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कबीर ने बनारस के घाट से जन-जन के बीच ज्ञान की वाणी मुखरित कर समरस समाज के प्रति एक मानस बनाया था। लोगों को समझाया था कि जात-पात, वर्ण भेद आदि भूलकर सबको एक ही मानो, सबकी ‘जात’ मानवता है। भारत में प्राचीन काल से ही वर्ण व्यवस्था के ऊपरी भेदों के विरुद्ध समाज को जाग्रत करने के लिए संतों-महंतों ने अनेक सूत्र दिए हैं और सत् मार्ग की दिशा बताई है
सतीश पेडणेकर
भारतीय मनीषा में यह बात अनादि काल से रही है कि मानव किसी भी भेदाभेद से परे, एक हैं। वेदव्यास से लेकर वाल्मीकि तक और विवेकानंद से लेकर महात्मा गांधी तक, सभी ने अपनी तरह से, सरलतम शब्दों में ‘सब जन एक’ का मंत्र दिया है। ऐसे ही भक्तिकाल के एक संत हुए हैं कबीर। जुलाहे का काम करने वाले कबीर ने घाट पर कपड़े रंगते-रंगते ही आमजन की वाणी में ऐसे दोहे रचे जिनमें समरसता का संंदेश खूबसूरती के साथ पिरोया दिखता है। इसीलिए कबीर की वाणी हर कालखंड में समीचीन है। 9 जून को कबीर जयंती के अवसर पर कबीरदास, रैदास, श्री नारायण गुरु, संत शंकरदेव, रामानुजाचार्य जैसी भारत की अनूठी संत-परंपरा द्वारा समाज का समरस बनाने की दिशा में दिए अमूल्य योगदान की चर्चा करना सर्वथा उपयुक्त ही है।
गुरु रामानंद के जीवन की एक बड़ी रोचक कथा है। रामभक्ति की पावन धारा को स्वामी रामानंद ने गरीबों और वंचितों की झोंपड़ी तक पहुंचाया और इसके लिए वैष्णवों के नारायण मंत्र के स्थान पर रामतारक मंत्र को सांप्रदायिक दीक्षा का बीजमंत्र माना। बीजमंत्र हमेशा शिष्य के कान में कहने की प्रथा है! आचार्य रामानंद के बारे में प्रसिद्ध है कि उन्होंने पेड़ पर चढ़कर रामतारक मंत्र का उपदेश दिया था ताकि वह सभी जातियों के लोगों के कान में पड़े और अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे। उनका कहना था-जात-पात पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई। उनके सम्प्रदाय को रामानंद अथवा वैरागी सम्प्रदाय भी कहते हैं। जात-पात में बिखरे समाज को सुदृढ़ बनाने की भावना से उन्होंने भक्तिमार्ग में जातिभेद को व्यर्थ बताया और कहा कि भगवान की शरणागति का मार्ग सबके लिए समान रूप से खुला है। चाहे किसी भी जाति या वर्ग का व्यक्ति हो, उसे राममंत्र देने में उन्होंने संकोच नहीं किया।
उन्होंने राम की उपासना का प्रचार किया और तब बिजली की गति से रामनाम की चर्चा सारे भारत में फैल गई। इस देश के इतिहास में स्वामी रामानंद पहले ऐसे संत पुरुष थे, जिन्होंने इस देश के समाज को अपने धर्म-संघ में उचित प्रतिनिधित्व देकर उन हजारों जातियों और उपजातियों में बिखरे, निराशा और पराभव के अंधकार में डूबे निष्प्राण समाज में पुन: प्राण फूंककर धर्म के सही मर्म को समझाया। इससे पूर्व जितने भी संत-महापुरुष हुए, उन्होंने दार्शनिक आधार पर विश्वबंधुत्व और वसुधैव कुटुंबकम् की बात तो की थी, परन्तु धर्म- व्यवस्था में उसके पूरी तरह प्रतिष्ठापित होने में कहीं न कहीं कसर रह गई थी। पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधि अधिकांशत: ज्ञान, शिक्षा और आत्मसम्मान से वंचित रह गए थे। स्वामी रामानंदाचार्य ने समाज के पिछड़े बंधुओं के सामने राम भक्ति का द्वार खोल दिया था। श्रीरामानुज ने गुरु गोष्ठिपूर्ण द्वारा अट्ठारह बार लौटाए जाने के बाद रामानंदाचार्य को अष्टाक्षर नारायण मंत्र (ऊं नम: नारायणाय) का मंत्र देकर समझाया-वत्स! यह परमपावन मंत्र जिसके कानों में पड़ जाता है, वह भगवान नारायण के दिव्य वैकुंठधाम में जाता है। यह अत्यंत गुप्त मंत्र है, इसे किसी अपात्र को मत सुनाना। गुरु का निर्देश था कि रामानंद उनका बताया हुआ मंत्र किसी अन्य को न बताएं। किंतु जब रामानंद को ज्ञात हुआ कि मंत्र के सुनने से लोगों को मुक्ति मिल जाती है तो वे मंदिर की छत पर चढ़कर सैकड़ों नर-नारियों के सामने चिल्ला-चिल्लाकर उस मंत्र का उच्चारण करने लगे। यह है भारतीय संत परंपरा, जो बार-बार लोगों को समझाती रही है कि भक्ति के मार्ग में सभी बराबर हैं। वहां कोई छोटा बड़ा, ऊंच-नीच नहीं क्योंकि सभी ब्रह्म के ही अंश हैं।
इसी तरह रामानुजाचार्य का मानना था कि भक्ति का मार्ग जाति और वर्गविहीन है। वे केवल जातिविहीन भक्ति आंदोलन के प्रवर्तक थे जिनका मानना था कि सामाजिक सुधारों को धार्मिक एकात्मता के साथ जोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने अपने समय में कर्नाटक और तमिलनाडु के कई हिस्सों में वंचितों को अपने संप्रदाय की दीक्षा देकर जातीय भेदभाव के खत्म किया। उन्होंने मंदिरों के द्वार सभी जातियों के लिए खोल दिए। कई वंचितों को मंदिरों का पुरोहित भी बनाया। उस वक्त तक केवल ब्राह्मण ही नारायण मंत्र का जाप कर सकते थे। उन्होंने धोबी,अस्पृश्य समझी जाने वाली जातियों के लिए भक्ति का मार्ग खोल दिया। इससे सारे समाज में भक्ति की धारा उमड़ पड़ी। उन्होंने तिरुपति में अन्नक्षेत्र चलाया जहां आज भी लोग बिना जाति-भेद के भोजन करते हैं। उन्होंने घोषणा की थी कि भगवान की नजर में सभी समान हैं। स्वामी विवेकानंद ने अपने शिकागो भाषण में कहा था कि रामानुज ने उच्च और निम्न जाति के लोगों के बीच बराबरी की भावना जगाई। वे महात्मा गांधी के वंचितों को मंदिर प्रवेश कराने के आंदोलन के प्रेरणास्रोत थे।
दरअसल रामानंद प्रतीक थे उस काल के जब भक्ति का धार्मिक किसी एक छोटे से हिस्से तक सीमित न रहकर सारे भारत का आंदोलन बन गया था। उसने जाति, वर्ण और लिंग भेद से परे जाकर सारे देश को अपनी आगोश में ले लिया था। उस समय के संतों ने समाज को अध्यात्म से जोड़ दिया था। सबका एक ही संदेश था, जो धर्म के सत्य का ही संदेश था कि सभी में एक शक्ति का वास है तो फिर सामाजिक भेदभाव कैसा। धर्म के रास्ते पर सब समान हैं।
भक्ति का यह महाआंदोलन ऐसा आंदोलन था जिसमें वृहत्तर भारत की तस्वीर उभर कर आती थी। इस आंदोलन से जुड़े संत किसी एक जाति के नहीं थे। उनमें संत कबीरदास जैसे जुलाहा जाति के लोग थे तो रैदास जैसे चर्मकार भी, तुकाराम जैसे छोटे व्यापारी थे तो जनाबाई जैसी सेविका भी, ज्ञानेश्वर जैसे ब्राह्मण थे तो कनकदास जैसे चरवाहे भी थे। सभी एक ही बात कहते थे, जो सार रूप में स्वामी रामानंद के सूत्रों में कही गई है। वे ऐसे संत थे जिनकी छाया तले सगुण और निर्गुण, दोनों तरह के संत-उपासक विश्राम पाते थे।
यह कथा बताने के पीछे उद्देश्य यही है कि जहां आज जातिविहीन समाज की बात करना आधुनिक सपना माना जाता है, वहीं रामानंद तो कब के कह गए हैं कि-जात-पात पूछे नहीं कोय…। इस मुखर उद्घोषणा में 700 साल पहले भी यही सपना मौजूद था। वैसे यह देशज आधुनिकता भारतीय धार्मिक साहित्य और संत-महंतों के वचनों में हमेशा मौजूद रही है। दरअसल भगवान कृष्ण और गौतम बुद्ध से लेकर बाद की संत परंपरा तक ने भेदभाव पर आधारित समाज व्यवस्था के खिलाफ आवाज मुखर की है। सबका यही कहना रहा है कि सारे वर्ण समान हैं। कोई छोटा या बड़ा, ऊंचा या नीचा नहीं है।
यह परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है। पुरुष सूक्त में समाज की कल्पना सहस्र शीर्ष पुरुष के रूप में की गई है।
सहस्रशीर्षा पुरुष: सहस्राक्ष: सहस्रपात्।
स भूमिंसर्वत: स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङगुलम्।।
(जो सहस्रों सिर वाले, सहस्रों नेत्र वाले और सहस्रों चरण वाले विराट पुरुष हैं, वे सारे ब्रह्मांड को आवृत्त करके भी दस अंगुल शेष रहते हैं।।1।।)
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृत:।
ऊरु तदस्य यद्वैश्य: पद् भ्यां शूद्रोऽअजायत।।11।।
(विराट पुरुष का मुख ब्राह्मण अर्थात् ज्ञानीजन (विवेकवान) हुए। क्षत्रिय अर्थात् पराक्रमी व्यक्ति, उसके शरीर में विद्यमान बाहुओं के समान हैं। वैश्य अर्थात् पोषणशक्ति-सम्पन्न व्यक्ति उसकी जंघा एवं सेवाधर्मी व्यक्ति उसके पैर हुए।।11।।)
इस तरह समाज पुरुष की कल्पना एक शरीर के रूप में की गई है विभिन्न वर्णों को समाज शरीर का अंग बताया गया है। शरीर के ये अंग एक दूसरे से बड़े या छोटे नहीं वरन् शरीर के लिए अपरिहार्य और परस्पर पूरक हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में भी भगवान बहुत स्पष्ट शब्दों में घोषणा करते हैं-चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:। इसके बावजूद भी यदि कोई जाति को वर्ण आधारित बताता है तो वह कृष्ण द्वारा किए गए निर्देश का उल्लंघन कर रहा है। यदि ऋषियों की महान परंपरा को देखें तो पाएंगे कि वशिष्ठ और वामदेव जैसे ऋषियों को छोड़ दें तो उनमें बहुत से उन जातियों के हैं जिन्हें ‘निम्न’ कहा जाता है। प्रतिभाशाली लोगों को समाज में जो सम्मान और मान्यता दी गई, वह उनके काम के कारण थी, न कि किसी वंश विशेष में जन्म लेने की वजह से। सत्यकाम जाबाला की तरह गणिका के बेटे थे मगर बाद में सुप्रसिद्ध ऋषि बने।
खुद गीता कहने वाले कृष्ण यादव जाति के माने जाते हैं जो आज के ‘अन्य पिछड़े वर्गों’ में से एक है। इसके बावजूद उन्हें दिव्य शक्ति की सर्वोच्च अभिव्यक्ति माना जाता है, उनकी आराधना की जाती है। सभी जातियां उनका आदर करती हैं। यदि जाति व्यवस्था इतनी जड़ होती तो उन्हें कौन पूर्णावतार मानता? इस बात का भी जिक्र किया जाना चाहिए कि भगवान कार्तिकेय ने जिस वनवासी कन्या से विवाह किया उसे सभी इच्छा पूरी करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। यह तथ्य साबित करता है कि जाति आधारित भेदभाव को मूल रूप में शास्त्रों में मान्यता प्राप्त नहीं थी। यह बुराई बाद में समाज में पैठ गई। ऋषि और वेद कहते हैं-वसुधैव कुटुम्बकम् विश्व एक परिवार है। तो हम वंचितों के बहिष्कृत होने और परिवार का हिस्सा न होने का औचित्य कैसे साबित कर सकते हैं?
शिव को महादेव कहा जाता है यानी देवों के देव, जो खुद निषाद-पुत्र हैं (एक अस्पृश्य) जिन्हें छुआ नहीं जा सकता)। सुप्रसिद्ध रुद्रम में सूत्र है-निषादस्य वो नम: यानी (मैं) निषाद को नमस्कार करता हूं। उपनिषद् तो साफ तौर पर घोषणा करते हैं कि ‘हम ब्रह्म हैं’, भले कोई किसी भी जाति, वंश या परिवार का हो।
कभी-कभी आम लोग ही नहीं, साधु-संत भी भटक जाते हैं तो भारतीय मनीषा उन्हें सही रास्ते पर आने का मार्ग दिखाती है। शंकराचार्य के बारे में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। धर्म संस्थापना के उनके इस कार्य को देखकर कहा जाता है कि वे साक्षात् शंकर के अवतार थे। सम्पूर्ण जगत् के जीवों को ब्रह्म के रूप में स्वीकार करना तथा तर्क आदि के द्वारा उसको सिद्ध कर देना आदि शंकराचार्य की विशेषता रही है। इस प्रकार शंकराचार्य के व्यक्तित्व तथा कृतित्व के मूल्यांकन से हम कह सकते हैं कि आदि शंकराचार्य ने राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया था।
शंकराचार्य जब काशी गए तो वहां मार्ग में उनके सामने एक चांडाल (श्मशान घाट में संस्कार कर्म करने वाला) आ गया। तब हिन्दू धर्म की जाति-व्यवस्था में चांडाल का काम सबसे निम्न स्तर का माना जाता था। शंकराचार्य ने चांडाल से रास्ते से परे हटने को कहा। जवाब में वह उनके सामने हाथ जोड़कर बोला, ‘‘क्या हटाऊं, अपना शरीर या आत्मा? आकार या निराकार?’’ इन सवालों ने शंकराचार्य को झकझोर दिया। उन्होंने उस चांडाल को ही अपना गुरु मान लिया। कहा जाता है, चांडाल के रूप में स्वयं शिव आए थे, पारम्परिक वर्ण व्यवस्था में पूरी तरह रचे-पगे शंकर को व्यावहारिक अद्वैत का मर्म समझाने। इस कथा की सीख यही है कि सच्चा संन्यासी वही है जो हर चीज में ब्रह्म के दर्शन कर सके। यह किसी के साथ सामाजिक आधार पर भेदभाव नहीं करता।
शिव और कृष्ण जैसे देवों के अलावा भारत के कई ऋषि-मनीषी न केवल वंचित वर्ग से थे, वरन् उन्होंने ऐसे वर्गों के लिए सतत कार्य भी किया था। वेदों का संपादन करने वाले, ब्रह्मसूत्र के रचयिता, महाभारत के लेखक वेदव्यास के बारे में तो कहा जाता है, उनके बाद से जो भी लिखा गया है, वह व्यास की जूठन के समान ही है। आज जो भी विद्या का केंद्र बनता है, उसे व्यासपीठ कहा जाता है।
हमारे देश में कई ऋषि दलितों या वंचितों के लिए कार्य करने वाले रहे हैं। महर्षि मतंग शूद्र कही जाने वाली जाति के थे और चांडालों के लिए कार्य करते थे। आज भी वंचितों की एक जाति को मतंग या मडिगा कहा जाता है। वराह पुराण में मतंग ऋषि की प्रशंसा में कई पद लिखे गए हैं। ऐतरेय ब्राह्मण और अन्य दस प्रमुख उपनिषदों में से एक ऐतरेय उपनिषद के रचयिता महर्षि ऐतरेय भी निम्न जाति के थे। उनकी मां ऐतरा सेविका थीं। न्याय और नीति के ज्ञाता विदुर दुनियाभर में विख्यात हैं। विदुर राजा धृतराष्ट्र की दासी के बेटे थे। सारे पुराण सूत उवाच से शुरू होते हैं, क्योंकि पुराणों को सुनाने का सम्मान सूत ऋषि को दिया गया है जो निम्न जाति के थे।
भक्तिकाल में सुधारक संतों की लंबी परंपरा रही है। दक्षिण में रामानुज की तरह बसवाचार्य का भी व्यापक प्रभाव है। उनकी मुख्य शिक्षा यही थी कि सभी समान हैं, भले ही वे किसी भी जाति-वर्ण, लिंग या पेशे के हों। उन्होंने सही आचरण और श्रम की महत्ता पर बल दिया। उनका कहना था कि अपने अंदर के शिव की पूजा करो। इस कारण उन्हें काफी विरोध का सामना भी करना पड़ा, लेकिन उनका भक्त-परिवार निरंतर बढ़ता गया। और लिंगायत आंदोलन खड़ा हो गया, जिससे कई और संत सामने आए जिनमें कई महिलाएं भी थीं जैसे अक्का महादेवी जैसी कवयित्रियां। श्री नारायण गुरु ने लोगों को प्रबुद्ध बनाने के लिए अभियान चलाया। समाज के कमजोर तबके के लोगों को शिक्षित, संगठित और मजबूत बनाने के लिए उन्होंने 1903 में श्री नारायण धर्म परिपालन योगम् की स्थापना की थी जो एसएनडीपी के नाम से विख्यात है। एसएनडीपी ने उनकी शिक्षाओं के प्रचार और प्रसार में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। श्री नारायण गुरु के निर्देशन में एसएनडीपी ने वंचित समुदायों के बीच शैक्षणिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया ताकि उन्हें गरिमा, गर्व और आत्मसम्मान मिल सके।
मध्यकाल में तो सारे देश में भक्तिधारा बेहद प्रबल थी। भक्ति एक विराट जनांदोलन बन गयी थी जिसके जरिये इस देश ने अपने को जाति, वंश, वर्ण के भेदभाव से ऊपर उठाकर एक बार फिर सबको एकता के सूत्र में पिरोने की कोशिश की थी। यह एक तरह से अपना आत्म-साक्षात्कार था। आत्म-साक्षात्कार करने की कोशिश आधुनिक काल में भी देखने को मिलती है।
इसमें आधुनिक दार्शनिक भी हैं और आधुनिक सुधारक भी, इनमें आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि और प्राचीन आध्यात्मिक सत्यों का संगम है। इन स्वप्नद्रष्टाओं ने सुधारों के प्रति व्यावहारिक दृष्टि अपनाते हुए वंचित वर्गों की शिक्षा, सशक्तिकरण और प्राचीन शास्त्रों में छिपे सत्य की पुनर्व्याख्या का तरीका अपनाया। इसमें स्वामी दयानंद भी हैं और विवेकानंद भी। बाद के काल में लोकमान्य तिलक कहते हैं कि अगर ईश्वर अस्पृश्यता को मानता है तो मैं ऐसे ईश्वर को नहीं मानूंगा। स्वातंत्र्यवीर सावरकर और डॉ. आंबेडकर ने तो इस क्षेत्र में महती कार्य किया है। डॉ.आंबेडकर हिन्दू धर्म की कुरीतियों का प्रखर रूप से विरोध करते रहे लेकिन हिन्दू धर्म की आत्मा अद्वैत को कभी नकार नहीं पाए। लोकभाषा में कहें तो-सियाराममय सब जग जानी की भावना को। उन्होंने अपने कई भाषणों में कई बार कहा है कि सोहं तत्वमसि, अहंम ब्रह्मास्मि की अवधारणाएं किसी भी सामाजिक लोकतंत्र का आधार होनी चाहिए। उन्हें हिन्दू समाज से कोई शिकायत थी तो बस इस बात की कि वह अपने सिद्धातों पर अमल नहीं कर रहा। अद्वैत के इन सिद्धांतों के अनुसार समतापूर्ण समाज बनाने की जगह उसने जातीय भेदभाव पर आधारित समाज कैसे बना दिया?
यही कार्य डॉ. हेडगेवार और रा. स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक पूज्य गुरुजी गोलवलकर के मार्गदर्शन में संघ ने किया है। इसके लिए संघ का रास्ता रहा- हिन्दू—हिन्दू, भाई-भाई। जिसमें न कोई ऊंचा है न कोई नीचा। सभी साथ-साथ जीते हंै। हिन्दू समाज के लाखों-करोड़ों लोग इस भावना के साथ संघकार्य से जड़े हुए हंै। यह बिना किसी नारेबाजी के रोजाना शांत तरीके से हो रही सामाजिक क्रांति है जिसे कई लोग समरसता भी कहते हैं। इसका असर अब समाज में दिखाई देने लगा है। यह वही राह है जो भारत के संत लगातार दिखाते रहे हैं। ये है हमारे धर्म के मूल सत्य को अपनाने की राह। समरसता की राह।
समाज में समरसता की अलख जगाई
संत कबीर भक्ति काल् इकलौते ऐसे कवि हैं जो जीवनभर समाज में व्याप्त कुरीतियों पर कुठाराघात करते रहे और समरसता की अलख जगाते रहे। वे कर्म प्रधान समाज की वकालत करते थे। लोक कल्याण ही उनके जीवन का मकसद था। जब उनका जन्म हुआ, तब देश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक स्थिति चिंताजनक थी। मुस्लिम शासकों की मतांधता से जनता त्रस्त थी और पाखंड का बोलबाला था। उन्होंने न केवल इनके खिलाफ आवाज उठाई, बल्कि असत्य एवं अन्याय की धज्जियां भी उड़ाते रहे। इसी कारण उनकी गिनती समाज सुधारक के रूप में भी होती है। उनके इनके नाम पर कबीरपंथ संप्रदाय भी प्रचलित है।
परमात्मा का साक्षात्कार
गुरु नानक बचपन से ही ध्यान और सत्संग में डूबे रहते थे। कहते हैं, नदी में स्नान के बाद एक दिन जंगल में उन्हें परमात्मा का साक्षात्कार हुआ। उन्हें अमृत पान कराने के बाद परमात्मा ने कहा- मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं। मैंने तुम्हें आनंदित किया है, अब तुम्हारे संपर्क में आने वाला हर व्यक्ति आनंदित होगा। इस घटना के बाद वे धर्म प्रचार के लिए देशाटन पर निकल पड़े। गुरु नानक कहते थे- ईश्वर एक है और हर जगह और प्राणी में मौजूद है। स्त्री-पुरुष बराबर हैं। उनके व्यक्तित्व परमात्मा का साक्षात्कारमें दार्शनिक, समाज सुधारक, धर्म सुधारक, योगी, गृहस्थ, कवि, देशभक्त और
विश्वबंधुत्व जैसे गुण मौजूद थे।
शास्वत मूल्यों के संवाहक
कलकत्ता में जन्मे स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। गुरु रामकृष्ण परमहंस की कृपा से उन्हे आत्म-साक्षात्कार हुआ और संन्यास लेने के बाद इनका नाम विवेकानंद पड़ा। अमेरिका के शिकागो में 1893 को विश्व धर्म परिषद में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया और ओजपूर्ण व्याख्यान से सबका हृदय जीत लिया। इसके बाद अमेरिका, इंग्लैंड और पूरे यूरोप में हिन्दू दर्शन के सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया। उनका दृढ़ विश्वास था कि अध्यात्म विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा। रामकृष्ण मिशन के संस्थापक विवेकानंद खुद को गरीबों का सेवक कहते थे।
वंचितों में जगाया आत्मविश्वास
संत रैदास या रविदास काशी के थे। उन्हें रामानंद का शिष्य माना जाता है। उन्होंने उपेक्षित व शोषित दलितों में आत्मविश्वास का संचार किया और अपने उपदेशों से सामाजिक बुराइयों को दूर किया। कहते हैं कि रैदास अनपढ़ थे, लेकिन गुरुग्रंथ साहब व अन्य ग्रंथों में इनके पद हैं। मीराबाई को इनका शिष्य बताया जाता है। मीरा के पदों में भी गुरु रूप में उनका जिक्र है। समता और सदाचार पर रैदास का बहुत जोर था और सत्य को शुद्ध रूप में पेश करना ही उनका उद्देश्य था। उन्होंने एक पंथ भी चलाया, जो रैदासी पंथ कहलाता है।










