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शांत अंचल में किसने भड़काई आग

Written byArchiveArchive
Jun 19, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 19 Jun 2017 13:20:20

 

– उमेश चतुर्वेदी-

अफीम, सूरजमुखी और गेहूं की खेती कर समृद्धि के सोपान चढ़ने वाले मध्य प्रदेश के मंदसौर में अब शांति है। उग्र किसानों की आगजनी और 6 जून को गोलीबारी में 6 लोगों की मौत के बाद हालात को सामान्य बनाने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खुद कमान संभाल ली है। उपज की उचित कीमत और कर्जमाफी को लेकर भड़काया गया उग्र आंदोलन थम चुका है। लेकिन इस आंदोलन ने कुछ सवालों को जन्म दे दिया है।
गोलीबारी के बाद 12 जून तक इस इलाके के तीन किसान आत्महत्या कर चुके थे। इसके बावजूद सवाल यह है कि क्या सचमुच मंदसौर के किसान इतनी बुरी हालत में हैं कि उन्हें कर्ज माफी और अपनी उपज की उचित कीमत मांगने के लिए मजबूर होना पड़ा? क्या इस आंदोलन के पीछे कोई राजनीतिक साजिश थी? पुलिस की गोली से जो 6 लोग मारे गए, उनमें से पांच के बारे में खबर आई कि उनके नाम पर कहीं जमीन नहीं है। तो क्या इस आंदोलन को जान-बूझकर राजनीतिक साजिश के तहत उग्र बनाया गया? हिंसा और आगजनी की घटनाओं की जांच के लिए गठित न्यायिक आयोग से उम्मीद की जा रही है कि वह इन सभी सवालों के जवाब सामने लाएगा।
समृद्ध किसान का प्रदर्शन
मंदसौर, नीमच, शाजापुर, धार और रतलाम जिलों के किसानों के बारे में माना जाता है कि वे समृद्ध हैं। किसान चैनल के लिए कार्यक्रम बनाने वाले वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी बताते हैं कि अपने कार्यक्रम के सिलसिले में उन्होंने इस इलाके का लगातार दौरा किया है। उनका कहना है कि खेती में नवाचार का जितना प्रयोग इस इलाके के किसानों ने किया है, उतना महाराष्ट्र और गुजरात में ही दिखता है। फिर इस इलाके में महिला किसान भी बहुत हैं और उन्होंने खेती की कमान अपने हाथ में थाम रखी है। इस इलाके में प्रगतिशील और वैज्ञानिक खेती के चलते बहुत समृद्धि है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या समृद्ध किसान प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतरेंगे? सार्वजनिक वाहनों में आग लगाएंगे? बाजार में महिलाओं के कपड़े फाड़ेंगे और लोगों से बदसलूकी करेंगे? छोटे शहरों में भीड़ के अपकृत्यों के ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं। भारत की हजारों साल की शस्य संस्कृति की वजह से किसानों में खरापन तो दिखता है, लेकिन उनकी ओर से बदसलूकी का ऐसा सार्वजनिक कृत्य कम ही देखने में आया है। तो फिर आंदोलन में महिलाओं से बदसलूकी करने वाले लोग कौन थे? इसका जवाब देते हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से इलाके में महत्वपूर्ण दायित्व संभाल चुके श्री श्याम चौधरी। उनके अनुसार मालवा 'शांत टापू' रहा है। लेकिन उसे अशांत टापू में बदल दिया   गया। इसके पीछे असामाजिक तत्वों की सक्रियता ही थी।  
हार्दिक पटेल से जुड़े तार
ये असामाजिक तत्व कौन हैं? नाम न छापने की शर्त पर इस सवाल का जवाब एक स्थानीय नेता ने दिया। उन्होंने बताया कि आंदोलन को उग्र बनाने के पीछे कथित पाटीदार समुदाय के युवा नेता हार्दिक पटेल के लोगों का हाथ कहीं ज्यादा है। गुजरात से तड़ीपार किए गए हार्दिक पटेल पिछले तीन-चार महीने से इस इलाके में सक्रिय हैं। भारतीय जनता पार्टी के मंदसौर जिला उपाध्यक्ष विनोद शर्मा कहते हैं कि इस इलाके में पाटीदार समुदाय के हाथ में न केवल खेती की कमान है, बल्कि अफीम और उससे जुड़े कारोबार के भी सूत्र वही संभाले हुए है। पाटीदार समुदाय के वर्चस्व की ही वजह से हार्दिक पटेल इस इलाके में आते रहे। इस दौरान उनके लोग सक्रिय हुए।      
एक स्थानीय सूत्र के मुताबिक, हार्दिक की कोशिशों से शुरू होने वाला यह आंदोलन प्रारंभ में तो केवल कर्ज माफी और उपज की उचित कीमत की मांग पर ही केंद्रित रहा। श्याम चौधरी का कहना है कि बाद में यह भ्रमित हो गया और गुंडा तत्वों के हाथ में चला गया, जिसका कांग्रेस ने फायदा उठाया। हालांकि विनोद शर्मा खुले तौर पर आंदोलन के पीछे रतलाम के जिला पंचायत उपाध्यक्ष धाकड़ और राऊ के विधायक जीतू पटवारी का हाथ बताने से नहीं हिचकते। उनका कहना है कि हार्दिक पटेल की मंदसौर यात्राओं के बाद पाटीदार समुदाय के किसानों को गोलबंद करने के लिए व्हाट्सएप पर सूचनाएं दी जाने लगी थीं। इसके साथ ही कांग्रेस के ये दोनों नेता सक्रिय हो गए थे, जिसकी वजह से मालवा का यह शांत        टापू अशांत हो गया।
आंदोलन में अपराधी
श्री श्याम चौधरी कहते हैं, ''कांग्रेस ने अपने हित के लिए आंदोलन का फायदा उठाया। लेकिन आंदोलन के हिंसक होने के पीछे दूसरी वजह भी है। थाने तक को आग लगाने की कोशिश, बाजारों में नमकीन और दूध की दुकानें लूटने या उनमें तोड़फोड़ करने वाले आधे से ज्यादा लोग नकाबपोश थे। दरअसल, छोटे शहरों में लोगों के आपसी रिश्ते होते हैं। इसलिए वहां लिहाज ज्यादा किया जाता है। दुकानों में लूटपाट और महिलाओं से छेड़खानी भीड़तंत्र की आड़ में वही लोग कर सकते हैं, जिनकी आंख का पानी सूख चुका है। छोटे शहरों में ज्यादातर आंखें परिचित ही होती हैं। यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर भीड़ की आड़ में ऐसे दुष्कृत्य करने वाले विरले ही नजर आते हैं। इससे शक बढ़ता है कि ऐसा कृत्य करने वाले ज्यादातर बाहरी तत्व थे।''
एक जानकार बताते हैं कि मंदसौर, रतलाम और नीमच से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर सक्रिय अपराधियों को साजिश के तहत इस आंदोलन में शामिल कराया गया, जिन्होंने लूटपाट और बदसलूकी की घटनाओं को अंजाम दिया। एक स्थानीय सूत्र के मुताबिक, आंदोलन को उग्र बनाने में इन तत्वों का भी सहयोग लिया गया।
एक स्थानीय पत्रकार का कहना है कि अगर प्रशासन समय रहते चेत गया होता तो हालात इतने नहीं बिगड़ते। भाजपा नेता विनोद शर्मा ने तो यह भी कहा कि डीएम और एसपी आंदोलन की उग्रता भांपने में नाकाम रहे और समय पर बल नहीं मंगा पाए। शायद इसी के चलते स्थिति भयावह हो गई। उनका कहना है कि 3 जून को बूढ़ा गांव में बेरोजगार अराजक तत्वों ने उग्र प्रदर्शन किया। फिर महाराष्ट्र में जारी किसान आंदोलन से जुड़े लोग मंदसौर में भी सक्रिय रहे। बूढ़ा गांव में ही मंदसौर में हिंसा की रणनीति बनी, लेकिन प्रशासन इसे भांप पाने में शायद नाकाम रहा। मंदसौर में गोलीबारी के अगले दिन यानी 7 जून को धार और शाजापुर में आगजनी को भी प्रशासनिक लापरवाही बताने वाले भी कम नही हैं।
वैसे इस आंदोलन के भड़कने की एक वजह अफीम के किसानों की नोटबंदी के दौरान डूबी बड़ी रकम से उपजे क्षोभ को भी माना जा रहा है। एक स्थानीय नेता का कहना है कि चूंकि इलाके में अफीम की खेती होती है, इसलिए इससे जुड़े लोगों के कई तरह के गैरकानूनी धंधे भी होते हैं। इससे उनकी नकद कमाई होती है, जिसे वे बैंकों में नहीं रख सकते। नोटबंदी के दौरान ऐसे किसानों की मोटी रकम डूब गई। इसलिए उनमें आक्रोश था और जैसे ही किसान आंदोलन भड़का, उन्होंने भी जलती आग में घी डलने का काम किया।
कांग्रेस की घुसपैठ
प्रदेश में पूरी तरह निस्तेज पड़ी कांग्रेस भी जानती है कि आंदोलन भ्रमित हो गया और उसका रवैया उचित नहीं रहा। चूंकि राज्य में वह 14 साल से सत्ता में नहीं है और अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए वह अपनी खोई जमीन हासिल करने की कोशिशों में जुट गई है। मंदसौर हिंसा ने उसे यह मौका दे दिया। पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी का रतलाम के रास्ते मंदसौर में जबरदस्ती घुसने की कोशिश करना या ज्योतिरादित्य सिंधिया का सत्याग्रह करना उसी कड़ी का हिस्सा है।
पुलिस गोलीबारी के बाद सुरक्षा बलों ने भीड़ को अराजक बनाने वालों की खोजबीन शुरू कर दी है। जांच में कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं। इसके चलते कांग्रेस के कई नेता फरार बताए जा रहे हैं। हालांकि आंदोलन भड़काने में इनकी क्या भूमिका रही या प्रशासन कितना नाकाम रहा, इसका पता तो एक सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट मिलने के बाद ही चलेगा। आयोग को तीन माह में जांच रिपोर्ट सौंपनी है। आयोग के अध्यक्ष मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जे.के. जैन हैं, जिन्हें मुख्यत: तीन बिंदुओं पर जांच करनी है। उन्हें इस बात का पता लगाना है कि किन परिस्थितियों में पुलिस को गोलीबारी की अनुमति दी गई? पुलिस की यह कार्रवाई उपयुक्त थी या नहीं? यदि नहीं थी, तो इसके लिए दोषी कौन है? साथ ही, आयोग को इस बात की भी जांच करनी है कि क्या जिला प्रशासन और पुलिस ने उस समय बनी परिस्थितियों और घटनाओं की रोकथाम लिए पर्याप्त कदम उठाए थे? इसके अलावा, आयोग को यह सुझाव भी देना है कि ऐसे हालात में क्या कदम उठाए जाने चाहिए, जिससे भविष्य में दोबारा ऐसी घटनाएं न हों। 
बहरहाल, मंदसौर और इसके आसपास के इलाकों में जनजीवन अब पटरी पर लौट आया है। प्रशासन और राजनीतिक, दोनों ही स्तरों पर यह कोशिश होनी चाहिए कि दोबारा ऐसे हालात पैदा न हों।        ल्ल

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