विघ्न हरने वाली यात्रा
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विघ्न हरने वाली यात्रा

Written byArchiveArchive
Nov 27, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 27 Nov 2017 10:11:56

महाराष्ट्र में हर साल धूमधाम से गणेश उत्सव मनाया जाता है। उसी उल्लास के साथ यहां अष्ट विनायक की यात्रा भी होती है। उल्लेखनीय है कि गणेश जी का एक नाम विनायक भी है। इनके सभी मंदिरों में से महाराष्ट्र में मौजूद आठ मंदिर विशेष हैं, जिन्हें अष्टविनायक मंदिर कहा जाता है। अष्टविनायक का अभिप्राय है— आठ गणपति। ये आठ अति प्राचीन मंदिर भगवान गणेश के शक्तिपीठ भी कहलाते हैं। इन आठ मंदिरों में से छह पुणे जिले में और 2 रायगढ़ में हैं। गणपति या श्री विनायक बुद्धि और विद्या के आदि देव हैं। गणपति 'प्रथम आराध्य' भी हैं जिसका मतलब यह है कि किसी भी पूजा या यज्ञ के दौरान सबसे पहले उन्हीं की पूजा की जाती है। भक्तों का मानना है कि हर किसी को अपने जीवन काल में एक बार अष्टविनायक की यात्रा अवश्य करनी चाहिए। पुणे के समीप अष्टविनायक के आठ पवित्र मंदिर 20 से 110 किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित हैं। इन मंदिरों का पौराणिक महत्व और इतिहास है। इनमें विराजित गणेश की प्रतिमाएं स्वयंभू मानी जाती हैं, यानी ये स्वयं प्रकट हुई हैं।  अष्टविनायक के ये सभी मंदिर अत्यंत प्राचीन हैं। गणेश और मुद्गल पुराण में इन सभी का विशेष उल्लेख किया गया है। इन पवित्र प्रतिमाओं के प्राप्त होने के क्रम के अनुसार ही अष्टविनायक की यात्रा की जाती है। अष्टविनायक दर्शन की शास्त्रोक्त क्रम इस प्रकार है—मयूरेश्वर या मोरेश्वर (मोरगांव,  पुणे), सिद्धिविनायक (सिद्धटेक, पुणे), बल्लालेश्वर-(पाली गांव, रायगढ़) वरदविनायक  (कोल्हापुर, रायगढ़), चिंतामणि (थेऊर गांव, पुणे), गिरिजात्मज   (लेण्याद्री गांव, पुणे) विघ्नेश्वर अष्टविनायक  (ओझर, जूनर), महागणपति – (राजणगांव, पुणे) ।
मयूरेश्वर  
मयूरेश्वर या मोरेश्वर भगवान गणेश के 'अष्टविनायक' मंदिरों में से पहला है। यह मंदिर मोरगांव में करहा नदी के किनारे स्थित है। मोरगांव, पुणे में बारामती तालुका में स्थित है। इस क्षेत्र का 'मोर' नाम इसीलिए पड़ा, क्योंकि यहां किसी जमाने में बड़ी संख्या में मोर पाए जाते थे। मयूरेश्वर की मूर्ति यद्यपि आरंभ में आकार में छोटी थी, परंतु दशक दर दशक इस पर सिंदूर लगाए जाने के कारण यह आजकल बड़ी दिखती है। किंवदंती है कि ब्रह्मा ने सभी युगों में भगवान गणपति के अवतार की भविष्यवाणी की थी, मयूरेश्वर त्रेतायुग में उनके अवतार थे। एक पौराणिक कथा के अनुसार गणपति को मयूरेश्वर इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने 'मोरेश्वर' में रहने का निश्चय किया और मोर की सवारी की।
यह मंदिर पुणे से 80 किलोमीटर दूर स्थित है। मयूरेश्वर मंदिर के चारों कोनों में मीनारें हैं और लंबे पत्थरों की दीवारें हैं। यहां चार मुख्य द्वार हैं जो चारों युगों के प्रतीक हैं। इस मंदिर के द्वार पर शिवजी के वाहन नंदी की मूर्ति स्थापित है। मंदिर में विराजित गणेश जी की सूंड बाएं हाथ की ओर है तथा उनकी चार भुजाएं एवं तीन नेत्र हैं। इस मंदिर में भगवान गणेश द्वारा सिंधुरासुर नामक एक राक्षस का वध किया गया था।
सिद्धिविनायक मंदिर
अष्ट विनायक में दूसरे गणेश हैं सिद्धिविनायक। यह मंदिर पुणे से करीब 200 किमी की दूरी पर स्थित है। पास में भीम नदी है। यह क्षेत्र सिद्धटेक गांव के अंतर्गत आता है। यह पुणे के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। मंदिर करीब 200 साल पुराना है। मंदिर एक पहाड़ की चोटी पर बना हुआ है। मंदिर की परिक्रमा के लिए पहाड़ी की यात्रा करनी होती है। यहां गणेशजी की मूर्ति 3 फुट ऊंची और ढ़ाई फुट चौड़ी है। भगवान गणेश की सूंड सीधे हाथ की ओर है। सिद्धिविनायक का एक मंदिर मुंबई में भी है मगर वह अष्टविनायक मंदिरों में नहीं आता।
बल्लालेश्वर विनायक मंदिर
अष्टविनायक यात्रा का तीसरा पड़ाव है बल्लालेश्वर विनायक मंदिर। यह मंदिर रायगढ़ जिले के पाली गांव में है। यह जगह मुंबई से 124 कि.मी और पुणे से 111 कि.मी. दूर है।   इस मंदिर के साथ मान्यता जुड़ी है कि यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान गणेश किसी साधारण व्यक्ति जैसे परिधान (धोती-कुर्ते) में हैं। मान्यता है कि भगवान गणेश ने यहां पर अपने भक्त बल्लाल को एक ब्राह्मण के वेश में दर्शन दिए थे। उन्हीं बल्लाल के नाम पर इस मंदिर का नाम बल्लालेश्वर विनायक पड़ा। श्री विनायक का यह इकलौता मंदिर है जिसका नाम उनके भक्त के नाम पर रखा गया है।
त्रेता युग में जिस दण्डकारण्य का जिक्र है, यह स्थान उसी का हिस्सा माना जाता है। यह भी कि भगवान श्रीराम को मां जगदंबा ने यहीं पर दर्शन दिए थे। यहां से कुछ ही दूरी पर वह स्थान भी है जहां सीताहरण के समय रावण और जटायु में युद्ध हुआ था।
बल्लालेश्वर भगवान की प्रतिमा पाषाण के सिंहासन पर स्थापित है। पूर्व की तरफ मुख वाली 3 फुट ऊंची यह प्रतिमा स्वनिर्मित हुई लगती है। इस प्रतिमा में श्री गणेश की सूंड बांईं ओर मुड़ी हुई है। नेत्रों और नाभि में हीरे जड़े हुए हैं। श्री गणेश के दोनों ओर ऋद्धि-सिद्धि की प्रतिमाएं भी हैं जो उनके दोनों ओर चंवर लहरा रही हैं। यह प्रतिमा ब्राह्मण की पोशाक में स्थापित लगती है। मंदिर के समीप दो सरोवर भी हैं। इनमें से एक का जल भगवान गणेश को अर्पित किया जाता है। मंदिर में अंत: और बाह्य दो मंडपों का निर्माण किया गया है। बाहरी मंडप में भगवान गणेश के वाहन मूषक, जो कि अपने पंजों में मोदक दबाए हुए है, की प्रतिमा भी बनी हुई है।
इस मंदिर में भाद्रपद माह की शुक्ल प्रतिपदा से लेकर पंचमी के बीच  गणेशोत्सव की धूम देखी जा सकती है। इसी समय मंदिर में महापूजा और महाभोग का आयोजन भी किया जाता है।
श्री वरदविनायक
अष्ट विनायक में चौथे गणेश हैं श्री वरदविनायक। यह मंदिर रायगढ़ जिले के कोल्हापुर क्षेत्र में स्थित है। यहां एक सुंदर पर्वतीय गांव है महाड़। इसी गांव में श्री वरदविनायक मंदिर है।  मान्यता के अनुसार वरदविनायक भक्तों की सभी कामनाओं को पूरा होने का वरदान प्रदान करते हैं। मंदिर में नंददीप नाम का एक दीपक है जो कई वर्षों से प्रज्जवलित है।
चिंतामणि गणपति
अष्टविनायक में पांचवें गणेश हैं चिंतामणि गणपति। यह मंदिर पुणे जिले के हवेली क्षेत्र में स्थित है। मंदिर के पास ही तीन नदियों का संगम है। ये तीन नदियां हैं भीम, मुला और मुथा। यदि किसी भक्त का मन बहुत विचलित है और उसे जीवन में दु:ख ही दु:ख मिल रहे हैं तो इस मंदिर में आने पर ये सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। ऐसी मान्यता है कि स्वयं भगवान् ब्रह्मा ने अपने विचलित मन को वश में करने के लिए इसी स्थान पर तपस्या की थी। यह मंदिर पुणे से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
चिंतामणि मंदिर
थेउर को गणपति संप्रदाय के लोगों का तीर्थस्थल माना जाता है और मंदिर की वर्तमान संरचना का निर्माण भी गणपति संप्रदाय के संत मोर्य गोसावी और उनके वंशज धर्माधर ने करवाया था। अपने निवास स्थान चिंचवड और मोरगांव जाते समय मोर्य गोसावी अक्सर इस मंदिर के दर्शन के लिए आते थे। पूर्ण चंद्रमा वाली रात के हर चौथे दिन मोर्य थेउर मंदिर के दर्शन के लिए आया करते थे। कहानी के अनुसार, गुरु के आदेशों पर ही मोर्य ने थेउर में 42 दिन का उपवास कर तपस्या की थी। कहा जाता है कि इस समय उनके शरीर का संबंध दिव्य शक्ति से हो चुका था। माना जाता है कि भगवान गणेश उनके सामने शेर के रूप में प्रकट हुए और उन्हें सिद्धि प्रदान की।
श्री गिरजात्मज गणपति अष्टविनायक में अगले गणपति हैं श्री गिरजात्मज। यह मंदिर पुणे-नासिक राजमार्ग पर पुणे से करीब 90 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। गिरजात्मज का अर्थ है गिरिजा यानी माता पार्वती के पुत्र गणेश। यह मंदिर एक पहाड़ पर बौद्ध गुफाओं के स्थान पर बनाया गया है। यहां लेनयादरी पहाड़ पर 18 बौद्ध गुफाएं हैं और इनमें से 8वीं गुफा में गिरजात्मज विनायक मंदिर है। इन गुफाओं को गणेश गुफा भी कहा जाता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 300 सीढियां चढनी होती हैं। यह पूरा मंदिर ही एक बड़े पत्थर को काटकर बनाया गया है।
विघ्नेश्वर
अष्टविनायक में सातवें गणेश हैं विघ्नेश्वर गणपति। यह मंदिर ओझर जिले में जूनर क्षेत्र में स्थित है, जो पुणे-नासिक रोड पर नारायणगांव से  करीब 85 किलोमीटर की दूरी पर है। पौराणिक मान्यता के अनुसार विघ्नासुर नामक एक असुर था जो संतों को प्रताडि़त करता था। भगवान गणेश ने इसी क्षेत्र में उस असुर का वध किया और सभी को कष्टों से मुक्ति दिलवाई। तभी से यह मंदिर विघ्नेश्वर, विघ्नहर्ता और विघ्नहार के रूप में विख्यात है।  अन्य मंदिरों की तरह ही विघ्नेश्वर का मंदिर भी पूर्वमुखी है और यहां एक दीपमाला भी है, जिसके पास द्वारपालक हैं।
महागणपति
अष्टविनायक में आठवें गणेशजी हैं महागणपति। इन्हें गणेश जी का सबसे दिव्य और शक्तिशाली स्वरूप माना जाता है। मंदिर पुणे के रांजण गांव में स्थित है। मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा की ओर है जो कि बहुत विशाल और सुंदर है। प्रचलित मान्यता के अनुसार मंदिर की मूल मूर्ति तहखाने में छिपी हुई है। अतीत में जब विदेशियों ने यहां आक्रमण किया था तो उनसे मूर्ति बचाने के लिए उसे तहखाने में छिपा दिया गया था।  यह मूर्ति अष्टभुजा वाली मानी जाती है। त्रिपुरासुर दैत्य को मारने के लिए गणपति ने यह रूप धारण किया था। इसलिए इनका नाम त्रिपुरवेद महागणपति प्रसिद्ध हुआ। मराठा पेशवा माधवराव इस मंदिर की अक्सर यात्रा करते थे। उन्होंने 1790 में मूर्ति के आस-पास पत्थर के गर्भगृह का निर्माण करवाया था।
महाराष्ट्र के ज्यादातर शहरों से खासकर मुंबई और पुणे से अष्ट विनायक यात्रा के लिए विशेष बस सेवा उपलब्ध है, जो सभी मंदिरों की यात्रा कराती है।

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