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कश्मीरियत के नाम पर खुलेआम आतंकियों, जिहादियों, हत्यारों का समर्थन करने वाले कट्टरवादी तत्वों ने ही भारत में वहाबी आतंक को पैर पसारने की सहूलियत दी है। इसमें उन सेकुलर राजनीतिक दलों का दोष भी कम नहीं है जो वोट बैंक के लालच में इस्लामी आतंक के दंश को झुठलाते रहे हैं
हर्ष त्रिपाठी
भारत के नेता और बुद्धिजीवी अभी भी उसी मन:स्थिति में जी रहे हैं, जिसमें लंबे समय तक खुद को आधुनिक, खुले विचारों वाला कहता, पश्चिम का आधुनिक समाज जीता रहा। सीरिया, इराक के बर्बाद होने, दुनिया के ज्यादातर आतंकवादी हमलों के पीछे पहले अल कायदा, अब आईएसआईएस की ध्वनि आने के बाद भी दुनिया इस्लामिक आतंकवाद पर खुलकर बात करने से बचती रही है। भारत भी लंबे समय से इस्लामिक आतंकवाद की चपेट में हैं। बाबा बफार्नी के दर्शन के लिए गए 7 हिन्दू श्रद्धालुओं की हत्या उसी इस्लामिक आतंकवाद के बढ़ते खतरे की तरफ संकेत है, जो अब ज्यादा साफ दिखने लगा है। हैरानी की बात यह है कि अब भी भारत में मुसलमानों की बड़ी आबादी होने और कश्मीर में घाटी में अब लगभग मुसलमान रह जाने की वजह से कोई भी सेकुलर राजनीतिक दल कश्मीर घाटी में हो रही आतंकवादी घटनाओं को इस्लामी कहने का खतरा मोल नहीं लेना चाहता।
हिज्बुल मुजाहिदीन का सरगना रहा जाकिर मूसा 4 मिनट के वीडियो में साफ कहता है कि ‘‘भारतीय मुसलमान दुनिया के सबसे कायर मुसलमान हैं। हम इस्लाम का राज कायम करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। हम कश्मीरियत को बचाने की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं। कश्मीर में हम कोई राजनीतिक लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं। हम इस्लाम की लड़ाई लड़ रहे हैं और इसके रास्ते में जो भी आएगा, उसे इसका परिणाम भुगतना होगा।’’ मूसा ने अल कायदा का हाथ थामने के बाद जारी वीडियो में ये बातें कही हैं। लंबे समय से पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी गजवा-ए-हिन्द की बात करते रहे हैं। पहली बार यह बात इतने साफ तौर पर किसी आतंकवादी ने खुद कबूली है।
मूसा के वीडियो और अयूब पंडित की हत्या के बाद इतना तय है कि इस इस्लामिक आतंकवाद के निशाने पर हिन्दू रहेंगे, ऐसा सोचने वाले गलतफहमी के शिकार हैं। सीरिया और इराक, दो सबसे बड़े उदाहरण हैं, जहां इस्लामिक आतंकवाद ने सिर्फ मुसलमानों को मारा है। इस इस्लामिक आतंकवाद की वजह से दुनिया के हर देश के मुसलमान शक के दायरे में हैं। यहां तक कि वे मुसलमान भी जो सीरिया या इराक से इस्लामिक आतंकवाद का शिकार होने से बचकर भाग निकले। उसकी वजह बड़ी साफ है। मुसलमानों ने लंबे समय तक इस्लामिक आतंकवाद को मानने से ही इनकार कर दिया। ‘आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता’, इस कथन के आवरण में आतंकवाद का कट्टर इस्लामिक चेहरा ढका जाता रहा है।
इस्लामिक आतंकवाद घाटी में किस कदर पैठ जमा चुका है, इसका उदाहरण सिर्फ मूसा का वीडियो नहीं हैं। आतंकी बुरहान वानी को सेना ने मार गिराया। बुरहान वानी घाटी में एक ऐसे आतंकवादी कमांडर के तौर पर उभरा था, जिसने घाटी के नौजवानों को कट्टर इस्लामिक आतंकवाद की तरफ ललचाया था। सोचिए, उस देश में क्या हो सकता है, जहां राजनीतिक पार्टियां बुरहान वानी जैसे आतंकवादी के साथ सहानुभूति जताके, उसकी मौत पर ‘गमजदा’ होकर राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश करती हों। सेना पर ही सवाल खड़ा किया जाए। इस तरह की छोटी-छोटी लगातार हुई घटनाओं ने घाटी में इस्लामिक आतंकवाद की जड़ों को गहरा ही किया है। और यह इस्लामिक आतंकवाद हिन्दुस्थान में कितना ज्यादा फैल चुका है, इसका पता हमें तब चलता है, जब देश के अलग-अलग हिस्सों से कुछ मुसलमान युवकों के सीरिया में इस्लामिक स्टेट के लिए लड़ने जाने की खबरें आती हैं।
लंबे समय से कश्मीर घाटी में वहाबी/सलाफी इस्लाम मजबूत हो रहा था। अधकचरे किस्म के विश्लेषक कहते रहते हैं कि कश्मीर घाटी में ‘भाजपा-पीडीपी सरकार के गलत फैसलों की वजह से हिंसक घटनाएं बढ़ी हैं’। जबकि, सच्चाई यह है कि भाजपा-पीडीपी सरकार ने कश्मीरियत के खिलाफ कोई फैसला नहीं लिया है। हां, इस्लामिक आतंकवादियों को मारने का फैसला जरूर हुआ है। इस फैसले ने गुपचुप इस्लामिक आतंकवाद के पहरुए बने कट्टरवादी तत्वों को विचलित कर दिया है, इतना कि उन्होंने आम भारतीय मुसलमानों को ही ‘कायर’ कह दिया। दरअसल अरब से आया वहाबी इस्लाम कहता है कि वहाबी/सलाफी के अलावा सारे मुसलमानों को भी ‘शुद्ध’ करने की जरूरत है।
इस्लामिक आतंकवादी बार-बार यह बात कह रहे हैं कि यह ‘सच्चे मुसलमान और गैर मुसलमान की लड़ाई’ है। सच्चा मुसलमान कौन? सच्चा मुसलमान वह जो ‘सच्चा इस्लाम’ माने और उस इस्लाम में गैर मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं है। यानी अगर कोई मुसलमान भी ‘सच्चा इस्लाम’ नहीं मान रहा है, तो उसके लिए इस्लामिक आतंकवाद रियायत नहीं देता। अब तो छुट्टी पर जाने वाले पुलिस और सेना के मुसलमान अधिकारियों को मारा जा रहा है। शब-ए-कदर की रात की तकरीर के दौरान डीएसपी अयूब पंडित को वहशी तरीके से पीटकर लगातार जाना इसका जीता-जागता उदाहरण है। डीएसपी पंडित मीरवाइज उमर फारुख की सुरक्षा में तैनात थे। मीरवाइज मस्जिद में अन्दर तकरीर देते रहे और बाहर डीएसपी पंडित को कट्टरवादियों की भीड़ ने बेरहमी से मार डाला। उनके शव पर रोते हुए उनके भतीजी चीख रही थी-‘‘हां, हम भारतीय हैं, हम भारतीय हैं। उन्होंने हमारे अंकल को मार दिया।’’
2003 में संयुक्त हुर्रियत कॉन्फ्रेंस में विघटन के बाद वहाबी/सलाफी इस्लाम का विस्तार तेजी से हुआ। अरब दुनिया के पैसे से फल-फूल रहा वहाबी इस्लाम नौजवानों को आकर्षित करने लगा। मोटे अंदाज के हिसाब से कश्मीर घाटी में कुल 7500 मस्जिदें हैं, इनमें सबसे ज्यादा हनाफी मस्जिदें हैं। जबकि, 200 के आसपास सूफी दरगाह हैं। करीब 1000 मस्जिदें ऐसी हैं, जो वहाबी प्रभाव वाली हैं। यही वे मस्जिदें हैं, जहां से ‘सच्चे इस्लाम का राज’ कायम करने की तकरीरें दी जाती हैं। ऐसी मस्जिदों का विस्तार पिछले डेढ़ दशक में बहुत तेजी से हुआ है।
ऐसी परिस्थिति में, प्रदेश सरकार से लेकर समाज तक को खुलकर इस्लामी आतंक के विरुद्ध एक वातावरण तैयार करना होगा। कट्टर इस्लामिक खतरे के बारे में शाहिद सिद्दीकी लिखते हैं-‘‘कश्मीर कब तक खुद का इस्तेमाल पाकिस्तानी आतंकवादियों को करने देगा? आईएसआईएस ने इराक और सीरिया को खत्म कर दिया। अब वे कश्मीर को खत्म कर देंगे।’’ दुर्भाग्य से अभी भी किसी भी सेकुलर राजनीतिक दल ने अमरनाथ यात्रियों की हत्या पर इस्लामिक आतंकवाद और वहाबी इस्लाम पर लानत नहीं भेजी है।
आज के हालात में जरूरी है कि प. बंगाल हो या कश्मीर, गुजरात हो या उत्तर प्रदेश, भारतीय मुसलमानों को इस्लाम के नाम पर आतंकवाद को बढ़ाने की कोशिश में लगे मजहबी उन्मादियों और कट्टरवादियों का खुलकर विरोध करना चाहिए। इस्लामी आतंकवाद पर कड़ा प्रहार होना चाहिए। ल्ल










