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जनसंघ का जन्म

Written byArchiveArchive
Jan 23, 2018, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 23 Jan 2018 11:11:10

जनसंघ के गठन के समय की राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों पर प्रकाश डालता है रा. स्व. संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी का यह आलेख। इसमें संघ और तत्कालीन जनसंघ के बीच वैचारिक समानताओं के साथ ही विशिष्ट कार्य-उद्देश्यों  की चर्चा है

माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर
द्वितीय सरसंघचालक, रा.स्व.संघ

 

पूर्वी बंगाल, पाकिस्तान सरकार द्वारा हिंदुओं पर अमानवीय अत्याचार तथा फलत: उध्वस्त होकर उनके भारत में शरणार्थी के रूप में आने से अत्यंत व्यथित डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को केन्द्रीय मंत्री की आरामदेह कुर्सी सहन नहीं हुई और उन्होंने तयागपत्र देकर फिर एक बार यह सिद्ध कर दिया कि लोक-सेवा ही उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य है।
इसके बाद अनिवार्यत: वे एक ऐसे राजनीतिक दल की तलाश में थे जो अपने विचारों और उत्साह में उन्हें संतोष दे सके। संभवत: उस समय दलों में उन्हें एक भी ऐसा दल नहीं मिला। कांग्रेस राष्टÑवाद से सांप्रदायिक तुष्टीकरण की ओर बढ़ चली थी और उनकी राय में देश के लिए उससे बढ़कर विनाश और कलंक का माध्यम और कोई नहीं था। किन्हीं कारणों से हिंदू महासभा वह छोड़ ही चुके थे। सोशलिस्ट और प्रजा पार्टियों का न तो सिद्धांतों में और न ही कार्यक्रमों में कोई ठोस आधार दिखता था। कम्युनिस्ट पार्टी गैर-राष्टÑीय, विदेशी राज्य, विदेशी राष्टÑ के प्रति निष्ठाओं, अपने रूसी मालिकों के सांचे में ढली, गैर-भारतीय विचारधारा वाली और अराजकता फैलाने वाली थी। इसमें शामिल होने का प्रश्न ही नहीं था।
मेरे पुराने सहयोगियों में से एक श्री वसंतराव ओक, जिनकी राजनीतिक कार्य में रुचि थी, डॉ. मुखर्जी से दीर्घकाल से निकट संपर्क में थे और ऐसा लगता है कि इसी कारण डॉ. मुखर्जी इस संबंध में मेरी सहायता प्राप्त करने के लिए उत्साहित हुए। फलत: हम प्राय: मिलते थे और संबंधित विषयों पर चर्चा करते थे, स्वाभाविक रूप से मैंने उन्हें सावधान कर दिया था कि रा.स्व.संघ को राजनीति में नहीं घसीटा जा सकता और यह किसी राजनीतिक या अन्य दल का उपकरण नहीं बन सकता, क्योंकि कोई भी ऐसा संगठन, जो राष्टÑजीवन के वास्तविक अर्थात समग्र सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए समर्पित है, कभी भी राजनीतिक दलों की कठपुतली बनकर सफलतापूर्वक कार्य नहीं कर सकता।
उन्होंने यह स्थिति महसूस की और स्वीकार किया कि यही ठीक था। उसी समय उन्होंने यह भी विचार व्यक्त किया कि राजनीतिक दल भी किसी अन्य संगठन का आदेशपालक नहीं बनाया जा सकता। यही स्थिति उस दल के उचित विकास और वृद्धि के लिए प्रत्यक्षत: अनिवार्य थी। रा.स्व.संघ और प्रस्तावित दल के संबंधों के बारे में मूलभूत बातों पर सहमति के बाद दूसरा विचारणीय विषय उस आदर्शवाद के बारे में था, जिसके प्रति दल समर्पित होगा। जहां तक रा.स्व. संघ का संबंध है, इसका निश्चित सुविचारित आदर्श और कार्यपद्धति है। इस प्रकार यदि इस संगठन के किसी सदस्य का सहयोग वांछित हो तो यह दल की राजनीतिक-पहचान में भी आदर्शवाद होने की स्थिति में ही     संभव था। इस बिंदु पर भी पूरी सहमति थी। यहां तक कि जब अपनी प्रेस-वार्ताओं में उन्होंने कहा कि हिंदू राष्टÑ में विश्वास करने के कारण हिंदू महासभा सांप्रदायिक है तो मैंने उनका इस ओर ध्यान आकृष्ट किया कि हम रा.स्व.संघ के स्वयंसेवक भी भारतीय राष्टÑ के हिंदू राष्टÑ होने में उससे ज्यादा नहीं तो उतना ही दृढ़ विश्वास रखते हैं और इसलिए रा.स्व.संघ भी उनसे दूर ही रहने का पात्र है। परिणामत: उन्हें मेरी या ऐसे साथियों की सहानुभूति या सहयोग की आशा नहीं करनी चाहिए जो संघ के हिंदू राष्टÑ के विचार की पुन:प्रतिष्ठापना में अटूट निष्ठा रखते हैं और इसके लिए अनथक प्रयासरत हैं।
इस पर डॉ. मुखर्जी ने स्वीकार किया कि उन्होंने एक आवांछित टिप्पणी की थी। उन्होंने हिंदू राष्टÑ के विचार से पूर्ण सहमति व्यक्त की और कहा कि हिंदू राष्टÑ को उसके पूर्ण गौरव के साथ पुन: प्रतिष्ठित करने का विचार लोकतांत्रिक राज्य की आधुनिक अवधारणा से बेमेल नहीं है। उन्होंने कहा कि हिंदू राष्टÑ गैर-हिन्दू समुदायों को भी राष्टÑजीवन में तब तक पूर्ण नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समानता की गारंटी देता है, जब तक वे किसी राष्टÑ-विरोधी गतिविधि में शामिल न हों या राष्टÑ को उसके परम वैभव के स्थान से गिराकर सत्ता हथियाने की महत्वाकांक्षाएं न पालें। उन्होंने इस तथ्य को अपने राजनीतिक दल के उद्देश्यों में भी स्पष्ट करने की उत्सुकता व्यक्त की।
इस प्रकार पूर्ण सहमति की स्थिति में मैंने अपने कुछ दृढ़ निश्चयी और कसौटी पर परखे हुए सहयोगियों को चुना जो नए राजनीतिक दल के गठन का गुरुतर दायित्व निस्वार्थ ओर अचल निष्ठा से निभा सकते थे और जिनमें एक लोकप्रिय प्रतिष्ठित अखिल भारतीय राजनीतिक दल के उदय हेतु व्यापक और अटूट आधारशिला रखने की योग्यता थी। इस प्रकार डॉ. मुखर्जी अपनी वह महत्वाकांक्षा साकार कर सके, जिसे अब भारतीय जनसंघ कहा जाता है।
डॉ. मुखर्जी को अच्छे कार्यकर्ता प्रदान करने के बाद मैं, अपनी धारणाओं के अनुसार, जनसंघ की आगामी सभी गतिविधियों से विलग हो गया और रा.स्व.संघ के माध्यम से हिंदुओं के सांस्कृतिक संगठन के निर्माण कार्य में जुट गया। परंतु समय-समय पर, जब भी परस्पर भेंट का संयोग होता था, वह मुझे जनसंघ की प्रगति तथा अन्य प्रस्तावित कार्यक्रमों और आंदोलनों के बारे में बताते थे। मैं भी राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के कार्य में उनकी सहायता और सहयोग का अनुरोध करता था और वे सदा किसी भी समय और कहीं भी इच्छानुसार उपलब्ध रहते थे। हममें स्नेह का एक घनिष्ठ संबंध, जो सार्वजनिक जीवन में सहयोगी साथी की सीमा से परे था, उभर आया था और हर दिन यह और प्रगाढ़ होता जाता था। हम अपने-अपने संगठनों में प्राय: प्रत्येक महत्वपूर्ण कदम उठाने से पहले शायद ही एक-दूसरे से सलाह लेने से चूकते थे, परंतु एक-दूसरे के काम में दखल न देने, दोनों संगठनों को एक-दूसरे से भ्रमित न करने या एक को दूसरे पर आरोपित न करने के प्रति हमेशा सावधान रहते थे।
    (प्रकाशित तिथि 28 जनवरी, 1990)

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