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समृद्धि के सोपान

Written byArchiveArchive
Dec 25, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 25 Dec 2017 11:11:10


मेक इन इंडिया ने न सिर्फ भारत के उद्यमियों में एक नई ऊर्जा का संचार किया है बल्कि विदेशों से भी निवेशकों को आकर्षित किया है। भारत में कारोबार में सुगमता के लिए दुनिया में देश का मान-सम्मान बढ़ा है

प्रियंका द्विवेदी  

भारत को निर्माण का वैश्विक केन्द्र बनाने और विनिर्माण के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगभग तीन साल पहले 25 सितंबर, 2014 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मेक इन इंडिया अभियान की शुरुआत की थी। भारत में वैश्विक निवेश और विनिर्माण को आकर्षित करने की यह योजना आगे चलकर एक अंतरराष्ट्रीय मार्केटिंग अभियान के रूप में भी सामने आई। मेक इन इंडिया अभियान इसलिए शुरू किया गया जिससे भारत में बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर पैदा हों और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिले। इसका एक आयाम देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति देना और घाटे में चल रही सरकारी कंपनियों की हालत दुरुस्त करना भी है। मेक इन इंडिया अभियान में सरकार ने ऐसे 25 क्षेत्रों की पहचान की है, जिनमें हमारे वैश्विक अगुआ बनने की क्षमता है।
वर्तमान में देश के सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण का योगदान 15 प्रतिशत है। इस अभियान का लक्ष्य एशिया के अन्य विकासशील देशों की तरह इसे 25 प्रतिशत करना है। इस प्रक्रिया में सरकार को उम्मीद है कि ज्यादा से ज्यादा रोजगार उत्पन्न होगा, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित होगा और भारत को विनिर्माण केंद्र में तब्दील किया जा सकेगा।
मेक इन इंडिया अभियान का ‘लोगो’ एक शेर है जो अशोक चक्र से प्रेरित है और भारत की हर क्षेत्र में सफलता को दर्शाता है। इस अभियान को प्रधानमंत्री मोदी ने 1916 में जन्मे प्रसिद्ध देशभक्त, दार्शनिक और राजनीतिक विभूति पं. दीनदयाल उपाध्याय को समर्पित किया है।

‘मेक इन इंडिया’बनाम ‘मेक इन चाइना’
चीन से आने वाले खिलौने और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अब भारत में ही बनने लगे हैं और इसकी शुरुआत खुद चीनी कंपनियों ने की है। आंध्र प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में स्थित कई चीनी कंपनियां अमेरिका को निर्यात के लिए भी सामान बना रही हैं । मेक इन इंडिया अभियान से आकर्षित होकर श्री सिटी इंडस्ट्रियल हब में ऐसी छोटी-बड़ी 100 कंपनियां कार्यरत हैं। इस योजना के तहत सरकार उन कंपनियों को कई तरह की रियायतें दे रही है जो भारत में उत्पादन करेंगी। कहना न होगा, परंपरागत रूप से भारत को सामान निर्यात करने वाली चीनी कंपनियां इन रियायतों का फायदा उठाने भारत आ रही हैं।
शायद इन्हीं वजहों ने एप्पल आई फोन बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी फॉक्सकॉन को भारत में 20 अरब डॉलर के निवेश के साथ 10 फैक्ट्रियां लगाने को आकर्षित किया है। इस कंपनी ने चीन में 10 लाख लोगों को नौकरी दी है। फॉक्सकॉन क्जाओमी समेत कई अन्य चीनी ब्रांड के लिए ‘असेम्बलिंग’ का काम यहां एक साल पहले ही शुरू कर चुकी है। पिछले साल क्जाओमी, वनप्लस, लेनोवो, जियोनी और आसुस जैसी कंपनियों ने भी मेक इन इंडिया के तहत भारत में निवेश की घोषणा की । मैन्यू फैक्चरिंग फर्म शियान लोंगी सिलिकॉन मैटीरियल्स कॉर्पोरेशन ने हाल ही में आंध्रप्रदेश में 25 करोड़ डॉलर के निवेश और बाद में इसके छह गुना निवेश का वादा किया है, जिससे पांच हजार नौकरियों के अवसर पैदा होंगे।
अगले दशक में भारत को 10 करोड़ नौकरियों के अवसर पैदा करने की जरूरत पड़ेगी, ऐसे में उसके लिए ये विदेशी कंपनियां काफी अहम हैं और यह सब मेक इन इंडिया अभियान की वजह से ही संभव हो पाया है।

‘मेक इन इंडिया’ के तीन साल

चीन आउटसोर्सिंग, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में भारत का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी है। विनिर्माण केंद्र बनने में भारत का खराब बुनियादी ढांचा और लचर संचालन व्यवस्था सबसे बड़ी बाधा रही है। पिछली सरकारों का नौकरशाही नजरिया, सुगम परिवहन की कमी और बड़े पैमाने पर फैला भ्रष्टाचार निर्माताओं के लिए समय पर उत्पादन करना मुश्किल करता था। मोदी सरकार ने इन सब बाधाओं को दूर करने का वादा किया है जिससे निवेशकों के लिए यहां उद्योग स्थापित करना आसान हो।
मेक इन इंडिया का मकसद भारत में औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाना है। इस दृष्टि से प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश के मामले में मोदी सरकार का प्रदर्शन मनमोहन सरकार से बेहतर रहा है, 2011-12 में 117 अरब डॉलर का पूंजी निवेश हुआ था जबकि 2014-16 में यह आंकड़ा बढ़कर 149 अरब डॉलर हो गया था।

मोदी सरकार के बड़े कदम
मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के लिए मोदी सरकार ने कई बड़े कदम उठाए हंै। गृह मंत्रालय ने देश में हथियार और गोला-बारूद के उत्पादन में निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए नियमों को और उदार बना दिया है। इससे मेक इन इंडिया को तो बढ़ावा मिलेगा ही, हथियार उत्पादन के क्षेत्र में रोजगार भी बढ़ेंगे। उदार नियमों के कारण वैश्विक स्तर के देश में ही निर्मित हथियारों के जरिए सेना और पुलिस बलों की हथियार संबंधी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकेगा। नए नियम गृह मंत्रालय द्वारा छोटे हथियारों के निर्माण को प्रदान किए जाने वाले लाइसेंस पर लागू होंगे, साथ ही ये नियम औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग के तहत लाइसेंस प्राप्त करने वाले टैंक, हथियारों से लैस लड़ाकू वाहन, रक्षक विमान, अंतरिक्ष यान, युद्ध सामग्री और अन्य हथियारों के पुर्जे तैयार करने वाली इकाइयों पर भी लागू होंगे।
उत्पादन के लिए उदार नियम  
उत्पादन के लिए दिया गया लाइसेंस आजीवन वैध होगा। प्रत्येक 5 वर्ष के बाद लाइसेंस के नवीनीकरण की शर्त को हटा दिया गया है। हथियार उत्पादकों द्वारा केंद्र और राज्य सरकारों को छोटे और हल्के हथियारों को बेचने के लिए गृह मंत्रालय की पूर्व अनुमति की अब जरूरत नहीं होगी। जितने उत्पादन की अनुमति है अगर उससे 15 फीसदी अधिक तक का उत्पादन ज्यादा किया जाता है तो इसके लिए सरकार से स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होगी। सिर्फ उत्पादक इकाई को लाइसेंस देने वाले प्राधिकरण को सूचना देनी होगी।

 नीतिगत पहल
रक्षा उत्पादों के स्वदेश में निर्माण के लिए सरकार ने 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी हुई है। इसमें से 49 प्रतिशत तक की एफडीआई को सीधे मंजूरी का प्रावधान है, जबकि 49 प्रतिशत से अधिक के एफडीआई के लिए सरकार से अलग से मंजूरी लेनी पड़ती है।

स्वदेशी उत्पादन पर ध्यान
मेक इन इंडिया के जरिये रक्षा क्षेत्र में विदेशी निर्भरता खत्म करने की कोशिश की जा रही है। पिछले सालों में इसका बहुत अधिक लाभ भी मिला है। रक्षा मंत्रालय ने भारत में निर्मित कई उत्पादों का अनावरण किया है, जैसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) का तेजस एयरक्राफ्ट, मध्यम दूरी की मिसाइलें, टैंक आदि। अभी तक सरकारी शिपयार्डों में ही युद्धपोतों के स्वदेशीकरण का काम चल रहा था, लेकिन देश में पहली बार नौसेना के लिए निजी क्षेत्र के शिपयार्ड में बने दो युद्धपोत पानी में उतारे गए हैं। रिलायंस डिफेंस एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड ने 25 जुलाई, 2017 को गुजरात के पीपावाव में नौसेना के लिए दो ‘आॅफशोर पैट्रोल वेसेल’ उतारे, जिनके नाम शचि और श्रुति हैं।एफ-16 के रखरखाव का केन्द्र  बनेगा भारत अमेरिकी एयरोस्पेस कंपनी लॉकहीड मार्टिन को अगर भारत में एफ-16 विमान बनाने की अनुमति मिल गई तो भारत एफ-16 विमानों के रखरखाव का ‘ग्लोबल हब’ बन सकता है। उम्मीद है कि लॉकहीड टाटा के साथ मिलकर भारत में एफ-16 के ब्लॉक 70 का निर्माण करेगी। दरअसल इस वक्त दुनिया में करीब 3000 एफ-16 विमान हैं।

भारत में बनाओ, भारत में बना खरीदो
इस नीति के तहत रक्षा मंत्रालय ने 82 हजार करोड़ के सौदे को मंजूरी दी है। इसके अंतर्गत लाइट कम्बैट एयरक्राफ्ट, टी-90 टैंक और लाइट कम्बैट हेलीकॉप्टरों की खरीद भी शामिल है। इस क्षेत्र में एमएसएमई को प्रोत्साहित करने के लिए कई सुविधाएं दी गई हैं।

बुलेट ट्रेन से बढ़ेगा हौसला
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बुलेट ट्रेन परियोजना से देश विकसित राष्ट्रों के समकक्ष खड़ा हो जाएगा। बुलेट ट्रेन से देश की अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी और साथ ही देश के पर्यटन, प्रौद्योगिकी, प्रतिभा और व्यापार को भी सीधे लाभ पहुंचेगा। इस महत्वाकांक्षी परियोजना से मेक इन इंडिया को बढ़ावा मिलेगा। निकट भविष्य में बुलेट ट्रेन के कल-पुर्जों का निर्माण देश में ही होने की उम्मीद है। परियोजना से न केवल देश के विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा बल्कि देश में नई प्रौद्योगिकी का भी विकास होगा।

सबसे बड़ी तेल कंपनी करेगी निवेश
दुनिया की सबसे बड़ी तेल निर्यातक कंपनी सऊदी आर्मको भारत में 40 हजार करोड़ रुपये का निवेश करने जा रही है। कंपनी ने आधिकारिक तौर पर भारत में अपना कार्यालय शुरू कर दिया है। आर्मको इंडियन आॅयल के कंसोर्टियम के साथ मिलकर महाराष्ट्र में जल्द ही नई रिफाइनरी बनाने जा रही है। भारत में 19 प्रतिशत कच्चा तेल और 29 प्रतिशत एलपीजी सऊदी अरब से आयात होता है। वर्ष 2016-17 के दौरान भारत ने सऊदी अरब से 3.95 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया।
विदेशी निवेश में भारत सर्वोच्च
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में भारत अपना सर्वोच्च स्थान बनाए हुए है। मोदी सरकार के कार्यकाल में देश दुनिया में सबसे ज्यादा एफडीआई आकर्षित करने वाला देश बना है। सिर्फ 2016 में देश में 809 परियोजनाओं में 62.3 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया। मेक इन इंडिया के इक्विटी प्रवाह में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। मोदी सरकार ने देश के सभी बड़े क्षेत्रों को एफडीआई के लिए खोल दिया है। ढांचागत विकास के लिए मोदी सरकार ने कई क्षेत्रों में 100 प्रतिशत एफडीआई को मंजूरी दे दी है।  इससे मेक इन इंडिया को सीधे बढ़ावा मिलेगा।

उद्यमिता में भी तेजी
अमेरिका में नौकरी कर रहे भारतीय इंजीनियर अपने देश में आकर औसतन 3 से 4 स्टार्ट अप रोज शुरू कर रहे हैं। वहीं देश के नौजवान उद्यमी अपना कारोबार तेजी सेबढ़ा रहे हैं और निवेशकों से अरबों रुपए का निवेश पा रहे हैं। 74,650 नई कंपनियों का पंजीकरण
मोदी सरकार द्वारा उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के कारण देश में मौजूदा साल में अब तक 74,650 नई कंपनियों का पंजीकरण हो चुका है। कारपोरेट कार्य मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार जनवरी-अगस्त 2017 के दौरान 74,650 नई कंपनियां स्थापित की गई हैं। अकेले अगस्त महीने में 9,413 कंपनियां पंजीकृत हुईं जबकि मार्च में सर्वाधिक 11,293 कंपनियों का पंजीकरण किया गया।     
मेक इन इंडिया अभियान को  बड़ी सफलता दिलाने के लिये प्रयासों और सुधारों की एक लंबी श्रृंखला है। इसके लिये राज्यों को भी केंद्र की तरह प्रतिबद्धता दिखानी होगी, तब जाकर भारत को विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने का स्वप्न पूरा हो पाएगा। निश्चित रूप से समृद्धि के इन सोपानों के माध्यम से भारत विश्व में अपना उचित स्थान पाने की ओर बढ़ चला है। 
(लेखिका  मेवाड़ विश्वविद्यालय, राजस्थान में पत्रकारिता विभाग की विभागाध्यक्ष और टेक्निकल टुडे पत्रिका की सह संपादक हैं )

मेक इन इंडिया : कुछ विशेष उपलब्धियां
भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, यह वृद्धि तब हुई है जब वैश्विक एफडीआई दर में गिरावट रही
लाइसेंसिंग, सुरक्षा और पर्यावरण मंजूरी जैसी प्रक्रियाओं को सरल बनाने से व्यापार करने की सुगमता (इज आफ डूइंग बिजिनेस) सूचकांक में भारत ने सुधारी अपनी स्थिति
रक्षा क्षेत्र तथा इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन और निर्माण के क्षेत्र में उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि, नतीजतन आयात निर्भरता में आई कमी
कपड़ा, फुटवियर और चमड़ा उद्योग को प्रदान की नई ऊर्जा

‘मेक इन इंडिया’: कुछ चुनौतियां
रेल-सड़क यातायात और अपर्याप्त बंदरगाह।  तैयार उत्पाद को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए जरूरी यातायात सुविधा का बंदोबस्त करना जरूरी। ऊर्जा की कमी दूर करनी होगी।  राज्य-केंद्र समन्वय हो और मजबूत।
कृषि पर आधारित जनसंख्या में नहीं हुई खास कमी। इसका अर्थ है कि एक बड़ा श्रम बल अब तक विनिर्माण प्रक्रियाओं से नहीं जुड़ा।
श्रम ब्यूरो के अनुसार संगठित क्षेत्र में रोजगार सृजन की स्थिति में नहीं हुआ कोई विशेष सुधार।
जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान अब भी 50 प्रतिशत से अधिक। विनिर्माण क्षेत्र में और बढ़त चाहिए।
औद्योगिक उत्पादन की दर में आई उछाल तो सुधरेगी उत्पादन की स्थिति।
श्रम कानूनों में भी हों और कई बदलाव, यह करना भी है बेहद जरूरी।
मेक इन इंडिया की सफलता स्किल इंडिया और स्टैंड-अप इंडिया जैसे अभियानों की सफलता से जुड़ी। विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनने के लिये भारत को करना होगा अपनी कौशल क्षमता में विकास।
देश में पर्याप्त संख्या में वाणिज्यिक अदालतों की स्थापना हो, ताकि व्यापार से जुड़े कानूनी विवादों का जल्दी किया जा सके निपटारा।
पूंजी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये बैंकों की एनपीए समस्या को सुलझाने में न हो देरी।
यूपीए सरकार का दूसरा कार्यकाल घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों के साये में बीता। इससे भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी नुकसान पहुंचा। पुराने और नए निवेशकों का विश्वास कमाना मोदी सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती होगी।
कारोबार करना आसान बनाने में ई-गवर्नेंस की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। केंद्र और राज्यों में इसके माध्यम से सिंगल विंडो सिस्टम शुरू करने के साथ-साथ भूमि-आवंटन में भी तेजी लानी होगी।
भ्रष्टाचार के अलावा भारत के सरकारी दफ्तरों की दूसरी सबसे बड़ी समस्या है लाल फीताशाही। मेक इन इंडिया निवेशक जटिल प्रक्रियाओं के जाल में फंसकर अपना समय गंवाना पसंद नहीं करेंगे। अत: सरकार को बनानी होंगी आसान व्यवस्थाएं और सिंगल विंडो सिस्टम्स पर देना होगा पूरा जोर। देश में व्यापार करने की सुगमता (इजी आॅफ डूइंग बिजिनेस) में काफी प्रगति हुई है लेकिन इसे बनाना होगा और भी बेहतर।

हिमांशु गुप्ता, निदेशक, रैंप इंडस्ट्रीज, ग्रेटर नोएडा
हिमांशु गुप्ता ने 2015 में स्टार्ट अप इंडिया के तहत अपनी कंपनी का पंजीकरण करवाया था। उन्होंने 14 साल तक जेडटीई टेलीकॉम नामक चीनी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करने के बाद अपने खुद के व्यवसाय/स्टार्ट अप पर काम किया। उनकी  कंपनी रैंप इंडस्ट्री शीट मेटल पुर्जे, जैसे आॅटोमोबाइल पुर्जे, कार वाइपर, यूपीएस इनवर्टर के मेटल कैबिनेट और गृह सज्जा और एलईडी लाइट के मेटल पुर्जे बनाती है। वे बताते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के स्टार्ट अप इंडिया अभियान के माध्यम से हम किसी भी व्यवसाय को आसानी से शुरू कर सकते हैं। पहले इसमें समय लगता था, लेकिन अब ऐसा करना आसान हो गया है। आॅटोमोबाइल पुर्जों के निर्माण में अब हम विदेशों पर निर्भर नहीं हैं। इनका निर्माण अब हम खुद अपनी कंपनी के द्वारा कर रहे हैं। फिलहाल वे 19 लोगों की टीम के साथ काम कर रहे हैं।

राजेश मिश्रा, व्यवसाय प्रमुख, गीगावाट प्राइवेट लिमिटेड, गाजियाबाद

सौर ऊर्र्जा वर्तमान समय की मांग है, इसी विचार को लेकर राजेश मिश्रा ने स्टार्टअप इंडिया के अंतर्गत अपनी कंपनी गीगावाट प्राइवेट लिमिटेड को पंजीकृत करवाया है। वे बताते हैं कि वे सौर ऊर्जा आधारित प्रोजेक्ट, जैसे सोलर लाइट, सोलर प्लेट, सोलर लालटेन, सोलर पैन,  सोलर कुकर, सोलर होमलाइट ,सोलर पंप की निर्माण इकाई की शुरुआत करने जा रहे हैं। लोगों को सौर ऊर्जा के लिए जागरूक करने के साथ ही सोलर सेफ्टी सर्विलांस के कई उपकरण तैयार कर रहे हैं। वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के मेक इन इंडिया का उदेश्य भी यही है कि देश में ही विभिन्न उत्पाद तैयार किया जाएं। वे बताते हैं कि स्टार्टअप इंडिया में बैंक से बहुत कम ब्याज पर ऋण मिल जाता है। साथ ही प्रोजेक्ट के अनुसार 15 से 20 लाख रुपये की सहायता भी सरकार से मिलती है। 

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