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समरस समाज के प्रणेता

Written byArchiveArchive
Jul 10, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 10 Jul 2017 10:56:11

4 जून, 207
आवरण कथा ‘समरसता के संत’ से स्पष्ट है कि हमारे देश के संतों ने, वे चाहे किसी भी स्थान और क्षेत्र के रहे हों, सदैव समरसता की बात की और उसी को आगे बढ़ाया। इसीलिए आज भी समाज के प्रबुद्ध तबके में अगर कबीर का आदर से नाम लिया जाता है तो उतने ही सम्मान से तुलसीदास का।
—कमल किशोर गोयनका, मेल से
जो लोग संतों को मत-पंथ की दीवारों में बांधते हैं, उन्हें यह अंक जरूर पढ़ना चाहिए। क्योंकि संत किसी व्यक्ति विशेष के नहीं होते, बल्कि पूरे समाज के होते हैं। इस अंक ने अनेकों भ्रमों दूर करके देश को समरसता के मूल में विद्ममान एकता की शाश्वत धारणा को हृदयंगम करने का रास्ता सुझाया है।
—बी.एस.शांताबाई, बेंगलुरू(कर्नाटक)

अब तो करो समझ की बात!
रपट ‘अब समझदारी की बात करो मियां (4 जून, 2017)’ उन मुल्ला-मौलवी और बड़बोले मुस्लिम नेताओं पर सटीक बैठती है जिनका सिर्फ और सिर्फ एक ही काम है— समाज में उन्माद फैलाना। यह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि शर्मनाक है। वे हर हिंसक घटना को इस्लाम और मुस्लिम जगत से जोड़कर अराजकता का माहौल पनपाते हैं। लेकिन ऐसे लोग यह नहीं समझते कि जब पूरी दुनिया तरक्की और बुलंदी की ओर जा रही है, वहां पूर्वाग्रही और संकीर्ण मानसिकता के सहारे आप किन लोगों का भला कर रहे हैं? बेहतर होगा कि ये लोग मजहब को मानवता से जोड़कर सहिष्णु बनें और समाज एवं राष्ट्र के निर्माण में योगदान दें।
—मनोहर मंजुल, प. निमाड़ (म.प्र.)

ाजहब से लेकर महिला अधिकारों तक की बात पर इस्लाम पर सवाल उठते रहे हैं। महिला हक की बात करते ही मुल्ला-मौलवी बेचैन होने लगते हैं। इस्लाम में बुर्कानशी महिलाएं अगर अपना अधिकर मांग रही हैं तो इसे गलत नहीं कहा जा सकता। आज देश ही नहीं, विश्व में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हैं तो फिर इस्लाम में जब महिलाएं अपने हक के लिए आवाज बुलंद करती हैं तो कुछ लोगों को एतराज क्यों होता है? भारत के संविधान की मूल भावना ही है सबको समानता देना। इसलिए किसी भी मत-पंत की महिलाओं को समान अधिकार मिलें और समाज में वे पुरुष वर्ग के साथ कंधे से कंधा मिलकार चलें, इसकी चिंता सरकार को भी करनी है और समाज को भी।
—जगन्नाथ श्रीवास्तव, देवरिया (उ.प्र.)

आज अगर कश्मीर समस्या रौद्र रूप लिए है तो इसमें अलगाववादियों की प्रमुख भूमिका रही है। मस्जिदों के मुल्ला- मौलवी आए दिन कश्मीरियों को भड़काने, उन्हें लोभ लालच देकर भारत के खिलाफ ‘कश्मीर आजाद’ कराने की बात कहलवाने और कश्मीर के शांत माहौल को बर्बाद करने की कसमें खाने के लिए भड़काते हैं लेकिन क्या यह समझदारी है कि आप जिस देश में रहते हैं, उस देश के खिलाफ ही आग उगलते हैं, उसको बर्बाद करने के षड्यंत्र रचते हैं। ऐसे लोगों का एक ही इलाज है कड़ी कार्रवाई। तभी सच्चाई  इनकी समझ में आएगी।
— सुनील सिंह, गया (बिहार)

मुसलमानों को बेवजह के विवादों से बचना होगा। यह व्यक्तिगत तौर पर भी और उनकी कौम के लिए भी अच्छा होगा। कुछ मुस्लिम कहते हैं कि यह देश जितना हिन्दुओं, ईसाइयों और सिखों का है, उतना ही मुस्लिमों का है। अब अगर उन्हें इस देश की इतनी चिंता है तो उन्हें यहां अच्छाई और बुराई दोनों की जिम्मेदारी लेनी होगी। तभी कोई उन्हें देश का जिम्मेदार नागरिक मानेगा।
—बी.एल.सचदेवा, आईएनए मार्केट(नई दिल्ली)

जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है तब से, समाज और देशविरोधी तत्व खुलकर सामने आने लगे हैं। हम किसी न किसी बहाने आए दिन उनके चेहरे देखते हैं। टीवी चैनलों की बहस से लेकर राजधानी के जंतर-मंतर पर अक्सर यह छोटी-छोटी घटनाओं के बहाने सरकार को घेरने की जुगत भिड़ाते दिखते हैं। अब ऐसे लोगों को समझना होगा कि देश की जनता ने ही इस सरकार को चुना है तो जनता का सम्मान करते हुए बेवजह के विवादों को तूल देकर समाज का माहौल न बिगाड़ा जाए। देश की जनता उनके रंगे चेहरे को भलीभांति जान चुकी है।
—हरीश चन्द्र धानुक, लखनऊ(उ.प्र.)

तुष्टीकरण की बढ़ती विषबेल
‘लीगी सोच लगा रही आग (4 जून, 2017)’ रपट उन लोगों के लिए साक्ष्य है जो हर घटना को मजहब के चश्मे से देखते हैं और हिन्दुओं के शामिल होने पर हो-हल्ला मचाकर उसे राष्ट्रीय स्तर का बना देते हैं लेकिन जब इन्हीं घटनाओं में मुस्लिमों का हाथ होता है तो कुंडली मारकर बैठ जाते हैं। बंगाल में आज यही हो रहा है। हर दिन उन्मादियों द्वारा हिन्दुओं का दमन किया जा रहा है, उनके घरों पर धावा बोला जा रहा है, उनकी जमीनें हथियाई जा रही है पर इस पर न ही ममता सरकार कुछ बोलती है और न ही वहां
का प्रशासन।
                 — राममोहन चंद्रवंशी, हरदा(म.प्र.)

बंगाल के सीमावर्ती गांवों में बंगलादेशी मुसलमानों की बढ़ती घुसपैठ के चलते यह क्षेत्र हिन्दू विहीन हो रहे हैं। वोट के लालच में घुसपैठियों का यहां बसना अनवरत जारी है। आए दिन समाचार पत्रों में छपती रपटें इसकी गवाह हैं। राज्य की ममता सरकार के लिए बंगलादेशी घुसपैठियों का यह बड़ा वर्ग सिर्फ वोटर ही नहीं बल्कि काडर हो गया है। इनमें से ही उसने कइयों को पदाधिकारी बनाया है, जो क्षेत्र में जमकर हिन्दुओं का उत्पीड़न करते हैं और उन्हें मार देने से भी नहीं हिचकते। हिन्दू परिवारों के पास पलायन करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं रह जाता।   
—अनुभव वार्ष्णेय, रायपुर (छत्तीसगढ़)

झुंझलाता विपक्ष
केन्द्र की राजग सरकार के किसी भी निर्णय पर विपक्षी दल उठापटक मचाना शुरू कर देते हैं और देश में भ्रामकता का माहौल तैयार कर देते हैं। बात चाहे किसी योजना की हो या फिर देश में घटती किसी घटना की। हर बात के लिए केन्द्र की मोदी सरकार ही जिम्मेदार ठहराई जाती है। जबकि कानून-व्यवस्था का मामला राज्य सरकार का होता है, उससे केन्द्र को कोई मतलब नहीं होता। फिर भी कुछ लोग समाज के भोलेभाले लोगों को भड़काते रहते हैं और उनकी अज्ञानता का लाभ उठाते रहते हैं। इससे यह बात जाहिर होती है कि देश में ही नहीं विपक्ष में भय और असुरक्षा का माहौल है।
— बी.जे.अग्रवाल, नागपुर (महाराष्ट्र)

चीन की दादागीरी
दशकों से भारत-चीन के रिश्तों में ऊपर से मिठास लेकिन अंदर से खटास नजर आती है। एशिया में अपनी दादागीरी के दम पर वह भारत को बंदर घुड़की दिखाता रहता है और काफी हद तक इसका फायदा उठाकर उसके देश की 39 हजार वर्ग किमी. जमीन हथिया ली है। अब उसकी नजर अरुणाचल पर है। पिछली सरकारों की गलतियां इतनी ज्यादा रही जिसके चलते विदेश मामलों में चीजें सुलझने के  बजाए उलझ गई हैं। अगर कोई यह कहे कि इन बड़े मामलों को मोदी जी एकदम से ठीक कर देंगे तो यह सही नहीं होगा। क्योंकि उनके हाथ में कोई जादू की छड़ी नहीं है। भारत को चीन को वैश्विक स्तर पर घेर उसके मनोबल और मंसूबों को तोड़ना होगा।
— आनंद मोहन भटनागर, लखनऊ (उ.प्र.)

एक निवेदन
 हमें यह जानकर सुखद अनुभूति हुई हैं कि देशभर में पाञ्चजन्य के अनेक पाठक लंबे काल से पत्रिका का प्रत्येक अंक अपने घरों में अथवा पुस्तकालयों में संरक्षित करते आ रहे हैं। एक अभिनव प्रकल्प के अन्तर्गत पाञ्चजन्य ने अपने प्रारंभ से लेकर अभी तक के सभी अंकों के सिलसिलेवार ‘डिजिटाइजेशन’ (कम्प्यूटर पर अपने मूल रूप में पढ़ा जाने वाला स्वरूप) करने का कार्य शुरू किया है। लेकिन समय के साथ हमारे पास सुरक्षित कुछ अंक उपलब्ध नहीं हैं। आप सब सुधी पाठकों से अनुरोध है कि यदि आपके पास 1948 से 1978 तक के अंक उपलब्ध हैं तो कृपया हमें सूचित करें। हम उन अंकों के छायाचित्र लेकर आपको जैसे का तैसा वापस करने की व्यवस्था करेंगे। कृपया डाक द्वारा या ईमेल से इस संबंध में अविलंब सूचित करें।
कृते/संपादक
संस्कृति भवन, 2322, गली लक्ष्मी नारायण, पहाड़गंज, नई दिल्ली-55,
दूरभाष-011-47642012/14/16, ईमेल-ी्िर३ङ्म१.स्रंल्लूँ्नंल्ल८ं@ॅें्र’.ूङ्मे

दार्जिलिंग से सुलगी आग
दार्जिलिंग में हो रहा, दंगा और फसाद
वर्षों से वह शांत था, फिर से सुलगी आग।
फिर से सुलगी आग, पर्यटन का क्रम टूटा
ले भाषा का नाम, सब तरफ गुस्सा फूटा।
कह ‘प्रशांत’ भारत में हैं जितनी भाषाएं
सबको सीखें और प्रेम रसधार बहाएं॥
— ‘प्रशांत’

झोले वालों से सावधान !
कुछ समय से देश में एक पक्ष ऐसा उभरा है जो छोटी भी घटना को अपने जाति, संपद्राय और मजहब से जोड़कर सीधे देश के प्रधानमंत्री पर हमलावर हो जाता है। ‘समाज को बांटती विषैली सोच’ रपट इसी का एक उदाहरण है।
देश में जैसे ही कोई घटना घटती है कि पहले से तैयार ‘झोलेवाले’ उस घटना को जातिगत और मजहबी रंग देने के लिए उसे इतना तूल दे देते हैं कि ऐसा लगने लगता है कि देश में माहौल खराब है और घटना सौ आने सही है। यह सही है कि कुछ उन्मादी किस्म के लोगों द्वारा विभिन्न राज्यों में इस तरह की वारदातें की जाती हैं। लेकिन जिस स्तर पर तथाकथित बौद्धिक वर्ग के के शोर मचाने से देशी और विदेशी मीडिया इसे तूल देकर डर का माहौल बनाता है कि वह निहायत गलत है। कुछ लोगों द्वारा जंतर-मंतर पर हुजूम जुटाना शुरू कर दिया जाता है और घटना के बहाने सरकार को कोसने-लताड़ने में फिर कोई कमी नहीं रखी जाती। इन प्रदर्शनों में अधिकतर वही लोग शामिल होते हैं जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में देशविरोधी नारेबाजी करते हैं, याकूब मेमन की फांसी टलवाने के लिए रात में सर्वोच्च न्यायालय का टरवाजा खटकाते हैं, अखलाक की हत्या पर घड़ियाली आंसू बहाते हैं। आज फिर से कुछ वामपंथी संगठनों देश में अराजकता का माहौल बनाने की कोशिश में लगी हैं। देश के लोगों को ऐसे संगठनों और व्यक्तियों से सावधान रहना होगा और समय-समय पर उनका प्रतिकार करना होगा।
—दया वर्धिनी
श्रीलक्ष्मी रेजिडेंसी, फ्लैट न.एस 2, द्वितीय तल, सिंकदराबाद (तेलंगाना)

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