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कम्युनिस्ट पार्टी केरल में सशस्त्रआंदोलन करने की तैयारी में

Written byArchiveArchive
Jun 5, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 05 Jun 2017 12:44:40

इतिहास के पन्नों से

केन्द्रीय सरकारी कर्मचारियों की हड़ताल केरल में विशेष जोर न पकड़ सकी। इसका कारण भी स्पष्ट ही है। समूचे देश में वह हड़ताल प्रजासमाजवादी नेताओं द्वारा संचालित की जा रही थी। यहां उनका संचालितकर्ता कौन? यहां तो प्रजासमाजवादी दल के नेता और राज्य के मुख्यमंत्री श्री पोट्टम थाणुपिल्लई स्वयं ही हड़ताल का सामना करने के लिए मुस्तैद थे। अपने द्वारा प्रशासित प्रदेश में विशेष अव्यवस्था उत्पन्न न हो इसलिए प्र.स. दल ने भी यहां उतना जो नहीं लगाया जितना बम्बई-दिल्ली और कलकत्ता आदि में। अब तो हड़ताल समाप्त भी हो गई। कुछ लोगों को इस बात का लाभ कम्युनिस्टों ने क्यों नहीं उठाया। कुछ पर्यवेक्षकों के अनुसार राज्य कम्युनिस्ट पार्टी इसका लाभ उठाने के लिए उतावली थी पर केन्द्रीय नेतृत्व ने इसकी अनुभूति नहीं दी। कारण इस हड़ताल को कहीं भी सफल बनाने का अर्थ होता  प्र.स. दल की श्रेय देना। कम्युनिस्ट  पार्टी तो इस बात के लिए उत्सुक थी कि ऊपर से समर्थन करते हुए अंदर ही अंदर इस हड़ताल को असफल बनाया जाए जिससे प्र.सं. दल का नेतृत्व मजदूर क्षेत्र से समाप्त हो। जो भी हो पर कम्युनिस्टों ने इस स्थिति में तटस्थ रहना ही उचित समझा। लोगों को यह अपेक्षा अवश्य थी कि वे इस राज्य में कर्मचारियों की आड़ में तोड़-फोड़ और अव्यवस्था अवश्य पैदा करेंगे।
राज्य के गृहमंत्री श्री चाको ने गत मास यह घोषणा की थी कि कम्युनिस्टों के 18 मास के शासन काल में 600 से भी अधिक हत्या की घटनाएं घटी जिसमें कम से कम 25 राजनीतिक कारणों से  घटी थीं। इस मास उन्होंने एक और रहस्य का उद्घाटन किया है। उन्होंने कहा है कि राज्य में सशस्त्र क्रांति करने के लिए कम्युनिस्ट योजना बना रहे हैं। राज्य कम्युनिस्ट  पार्टी की कौंशिल में इस योजना पर 2 दिनों तक विचार विनिमय किया गया है।
यद्यपि इस समय यह बात विशेष प्रासंगिक नहीं दिखती तो भी यह बात सर्व विदित है कि राज्यच्युत होकर कम्युनिस्ट यहां चुप नहीं बैठे हैं। ये दोनों मोर्चो पर सक्रिय हैं। संवैधानिक दृष्टि से अगल चुनाव जीतने के लिए वे वर्तमान शासन के विरुद्ध जनता में असंतोष उत्पन्न कर रहे हैं और अपने स्थायी स्वभाव के अनुसार अंदर ही अंदर शास्त्रों का एकत्रीकरण भी कर रहे हैं। उनकी दृष्टि में दोनों ही प्रकार के अवसर उपस्थित हो सकते हैं और वे किसी में भी चूकना नहीं चाहते। विधानसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए गृहमंत्री श्री चाको ने यह घोषणा की है कि भ्रष्टाचार निरोध विभाग की पुन: संगठन किया जाएगा और सरकार एक ऐसा कानून बनाएगी जिसने अन्तर्गत विधानसभा के सदस्यों के भ्रष्टाचार पर भी विचार किया जा सके। गृहमंत्री की इस घोषणा का सर्वत्र स्वागत किया गया है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि वर्तमान सरकार के शासनारूढ़ होने के पश्चात 226 अफसरों पर भ्रष्टाचार के मुकदमें चलाए गए जिनमें 43 कर्मचारी मुअत्तल भी कर दिए गए हैं।
राष्ट्रपति ने कम्युनिस्टों के शासन काल में पारित 4 विधेयक नही विधानसभा के पास पुन: विचारार्थ भेज दिए हैं। ये विधेयक हैं। कोर्टफीस विधेयक-कृषक बंध विधेयक और जमींदारी कर निरोधक विधेयक। जिस प्रकार के संशोधन इसमें अपेक्षित हैं उसी सूची भी साथ में भेज दी गई है। यह तो निश्चित ही है कि कम्युनिस्टों के न चाहते हुए भी नई विधानसभा इस संशोधनों को स्वीकार कर लेगी।

बख्शी सरकार जनतंत्र का
गला घोंट रही है
यदि सरकार का यही रवैया रहा तो राज्य की
शांति और व्यवस्था खतरे में पड जाएगी
जम्मू-कश्मीर राज्य में जनतंत्र का जैसा मखौल हो रहा है वैसा संसार में शायद ही कहीं देखने को मिले। गत जून के अंतिम सप्ताह में नेशनल कांफ्रेंस के प्रधानमंत्री तथा लोकसभा के सदस्य बख्शी अब्दुल रशीद ने जम्मू के दोदा जिले का दौरा किया। आपके साथ एक मंत्री तथा एक उपमंत्री के अतिरिक्त विधानसभा के अध्यक्ष श्री मीर साहब भी थे। तहसीलदार और डेवलपमेंट आफिसर तो आपकी व्यवस्था में पूरे समय तक
जुटे रहे।
अनेक सरकारी अधिकारियों के पास सूचनाएं भेजकर  पार्टी नेता का स्वागत करने के लिए कहा गया था। इन प्रयत्नों के बाद भी जनता तो कहीं दिखा नहीं-हां प्राइमरी स्कूल के छोटे-छोटे बच्चों द्वारा स्वागत का कार्यक्रम अवश्य कराया गया।
लगभग आधे दर्जन सभाओं का आयोजन सरकारी कर्मचारियों को ही करना पड़ा, जिसमें सूचना विभाग के लाउडस्पीकरों का खूलकर प्रयोग हुआ। इतनी ही नहीं तो इन अवसरों पर अधिक भीड़ आकर्षित करने के लिए सूचना विभाग की ओर से सरकारी खर्चे पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया।
इस दौरे में एक महत्वपूर्ण बात यह घटी कि शासक दल के नेताओं ने जनमत गणना मोर्चे के नेताओं से भी वार्त्ता की ओर प्रजा परिषद् के विरुद्ध संगठित मोर्चा बनाने पर जोर दिया।
शासन ने जहां अपने दल के नेताओं के दौरे के लिए इस प्रकार की सुविधाएं प्रदान की वहीं प्रजापरिषद् के नेता भी श्यामलाल श्री अब्दुल रहमान और श्री सत्यदेव एम.एल. के दौरे के समय गुण्डों द्वारा, सभाओं में उत्पात कराया गया। लाठी चार्ज किया गया और गुण्डों को पकड़ने के स्थान पर परिषद् के कार्यकर्त्ताओं को ही हवालात में बंद किया गया। श्री श्यामलाल ने एक वक्तव्य प्रसारित कर उपर्युक्त तथ्यों की न्यायालयीन जांच करने की मांग करते हुए कहा है कि यदि शासन का यही रवैया रहा तो प्रदेश की शांति और व्यवस्था खतरे में
पड़ जाएगी।
कृषि की समस्याएं

कृषि को प्राथमिकता देने की घोषणा तो कई वर्षो से की जा रही है, किन्तु शासन ने जो नीतियां अपनायी हैं उनमें किसान के हिंतों की तथा कृषि की आनवश्कयताओं का ध्यान नहीं रखा गया। भारत में उर्वरक दुनिया के सभी देशों के मुकाबले महंगा बिकता रहा है। 55 करोड़ रुपए की सहायता जो सासन इस मद में देता था वह भी पिछले केन्द्रीय बजट में समाप्त कर दी गयी। विदेशी कंपनियों को यहां के उर्वरक के कारखाने खोलने की अनुमति दी गयी है और उन्हें मनमाने दामों पर अपने उत्पादन बेचने की छूट दे दी गई है। सत्य तो यह है कि यदि किसान की ईंधन की आवश्कयकताएं मृदु कोक से पूरी कर दी जाए और उसे गोबर को खाद के रूप में प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए तो हमें उर्वरकों के नए कारखानों की आवश्यकता नहीं रहेगी। व्यावहारिक आर्थिक अनुसंधान की राष्ट्रीय परिषद् की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 'भारत प्रतिवर्ष दस सिन्द्रियां जला देता है।'
—पं. दीनदयाल उपाध्याय (विचार-दर्शन, खण्ड-7, पृ. 79-80)

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