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आसाम प्रदेश—क्या भाषा के आधार पर आसाम का पुनर्विभाजन होगा?

Written byArchiveArchive
May 22, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 22 May 2017 11:53:54

पाञ्चजन्य
वर्ष: 14  अंक: 1
11 जुलाई ,1960

भाषावार राज्य रचना के दुष्परिणाम से आसाम भी अछूता न रह सका और  कांग्रेस द्वारा सुलगाई गई यह चिनगारी आज कांग्रेस को ही भस्मसात करने पर तुल गई है। आसाम में गोहाटी तथा अन्य स्थानों पर आसामी और गैर-आसामियों में जो दंगे हुए वे तात्कालिक रूप से यद्यपि दबा दिए गए हैं, तथापि यह समझना भूल होगी कि यह कलह सर्वदा के लिए शांत हो गया है। वस्तुस्थिति यह है कि आसाम प्रदेश में आसामी भाषा बोलने वालों की संख्या 55 प्रतिशत है और शेष 45 प्रतिशत भिन्न भाषाभाषी हैं। आसामी भारत के संविधान द्वारा स्वीकृत 14 भाषाओं में से एक मान्यता प्राप्त भाषा होने पर भी अभी तक यहां की राज्य सरकार ने उसे राज्य की भाषा के रूप में प्रतिष्ठा नहीं दिया है। ऐसा करने का एक प्रमुख कारण यह था कि कछार, खासी और जयन्तिया पर्वत, गारो पर्वत, मीजो पर्वत तथा उत्तरी कछार पर्वतीय क्षेत्र के निवासी अधिकांश गैर आसामी हैं और राज्यभाषा के रूप में आसामी भाषा का ‘लादा’ जाना उन्हें सहन नहीं था।
परन्तु दंगाग्रस्त क्षेत्रों का भ्रमण कर जनता और राजनैतिक नेताओं से मिलने के पश्चात् में निश्चित रूप से यह कह सकता हूं कि मूलत: यह विवाद जनता का न होकर राजनीतिक पार्टियों का है, जिन्होंने भाई-भाई के बीच विवाद पैदा कर सन् 62 के चुनावों में अपने स्वार्थ की रोटी सेंकने की योजना बनाई है। सरकार और विरोध पक्ष दोनों ही इस प्रश्न को दलीय लाभ की दृष्टि से ही सुलझाना चाहते हैं।
बहुसंख्यक असम भाषी मतदाताओं को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए विरोधी दलों ने गत बजट अधिवेशन के समय आसामी भाषा को राजभाषा के रूप में स्वीकार करने का प्रस्ताव उपस्थित किया था। पर यह प्रस्ताव कांग्रेस के विरोध के कारण स्वीकृत न हो सका था। मुख्यमंत्री श्री चालिहा ने उस समय कहा था अल्पमत की राय के बिना वे उन पर कोई भाषा लाद नहीं सकते। विरोधी दलों ने स्थिति का लाभ उठाने में कोई कोर-कसर न की।  असमिया भाषियों को इस प्रश्न पर भड़काने में मानो होड़ सी लग गई। ब्रह्मपुत्र घाटी में आंदोलन तेज किया गया। उधर कांग्रेसी कर्णधारों ने भी विचार करना प्रारम्भ किया कि आसामी और गैर आसामी में किसका ‘वोट’ अधिक मूल्यवान है। स्वाभाविक रूप से बहुमत का वोट अधिक कीमती मालूूम हुआ और पूर्ण विचार करके उन्होंने अप्रैल में एक प्रस्ताव पारित किया कि आसामी को राज्य भाषा के रूप में मान्यता दी जाए। पर साथ ही 45 प्रतिशत गैर आसामी भाषा-भाषियों का ख्याल करके उन्होंने यह भी कहा कि 4-5 जिलों में जहां उनका बहुमत है वहां आसामी भाषा उन पर लादी नहीं जाएगी। पर इससे दोनों में से किसी भी वर्ग को संतोष होना सम्भव न था। फलत: एक-दूसरे के विरुद्ध प्रदर्शन प्रारम्भ हुए। सर्वप्रथम 21 मई को शिलांग में गैर आसामी भाषियों ने एक विशाल जुलूस निकाल कर असमिया भाषियों के प्रति अपमान जनक नारे लगाए। दूसरे वर्ग से इसकी प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी।

बम्बई राज्य में कम्युनिस्टों के पैर उखड़े
-हमारे प्रतिनिधियों द्वारा-
गत पखवारे में स्थानीय गतिविधियों से सबसे महत्वपूर्ण रहे राज्य-विधान परिषद् के लिए चुनाव। ये चुनाव जितने ही महत्वपूर्ण रहे, उनके परिणाम उतने ही हलचलकारी रहे। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इन चुनाव परिणामों ने बड़े-बड़े राजनीतिक धुरंधरों को भी हक्का-बक्का कर दिया है। विदर्भ से श्री बच्छराज व्यास और पूना से श्री गवण्डी के विजयी होने का समाचार पिछले पखवारे की
महाराष्ट्र की चिट्ठी में आ चुका है। अब बम्बई से जनसंघ के तीसरे उम्मीदवार श्री जोगलेकर भी विजयी हो गए हैं।
इस प्रकार उल्लेखनीय है कि स्थानीय निकाय और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से होने वाले इन चुनावों में जनसंघ के शत-प्रतिशत उम्मीदवार सफलीभूत हुए हैं, जबकि कांग्रेस को केवल आंशिक सफलता ही प्राप्त हुई है। पूरे महाराष्ट्र में जनसंघ ने स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से अपने तीन उम्मीदवार खड़े किए थे और ये तीनों ही उम्मीदवार भारी बहुमत से विजयी हुए हैं। जैसा कि मैं पहले इन स्तम्भों में इस क्षेत्र से कम्युनिस्टों के क्रमिक विपर्यय की सूचना देता आया हूं, इस बार का चुनाव मेरे कथन की शत-प्रतिशत पुष्टि करने में सहायक सिद्ध हुआ है।
बड़े गर्व से महाराष्ट्र को अपना अभेद्य गढ़ घोषित करने वाले कम्युनिस्टों या उनके समान सिद्धांत रखने वाले दलों को  भी स्थायी नहीं मिल सका है। स्मरणीय है कि जब जनसंघ ने कम्युनिस्ट प्रधान संयुक्त महाराष्ट्र समिति से सम्बंध विच्छेद किया था, तब कम्युनिस्टों और प्रजा समाजवादियों ने छाती ठोंककर यह धमकी दी थी कि समिति से अलग हो जाने के बाद जनसंघ को महाराष्ट्र में पैर रखने की भी जगह नहीं मिलेगी। परन्तु वस्तुस्थिति इसके विपरीत ही नजर आ रही है।
जनसंघ के समिति से अलग होने के बाद म्युनिसिपल चुनावों के अतिरिक्त यह पहला महत्वपूर्ण चुनाव-संघर्ष था।  म्युनिसिपल चुनाव में तो जनसंघ ने उक्त दलों के उक्त दावे को झूठा साबित कर ही दिया था, इस चुनाव में उसने कम्युनिस्टों को यह सोचने के लिए विवश कर दिया है कि वस्तुत: वे स्वयं कितने पानी में हैं, क्योंकि कम्युनिस्टों एवं उनके साथी दलों को तो एक भी स्थान नहीं मिल सका और उसके विपरीत जनसंघ ने अपने तीनों उम्मीदवारों के लिए विजयश्री हासिल की। बम्बई नगर और महाराष्ट्र राज्य से कम्युनिस्टों के पैर उखड़ जाने का यह चुनाव-परिणाम-सबसे अलग और सबसे स्पष्ट उदाहरण रहा परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि यहां कांग्रेस का बल बहुत बढ़ गया है क्योंकि इसी चुनाव परिणाम से यह भी स्पष्ट है कि कांग्रेस को केवल आंशिक सफलता ही हाथ लगी है। कम्युनिस्टों की इस विपर्ययमुखी स्थिति में प्रजा समाजवादी पार्टी ने और दो कीलें गाड़ दी हैं। पहला तो यह कि उसके कार्पोरेशन में 33 सदस्यों का प्रजा समाजवादी रिपब्लिकन गुट नाम से एक अलग गुट बना लिया है। इस  प्रकार 62 सदस्यीय सयुक्त महाराष्ट्र समिति का संख्या बल घटकर केवल 29 रह गया है, जो कम्युनिस्टों की दृष्टि से एक बहुत बड़ा आघात है।
हमें सावधान रहना चाहिए

देश में ऐसे तत्व हैं जिनका दंगों में राजनीतिक स्वार्थ विकसित हो गया है। फलत: वे इन अवांछनीय घटनाओं को सीमित करने और दबाने के बजाए उन्हें अपने मतलब का रंग दोकर चारों ओर ले उड़ते हैं। घटना चाहे जैसी हो, उनकी व्याख्या और प्रचार की लाइन तय है। इनके अनुसार हर स्थान पर मुसलमान मारे जाएंगे और मारने वालों में भारतीय जनसंघ तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता होंगे। कई बार तो जहां संघ और जनसंघ की शाखा भी न हो वहां भी इनके अखबारों में शाखाएं खुल जाती हैं। उनकी ये हरकतें उन गिरहकटों और उठाईगीरों की चाल के समान हैं जो लोगों को तथा पुलिस को भी भ्रम में डालने के लिए चोर से विरुद्ध दिशा में चोर-चोर चिल्लाकर दौड़ने लगते हैं तथा किसी भी भलेमानस को पकड़कर पीटने लगते हैं। तब तक असली चोर आराम से गायब हो जाता है। हमें इन तत्वों से सावधान रहना चाहिए।
—पं. दीनदयाल उपाध्याय (विचार-दर्शन, खण्ड-7, पृ. 84-85)

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