क्रांति-गाथा-44 - वीरों का दर्प, विजय का गर्व
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क्रांति-गाथा-44 – वीरों का दर्प, विजय का गर्व

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Oct 2, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 02 Oct 2017 10:11:56

पाञ्चजन्य ने 1968 में क्रांतिकारियों पर केंद्रित विशेषांकों की शंृखला प्रकाशित की थी। दिवंगत श्री वचनेश त्रिपाठी के संपादन में निकले इन अंकों में देशभर के क्रांतिकारियों की शौर्य गाथाएं थीं। पाञ्चजन्य पाठकों के लिए इन क्रांतिकारियों की शौर्य गाथाओं को नियमित रूप से प्रकाशित कर रहा है। प्रस्तुत है 22 जनवरी ,1968 के अंक में प्रकाशित किरणचन्द्र दास के आलेख की समापन कड़ी:-

भगतसिंह और दत्त भी लाये गए
संभवत: वह उनके अनशन का 43वां दिन था जिस दिन मैं उनकी उस गहन मुस्कान का अर्थ समझ सका जिसके द्वारा उन्होंने हम लोगों का प्रथम दिन स्वागत किया था। उनकी अवस्था उस दिन बहुत ही अधिक चिंताजनक हो गई थी। सरदार भगतसिंह तथा श्री बटुकेश्वर दत्त लाहौर सेंट्रल जेल से उनके पास लाये गये कि वह उन्हें आंतों की सफाई के लिए एनिमा लेने पर राजी कर सकें। बटुदा ने उन्हें बंगाली भाषा में ही समझाया कि उन्हें यह बात इस शर्त पर मान लेनी चाहिए कि इसकी सारी जिम्मेदारी उन दोनों (सरदार तथा बटुदा) पर हो। यदि वह ऐसा नहीं करते तो इतने निकट संपर्क में आने का सुयोग हाथ से निकल जााएगा और वह बहुत सी आवश्यक बातों पर विचार-विमर्श न कर सकेंगे जिन्हें उन्हें मिलकर एक-दूसरे के मन्तव्य से निश्चित करना है। ऐसी स्थिति में यतीन्द्रदास ने एनिमा लेना स्वीकार कर लिया।

यतीनदा ने वशिष्ठ की गाय की कथा सुनाई
दूसरे दिन बहुत सवेरे ही मेरे भाई ने अपने सभी साथियों को सहसा ही अपने चारों ओर एकत्रित किया और बहुत ही क्षीण तथा कांपते हुए स्वर में हम लोगों को महर्षि वशिष्ठ की गाय की कथा सुनाई जिससे हम आज भी शिक्षा ले सकते हें। विश्वामित्र के उद्देश्य को यदि पूरा नहीं होने दिया तो सैनिक शक्ति ने, केवल निष्क्रिय विरोध से गाय की रक्षा हो सकना संभव न था। उस कथा से सारांश यह निकला कि उस समय भारत में अंग्रेजी शासन सत्ता से मुक्ति पाने का मार्ग सविनय अवज्ञा का नहीं वरन सशस्त्र क्रांति का था।
यतीन्द्रदास और भगतसिंह दोनों ने ही यह अनुभव किया कि जब तक सरकार को आतंकित नहीं किया जाएगा तब तक वह वास्तविकता की ओर से आंखें मूंदे रहेगी। यतीन्द्र ने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए उस ऐतिहासिक भूख-हड़ताल के रूप में चरम कोटि की तपस्या तथा आत्मोसर्ग का व्रत लिया और इस भूख-हड़ताल का अंत हुआ लाहौर की बोर्स्टल जेल में 63 दिन के उपवास के उपरांत 13 सितंबर 1929 के दिन स्वयं उनके जीवन के अंत के साथ। उनके अन्य वीर क्रांतिकारी साथी सरदार भगतसिंह, राजगुरु तथा सुखदेव 23 मार्च सन 1931 को हंसते हुए फांसी पर झूल गये।
13 सितंबर 1929 का प्रभात हुआ। प्रात: की सुरभित मंद समीकरण कण-कण में प्राणों का संचार करने लगा, वृक्षों की डालों के बीच-बीच से नीले आकाश का वितान झांकने लगा, बादलों के टुकड़े रुई के धुने हुए पहलों की भांति इधर-उधर गगन-मंडल में विच्छिन्न पड़े दिखलायी दे रहे थे। और प्रकृति के इन जीवनदायी वरदानों के बीच चमक उठीं क्रूर तथा लज्जाहीन बोर्स्टल जेल की दीवालें।

अंतिम दिन
उस अंतिम दिन यतीन्द्रदास की ध्यानमग्नता जैसे और भी अधिक गंभीर हो उठी। ऐसा लग रहा था मानों उनकी आत्मा एक अलौकिक आनंद की अनुभूति कर रही हो। उनकी श्वास की गति अत्यधिक मंद पड़ गयी और जब-तब एक हल्की सी सिहरन उनके शरीर में हो उठती थी परंतु उनके नेत्रों में चमक उठी थी उषा की स्वर्णिम आभा जिसकी उद्दीप्ति क्षण-प्रति-क्षण बढ़ती जा रही थी। उनके आनन पर आंतरिक आनंद की वही आभा थी जो कुछ दिन पूर्व उस समय थी जब उन्होंने सरदार भगत सिंह से अपने यह अंतिम शब्द कहे थे 'मैंने ब्रिटिश शासन को पराजित करने का संकल्प कर लिया है।'
उनकी वह स्मितता कितनी भव्य और अन्तरतम को छू देने वाली थी वह अुनभव करने की बात थी वर्णन की नहीं। उनका खाट पर पड़ा कृश शरीर तेजपुञ्ज लगने लगा था। उनकी दृष्टि में वीरों का दर्प तथा विजय का गर्व था। उनके मानस पर बस एक ही विचार छाया हुआ था 'मेरी सफलता अथवा असफलता पर अपना अभिमत देनेवाला एक निष्पक्ष निर्णेता बड़ी ही सतर्क दृष्टि से जीवन के प्रत्येक क्षण का मूल्यांकन कर रहा है और वह प्रमाणपुरुष है स्वयं मेरा अन्त:करण।'
दोपहर होते-होते उनकी हालत सहसा बिगड़ने लगी जिसे देखकर उनके समस्त साथियों ने समवेत स्वर में 'वन्देमातरम्' का गीत गाना आरंभ कर दिया। मध्याह्न में लगभग 12 बजकर 55 मिनट पर वे परम शांति के साथ चिरनिद्रा में विलीन हो गये।
अनुवादक- श्री देवीशंकर मिश्र 'अमर'

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