उत्तराखण्ड/मंदिर मुक्ति : आस्था और अधिकार
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होम भारत

उत्तराखण्ड/मंदिर मुक्ति : आस्था और अधिकार

Written byPanchjanyaPanchjanya
Apr 22, 2021, 08:05 pm IST
in भारत, उत्तराखंड

उत्तराखण्ड की तीरथ सिंह रावत सरकार ने राज्य के मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण वाले देवस्थानम बोर्ड को समाप्त करने का फैसला लिया है। स्मरण रहे कि पूर्ववर्ती त्रिवेन्द्र सिंह सरकार ने चार धाम सहित कुल 51 मंदिरों पर सरकार के नियंत्रण के लिए देवस्थानम बोर्ड बनाया था, जिसके पीछे मुख्य उद्देश्य इन मंदिरों के विकास और यात्रा सुविधाओं को जुटाने का प्रबंधन बनाना था। लेकिन मंदिरों से जुड़े पुरोहितों, संत समाज ने इसका विरोध किया, जिसके बाद यह मामला सर्वोच्च न्यायालय तक गया।

उत्तराखण्ड के चारधाम और अन्य मंदिरों से राज्य का धार्मिक पर्यटन जुड़ा हुआ है। तीर्थ यात्रा पर आने वाले लाखों लोगों से यहां का आर्थिक चक्र भी चलता है। त्रिवेन्द्र सरकार यह चाहती थी कि यहां सुविधाएं बेहतर हों इसलिए श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तर्ज पर यहां देवस्थानम बोर्ड काम करे। लेकिन बोर्ड बनाते वक्त राज्य सरकार की तरफ से पुरोहितों से पर्याप्त संवाद नहीं किया गया। इसका बड़ा कारण यहां की नौकरशाही का हावी होना रहा, जिसकी वजह से पुरोहित समाज ने इसका भारी विरोध किया। पुरोहित समाज ने नैनीताल उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय तक में यह मामला लड़ा। बाद में काफी सोच-विचार के बाद वर्तमान मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने देवस्थानम बोर्ड को ही समाप्त करने का फैसला लिया है। देवस्थानम बोर्ड में यह व्यवस्था थी कि इसके बोर्ड सदस्यों में मुख्यमंत्री अध्यक्ष, धर्म संस्कृति मंत्री उपाध्यक्ष, तीन सांसद, छह विधायक थे। गढ़वाल मंडल के आयुक्त को मुख्य कार्याधिकारी बनाया जाना था। इस बोर्ड में तीर्थ पुरोहितों को उचित स्थान नहीं दिया गया था। इससे खिन्न पुरोहित समाज ने अपने आप को अपमानित महसूस किया। 2019 में त्रिवेन्द्र सरकार ने इसका प्रस्ताव बनाया था और 14 जनवरी, 2020 को इस बोर्ड को सरकार अस्तित्व में लाई थी। इस दिन से ही सरकार के इस निर्णय के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया। तीर्थ पुरोहितों ने संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 32 के तहत इस बोर्ड को ‘जनभावना के विरुद्ध’
बताया था।

बोर्ड बन जाने के बाद सरकार पुरोहितों के वेतन, मन्दिर सेवादारों के खर्चे निर्धारित करने और मन्दिर की आय जैसे विषयों में हस्तक्षेप करने लगी जिसके बाद विरोध और तेज हो गया। तीर्थ पुरोहितों का कहना था कि पूर्व में भी चारधाम विकास बोर्ड काम करता था, उसको लेकर भी हमेशा से यही कहा जाता रहा था कि धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में धार्मिक विचारों के लोग ही रहने चाहिए, न कि राजनीति से जुड़े लोग। 

बद्री-केदार मन्दिर संचालन समिति 1939 से चारधाम मंदिरों के लिए कार्य करती आ रही है। टिहरी राजघराना भी उतना ही दखल देता था जिसकी मर्यादाओं को पुरोहित समाज ने तय किया था। 1964 में समिति में सुधार किए गए, चढ़ावा सम्बन्धी विषयों को पारदर्शी बनाने के लिए सरकार ने व्यवस्था बना कर तो दी, लेकिन इसमें मन्दिर संचालन समिति की भूमिका प्रमुख थी। देवस्थानम बोर्ड बनने से इस समिति के अस्तित्व, इसमें काम करने वाले करीब सात सौ कर्मचारियों के भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे थे। अब बोर्ड के निरस्त हो जाने से पुन: बद्री-केदार मन्दिर संचालन समिति का अस्तित्व बहाल हो सकेगा। उम्मीद की जा रही है कि मन्दिर समिति ही मंदिरों का संचालन करेगी और स्थल विकास की जिम्मेदारी को सरकार खुद देखेगी। उत्तराखण्ड के चारधाम में ऋषिकेश से लेकर तिब्बत सीमा तक 51 बड़े मन्दिर हैं जहां यात्रियों का आना रहता है। अब यहां हर मौसम के अनुकूल सड़क बन रही है। इन्हें रेल और हवाई मार्ग से भी जोड़ा जा रहा है। सरकार चाहती है कि यात्रियों के लिए और बेहतर सुविधाएं बनाई जाएं। इसके लिए एक योजना पर काम चल रहा है।

देवस्थानम बोर्ड से मुक्त हुए ये मंदिर
बद्रीनाथ मंदिर व परिसर में स्थित लक्ष्मी मंदिर, गरुड़, हनुमान, घटाकर्ण तथा अन्य शंकराचार्य मंदिर (बद्रीनाथ), आदिकेश्वर मंदिर, बल्लभाचार्य मंदिर, तृप्तकुंड, ब्रह्मकपाल, बरानेत्र की शिला व परिक्रमा परिसर (बद्रीनाथ), माता मूर्ति मंदिर, पंचधारा, परिक्रमा सिल व धर्मशाला, बसुधारा स्थल, योगध्यान बद्री मंदिर (पांडुकेश्वर), भविष्यबद्री (सुभांई), बासुदेव मंदिर (जोशीमठ), नृसिंह मंदिर (जोशीमठ), दुर्गा मंदिर (जोशीमठ), राजराजेश्वरी मंदिर (जोशीमठ), ज्योतेश्वर वत्सल मंदिर, नारायण मंदिर (विष्णुप्रयाग), सीता देवी मंदिर (चांई), वृद्धबद्री मंदिर (अणिमठ), ध्यानबद्री उर्गम, नृसिंह मंदिर (पाखी), लक्ष्मीनाराण मंदिर (नंदप्रयाग), श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर (कुलसारी), श्री लक्ष्मीनाराण मंदिर (द्वाराहाट), लक्ष्मी नारायण मंदिर (गुडसिर), लक्ष्मीनाराण मंदिर (बयाला), रघुनाथ मंदिर (देवप्रयाग), चंद्रबदनी मंदिर (टिहरी), मुखैमरमोली नागराजा मंदिर, राजराजेश्वरी मंदिर चैरास (श्रीनगर), उडककुंड (केदारनाथ), लघु मंदिर (केदारनाथ), विश्वनाथ मंदिर (गुप्तकाशी), विश्वनाथ मंदिर परिसर में लघु मंदिर (गुप्तकाशी), ऊषा मंदिर (ऊखीमठ), बाराही मंदिर (ऊखीमठ), मदमहेश्वर मंदिर, महाकाली मंदिर (कालीमठ), महालक्ष्मी मंदिर (कालीमठ), महासरस्वती मंदिर (कालीमठ), त्रिजुगीनारायण मंदिर, त्रिजुगीनारयण मंदिर परिसर एवं लघु मंदिर, गौरी माई मंदिर (गौरीकुंड), तुंगनाथ मंदिर (तुंगनाथ), तुंगनाथ मंदिर (मक्कूमठ), कालीशिला मंदिर, यमुनोत्री का यमुना मंदिर, शनिदेव, कुडाशिला आदि अन्य लघु मंदिर तथा खरसाली में शनिमहाराज मंदिर, मां गंगा मंदिर एवं समस्त लघु मंदिर, रघुनाथ मंदिर (देवप्रयाग), चंद्रबदनी मंदिर (टिहरी), मुखैमरमोली नागराजा मंदिर एवं राजराजेश्वरी मंदिर चैरास (श्रीनगर)।

यूं चलती आई है व्यवस्था मंदिरों की
1815 के बाद जब गढ़वाल का ब्रिटिश और टिहरी गढ़वाल के रूप में विभाजन हुआ तो बद्रीनाथ-केदारनाथ दो महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल ब्रिटिश गढ़वाल के हिस्से बन गए। पूर्व के जो धार्मिक अधिकार बद्रीनाथ-केदारनाथ के पास थे, वे स्थगित हो गए। बद्रीनाथ-केदारनाथ की व्यवस्था अंग्रेजों ने 1810 के बंगाल रेगुलेटिंग एक्ट से की थी, लेकिन दूरी अधिक होने के कारण वे यहां प्रभावी व्यवस्था नहीं कर सके। इसके कारण 1823 में कमिश्नर विलियम ट्रेल ने अल्मोड़ा तक फैले 226 गांवों को बद्री-केदार की व्यवस्था के गांव घोषित किया, जिनका राजस्व मंदिर की व्यवस्था के लिए प्रयोग होता था। साथ ही सदाव्रत की धनराशि भी इन मंदिरों की व्यवस्था के लिए आवंटित की गई। अंग्रेजों ने स्वयं को मंदिरों के धार्मिक प्रबंध से अलग रखा था।

1924 में पड़े भीषण अकाल के बाद जब बद्रीनाथ-केदारनाथ में यात्रियों की संख्या बहुत न्यून रह गई, तब रावल और नायब रावल का गुजर-बसर मुश्किल हो गया। उन्होंने वापस जाने की धमकी दे दी। तब बद्रीनाथ मंदिर के पुरोहितों ने श्री घनश्याम डिमरी के नेतृत्व में पौड़ी में कमिश्नरी में मैल्कम हाल का महीनों तक घेराव किया। जन दबाव को कम करने के लिए 1928 में टिहरी दरबार ने हिंदू एडोमंट कमेटी का गठन कर पुन: 5000 रु. प्रतिवर्ष बद्रीनाथ मंदिर की व्यवस्थाओं के लिए देना प्रारंभ किया।  सितम्बर1932 के बाद बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर की धार्मिक व्यवस्थाओं का प्रबंध फिर से टिहरी दरबार में निहित हो गया।

1939 में बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति का संशोधित एक्ट जारी किया, जिसमें मंदिर की धार्मिक व्यवस्था में टिहरी राजदरबार को शामिल किया गया लेकिन नागरिक प्रबंध अंग्रेजों के ही हाथ में रहा। धार्मिक व्यवस्था में भी रावल और नायब रावल राज दरबार से जुड़े थे। लेकिन लक्ष्मी मंदिर के पुजारी डिमरी, भोग परंपरा और नारद शिला की व्यवस्था दक्ष पुरोहितों द्वारा पूर्ववत स्वतंत्र रही। डिमरी पंचायत के निर्णय हमेशा स्वतंत्र रहे।

1964 में मंदिर समिति का नया एक्ट अस्तित्व में आया जिसके द्वारा बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था की जिम्मेदारी मुख्य कार्य अधिकारी को दी गई, जो पीसीएस स्तर का अधिकारी होता था। वही समिति का प्रशासक कहलाया। बाद के दिनों में मंदिर समिति के अध्यक्ष राजनीतिक रूप से मनोनीत किए जाने लगे, जिनके द्वारा भी मंदिर के परंपराओं का सम्मान किया जाता रहा है। 50 वर्ष से अधिक समय में मंदिर समिति ने इस व्यवस्था में बेहतर प्रबंधन किया, यात्रा का विस्तार हुआ पुरोहित, पंडा और प्रशासनिक व्यवस्थाओं में बेहतर समन्वय रहा।

2020 में गठित चारधाम देवस्थानम बोर्ड का ढांचा किंचित दोषपूर्ण था। इसमें एक वरिष्ठ नौकरशाह मुख्य कार्याधिकारी के साथ ही एक दर्जन से अधिक नौकरशाहों के शामिल होने की गुंजाइश थी। इसमें चार उद्योगपति (बड़े दानदाता) भी थे, जबकि वृत्तिधारी पुरोहित समाज से मात्र तीन सदस्यों का मनोनयन था। बोर्ड ने अपने अस्तित्व में आने से पहले ही सदियों से चारधाम मंदिर की परंपरा और व्यवस्थाओं का संरक्षण कर रहे पुरोहितों और वृत्तिधारकों के भीतर गहरी आशंका भर दी थी। स्थानीय पुरोहितों के हितों के संरक्षण के लिए इसके एक्ट में कोई पूर्व गृहकार्य नहीं किया गया। बताते हैं, बिना उचित तैयारी के ही 51 मंदिरों का प्रबंधन इस बोर्ड के अधीन कर दिया गया था। इससे पूरे गढ़वाल क्षेत्र में व्यापक जन असंतोष पैदा हुआ, जिसकी परिणति चारधाम देवस्थानम बोर्ड को भंग करने के रूप में सामने आई है। यद्यपि चारधाम देवस्थानम बोर्ड भंग हो गया है, लेकिन चारधाम यात्रा का संचालन बेहतर और सुविधापूर्ण हो, ऐसी समय की मांग है।

दिनेश मानसेरा

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