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मानसिकता में बदलाव जरूरी

Written byArchiveArchive
Oct 28, 2017, 12:00 am IST
in Archive

आवरण कथा/बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ-जन-जन से जुड़ा अभियान

दिंनाक: 28 Oct 2017 11:56:11

 
हरियाणा में ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान के सकारात्मक परिणाम दिखने लगे हैं।  राज्य में 2011 में प्रति हजार लड़कों पर 877 लड़कियां थीं, जो बढ़कर 900 से अधिक हो गई हैं। इसके अलावा, महिला सशक्तिकरण के लिए निजी और सरकारी प्रयासों के भी अच्छे  नतीजे मिल रहे हैं

सुनील जागलान
चौबीस जनवरी, 2012 की मध्यरात्रि को एक निजी अस्पताल में जब मेरी बेटी का जन्म हुआ तो इसकी सूचना देने वाली नर्स के चेहरे के भाव बड़े अजीबोगरीब थे। उसने धीरे से कहा, ‘‘बेटी हुई है।’’ यह सुनते ही हमारे चेहरे खुशी से खिल गए थे। अस्पताल से जाते समय मैंने उस नर्स को 2,000 रुपये देते हुए कहा कि सुबह पूरे अस्पताल में मिठाई बांटना और कहना कि बीबीपुर के सरपंच के यहां बेटी जन्मी है। लेकिन उसने कहा, ‘‘आप 100 रुपये दे दीजिए, अगर लड़का होता तो हम इससे ज्यादा ले लेते।’’ यह मेरी जिंदगी की पहली घटना थी, जिसने मेरी खुशी को कम करने की कोशिश की। पिता बनने की खुशी में अगले दिन जब मैं मिठाई बांट रहा था तो कुछ अधिकारियों ने बेटा होने की बधाई दी। जब तक बेटी के छठी के गीत नहीं गवाए गए तब तक लोगों को यही लगा कि मेरे घर बेटा ही जन्मा होगा, चूंकि बेटी पैदा होने की खुशी में उस रात मेरी बहन रीतू ने थाली बजाई थी। बाद में जब लोगों को पता चला कि बेटी हुई है तो वे आश्चर्यचकित रह गए। कई दिनों तक यह बात मेरे जेहन में घूमती रही और इसी के बाद मैंने पहली बार गांव का लिंगानुपात जाना। पता चला कि गांव में कन्या शिशु की संख्या बहुत कम थी।
इसके बाद मैंने कन्या भू्रणहत्या रोकने के प्रयास शुरू कर दिए। इसके तहत कई छोटी बैठकों के अलावा 18 जून, 2012 को कन्या भू्रणहत्या रोकने के लिए चौपाल में महिला ग्राम सभा के आयोजन की मुनादी कराई। इसी दौरान मुझे एक बात और पता चली कि महिलाएं चौपाल में नहीं जातीं और अगर चौपाल के पास से गुजरती भी हैं तो घूंघट करती हैं। मैंने इसके लिए भी गांव की महिलाओं के साथ बातचीत की और इस भरोसे के साथ उनका सहयोग मांगा कि उनकी स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम उठाऊंगा। इसके बाद पहली बार 250 से अधिक महिलाएं चौपाल में एकत्रित हुर्इं। जब मैंने अपनी बेटी के जन्म की कहानी सुनाई और गांव में कन्या शिशु दर के आंकड़े उनके सामने रखे तो एक बुजुर्ग महिला शीला देवी ने कहा, ‘‘हम तो यही सुनते आए हैं कि बेटा ही वंश चलाता है। अगर किसी के यहां अधिक लड़कियां जन्म लेती हैं तो उन्हें गर्भ में ही मरवा दिया जाता है।’’ काफी विचार-विमर्श करके सबने गांव में कन्या भू्रणहत्या रोकने के लिए समिति गठित की और गर्भवती महिलाओं का पहले दो माह के भीतर ही पंजीकरण कराने का निर्णय लिया गया। इसके बाद इस कुरीति के विरुद्ध  14 जुलाई, 2012 को गांव में महाखाप, महापंचायत का आयोजन कराया, जिसमें हरियाणा के अलावा, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान की सभी खापों को पंचायत में शामिल होने का न्योता भेजा। साथ ही, इसमें महिलाओं को भी शामिल करने का फैसला किया ताकि वे खाप प्रतिनिधियों के समक्ष अपने विचार रखें। इस पंचायत में करीब 125 से ज्यादा खाप पंचायतों ने भाग लिया। इसमें मैंने सुझाव दिया कि कन्या भू्रणहत्या करने वालों पर धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए, जिसका सभी खाप प्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों व महिलाओं ने स्वागत किया और सरकार से इस दिशा में शीघ्र कानून बनाने की मांग की। साथ ही, इस खाप पंचायत के बाद जागरूकता अभियान शुरू हो गया, जिसमें राज्य सरकार ने भी काफी मदद की। इसी साल 15 अगस्त को मैंने एक बेटी की मां से ध्वजारोहण कराया, बाद में जिसे विभिन्न ग्राम पंचायतों ने भी अपनाया। मैंने किन्नर समाज को घर पर बुलाकर बेटी होने की बधाई देने की प्रथा शुरू करवाई। इसके अलावा, जींद जिले की बीबीपुर ग्राम पंचायत को मिलने वाले फंड में से महिलाओं द्वारा सुझाए गए कार्यों पर 50 फीसदी राशि खर्च करने की व्यवस्था भी की। इन प्रयासों का असर यह हुआ कि ग्राम सभाओं में महिलाओं की संख्या 500 से अधिक हो गई। जब महिलाओं की भागीदारी बढ़ी तो प्रसव पूर्व भ्रूण लिंग परीक्षण, घरेलू हिंसा और आॅनर किलिंग रोकने के प्रयास शुरू किए गए। साथ ही, बेटियों को सम्मान देने के लिए करीब 70 लाख रुपये की लागत से बने गांव के सबसे लंबे मार्ग का नाम ‘लाडो मार्ग’ रखा गया। साथ ही, महिला सशक्तिकरण के लिए गांव में लाडो स्थल, महिला शक्ति स्थल, महिला चबूतरा, लाडो पुस्तकालय व कंप्यूटर केंद्र बनाए गए। ‘बेस्ट वीमन शेफ आॅफ बीबीपुर’ प्रतियोगिता का आयोजन भी कराया गया, जिसमें गांव की 400 से अधिक महिलाओं ने हिस्सा लिया।
9 जून, 2015 को टीवी पर सलमान खान की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ का गाना ‘चल बेटा सेल्फी ले ले रे’ चल रहा था और मेरी बेटी नंदिनी अपनी सेल्फी ले रही थी। यह देख-सुनकर मेरे मन में ख्याल आया कि 19 जून को अपने जन्म दिन पर ‘सेल्फी विद डॉटर’ अभियान शुरू करना चाहिए। इसके बाद मैंने सोशल मीडिया के जरिये घोषणा की कि जो भी अपनी बेटी के साथ मुझे सेल्फी भेजेगा, उसे 3,100, 2,100, 1,100 रुपये के नकद पुरस्कार के साथ ट्रॉफी और प्रमाणपत्र भी दिया जाएगा। मुझे देशभर से 794 सेल्फी मिलीं और इनमें से तीन सर्वश्रेष्ठ सेल्फी को यह इनाम दिया गया। यह अभियान जारी रहा और 28 जून, 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यक्रम ‘मन की बात’ में इस प्रयास का न केवल उल्लेख किया, बल्कि लोगों से अपनी बेटी के साथ सेल्फी लेकर किसी भी भाषा में टैग लाइन के साथ सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की अपील भी की। साथ ही कहा कि जिसकी टैग लाइन प्रेरक होगी, वे उसे री-ट्वीट करेंगे। प्रधानमंत्री की प्रशंसा से प्रेरित होकर हमने ‘डिजिटल इंडिया विद लाडो’ अभियान शुरू किया, जिसमें घरों के बाहर बेटियों के नाम की नेम प्लेट के साथ उनका ई-मेल आईडी अंकित कराया। इसके साथ ही, बीबीपुर मॉडल आॅफ वुमेन एम्पावरमेंट एंड विलेज डेवलपमेंट के तहत पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा गोद लिए 100 स्मार्ट ग्राम में ‘सेल्फी विद डॉटर एंड ट्री’ अभियान शुरू किया। इसके तहत बेटियों और महिलाओं से पौधे लगवाए जाते हैं और उन्हीं के नाम पर उसका नामकरण करने के साथ पौधों की देखभाल की शपथ दिलाई जाती है। 2015 से शुरू इस अभियान के तहत बेटियों व महिलाओं के नाम से 10,000 से अधिक पेड़ लगाए जा चुके हैं, जिसके लिए वन विभाग ने राज्य स्तर पर मुझे सम्मानित भी किया। हमारा लक्ष्य गुरुग्राम जिले के 100 स्मार्ट गांवों में बेटियों के नाम पर लगभग 20,000 पेड़ लगाकर रिकॉर्ड बनाने का है। जिन घरों में जगह नहीं है, उन घरों की महिलाएं सार्वजनिक या धार्मिक स्थलों पर पौधे लगाकर उनकी देखभाल करेंगी।
इसके अलावा, मेवात और गुरुग्राम की लड़कियों के लिए पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के प्रयासों से ‘सेल्फी विद डॉटर फांउडेशन’ के बीबीपुर मॉडल द्वारा ‘लाडो पुस्तकालय’ खोले जा रहे हैं। इन पुस्तकालयों का उद्घाटन गांव की बेटियां ही कर रही हैं। पुस्तकालय के रख-रखाव और इस्तेमाल की जिम्मेदारी लड़कियों को ही दी गई है। पुस्तकालय खोलने से पहले बाकायदा इन इलाकों में सर्वेक्षण किया गया। इसमें पता चला कि मेवात की लड़कियां मलाला युसुफजई के जीवन संघर्ष को जानना चाहती हैं तो किसी ने कल्पना चावला और ज्योतिबा फुले के बारे में जानने की दिलचस्पी दिखाई।  इसे देखते हुए सशक्त महिलाओं की जीवनी, एसएससी, बैंकिंग, महिला पुलिस भर्ती, प्रतियोगी पुस्तकों के अलावा अन्य प्रेरणादायी पुस्तकें रखी गई हैं। इसके अलावा, मेवात व गुरुग्राम के 100 गांवों में सेल्फी विद डॉटर के बीबीपुर मॉडल आॅफ वुमेन एम्पावरमेंट एंड विलेज डेवलपमेंट योजना को लागू किया जा रहा है। इसका मकसद लड़कियों और महिलाओं को बाहरी दुनिया से जोड़ना है ताकि वे पढ़ और सीख कर आगे बढ़ सकें। बीबीपुर मॉडल पर विश्वविद्यालय की छात्राएं प्रोजक्ट भी बना रही हैं।
हरियाणा के लिए सबसे शुभ घड़ी 22 जनवरी, 2015 थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पानीपत शहर से ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान शुरू किया। राज्य में लिंगानुपात की स्थिति को देखते हुए यह कदम बेहद महत्वपूर्ण है। गिरते लिंगानुपात और महिला सशक्तिकरण  के लिए राज्य सरकार मेवात को छोड़कर सभी जिलों में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ कार्यक्रम चला रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार, हरियाणा में प्रति हजार लड़कों पर 877 लड़कियां थीं जो अब 900 के पार है। चौंकाने वाली बात यह है कि गुरुग्राम में साक्षरता दर अधिकतम है, लेकिन लिंगानुपात निम्नतम है। वहीं, मेवात में साक्षरता दर न्यूनतम है, जबकि लिंगानुपात अधिकतम है। हालांकि राज्य सरकार ने इस दिशा में कई कदम उठाए हैं, जिनमें 15 अगस्त और 26 जनवरी को लड़कियों से ध्वजारोहण कराना और हर जिले में महिला पुलिस थाना स्थापित करने की घोषणा प्रमुख हैं।  

सरकार के प्रयास
 ‘सुकन्या समृद्घि खाता योजना’ के तहत लड़की के जन्म से 10 वर्ष की उम्र
तक खाता खोलने पर राज्य सरकार ब्याज देती है।
  ‘आपकी बेटी, हमारी बेटी योजना’ के तहत अनुसूचित जाति तथा गरीब परिवारों को पहली बेटी और सभी परिवारों को दूसरी बेटी के जन्म पर 21-21,000 रुपये दिए जाते हैं। यह राशि भारतीय जीवन बीमा निगम में जमा होती है और बालिका के 18 वर्ष (अविवाहित) के होने पर एक लाख रुपये की राशि दी जाएगी।
 राष्टंÑीय पोषाहार मिशन की तर्ज पर राज्य पोषण मिशन के गठन की घोषणा, महिलाओं के विकास के लिए ‘हरियाणा कन्या कोष’, हिंसा प्रभावित महिलाओं के लिए ‘वन स्टॉप‘ सेंटर सखी की स्थापना व सोनीपत के हसनपुर में ‘नन्दघर‘ नाम से देश का पहला अत्याधुनिक आंगनवाड़ी केंद्र शुरू किया गया।
 महिलाओं के कौशल विकास प्रशिक्षण के लिए संयुक्त राष्टÑ विकास कार्यक्रम से समझौता किया गया है। इसके तहत दो वर्षों में 10,000 महिलाओं का दक्षता विकास किया जाएगा।
2015-16 के दौरान लिंगानुपात में सुधार के लिए नारनौल, भिवानी व झज्जर, 2016-17 में रोहतक, रेवाड़ी, जींद तथा अंबाला जिलों को सम्मानित किया गया।
महिला दिवस पर इंदिरा गांधी महिला शक्ति पुरस्कार, कल्पना चावला शौर्य पुरस्कार, बहन शन्नो देवी पंचायती राज पुरस्कार, लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार, विशिष्ट  खेल पुरस्कार, सरकारी व सामाजिक सेवा पुरस्कार आदि दिए जाते हैं।
2015-16 में 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों के पोषण में सुधार के लिए पंचकूला, जींद, नारनौल व मेवात, 2016-17 में कैथल, मेवात और गुरुग्राम को जिला स्तरीय पोषण पुरस्कार दिए गए।
हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड की मैट्रिक परीक्षा में प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त करने पर लड़कियों को क्रमश: 8,000, 6,000 तथा 4,000 रुपये, 12वीं परीक्षा में खंड स्तर पर क्रमश: 12,000, 10,000 और 8,000 रुपये की राशि दी जाती है।    
ग्रामीण महिला खेल प्र्रतियोगिता में ब्लॉक स्तर पर प्रथम, द्वितीय व तृतीय आने पर क्रमश: 2,100, 1,100 व 750 रुपये, जिला स्तर पर 4,100, 3,100 व 2,100 रुपये, प्रदेश स्तर पर 11,000, 8,100 व 4,100 रुपये पुरस्कार के रूप में दिए
जाते हैं।  
सर्वश्रेष्ठ माता पुरस्कार योजना के तहत सर्किल स्तर पर प्रथम, द्वितीय व तृतीय पुरस्कार राशि बढ़ाकर क्रमश: 2,000, 1,200 व 800 रुपये, ब्लॉक स्तर पर 4,000, 3,000 और 2,000 रु.की गई।
(लेखक बीबीपुर ग्राम पंचायत के पूर्व सरपंच और ‘सेल्फी विद डॉटर’ के जनक हैं)

मैं सोनीपत शहर की रहने वाली हूं। छोटा शहर, गिनती की सहेलियां, समय से स्कूल जाना और वापस घर आना। मेरी दुनिया इतने तक ही सीमित थी। मैं स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती थी। इस तरह थिएटर से मेरा पहला परिचय हुआ। 1989 में स्कूल की ओर से ड्रामा शिक्षक के नेतृत्व में पांच-छह विद्यार्थियों का ग्रुप दो महीने के लिए इंग्लैंड में नाटक खेलने गया। हालांकि नाटक और अभिनय सिर्फ स्कूल-कॉलेज तक ही सीमित रहा। मैंने इसे करियर बनाने के बारे में नहीं सोचा। जब सपना देखने की ही हिम्मत नहीं होती थी तो मंजिल के बारे में कैसे सोच सकती थी। लिहाजा मेरी दुनिया सिर्फ पढ़ाई तक ही सीमित रही। अंग्रेजी में स्नात्तकोत्तर के बाद 1995 में मैंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) का फॉर्म भरा और मेरा चयन हो गया। लेकिन मेरे इस फैसले का घर में विरोध हुआ। खासकर पिताजी नहीं चाहते थे कि मैं अभिनय के क्षेत्र में जाऊं। लेकिन मैंने ठान लिया था कि मुझे इसी क्षेत्र में जाना है। एनएसडी में चुनी जाने वाली मैं हरियाणा की पहली जाट लड़की थी।
कॉलेज के दिनों में यूथ फेस्टिवल में नाटक के दौरान अगर लड़का किसी का हाथ पकड़ लेता था तो दर्शक दीर्घा से हूटिंग होती थी। हालांकि लड़का-लड़की नाटक के पात्र होते थे और पटकथा के अनुसार केवल अभिनय कर रहे होते थे। लेकिन लोगों को ऐसा लगता था- ओ हो, ये क्या हो गया? यहां तक कि अब भी जब मैं हरियाणा आती हूं और यूथ फेस्टिवल या किसी कार्यक्रम में जाती हूं तो लड़कियों को स्टेज पर देखकर उसी तरह हूटिंग होती है। मतलब लोगों के सोचने के तौर-तरीके में अब तक कोई बदलाव नहीं आया है। दरअसल, हमारे यहां के दर्शक चाहे सिनेमा के परदे पर हो या स्टेज पर कोई कार्यक्रम हो, वह महिला को आज भी अलग नजर से ही देखते हंै। मुझे हैरानी होती है कि जहां विभिन्न क्षेत्रों में लड़कियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं, वहीं नाटक में पात्र के तौर पर किसी लड़की द्वारा लड़के का हाथ पकड़ना, चाहे वह किरदार पिता-पुत्री का ही क्यों न हो, इसे पुरुष और महिला के संपर्क के रूप में ही देखा जाता है। जब लड़कियों में इतना बदलाव आ गया है तो पुरुष दर्शकों में बदलाव क्यों नहीं आया है?’’ कुछ साल पहले मैं रोहतक फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट में गई थी। वहां सिर्फ एक लड़की दिखी। वह शादी के बाद निर्देशन के क्षेत्र में चली गई, क्योंकि परिवार ने उसे अभिनय करने की इजाजत नहीं दी। इंस्टीट्यूट में ही पता चला कि लड़के ही लड़कियों की भूमिका निभाते हैं। इस मानसिकता को बदलना होगा। एक और घटना के बारे में बताना चाहूंगी। मैंने 12वीं में पढ़ाई के दौरान स्कूटर चलाना सीखा। उस समय पूरे सोनीपत शहर में तीन-चार लड़कियां ही स्कूटर चलाती थीं और लोग उन्हें अजीब निगाहों से देखते थे। हालांकि अब ऐसी स्थिति नहीं है। दरअसल, लड़कियां और महिलाओं के साथ समस्या यह है कि वे अपनी अंतरात्मा की आवाज को नहीं पहचान पातीं। विडंबना तो यह कि पढ़ी-लिखी और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलाओं की भी यही स्थिति है।     (नागार्जुन से बातचीत पर आधारित)

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