृति शेष : गीत-गजल का लोकप्रिय स्वर कुंअर बेचैन : तुम्हें वंदन हमारी आस्था का
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स्मृति शेष : गीत-गजल का लोकप्रिय स्वर कुंअर बेचैन : तुम्हें वंदन हमारी आस्था का

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 7, 2021, 12:22 pm IST
in उत्तर प्रदेश, श्रद्धांजलि

मधुर-मार्मिक गीतों तथा सहज-सार्थक गजलों के कारण कुंअर बेचैन की देश-विदेश में व्यापक प्रतिष्ठा है। भावों की गहनता तथा अभिव्यक्ति की विविधता के कारण यदि एक ओर उन्हें वर्तमान समय के प्रमुख गीतकार के रूप में परिगणित किया जाता है तो दूसरी ओर बहुरंगी एवं आत्मीय गजलों के कारण वे हिन्दी गजल को सर्जनात्मक ऊंचाई प्रदान करने वाले श्रेष्ठ गजलकार माने जाते हैं। काव्य-मंचों पर सौम्य-शालीन उपस्थिति तथा सम्मोहक प्रस्तुति डॉ. कुंअर बेचैन को कुछ अलग, कुछ विशिष्ट बना देती है।
1 जुलाई, 2017 को डॉ. कुंअर बेचैन ने अपने जीवन के 75 वर्ष पूर्ण कर 76वें वर्ष में प्रवेश किया था। गीत-गजल के अनुरागियों, रसिक श्रोताओं, मर्मज्ञ पाठकों की ओर से जीवन की इस अमृत-बेला पर उनके रचनात्मक प्रदेय पर यह आलेख लिखने का मन बना। डॉ. बेचैन का हार्दिक अभिनंदन करते हुए उन्हीं के गीत की पंक्तियां समर्पित हैं- ‘तुम्हारी उम्र देवालय/ स्वयं तुम प्रीति-गरिमा/ तुम्हें वन्दन हमारी आस्था का।’

कुंअर बहादुर सक्सेना का जन्म जुलाई 1942 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिला उमरी ग्राम में हुआ था। एमए (हिन्दी) तथा पीएचडी की उपाधि प्राप्त डॉ. बेचैन ने लंबी अवधि तक गाजियाबाद के एक महाविद्यालय में हिन्दी विभाग के रीडर एवं अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। वे जब केवल दो माह के थे, तभी उनके मस्तक से पिता का साया उठ गया। 6 वर्ष में मातृ विहीन हो गए, तब बहन-बहनोई ने उनका पालन-पोषण किया। विपत्तियों का पहाड़ तब और टूट पड़ा, जब नौ वर्ष की अवस्था में कवि की बहन की भी मृत्यु हो गई। विडम्बनीय स्थितियों के बीच उन्होंने जीवन के अभावों-अवरोधों का साक्षात्कार किया, परंतु वे विचलित नहीं हुए। उनकी रचनाओं में व्यक्त पीड़ा या वेदना कवि का भोगा हुआ यथार्थ है। ‘मछली का कथन’ गीत में कवि सहज भाव से कहता है-
बाहर कांटे दिए जगत ने, भीतर दिए विधाता ने/
अपना भाग्य, कसकते कांटे, कांटों-साथ तड़पना भी/
मछली का यह कथन, कथन है अपना भी।
रचनाकार ने मछली के बहाने मानव जीवन की उस वास्तविकता से हमें परिचित कराया है, जिससे हम प्रतिदिन रू-ब-रू होते हैं। समाज के सबल-समर्थ जनों द्वारा निर्बल-असमर्थ जनों पर किया जाने वाला शोषण, गीत के अगले अंश में-
ये सारे जग के मछुआरे/ खड़े हुए हैं जाल पसारे
हैं जिनकी व्यापार-वस्तु हम/ वे क्या जानें दर्द हमारे
अपना भाग्य/ हार से नाते/ इसको-उसको बिकना भी
मछली का यह कथन/ कथन है अपना भी।
कुंअर बेचैन के प्रकाशित गीत-संग्रह हैं- ‘पिन बहुत सारे’, ‘भीतर सांकल: बाहर सांकल’, ‘उर्वशी हो तुम’, ‘झुलसो मत मोरपंख’, ‘एक दीप चौमुखी’, ‘नदी पसीने की’, ‘दिन दिवंगत हुए’, ’लौट आए गीत के दिन’, ‘कुंअर बेचैन के प्रेम गीत’, ‘बेचैन के नव गीत।’ उनके प्रकाशित काव्य संग्रह हैं- ‘नदी क्यों रुक गई’ तथा ‘शब्द एक लालटेन।’ बेचैन जी ने ‘पर्स पर तितली’ तथा ‘दो होठों की बात’ (दोहा संग्रह) की भी रचना की है। उनका प्रकाशित उपन्यास है-‘मरकत द्वीप का नीलमणि’। 2017 में उनका एक महाकाव्य ‘प्रतीक पांचाली’
प्रकाशित हुआ।

डॉ. बेचैन विरचित 15 गजल संग्रह उन्हें हिन्दी के शीर्षस्थ गजलकार की प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं। ‘शामियाने कांच के’, ‘महावर इंतजारों का’, ‘रस्सियां पानी की’, ‘पत्थर की बांसुरी’, ‘दीवारों पर दस्तक’, ‘नाव बनता हुआ कागज’, ‘आग पर कंदौल’, ‘आंधियों में पेड़’, ‘आठ सुरों की बांसुरी’, ‘आंगन की अलगनी’, ‘तो सुबह हो’, ‘कोई आवाज देता है’, ‘आंधियों धीरे चलो’, ‘खुशबू की लकीर’, ‘धूप चली मीलों तक’ पुस्तकें प्रकाशित प्रशंसित हुर्इं। डॉ. बेचैन ने लगभग 20 देशों की यात्राएं कीं। वे कई महत्वपूर्ण सम्मानों द्वारा समादृत हैं। उन्होंने साहित्य पर 22 शोधकार्य किए। चित्रकार के रूप में भी कुंअर बेचैन की पहचान है। उनकी दो चित्र प्रदर्शनियां भी लग चुकी हैं। कवि के सुमधुर कंठ को व्यापक प्रशंसा मिली तथा उनके 6 कैसेट/आॅडियो, सीडी प्रस्तुत किये जा चुके हैं।
कोलकाता की त्रैमासिक पत्रिका ‘मुक्तांचल’ के जुलाई-सितम्बर 2015 अंक में प्रकाशित एक साक्षात्कार में डॉ. कुंअर बेचैन कहते हैं, ‘‘मैं मूलत: गीतकार हूं। गजलकार भी हूं, लेकिन मैंने छन्दमुक्त कविताएं भी लिखी हैं। मेरे दो संग्रह हैं, उसे आप पढ़ेंगे तो लगेगा ही नहीं कि यह कुंअर बेचैन का होगा।’’
‘कविता’ शीर्षक रचना में कविता के बारे में कवि के महत्वपूर्ण मंतव्य हैं। उनका परामर्श है कि कविता जब ऐसी संकरी गली हो जाए कि उसमें टहलना कठिन हो, तब उसे बंद कर देना चाहिए, क्योंकि ‘कविता/ दम नहीं घोटती/ वरन वह देती है स्वच्छ प्राणवायु/ उन सभी को/ जिनकी सांस फूलने लगी है।’ कवि की दृष्टि में कविता में प्रयुक्त भाव-विचार ‘शब्दों की लालटेन लेकर/ इसलिए खड़े रहते हैं/ कि कोई अंधेरे में न रह जाय।’ कवि मानता है कि ‘कविता का उद्देश्य नया रास्ता खोलना, नई रोशनी थिरकाना और नया गीत उगाना है।’ डॉ. बेचैन के गीत-जगत में परंपरागत गीत तो हैं ही, नव-गीत तथा समसामयिक संदर्भों एंव जीवन की विरुपताओं को वाणी देने वाले मार्मिक गीत भी हैं। उनके प्रेम-गीतों की भावाभिव्यक्ति भी अत्यधिक मोहक है। ध्यातव्य हैं एक लोकप्रिय गीत की आरंभिक पंक्तियां-
जितनी दूर नयन से सपना/ जितनी दूर अधर से हंसना
बिछुए जितनी दूर कुंआरे पांव से/ उतनी दूर पिया तुम
मेरे गांव से,
इन लम्बे गीत में प्रेम की उदात्तता का अंकन इन चार
पंक्तियों में-
हर पत्ती पर लिखी तुम्हारी पातियां
फूलों-फूलों नव सतरंगी साधना
मंदिर-मंदिर सिर्फ तुम्हारे ही भजन
उपवन-उपवन मधुवंती आराधना
एक अन्य गीत में प्रेम की पवित्रता की प्रतीति कराने वाली ये पंक्तियां रेखांकित करने योग्य हैं-
अगरु के धूम्र-सी अलकें, नयन की वर्तिकाएं
कथावाचक अधर पर मौन की पावन ऋचाएं
तुम्हारी उम्र मेघालय, स्वयं तुम ज्योति-गरिमा
तुम्हें अर्चन प्रणय की प्रिय प्रथा का।
तुम्हें वंदन हमारी आस्था का।।
प्रेमपरक गीतों में प्रेमास्पद का यह विवेचन कुंअर बेचैन को विरल एवं विशिष्ट बनाता है। इसी प्रकार किसी अन्य गीत में जब कवि कहता है- ‘मिल गए पंथ में प्राण तुम, धूप में बादलों की तरह/ एक दर्शन तुम्हारा हुआ, चार तीर्थस्थलों की तरह’-तो पूरा परिवेश प्यार के शुभ पलों को नई अर्थवत्ता प्रदान कर देता है। विरह की वेदना गीतकार को आकुल-व्याकुल कर देती है। अपनी आकांक्षा को सीधी सपाट शब्दावली में वाणी देते हुए वह कह उठता है-
गम तुम्हारा लिये घूमते हम फिरे,/ मंच से मंच तक गीत गाते हुए।
चाह थी बस यही, हम तुम्हें देख लें/ गीत अपना कहीं गुनगुनाते हुए।
डॉ. कुंअर बेचैन को सबसे पहले सुनने का सुयोग प्राप्त हुआ था, कोलकाता के एक आयोजन में आज से लगभग 20 वर्ष पूर्व। उस समारोह की अध्यक्षता कर रहे थे अप्रतिम काव्य-मर्मज्ञ आचार्य विष्णुकांत शास्त्री। अपनी चुनिंदा गजलों के साथ डॉ. बेचैन ने उस दिन जो गीत सुनाया था, वह उनका सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है। रचना की दयस्पर्शिता ने श्रोताओं को अभिभूत कर लिया था। प्रस्तुति के अनोखे अंदाज के कारण नम हो गई थीं अधिकांश आंखें। गीत का मुखड़ा है-
‘बदरी बाबुल के अंगना जइयो/ जइयो बरसियो कहियो/कहियो कि हम हैं तोरी बिटिया की अंखियां।’
विवाहिता बेटी को त्यौहार के मौसम में अपना पैतृक घर बार-बार याद आता है। याद आती है प्यारी सखियां और विचलित कर देता है रक्षाबंधन के अवसर पर भाई का स्मरण। ससुराल वालों द्वारा पीहर न भेजे जाने की व्यथा से वह वेदना-विगलित होकर बादल को, बिजली को, पुरवैया को माध्यम बनाती है- मायके में अपनी उपस्थिति का अहसास कराने के लिए। मार्मिक
पंक्तियां हैं-
पुरवा! भैया के अंगना जइयो/ छू-छू कलाई
कहियो/ कहियो कि हम हैं तोरी बहना की रखियां।
25 दिसम्बर, 2016 को डॉ. कुंअर बेचैन को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल माननीय केसरीनाथ त्रिपाठी ने ‘विचार मंच’ का ‘कन्हैयालाल सेठिया सम्मान’ प्रदान किया था। उसी शाम राजभवन की अंतरंग गोष्ठी में कुंअर जी ने एक गीत सस्वर सुनाया था, जो अपनी सहजता एवं गहन अर्थवत्ता के कारण अविस्मरणीय है। गीत की आरंभिक पंक्तियां हैं- ‘बहुत दिनों के बाद खिड़कियां खोली हैं/ ओ बासंती पवन हमारे घर आना।’
डॉ. कुंअर बेचैन के गीतों को पढ़ते हुए एक नव-गीत पर दृष्टि सहसा ठहर गई। 28 पंक्तियों वाले इस गीत में आज के समय एवं समाज की नब्ज को टटोलते हुए पीढ़ियों की सोच में आए परिवर्तन पर बड़ी सजग टिप्पणी की गई है। पंक्तियां स्वत: स्पष्ट हैं- ‘जिसे बनाया वृद्ध पिता के श्रमजल ने/ दादी की हंसुली, माता की पायल ने/ उस कच्चे घर की सच्ची दीवारों पर/ मेरी टाई टंगने से कतराती है।’
बड़ी आकांक्षा-अपेक्षा के साथ जिस घर को माता-पिता ने तिनका-तिनका जोड़कर निर्मित किया हो, आधुनिक पीढ़ी उस अनुभूति एवं भावना को भुलाकर थोथे प्रदर्शन की ओर आकृष्ट होती जा रही है। आखिर क्यों होता है ऐसा? जवाब एक अन्य गीत की आरंभिक पंक्ति में- ‘ऊपर लेबल अमृत का है/ भीतर भरा जहर। जिस बोतल में कैद हुआ हूं/ उसका नाम शहर।’ नगरीय जीवन के बाहरी चाकचिक्य में आकृष्ट आज का शहरी मनुष्य ग्रामीण परिवेश को जिस नजर से देखता है, यह गीत उस मन: स्थिति की सही-सटीक व्याख्या करता है।

मध्यमवर्गीय पत्नी को संबोधित दूसरे नव-गीत में उस पति की विवशता का मार्मिक अंकन है, जो दिन-रात भाग-दौड़ करते हुए गृहस्थी की जरूरतों को पूरा करने में इस कदर व्यस्त है कि वह न तो पत्नी की आवश्यकता पूरी कर पाता है और न ही बच्चे का जन्मदिन मना पाने की सुविधा ही जुटा पाता है। बेबेसी का अहसास कराती गीत-पंक्तियां हैं- ‘कल स्वयं की व्यस्ताओं से/ निकालूंगा समय कुछ/ फिर भरूंगा खुद तुम्हारी मांग में सिंदूर/ मुझको माफ करना/ आज तो इस वक्त काफी देर आॅफिस को हुई है।’
और यह भी- ‘कल पराजय के जलधि से/ मैं निकालूंगा विजय कुछ। फिर मनायेंगे जनम-दिन की खुशी भरपूर/ मुझको माफ करना। आज तो यह जेब भी मेरे फटेपन ने छुई है।’
अभावों एवं लाचारियों से परिपूर्ण निम्न एवं मध्यवर्गीय जीवन से कवि सुपरिचित है। प्रतीत होता है मानो भोगे हुए यथार्थ को उसने गीत-बद्ध कर दिया है। और जब परिस्थिति भी ऐसी हो कि अनुकूलता की प्रतिकूलता में रूपांतरित हो जाए, तब तो अस्तित्व ही संकटग्रस्त हो जाता है- ‘फूल भी यदि शूल से चुभने लगें/ तितलियों को फिर कहां पर ठौर है।’
कहने की आवश्यकता नहीं कि अपने वैविध्यपूर्ण ‘दयस्पर्शी गीतों के कारण डॉ. कुंअर बेचैन आधुनिक हिन्दी गीतकारों में अत्यंत सम्मानित हैं। उनका मोहक कंठ-स्वर सोने में सुगंध की उक्ति को चरितार्थ करता है। गजल के प्रति कुंअर बेचैन का विशेष अनुराग रहा है। उनके 15 गजल संग्रह ‘गजल का व्याकरण’ शीर्षक विवेचनात्मक कृति तथा मिर्जा गालिब के जीवन पर आधारित उनका उपन्यास ‘जी हां, मैं गजल हूं’ उनके गजल प्रेम को स्वत: स्पष्ट करते हैं। गजलों में कुंअर बेचैन खिलकर और खुलकर मुखर हुए हैं। रचनाकार ने अपने शब्दों के माध्यम से स्वयं को और समय को व्याख्यायित किया है। अनुभूति के धरातल पर चिंतन की ऊंचाइयों का साक्षात्कार डॉ. बेचैन की गजलों में किया जा सकता है। अपनी एक गजल में वे कहते भी हैं- ‘अपने एहसास की जमीनों पर/ सोच का आसमान रखिएगा।’ आठ सुरों की बांसुरी शीर्षक गजल-संग्रह में अपनी बात के अंतर्गत डॉ बेचैन ने कहा भी है कि उनकी गजलों में प्रेम, सौंदर्य, सामाजिक सोच और फिक्र के साथ-साथ दर्शन की मनोभूतियां भी मिलेगी। डॉ. बेचैन की गजलों में कहीं वेदना की विकलता है, तो कहीं आंसुओं का प्रवाह भी। अपनी एक रचना में कवि की स्वीकारोक्ति है- ‘कभी वो तैरकर आए, कभी बहते हुए आए/ हमारे अश्क जब आए, गजल कहते
हुए आए।’
भाषा, भंगिमा के साथ भावाभिव्यक्ति की सहजता तथा संवेदना की शक्तिमता के कारण कुंअर बेचैन की गजलें पाठकों-श्रोताओं पर सीधा असर करती हैं और यह प्रतीति
भी कराती हैं कि रचनाकार ने गजलों-गीतों में उन्हीं
भावनाओं को शब्दबद्ध कर दिया है। उसकी यह सबसे बड़ी उपलब्धि है।
कोरोना से लड़ाई लड़ते हुए 26 अप्रैल,2021 को वे अपने असंख्य चाहने वालों को रोता-बिलखता छोड़ गए। गत वर्ष के कोरोना काल में 22 अप्रैल, 2020 को उन्होंने फेसबुक पर एक मुक्तक पोस्ट किया था-
किसे पता कि कहां कौन कब बिछुड़ जाए
वो बात कर जो मेरी जिन्दगी से जुड़ जाए।
मैं तेरे पास यूं ही आत्मा-सा बैठा रहूं
ये मेरा जिस्म कहीं उड़ सके तो उड़ जाए।।
अपने अत्यंत प्रिय गीत-गजलकार को उनकी उपरोक्त पंक्तियों के साथ मेरी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।

डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी

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