विदेश संबंध/ओमान: रणनीतिक बढ़त बनाता भारत
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विदेश संबंध/ओमान: रणनीतिक बढ़त बनाता भारत

Written byArchiveArchive
Mar 5, 2018, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 05 Mar 2018 11:00:40

होर्मुज जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित ओमान से सैन्य समझौता न केवल इस महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग पर हमारी रणनीतिक उपस्थिति बढ़ाता है, बल्कि यह  इस पूरे क्षेत्र को अपनी साम्राज्यवादी चालों की बिसात बना देने वाले चीन को भी करारा कूटनीतिक जवाब है

अरविंद शरण

पधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में ओमान के दौरे पर थे। इस दौरान उन्होंने आठ समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है भारत का ओमान के साथ सैन्य समझौता। इस समझौते के बाद अल दक्म बंदरगाह पर भारतीय नौसेना और वायु सेना के लिए पैर रखने की जगह मिलना रणनीतिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। यह इस बात का उद्घोष भी है कि दुनिया के लगभग 40 प्रतिशत तेल और गैस के भंडार के पास दुनिया की बड़ी ताकतों का जमघट, खास तौर पर साम्राज्यवादी चीन के एक के बाद एक संदेह जगाने वाले कदमों पर भारत आंखें मूंद कर बैठा नहीं रह सकता। अगर दुनिया ने भारत से लगते समुद्र का नाम हिंद महासागर रखा है, तो यह इस क्षेत्र में भारत के स्वाभाविक प्रभुत्व की स्वीकारोक्ति है।
ओमान में भारत को सैन्य सुविधा मिलने को हिंद महासागर और इससे सटे अरब सागर और फारस की खाड़ी के इलाके में अपने सहज-प्राकृतिक स्थान को पुन: हासिल करने के रास्ते में एक मील के पत्थर के तौर पर देखा जाना चाहिए। अभी हाल ही में इस तरह की खबर आई थी कि ग्वादर बंदरगाह पर चीन नौसेना और वायु सेना का अड्डा बनाने जा रहा है। भारत के लिए यह चिंता की बात थी और इसकी समुचित काट जरूरी थी, क्योंकि कूटनीति की बिसात पर आपको चाल-दर-चाल सामने वाले की रणनीति का जवाब देना पड़ता है और अगर विपक्षी खिलाड़ी चीन हो, तो असावधान होने की गुंजाइश नहीं होती। ओमान में सैन्य सुविधा हासिल करने को इस नजरिये से देखा जाना सर्वथा स्वाभाविक है।
रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) गगन दीप बख्शी कहते हैं, ‘‘चीन में शतरंज की तरह का एक खेल खेला जाता है- वेई ची। इसमें पूरी रणनीति विपक्ष को घेरने की होती है। चीन हमारे साथ वही खेल खेल रहा है और उसकी व्यूह रचना का जवाब देना हमारी मजबूरी है। राहत की बात यह है कि अब हमने उनके लिए खेल के मैदान को खुला नहीं छोड़ने और आंख में आंख डालकर बात करने की रणनीति अपनाई है। अगर हिंद महासागर में कोई हावी हो जाता तो हमारे लिए यह बड़ी कूटनीतिक पराजय होती। हाल के कुछ वर्षों के दौरान लिए गए दूरदर्शी फैसलों का ही नतीजा है कि आज हम इस पूरे क्षेत्र में अपनी खोई रणनीतिक जमीन को वापस पाने में काफी हद तक सफल हुए हैं।’’
व्यापक तौर पर देखें तो हिंद महासागर और अरब सागर के मुहाने पर स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में हाल के वर्षों में भारत ने अपनी ताकत को रणनीतिक मजबूती तो दी ही है, इसकी रणनीतिक क्षमता को अमेरिका और फ्रांस जैसे मित्र देश भी बढ़ा रहे हैं, जिनकी चीन के प्रति अपनी-अपनी आशंकाएं हैं। अभी हाल ही में अमेरिकी नैसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि चीन की वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) परियोजना रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील दुनिया के तमाम संकरे समुद्री व्यापार मार्गों पर अकारण दबाव बना रही है, जिसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।
भारत की मजबूती
चीन ने पूरे समुद्री इलाके में भारत की घेराबंदी कर रखी है। श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह को विकसित करने का काम उसके पास है। फिलहाल दोनों देशों के बीच जो समझौता अस्तित्व में है, उसमें चीन को बंदरगाह के सैन्य इस्तेमाल की अनुमति नहीं है, लेकिन आपात स्थिति में इस तरह की अतिरिक्त सुविधा हासिल कर लेना कोई बड़ी बात नहीं होती। खासतौर पर वैसे देश से जो चीन के दिए कर्ज में डूबा हो। तो मानकर चलना चाहिए कि हंबनटोटा बंदरगाह का सैन्य इस्तेमाल हमारे खिलाफ हो सकता है। इसी तरह चीन ने होर्मुज जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित अफ्रीकी देश जिबूती में अपना सैन्य ठिकाना बना रखा है। इसके अलावा, वह म्यांमार के हांग्वी बंदरगाह और मालदीव के एक टापू पर सैन्य सुविधाएं विकसित कर रहा है। चीन की इस तरह की गतिविधियां हिंद महासागर और होर्मुज जलडमरूमध्य क्षेत्र में भारत पर जबरदस्त दबाव बना रही हैं, लेकिन हाल के वर्षों में हमने अपनी खोई ताकत काफी हद तक वापस पा ली है। हमने ईरान से मिलकर चाबहार बंदरगाह को विकसित किया है जो अफगानिस्तान से लेकर मध्य एशिया के बाजार तक हमारी पहुंच बनाएगा। फारस की खाड़ी में ओमान के अल दक्म बंदरगाह में हमारी सैन्य उपस्थिति होगी ही। इसके अलावा, हिंद महासागर में दक्षिण की ओर नीचे सेशल्स के एजम्पशन द्वीप में भारत अपनी सेनाएं रख तो सकता ही है, वहां सैन्य सुविधाओं का निर्माण भी कर सकता है। इस संबंध में इसी साल जनवरी में समझौता हुआ है। एजम्पशन द्वीप मेडागास्कर के उत्तर में पड़ता है और भारत यहां से मेडागास्कर और मोजांबिक के बीच स्थित मोजांबिक चैनल से होने वाले व्यापार की सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
मे. जनरल बख्शी कहते हैं, ‘1962 के भारत और आज के भारत में काफी अंतर है। तब से ब्रह्मपुत्र में न जाने कितना पानी बह चुका है। आज भारत के पास मजबूत सैन्य शक्ति और खोए प्रभुत्व को पाने की दृढ़ इच्छाशक्ति के अलावा अपने-अपने हितों से बंधी अमेरिका जैसी बड़ी ताकतों का रणनीतिक सहयोग भी है। चीन के प्रति हमें सुरक्षात्मक और आक्रामक रणनीतियों का एक मिला-जुला स्वरूप तैयार करना होगा। अंदमान एवं निकोबार द्वीप समूह मलक्का जलडमरूमध्य के संवेदनशील क्षेत्र के नजदीक है, जहां हमने सैन्य अड्डा बना रखा है। यहां के कुछ और निर्जन टापुओं को भी सैन्य अड्डे के तौर पर विकसित करके हमें चीन पर दबाव    बनाना चाहिए। इसके अलावा हमें वियतनाम, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ संबंधों को और मजबूती बनाना चाहिए।’   
मित्र देशों का साथ अहम
भारत के लिए मित्र देशों, खास तौर पर अमेरिका और फ्रांस का साथ हिंद महासागर और होर्मुज क्षेत्र में काफी महत्वपूर्ण है। भारत और अमेरिका के बीच 2017 में एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ जिसके मुताबिक भारत पूरे क्षेत्र में अमेरिकी अड्डों का सैन्य इस्तेमाल कर सकता है। ब्रिटिश अधिकार वाले टापू डिएगो गार्सिया पर अमेरिकी ने अच्छी-खासी सैन्य उपस्थिति बना रखी है। इसके अलावा यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा ओमान के पास मौजूद है। भारत ने इसी तरह का समझौता सिंगापुर के साथ भी किया है। समझौते के मुताबिक, भारत सिंगापुर के रणनीतिक नजरिए से अहम चांगी नौसैनिक अड्डे का भी इस्तेमाल कर सकता है। इसके अलावा भारत ने फ्रांस के साथ भी उसके सैन्य अड्डों के इस्तेमाल को लेकर ऐसा ही समझौता कर रखा है। भारत इस इलाके में एकमात्र ऐसा देश है, जिसके फ्रांस के साथ इतने मजबूत रणनीतिक रिश्ते हैं। फ्रांस ने होर्मुज के मुहाने पर जिबूती व दक्षिण हिंद महासागर में मॉरीशस के पास रीयूनियन आईलैंड में मजबूत सैन्य बेड़ा तैनात कर रखा है। मित्र देशों की ये सारी सैन्य सुविधाएं हमारे लिए नैतिक बल को बढ़ाने वाले हैं।
तेल सुरक्षा में भी ओमान का साथ
ओमान से हमारे रिश्तों का एक और आशाओं से भरा आयाम है। अल दक्म बंदरगाह के पास ही ओमान एक बड़ा रणनीतिक तेल भंडार बना रहा है। यह भंडार भारत को आश्वस्त होने का एक और कारण देता है। अरब देशों में जो हाल है और फिर जिस तरह दुनिया की ताकतों ने होर्मुज जलडमरूमध्य की घेराबंदी कर रखी है, अगर कभी किसी कारण से तनाव बढ़ा और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्त रुक गई तो भारत के लिए ओमान के इस भंडार से तेल लेने का रास्ता खुला रहेगा जो हमें वैकल्पिक व्यवस्था करने के लिए कुछ अतिरिक्त समय दे सकेगा। इस तरह साफ है कि भारत के आसपास के समुद्री क्षेत्र में अपना स्वाभाविक रणनीतिक प्रभुत्व वापस पाने के लिए पिछले चंद वर्षों के दौरान किए गए कूटनीतिक प्रयासों की निरंतरता ओमान  से अहम समझौते में भी दिखती है। इसे एक घटना नहीं बल्कि व्यापक  रणनीति के उदाहरण के तौर पर देखा  जाना चाहिए।   

 

बेहतर तेल भंडारण में बढ़ते कदम
वैसे तो देश की आपात ऊर्जा जरूरतों के लिए भंडारण का विचार 1988 में ही आया और 2003 में इस दिशा में बढ़ने का फैसला हुआ, लेकिन सरकारी सुस्ती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि घोषणा के दस साल बाद भी कोई भंडारण क्षमता विकसित नहीं की जा सकी थी। केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद इस योजना ने गति पकड़ी और तब 2015 में इसमें तेल रखा जाना शुरू हो सका। इस देरी से एक नुकसान यह हुआ कि जब दुनिया में तेल की कीमत काफी कम थी औप चीन का पूरा ध्यान अपने भंडार को बढ़ाने पर था, हम उसका फायदा नहीं उठा सके और आज तेल की कीमतें फिर बढ़ने लगी हैं। अर्थशास्त्री देबाशीष नंदी कहते हैं, ‘‘यह तो बड़ी साधारण-सी बात है कि अगर आप योजना बनाकर उस पर बैठ जाएंगे तो लागत बढ़ेगी और जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा बर्बाद होगा। लेकिन अगर ऐसा    देश की सुरक्षा से जुड़ी योजना के साथ हो तो यह गंभीर लापरवाही के अलावा     कुछ भी नहीं।’’
बहरहाल, मौजूदा सरकार के लिए यह एक प्राथमिकता वाला विषय था, इसीलिए हालिया बजट में देश की रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण क्षमता को एक करोड़ टन और बढ़ाने के लिए ओडिशा के चांदीखोल और राजस्थान के बीकानेर में बड़े भंडार बनाने का फैसला किया गया। चांदीखोल में भंडारण क्षमता 44 लाख टन और बीकानेर में 56 लाख टन होगी।   
आपात भंडारण क्षमता
हमारे पास फिलहाल आपात जरूरतों के लिए तेल भंडारण की कुल क्षमता 53.3 लाख टन है और इसके लिए तीन जगहों पर चैंबर बनाए गए हैं। विशाखापत्तनम में 13.3 लाख टन, मंगलूर में 15 लाख टन और पुदुर में 25 लाख टन कच्चा तेल रखने की क्षमता है। विपरीत परिस्थितियों के लिए तेल भंडारण का काम देख रहे इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड के सीईओ एवं एमडी एस.पी.एस. आहूजा कहते हैं, ‘‘अभी हमारे पास दस दिनों की जरूरतों के लिए तेल का भंडार है और भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए दो और बड़े चैंबर बनाने की योजना है। उम्मीद है कि इससे हम खुद को किसी भी आपात स्थिति के लिए बेहतर तरीके से तैयार कर सकेंगे।’’ तेल क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि देश में 30 से 40 दिन की जरूरत का रणनीतिक तेल भंडार होना चाहिए। इस दृष्टि से भारत को अभी और क्षमता विकसित करनी होगी।
क्यों जरूरी है आपात भंडारण?
किसी भी देश के लिए आपात काल के लिए तेल का समुचित भंडार बनाना इसलिए जरूरी है कि अगर किसी कारणवश कच्चे तेल की कीमत एकदम से आसमान छूने लगे या फिर किन्हीं कूटनीतिक वजह से तयशुदा देशों से तेल की आपूर्ति बाधित हो जाए तो वैकल्पिक उपाय सुनिश्चित करने तक की जरूरतें पूरी हो सकें।
यूएई से करार अहम
हाल ही में हुए समझौते के मुताबिक संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) मंगलूर स्थित तेल भंडार में 58.6 लाख बैरल तेल रखेगा। रखरखाव के बदले आधा हिस्सा भारत का होगा। फिलहाल यह समझौता तीन साल के लिए हुआ है। दोनों देशों के लिए यह फायदे का सौदा है। भारत के लिए तो यह लाभकारी है ही, यूएई के लिए अच्छी बात यह होगी कि उसे आसपास के बाजार में तेल पहुंचाने में काफी समय बच जाएगा।

ओमान के साथ सैन्य अभ्यास
ओमान के साथ भारत के पुराने और ऐतिहासिक व्यापारिक रिश्ते हैं। दोनों देश सैन्य रिश्ते और दक्षता बढ़ाने के लिए संयुक्त सैन्य अभ्यास भी करते रहे हैं। दोनों देशों के सैनिकों का पहला संयुक्त युद्धाभ्यास जनवरी 2015 में ओमान में हुआ था। पिछले साल दोनों देशों की सेनाओं का दूसरा संयुक्त अभ्यास 6 से 19 मार्च तक हिमाचल प्रदेश में हुआ था। भारतीय सेना और रॉयल ओमान आर्मी का यह संयुक्त युद्धाभ्यास ‘अल नगाह-2’ चंबा के बकलोह में हुआ था। इसमें दोनों देशों के 60-60 सैनिकों ने हिस्सा लिया था।

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