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चाबहार बंदरगाह भारत-ईरान-अफगानिस्तान के बीच क्या महत्व रखता है, यह भारत से गेहूं की पहली खेप वहां पहुंचने पर अफगानिस्तान वालों की खुशी देखकर समझा जा सकता है। यह त्रिपक्षीय सहयोग की सदाबहार राह बनेगा। पाकिस्तान को दरकिनार कर भारत ने चाबहार के जरिए आतंक के पैरोकारों को दिया करारा जवाब
आलोक गोस्वामी
ऊ७तरराष्टÑीय कूटनीति का पहला सबक होता है-दूसरे देशों के साथ साझे हित के आयाम तलाश कर दोनों के लाभ की दिशा में समन्वय और सहयोग के साथ कदम बढ़ाना। ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित करने की ईरान और अफगानिस्तान के साथ मई, 2016 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा की गई संधि उसी समन्वयकारी और समझदारी वाली कूटनीति को ही रेखांकित करती है।
और महज एक साल के भीतर इस ऐतिहासकि संधि के सुफल मिलने शुरू हो गए, जब भारत के कांडला बंदरगाह से 15,000 टन गेहूं की पहली खेप चाबहार के रास्ते अफगानिस्तान के सीमांत सूबे नीमरोज पहुंची और वहां के लोगों ने खुशी में झूमते हुए भारत को भर-भर दुआएं दीं। भारत से कभी अफगानिस्तान तक सामान भेजने का एकमात्र रास्ता पाकिस्तान से गुजरा करता था, लेकिन पाकिस्तान ने हेकड़ी में आकर वह रास्ता बंद कर दिया तो भारत की तरफ से चाबहार उसका मुंहतोड़ जवाब जैसा भी साबित हुआ है। लिहाजा पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। और सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, जो चीन पाकिस्तान में 4600 करोड़ डालर खर्च करके उसका ग्वादर बंदरगाह बना रहा है उसके भी मुश्कें कसी हुई हैं। वह ठगा सा देख रहा है। बीजिंग बिलबिला रहा है, पर झेंप मिटाने के उसने अपने भोंपू अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ में ‘चाबहार से चीन की बड़ी कंपनियों को भी फायदा’ और ‘यह चीन के बेल्ट एंड रोड कदम के साथ मेल खाता है’ जैसी खबरें और संपादकीय टिप्पणियां भी छपवार्इं।
कहना न होगा, भारत ने एक संधि से कई निशाने साधे हैं। एक तरफ तो उसने ईरान और अफगानिस्तान जैसे साझी विरासत और साझे हितों वाले देशों से दोस्ती की बुनियाद मजबूत की है, तो वहीं आतंकवादियों की पनाहगाह पाकिस्तान और उसे पैसे के दम पर अपने ठेंगे तले रखने वाले विस्तारवादी चीन को उसकी जायज जगह दिखाई है। नि:संदेह चाबहार बंदरगाह भारत-ईरान-अफगानिस्तान के त्रिपक्षीय संबंधों में मील का एक पत्थर कहा जा सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी की इस दूरदर्शिता की दुनियाभर के कूटनीतिज्ञ जहां एक ओर सराहना कर रहे हैं वहीं उस अमेरिका ने भी ‘जायज तरीकों से भारत के ईरान के साथ व्यवहार’ को लेकर अपनी रजामंदी जताई है। और यह रजामंदी खुद अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने तकरीबन उन्हीं दिनों नई दिल्ली में जताई जब वे अक्तूबर, 2017 के आखिरी हफ्ते में भारत आए हुए थे।
मई, 2014 में प्रधानमंत्री पद संभालते ही मोदी ने भूटान की पहली आधिकारिक यात्रा करके साफ कर दिया था कि वे पड़ोसी देशों के साथ ही दुनिया में सभी देशों के साथ कूटनीतिक संबंध मजबूत बनाने को लेकर गंभीर हैं। शियाबहुल ईरान और अफगानिस्तान के साथ तो भारत के प्राचीन संबंध रहे हैं। ईरान को पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों ने सुुन्नी मुसलमानों के वोटों के लालच में चिमटी से भी छूना मुनासिब नहीं समझा था। लेकिन उसी ईरान के साथ संबंधों पर जमी धूल हटाई थी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने, जब वे अप्रैल, 2001 में तेहरान की पांच दिन की यात्रा पर गए थे। मुझे भी उस यात्रा में उनके साथ जाने का अवसर मिला था और उस दौरान भारत-ईरान रिश्तों की ऐतिहासिकता के बारे में कई महत्वपूर्ण बातें पता चली थीं। ईरान प्राचीन आर्यावर्त का हिस्सा रहा है, जब इसे परशिया या फारस की खाड़ी के नाम से जाना जाता था। तेल और गैस के अकूत भंडारों वाला यह ईरान ही है जो भारत को दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा यानी कुल जरूरत का 14 प्रतिशत कच्चा तेल उपलब्ध कराता रहा है। यह महज संयोग नहीं था कि वाजपेयी सरकार के तहत ही चाबहार बंदरगाह निर्माण की शुरुआती चर्चा चली थी (केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने इस बात का उल्लेख भी किया), जिसे मोदी सरकार ने पदभार संभालने के 2 ही साल के अंदर मूर्तरूप दिया है। मोदी ने मई, 2016 की अपनी ईरान यात्रा में द्विपक्षीय हित की अन्य कई घोषणाएं कीं, जिनमें प्रमुख हैं-चाबहार मुक्त व्यापार क्षेत्र में अनेक कंपनियों का निर्माण, तेल आयात दुगुना करना और एक बड़ा गैस भंडार विकसित करना।
इधर चाबहार से अफगानिस्तान को जोड़ने के लिए भारत 2009 में ही अफगानिस्तान में कई सड़क मार्गोंे का निर्माण कर चुका है, जैसे-चाबहार से 883 किमी. दूर अफगानिस्तान में जरंज को जोड़ने वाली जरंज-डेलारम सड़क, जो अफगानिस्तान के ‘गारलैंड हाइवे’ तक पहुंच सुगम बनाती है। इसके जरिए वहां के चार बड़े शहरों-हेरात, कंधार, काबुल और मजार-ए-शरीफ तक पहुंचा जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि 2014 में जब अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों ने वापसी की थी, उस वक्त पाकिस्तान ने वहां भारत के राहत कार्यों और अफगानियों को फिर से अपने पैरों पर खड़े होने में मदद के प्रयासों का अंतरराष्टÑीय मंचों पर यह कहकर विरोध किया था कि भारत अफगानिस्तान को अपने ‘कब्जे’ में करना चाहता है। अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान की 2,600 किमी. की छिद्रित सीमा है जिसके जरिए पाकिस्तान के आतंकी तत्व वहां के पहाड़ी इलाकों में अड्डे जमाते रहे हैं। पाकिस्तान क्यों चाहेगा कि भारत वहां विकास कार्य करे या और किसी तरह की मदद करे। चाबहार से उसके कसमसाने की यह भी एक बड़ी वजह है कि अब अफगानिस्तान के लिए सामान भेजते वक्त उसके कराची बंदरगाह को कोई नहीं पूछेगा।
भारत के केन्द्रीय सड़क परिवहन और जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी कहते हैं कि ऐतिहासिक संबंधों को सहेजे चाबहार भारत और ईरान के बीच विकास के एक नए दौर की शुरुआत करेगा। अब हम पाकिस्तान जाए बिना अफगानिस्तान और उसके आगे रूस और यूरोप तक जा सकेंगे। भारत चाबहार और जहेदान के बीच 500 किलोमीटर का रेल मार्ग बनाने जा रहा है जो चाबहार को मध्य एशिया से जोड़ देगा। चाबहार परियोजना सार्वजनिक क्षेत्र के बंदरगाह के नाते भारत का पहला विदेशी उद्यम है।
गत 3 दिसम्बर को ईरान के राष्टÑपति हसन रूहानी ने चाबहार बंदरगाह विस्तार के पहले चरण का उद्घाटन किया। इस मौके पर भारत के जहाजरानी राज्यमंत्री पो. राधाकृष्णन के साथ ही 17 देशों के 60 से ज्यादा प्रतिनिधि उपस्थित थे। भारत इस परियोजना को कितना महत्व देता है, इसका अंदाजा इस बात से भी हो जाता है कि भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जब 2 दिसम्बर को अपनी रूस यात्रा खत्म करके लौट रही थीं तो बीच में वे तेहरान में रुकीं और परियोजना की बारीकियों पर वहां के विदेश मंत्री जावेद जरीफ से लंबी बातचीत करके सारी विघ्न-बाधाओं को दूर किया।
नई दिल्ली-तेहरान-काबुल के बीच दूरियां बेहद कम हो चली हैं, और गडकरी के शब्दों में कहें तो, दिल्ली से मुम्बई के बीच जितनी दूरी है उससे भी कम दूरी है कांडला से चाबहार तक। और हो भी क्यों न, ईरान और भारत के रिश्ते कोई आज के थोड़े हैं, ये तो सदियों पुराने हैं। ईरान के 14वीं सदी के जाने-माने शायर हाफिज शिराजी तो फारसी में लिख भी गए हैं कि-
जनूनत गरबे नफसे-खुद तमाम अस्त
जे-काशी पा-बे काशान नीम गाम अस्त
यानी, अगर हम एक बार मन बना लें तो काशी और काशान के बीच दूरी बस आधा कदम ही तो रह जाती है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों को दिशा दिखाता है विश्वास, न कि संदेह; सहयोग, न कि प्रभुत्व जमाना; सबको साथ लेकर चलना, न कि अलग रखना। ये चाबहार संधि को राह दिखाने वाला सिद्घांत और संचालन के पीछे का भाव है। भारत और ईरान एक-दूसरे के सहयोग के लिए प्रतिबद्घ रहेंगे। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय समझौतों में चाबहार बंदरगाह के साथ विनिर्माण से जुड़ी प्रगति मील के पत्थर हैं। चाबहार शांति और प्रगति का गलियारा बनेगा।
-नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री, भारत
चाबहार बंदरगाह से भारत को ईरान में अपनी स्थिति मजबूत करने और पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान, रूस और यूरोप तक सीधी पहुंच बनाने में मदद मिलेगी। यह ऐतिहासिक मौका है जो विकास का एक नया दौर शुरू करेगा। पूरी तरह कार्य में जुट जाने के बाद यह बंदरगाह प्रगति का इंजन बन जाएगा।
— नितिन गडकरी
केन्द्रीय सड़क परिवहन और जहाजरानी मंत्री, भारत
(चाबहार संधि के अवसर पर व्यक्त विचार)
एक सधा हुआ रणनीतिक कदम
जे. के. त्रिपाठी
चाबहार बंदरगाह भारत-ईरान-अफगानिस्तान के त्रिपक्षीय संबंधों में मील का एक पत्थर कहा जा सकता है। इसके निर्माण में जहां भारत एक बड़ी राशि निवेश कर रहा है वहीं ईरान और अफगानिस्तान भी भारत के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को नई रोशनी में देख रहे हैं। इस योजना के तहत ईरान के सिस्तान प्रदेश में, जहां यह बंदरगाह है, वहां से रेलवे लाइन विकसित की जाएगी। साथ ही अफगानिस्तान के चार बड़े शहरों को बंदरगाह से सड़क द्वारा जोड़ा जाएगा।
सवाल है कि इस बंदरगाह को विकसित करने से भारत को क्या लाभ मिलेगा। इस कदम से कई दूरगामी परिणाम मिलने की अपेक्षा की जा रही है। प्रथमत: भारत को ईरान से आयात होने वाला कच्चा तेल अपेक्षाकृत सस्ता पड़ेगा। अभी ईरान भारत की मूल आवश्यकता का 14 प्रतिशत तेल देता है जो कि सऊदी अरब से मिलने वाले तेल के बाद सबसे बड़ी मात्रा है। ईरान के प्रचुर गैस भंडार व तेल भंडार का उपयोग भारत उत्तरोत्तर अपने विकास के लिए कर सकता है। भविष्य में हम सऊदी अरब की तुलना में ईरान पर अधिक निर्भर रह सकते हैं। दूसरा सबसे बड़ा लाभ यह है कि इस बंदरगाह और उससे अफगानिस्तान को जाने वाली सड़कों के द्वारा हम बिना पाकिस्तानी दखल के अपना सामान अफगानिस्तान पहुंचा सकते हैं और वह भी अपेक्षाकृत कम खर्च में। यही नहीं, यह बंदरगाह भारत से मध्य एशिया और यूरोप के देशों के साथ व्यापार का एक नया छोटा और सस्ता मार्ग खोलेगा। ईरान के जरिये अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देशों के साथ संबंध बेहतर बनाने की पाकिस्तान के खिलाफ हमारी रणनीति में यह बंदरगाह एक बड़ा कदम साबित होगा। जहां पाकिस्तान ग्वादर बंदरगाह को चीनी मदद से विकसित करके भारत को घेरने का प्रयत्न कर रहा है, जिसमें चीन का अधिक स्वार्थ है, वहीं भारत का यह कदम चीन की वन बेल्ट वन रोड योजना का मुंहतोड़ जवाब होगा। श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह को विकसित करके ऋण पूर्ति के रूप में कब्जा करने के बाद चीन भारत के पश्चिम में ग्वादर में अपनी नौसेना जमाने की जुगत में है। ऐसे में ग्वादर से मात्र 80 किलोमीटर पश्चिम में चाबहार बंदरगाह विकसित करना भारत की ओर से चीन की अरब सागर में घुसपैठ को चुनौती ही है।
एक और सवाल लोगों के मन में उभरता है, वह यह कि चीन के 4,600 करोड़ डॉलर के निवेश की तुलना में भारत द्वारा चाबहार में 50 करोड़ डालर का निवेश कितना लाभप्रद रहने वाला है? बेशक, ग्वादर बंदरगाह में चीन का निवेश बड़ा है और उसकी इस क्षेत्र को संचालित करने की इच्छा भी। किंतु पाकिस्तान में चीनी निवेश का विरोध भी होना शुरू हो गया है। कहा जाता है कि ग्वादर से होने वाली आय का 91 प्रतिशत हिस्सा चीन को अगले 40 वर्षों तक मिलता रहेगा जबकि पाकिस्तान के हिस्से में मात्र 9 प्रतिशत आय आएगी। भारत के चाबहार के निवेश में ऐसी कोई एकांगी शर्त नहीं है इसलिए वहां भारत का मार्ग प्रशस्त है। चाबहार में भारत के निवेश को पश्चिमी देशों में भी सराहना मिल रही है, क्योंकि यह चीन को रोकने की उनकी रणनीति में सहायक होगा। इससे भारत पश्चिमी सहयोगियों के और करीब आ जाएगा। कुल मिलाकर यह भारत का एक सधा हुआ रणनीतिक कदम है। इसका कितना बड़ा असर चीन व पाकिस्तान पर पड़ेगा, यह तो भविष्य ही बताएगा किंतु भारत के इस कदम से चीन और पाकिस्तान की बेचैनी तो बढ़ती दिखाई देने लगी है।
(लेखक पूर्व राजदूत रहे हैं)
ईरान के दक्षिणी तट पर स्थित सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत के किनारे बना चाबहार बंदरगाह भारत के पश्चिमी तट के पास है, इस वजह से इससे संपर्क करना आसान है।
ये है पाकिस्तान में चीनी पैसे से बन रहे उस ग्वादर बंदरगाह का कड़ा जवाब, जो चाबहार से महज 80 किलोमीटर पश्चिम में है।
परियोजना का निर्माण ईरान की रीवोल्यूशनरी गार्ड (सेना) से संबद्ध कंपनी खातम अल-अनबिया कर रही है। भारत की एक सरकारी कंपनी भी निर्माण में है शामिल।
इस बंदरगाह की सालाना मालवहन क्षमता होगी 85 लाख, फिलहाल यह है 25 लाख टन। बंदरगाह के ताजा विस्तार में 5 नयी गोदिया हैं जिनमें से 2 पर कंटेनर वाले जहाजों के लिए है सुविधा।
चाबहार से यूं होगा भारत को लाभ
भारत के कारोबारियों को इस बंदरगाह से फायदा इस तरह मिलेगा कि वे अपना सामान बिना किसी बाधा के सीधे ईरान तक भेज सकेंगे। वहां से इसे अफगानिस्तान और मध्य एशिया के दूसरे देशों में पहुंचाया जा सकेगा। भारत की इन देशों तक अब तक पहुंच की राह में पाकिस्तान रोड़ा बना हुआ था।
ल्ल यह बंदरगाह पूरी तरह चालू होने पर भारतीय सामान का निर्यात व्यय काफी कम या कहें अंदाजन एक तिहाई कम हो जाएगा। समय बचेगा, सो अलग।
पाकिस्तान और चीन से इतर यह भारत का एशिया के दूसरे देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है। ईरान और अफगानिस्तान से व्यापार बढ़ने पर जाहिर है इन देशों से भारत के संबंध पहले से और मजबूत होंगे।
चाबहार बंदरगाह ने ओमान की खाड़ी में अपनी क्षमता तीन गुना बढ़ा ली है। साथ ही पड़ोसी पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के लिए इसने एक बड़ी चुनौती पेश की है।
चाबहार बंदरगाह को जिस खातम अल-अनबिया कंपनी ने खड़ा किया ह वह ईरान की सरकारी निर्माण परियोजनाओं के लिए सबसे बड़ी अनुबंधक कंपनी है। इसके साथ ही निर्माण कार्य में भारत की सरकारी कंपनी ने भी हाथ बंटाया है।
इस बंदरगाह ने ईरान को हिन्द महासागर के और नजदीक पहुंचा दिया है। यहां से भविष्य में (संभवत:) चीन की होने वाली सैन्य हरकतों पर नजर रखी जा सकती है।
उल्लेखनीय है ईरान की मध्य एशिया और हिंद महासागर के उत्तरी हिस्से में बसे बाजारों तक आवागमन आसान बनाने के लिए चाबहार बंदरगाह को एक ‘ट्रांजिट हब’ के तौर पर विकसित करने की योजना भारत के लिए भी बाजार उपलब्ध कराएगी।











