बैरागी मन की वीर कलम
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बैरागी मन की वीर कलम

Written byArchiveArchive
Jan 23, 2018, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 23 Jan 2018 15:00:49

समरसता का मन और दुष्ट हंता खड्ग पाञ्चजन्य

गत 70 साल में पाञ्चजन्य ने देश की एकता-अखंडता के प्रति आवाज बुलंद करते हुए समरस समाज के भाव को पुष्ट किया है। अनेक अवसरों पर राष्टÑहित को सर्वोपरि रखकर तथाकथित मुख्यधारा पत्रकारिता से इतर घटनाक्रमों का प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुतिकरण किया है। यही है पाञ्चजन्य की गौरव-भाव जगाने वाली थाती

 

तरुण विजय

इक्कीस साल पहले नागपुर में उन माताओं से साक्षात्कार लिए थे, जिनके बेटे उच्च शिक्षा लेने के बाद संघ में प्रचारक बन गए। एक मां के तीन बेटे, तीनों प्रचारक। एक क्षण भी नहीं सोचा कि उनका क्या होगा। एक अन्य मां के पांच बेटे, दो प्रचारक। पूछा, कैसा लगा, तो उत्तर मिला ‘आश्चर्य है बाकी तीन भी प्रचारक क्यों नहीं बने।’
मुझे लगा जिन्होंने भारत माता के दर्शन नहीं किए, वे इन माताओं को देख लें, तो बस दर्शन सिद्धि हो जाएगी।
पाञ्चजन्य का दर्शन शास्त्र, उसकी कलम का धर्म यही है। जब शेष पत्रकारिता धर्म पर चोट ही कलम का मर्म मानती हो, तब धर्म के नवोन्मेष और प्रखर, अडिग, अटूट निष्ठा के साथ सम-असम का भेद तोड़ने वाली सरस-समरस वाणी को साहस के साथ प्रस्तुत करना पाञ्चजन्य की परिभाषा है। विश्व हिन्दू परिषद् के उस समय प्रमुख श्री अशोक सिंहल काशी के डोम राजा के घर गए, साथ में पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य, और अन्य शिखर विद्वान और सबने वहां डोम राजा के स्नेहालिंगन में बंधकर साथ भोजन किया तो अद्भुत वातावरण की सृष्टि हुई। वह पाञ्चजन्य के ‘धर्म क्षेत्रे-कुरु क्षेत्रे’ विशेषांक का आधार बना। संदेश था- नहीं चाहिए तुम्हारा जातिगत बंधन और छुआछूत का गर्हित, अहिंदू, किंवा हिन्दू क्षरण का दोषी व्यवहार।  
गोहाना का गर्हित काण्ड, जिसमें जाति विद्वेष ने भयानक, विकराल रूप ले लिया-ऐसा ही था। पाञ्चजन्य के सम्पादकीय ने देशभर में उन सबको चकित और स्तब्ध किया जो हमारी विचारधारा पर भेदभाव एवं दलित विरोध का आरोप लगाते थे। नहीं स्वीकार है जाति विरोध, नहीं स्वीकार है अपने ही बंधुओं पर जाति के आधार पर आघात। हमें धर्म के नाम पर हिंदू एकता और शक्ति संवर्धन अभीसिप्त है-धर्म को चोट पहुंचाने वाले जाति विद्वेषी वस्तुत: देश की काया पर प्रहार करते हैं—यह था पाञ्चजन्य का मंतव्य।
रा.स्व.संघ के तत्कालीन सरसंघचालक पूज्य बालासाहब देवरस को वह विषय पसंद था। उनका पुणे में वसंत व्याख्यानमाला के अन्तर्गत जातिगत भेदभाव तथा अस्पृश्यता निवारण की आवश्यकता पर हुआ उद्बोधन पाञ्चजन्य में छपा और उसी की धारा को हमने अंगीकार किया। बालासाहब अद्भुत प्रेरणा के स्रोत थे। उन्होंने कहा जो हाशिए पर हैं-नीचे के पायदान पर हैं पर गुणी हैं, वे वास्तव में उच्च और श्रेष्ठ जाति के हैं न कि वे जो भले ही स्वयं को उच्च जाति के  मानते होंगे, परंतु निष्कृष्ट कर्म करते हैं।
संभवत: यही कारण, यही संवेदना, यह राष्ट्रीय समरसता की भाव शक्ति का बल था कि पाञ्चजन्य देश का ऐसा प्रथम साप्ताहिक बना, जिसने जनजातीय योद्धाओं एवं राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के वीरों पर केन्द्रित ‘वीर वनवासी’ अंक प्रकाशित किया। इसकी सामग्री के संकलन मात्र के लिए मुझे प्राय: छह माह सम्पादक स्वनाम धन्य भानुप्रताप शुक्ल भानु जी ने भेजा था। वह विशेषांक इतना लोकप्रिय हुआ कि उसके आधार पर अंसारी रोड के कई प्रकाशकों ने पुस्तकें छाप डालीं। जनजातीय समाज गणतंत्र दिवस की परेड की शोभा या संरक्षण और अभिभावकत्व का मोहताज नहीं। वह वीर योद्धा अप्रतिम युद्धशैली और हिंदू धर्म तथा भारत राष्ट्र के प्रति अभिमानी सहनागरिक है जिसे बराबरी का सम्मान और निर्णय लेने का अधिकार चाहिए। वह खैरात नहीं, खम ठोक कर हिस्सेदारी का हकदार है-यह भाव पाञ्चजन्य में प्रकट हुआ।
केवल इतना ही नहीं, भारतीय राष्ट्र की प्रखर अग्निपुंज, नागालैण्ड की स्वतंत्रता सेनानी और ईसाई मतांतरण के विरुद्ध चट्टानी दृढ़ता से खड़ी रहीं रानी मां गाइदिन्ल्यु के विषय में सर्वाधिक एवं साक्षात्कारों सहित सामग्री पाञ्चजन्य ने सबसे पहले प्रकाशित की और संपूर्ण देश में रानी मां के प्रति आदर का लोकप्रिय भाव पैदा किया। अटल जी के समय रानी गाइदिन्ल्यू के नाम पर स्त्री शक्ति सम्मान स्थापित करने में पाञ्चजन्य की प्रबल प्रमुख भूमिका रही। वह राष्ट्रीय सम्मान आज भी जारी है। इतना ही नहीं, शायद ही देश का एक भी, और यह ‘एक भी’ बहुत विडम्बनाजनक है, पत्र होगा जो नियमित रूप से उत्तर पूर्वाञ्चल के बारे में सर्वस्पर्शी रिर्पोट, आलेख, साक्षात्कार और समाचार छापता है। पाञ्चजन्य के ‘अपना पूर्वाञ्चल’ जैसे अनेक उत्तर पूर्वाञ्चल पर केंद्रित विशेषांक पत्रकारिता में, पुस्तक साहित्य में स्थायी महत्ता रखते हैं। नागालैण्ड से जगदम्बा मल्ल, मणिपुर से प्रेमानंद शर्मा, अरुणाचल, त्रिपुरा, मेघालय नाम अनेक हैं। कई बार तो वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यकर्ता डॉ. विश्वामित्र जैसे कर्मवीर ही लेखनी के सहारे वहां का हाल बताते रहे। अरुणाचल में किसी भी पार्टी  की सरकार हो वहां के नेताओं के साक्षात्कार यदि छपे तो केवल पाञ्चजन्य में (कम से कम भारतीय भाषाओं के पत्रों में से) वरना बाकी पत्रों में, क्षमा करें, उनकी राष्ट्रीय पत्र होने की दावेदारी वहीं तक सीमित रहती है जहां तक उनका प्रसार होता है-देश तथा समाज भारतीय पत्रकारिता जगत में पाठकों की भौगोलिक व्यापकता के अनुरूप सिकुड़ता रहता है।
क्या आप बता सकेंगे कि भारत में कितने समाचार पत्र बंगलादेश-पाकिस्तान या अन्य क्षेत्रों में हिंदू वेदना को सम्प्रेषित करते हैं? याद है जब बंगलादेश में तस्लीमा नसरीन का वहां हिंदुओं पर हुए अत्याचारों पर केंद्रित उपन्यास छपा था तो देश में सबसे पहले उसका धारावाहिक अनुवाद किसने प्रस्तुत किया था? केवल पाञ्चजन्य ने। और सुखद आश्चर्य यह है कि उसमें भारतीय राष्ट्रीयता की शिखर बौद्धिक योद्धात्रयी-सीताराम गोयल, गिरिलाल जैन तथा रामस्वरूप-में से एक प्रखर, प्रगल्भ हिंदू योद्धा सीताराम गोयल जी ने सबसे बड़ी सहायता की थी। यह बताना यहां अप्रासंगिक न होगा कि देश में भारतीय भाषाओं में अकेला केवल पाञ्चजन्य ही रहा जिसे इन तीनों महान विचार योद्धाओं की लेखनी से नि:सृत मूल लेख प्रकाशित करने का लंबे समय तक सौभाग्य मिला! जब सामाजिक समरसता की बात पत्रकारिता में फैशनेबुल नहीं मानी जाती थी उस समय सफाई कर्मचारियों पर केंद्रित तथा एक नन्हीं, प्यारी दुलारी सफाई-दूत बिटिया का चित्र आवरण पर छाप कर वहीं ये चार पंक्तियां लिखीं थीं-‘‘कौन तुम्हें अस्पृश्य, अछूत अपावन कहता, पवित्रता तो साथ तुम्हारे ही है आयी, स्वच्छ गली घर द्वार सड़क सब तुमसे ही हैं, मनुज नहीं तो सदा जंगली रहता।’’
यह अंक पाञ्चजन्य के यशस्वी अंकों में एक है।
पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका के तमिल हिंदू, भूटान के हिंदू शरणार्थी, अफगानिस्तान से निकाले गए हिंदू-सिख शरणार्थी, नेपाल में कम्युनिस्ट आतंक के कारण प्रताड़ित धर्मनिष्ठ हिंदू, ऐसा कोई भी विषय रहा हो जहां हिंदू वेदना उभरी हो, वहां-वहां, हमेशा पाञ्चजन्य ने अपनी प्रखरता, निडरता से कलम उठायी। केवल कश्मीर के हिंदू विस्थापितों पर ही पांच से अधिक विशेषांक, निरंतर नियमित रिपोर्टें तथा ’90 के दशक के प्रारंभिक भयानक, अत्याचारी दौर में मैं स्वयं हजरत बल क्षेत्र में सात दिन रुका और पांच या छह सप्ताह आतंकवादी ठिकानों से हिंदू बैर में रंंगे जिहादी मानस का आंखों देखा परखा विवरण छापा। उस पर एक कठोर शब्द प्रहारयुक्त विशेषांक ‘विस्थापित हिंदू’ अंक काफी प्रभावी रहा।
भारतीयों में सामाजिक नवजागरण जाति विरोधी दुलार और समता का भाव कितना प्रभावी हो रहा है इसे लेकर ‘हिंदू नवचैतन्य’ अंक एक मील का पत्थर साबित हुआ। इतनी नफरत, इतनी बदगुमानी, इतना भेदभाव, इतनी अस्पृश्यता हमारे मनों में आज भी दलितों-अनुसूचित जातियों के प्रति पायी जाती है कि त्वचा जल उठती है। हमारे लिए क्या अनुसूचित जाति-जनजाति का विषय केवल चुनावी प्रपंच, वोट के पाखण्ड और जीत-हार तक सीमित है? जो दधीचि-बालासाहब देवरस, बालासाहब देशपाण्डे, भास्कर राव, रामभाऊ गोडबोले, और हजारों-हजारों संघ के कार्यकर्ता प्रचारक समरसता के लिए जीवन होम कर गए क्या उनकी परम्परा और उनका योगदान राजकाज के तराजू पर तुलेगा? पाञ्चजन्य ने सिंहासन नहीं, समरसता के तारों को सम्मानित किया तथा खुलकर, समानता का युद्ध लड़ा।
कोई बता सकता है कि देश में जिन्हें हम अस्पृश्य, दलित, हाशिए पर छिटके लोग कहते हैं उनका मूल सिसोदिया, चौहान वंशावलियों में ही है? इसे चालीस वर्ष के शोध के बाद प्रसिद्ध लेखक अमृतलाल नागर ने अपने कालजयी उपन्यास ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ में बहुत मार्मिक ढंग से उकेरा था।  नागर जी पाञ्चजन्य आए। भानु जी से उनकी पुरानी मित्रता थी। चौक, लखनऊ में उनका घर। उनसे एक लम्बा साक्षात्कार लिया-और ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ के अंश छापे, जिसे पढ़कर श्री अशोक सिंहल ने कहा-यह छापकर आपने हिंदुओं की आंखें खोल दीं। उनके अनेक भाषणों में इसका जिक्र हुआ। श्री अशोक सिंहल, अहंकार तथा विद्वेष की दुनिया से परे ऐसे संत थे, जो पाञ्चजन्य से एकरूप थे। वे मुझसे पाञ्चजन्य का संवाददाता परिचय कार्ड बनवाकर राम जन्मभूमि आंदोलन में अयोध्या में दाखिल हुए थे और ‘परिंदा भी पर नहीं मार सकता’ की दम्भोक्ति करने वाले मुलायम का घमंड तोड़ा था।
समरसता के साथ मन्दिरों में स्वच्छता, निर्मलता और पंडों-पुजारियों द्वारा भाविक श्रद्धालुओं की लूट के खिलाफ पाञ्चजन्य ने लिखा। काशी विश्वनाथ मन्दिर की गलियों में व्याप्त गंदगी, कूड़ा, पंडों द्वारा स्टेशन से ही तीर्थयात्रियों का पीछा और मन्दिर के भीतर अव्यवस्था पर पाञ्चजन्य में छपे सम्पादकीय को अशोक जी ने खुलेमन से सराहा और कहा-दु:ख है, अब ऐसे विषय हिंदू जागरण का हिस्सा नहीं बनते।
ये हिंदू युवा, यह हिंदू समाज जाति और अहंकारी पद-धन के मद में चूर राजनीति के चक्र तोड़ वे नए भारत की सर्जना करें, नया ताजगी भरा ऐसा समाज जो प्रौद्योगिकी, सूचना विद्या विज्ञान के रूप में साथ अच्छी मंशा और भावना से बढ़े-भूखे पेट भरें तब मन्दिर की बात करें-इन विषयों को लेकर अभिनव भारत अंक, भारतीय राष्ट्रवाद की जय यात्रा, आशा दीप विशेषांक चर्चित रहे तो विश्व के कोने-कोने में व्याप्त हिंदू संस्कृति के सतरंगी कलेवर तथा विरासत पर अनूठी सामग्री लिए क्रमश: दो विशेषांक छपे।
दुनिया में लेखों, कथाओं की ‘चोरी’ होती है- उनको लेकर जाली लेख छपते हैं। लेकिन प्रखर राष्ट्रवाद को अर्पित किसी समाचार पत्र का ही कोई ‘जाली’ अंक छापे, यह शायद आपने न सुना होगा। पाञ्चजन्य का अयोध्या अंक देश में अनेक छापाखानों में तत्कालीन आफसेट प्रेस पर छपा और एक अंक 50-50 रुपए में बिका। इलाहाबाद से एक पाठक ने 50 रुपए में वह अंक खरीदकर हमें भेजा जिसे मैंने श्री जगदीश उपासने को दिया, जो तब इण्डिया टुडे में थे।
यह कथा देश के राष्ट्रीय मन के वीर-भाव और वैरागीमन की कथा है। पाञ्चजन्य की कथा कभी इतिहास लिखेगा-यह वस्तुत: उस भाव का पत्रकारिता में भावांतरण है जिसे कभी बंकिम ने आनंदमठ में पिरोया था। बहुबल धारिणीं, नमामि तारिणीम् रिपुदल वारिणीम् मातरम् —- इति
 

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