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लगातार असफलताओं से न हों निराश

Written byArchiveArchive
May 8, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 08 May 2017 14:56:13

एक ‘कोरा’ (Quora) यूजर हैं, अकंद सितरा। यूपीएससी परीक्षा दी, पास नहीं हुए। दोबारा दी, फिर पास नहीं हुए। लेकिन रोए नहीं। कोरा पर एक सवाल आया कि आईएएस अफसर बनने का सफर कितना खुशनुमा होता है? अकंद ने उसका जवाब दिया, लेकिन आईएएस बनने पर नहीं, बल्कि नहीं बनने के बारे में। यह खुला खत उनके लिए है, जो यूपीएससी के लिए मेहनत करते हैं और बार-बार प्रयास के बावजूद फेल हो जाते हैं। यह उन सभी के लिए है जो किसी न किसी परीक्षा में फेल हुए हैं। अकंद ने कोरा पर यह पोस्ट अंग्रेजी में लिखी थी—
आगे बढ़ने से पहले मुझे अपना छोटा-सा परिचय देने की इजाजत दें। सिविल सर्विसेज-2013 इंटरव्यू में फेल। सिविल सर्विसेज-2015 मेन्स में फेल। सिविल सर्विसेज-2015 प्रारंभिक में फेल। आरबीआई मैनेजर पोस्ट-2015 इंटरव्यू में फेल। एसएससी सीजीएल-2015 टायर 2 फेल।  हर साल मैं किसी न किसी परीक्षा के अंतिम दौर में पहुंचता हूं और बाहर हो जाता हूं। हर बार अंतिम सूची में हमेशा कुछ नंबरों से रह जाता हूं। इतना करीब, फिर भी इतनी दूर। तीन साल की पढ़ाई कर क्या मैंने समय बर्बाद किया? कैसा रहा यह सफर? क्या मैं खुश हूं? मेरी एक साधारण-सी जिंदगी में ऐसे बहुत से सवाल हैं। खुशी असल में होती क्या है? अलग-अलग समय पर इसकी परिभाषाएं बदलती रहती हैं।
हर साल 10 लाख लोग सिविल सर्विसेज परीक्षा के लिए आवेदन देते हैं। पांच लाख से ज्यादा लोग प्रीलिम्स नहीं दे पाते और 4.85 लाख से ज्यादा इसमें पास नहीं होते। लेकिन नहीं चुने जाने पर खुश तो नहीं होते हैं न! 15,000 लोग मेन्स देते हैं, जिसमें 12,000 बाहर हो जाते हैं। सालभर मेहनत के बाद 9 कठिन पेपर देते हैं। शेष तीन हजार इंटरव्यू देते हैं, जिनमें से 2000 कुछ नंबरों से रह जाते हैं और उनका कॅरियर एक साल पीछे चला जाता है। अंतिम हजार लोगों में से 900 खुश नहीं होते, क्योंकि उन्हें मनमाफिक पद नहीं मिलता। आईटीएस, आईआईएस, आईआरटीएस में मेरे कई दोस्त हैं, जिनका मोह भंग हो चुका है, क्योंकि वे जिन पदों पर हैं, उसका रुतबा नहीं है। रुतबा तो बस आईएस, आईपीएस और आईएफएस का है। बाकी सब तो सामान्य सरकारी नौकरियां होती हैं तो क्या वे खुश हैं? अगर उन्हें एक नंबर और मिल जाता तो आईएएस बन सकते थे। यह बात उनकी आत्मा में कांटे की तरह चुभती रहेगी हमेशा। शीर्ष 100 में से आखिरी 30 लोग नाखुश होते हैं, क्योंकि उन्हें अपनी पसंद के कैडर नहीं मिलते। जिसे मुंबई चाहिए, उसे नागालैंड मिल जाता है। ऐसी जगह भेज दिया जाता है जहां की बोली, भाषा, संस्कृति कुछ भी उन्हें समझ में नहीं आती। अगर एक नंबर ज्यादा आया होता तो वे अपने राज्य या अपने शहर में होते। मतलब 10 लाख में से 9,99,950 लोग अलग-अलग कारणों से नाखुश हैं। लिहाजा क्या हमें अपनी मानसिक स्थिति उन चीजों के हिसाब से तय करनी चाहिए, जो हमारे वश में नहीं है? क्या हमारी खुशी किसी परीक्षा में पास होने पर निर्भर करती है? क्या हमें उन चीजों को लेकर दुखी होना चाहिए, जो बदल नहीं सकतीं? यह मैं नहीं जानता… आप तय करें।
मैं बताता हूं, मुझे कैसा लगता है। बिना किसी आय के, मम्मी-पापा के पैसों पर एक उदास कमरे में रहते हुए खुद को तीन साल घिसने के बावजूद कुछ भी न कर पाने के बाद भी मुझे संतोष है। क्योंकि मैं इस सफर में बहुत बदल गया हूं। मेरे अनुभवों ने मुझे बदल दिया है, मेरी बेहतरी के लिए। 2013 में जब मैं कॉलेज में था तब एक बेवकूफ और अपरिपक्व लड़का था। लोग मुझे कभी गंभीरता से नहीं लेते थे। पूरे कॉलेज में मेरा मजाक उड़ता था। उसके बाद मैंने परीक्षा की तैयारी शुरू की। सिविल सर्विसेज के लिए मुझे बहुत कुछ पढ़ना पड़ा- देश-दुनिया का इतिहास, भूगोल, राजनीति, अर्थशास्त्र, पर्यावरण, नीतिशास्त्र, लोक प्रशासन, समाजशास्त्र, समसामयिकी, विज्ञान और इस आसमान के नीचे हर चीज।
आप कह सकते हैं कि इन तीन साल में मैंने इन सभी विषयों में एमए कर लिया। एसएससी के लिए मैंने गणित, अंग्रेजी, रीजनिंग और लॉजिक पढ़ी। तीन बीए तो कर ही लिए होंगे। आरबीआई के लिए मैंने बैंकिंग, वित्त, बीमा और पैसों के बारे में पढ़ा। सभी रिपोटर््स को गहराई से पढ़ा। तीन साल के बाद एक जोकर, बेवकूफ लड़के से एक परिपक्व और समझदार आदमी बन गया। जब दोस्तों से मिलता तो उन्हें झटका लगता कि कोई इतना कैसे बदल सकता है? अब वे वाकई मेरी ‘इज्जत’ करते थे।
मैंने एक परीक्षा पास कर ली और गृह मंत्रालय में एक अच्छी नौकरी है। इस सफर के अंत में मेरे पास 60,000 रुपए मासिक की नौकरी है। मुझे मेरा प्यार मिल गया है, जिसने सबसे बुरे समय में मेरा साथ दिया। मुझे इज्जत मिली है- दोस्तों, मम्मी-पापा, परिवार, रिश्तेदार में और कोरा पर। मैं ज्यादा समझदार, ज्ञानी और जानकार हूं। मैंने सीख लिया है कि जिंदगी अच्छी या बुरी नहीं, बस जिंदगी है। जब-जब मैं कोई परीक्षा पास नहीं कर पाया, मुझे लगा, मैं गिर गया हूं। तब दुख और अवसाद से घिर जाता था। लगातार असफलताओं से समझ गया कि गिरना कुछ नहीं होता। जो चीजें मेरे वश में नहीं हैं, उन पर हतोत्साहित होने की कोई तुक नहीं है। मैंने सीखा है कि मैं जो हूं, मुझे उसके बारे में खुश रहना चाहिए और यह समझने के बाद मैं सुकून में हूं। पहले से कहीं बेहतर कर रहा हूं।
क्या मैं इन सभी परीक्षाओं में फेल हुआ हूं? हां। क्या मैं जिंदगी में फेल हुआ हूं? नहीं, बिल्कुल नहीं। मैं अपने जीवन से प्यार करता हूं। सफल नहीं हुआ तो क्या? मैं खुश हूं। मेरे पास वह सब नहीं, जो मैं चाहता था। पर वह सब है, जिसकी मुझे जरूरत थी। यह खुशनुमा सफर था। एक अच्छा अनुभव! मैंने अभी बस शुरुआत की है।
(मुकुंद बिहारी की फेसबुक वॉल से)

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