मिथक बना इतिहास
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मिथक बना इतिहास

Written byArchiveArchive
May 8, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 08 May 2017 12:40:37

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बाहुबली-2 भारतीय सनातन परंपराओं और धार्मिक-आध्यात्मिक शिक्षाओं से ओतप्रोत एक ऐसा महाकाव्य है जिसमें माहिष्मती साम्राज्य भले काल्पनिक हो लेकिन उसके पात्र और घटनाएं संपूर्ण विश्व के इतिहास में पूर्णत: सजीव हैं। शायद इसीलिए इस सिनेमा को देखते वक्त आंखें मन के साथ-साथ चलती हैं। या फिर मन आंखों के साथ हो जाता है। यह फिल्म न केवल अंतरराष्टÑीय स्तर की है बल्कि अंतरराष्टÑीय बाजार में भारत की पहली धमाकेदार दस्तक है।

अजय विद्युत

भारत से लेकर अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी तक के लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है बाहुबली-2 का जादू। क्या यह ढाई सौ करोड़ रुपए से बनी अब तक की सबसे महंगी भारतीय फिल्म के शानदार सेटों, वीएफएक्स और अन्य तकनीकों के कमाल की बदौलत है या फिर यह भारतीय संस्कृति, परंपरा, धर्म और शिक्षाओं की वह सार्वभौमिक अपील है जो देश, काल, भाषा, नस्ल-हर सीमा के पार जाकर संपूर्ण विश्व के मनुष्यों के अवचेतन से जुड़ती है? बहरहाल निर्देशक-पटकथा लेखक एस.एस. राजमौलि और कहानीकार के.वी. विजयेन्द्र प्रसाद की मानें तो फिल्म की कहानी पूर्णत: काल्पनिक है, लेकिन महाभारत और रामायण से प्रेरित है। लंदन के अखबार गार्जियन के 28 अप्रैल, 2017 के अंक में माइक मैक्काहिल लिखते हैं, ‘‘बाहुबली-2 भारतीय सिनेमा का सबसे अधिक बजट का एक चुस्त और सहृदय फिल्मी महाकाव्य है।’’

भारत में बनीं बड़े बजट की फिल्में
फिल्म    प्रदर्शन साल     भाषा    बजट (करोड़ रु.)
बाहुबली 2 : द कनक्लूजन-    2017     तेलुगू/तमिल    250
बाहुबली : द बिगनिंग-    2015    तेलुगू/तमिल    180
प्रेम रतन धन पायो    2015    हिंदी    175
धूम 3     2013    हिंदी     175
दिलवाले     2015     हिंदी     165
बैंग बैंग    2014    हिंदी     160
हैप्पी न्यू ईयर     2014     हिंदी     150
बाजीराव मस्तानी     2015    हिंदी    145
सुल्तान     2016     हिंदी    140

वास्तव में यह सिनेमा की सीमा के कहीं बाहर की कोई चीज है। माइक मैक्काहिल ने ठीक ही लिखा कि यह महाकाव्य है जो संपूर्ण विश्व को संबोधित करता है। भारतीय संस्कृति और जीवनशैली की सनातन व्यवस्था ही रही है ‘वसुधैव कुटुंबकम्, जहां पूरे विश्व को एक परिवार माना गया है। भारत के 8,000 रुपहले परदों के अलावा अमेरिका में 1,100 और कनाडा में 150 परदों पर बाहुबली 2 का प्रदर्शन और सब जगह लोगों में उसके प्रति उत्कंठा यही दर्शाती है कि भारत के पास भारतीयता की वह विरासत है जिसका आकर्षण पूरी दुनिया में है। धर्म, संस्कृति, जीवनशैली, रिश्तों, प्रेम, कला-मनोरंजन का ऐसा अनूठा पैकेज अन्यत्र मिलना सर्वथा दुर्लभ है। वह सनातन भी है और अधुनातन भी। यह समय के साथ लगातार नया होता गया है। हर वर्तमान में वह जीवंत है।

आसान नहीं था राज बनाए रखना
कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? बहुत से दर्शक इसी सवाल का जवाब पाने के लिए फिल्म के दूसरे भाग की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे थे। निर्देशक को डर था कि अगर यह बात पहले उजागर हो गई तो फिल्म को काफी नुकसान हो सकता है। इसलिए फिल्म रिलीज होने तक इस राज को छुपाए रखने के लिए यह दृश्य फिल्माते समय निर्माता-निर्देशक ने बहुत गोपनीयता रखी। शूटिंग के दौरान क्योंकि पहले कुछ सूचनाएं मीडिया में लीक हो चुकी थीं जिस कारण ऐसा किया गया। शूटिंग से पहले शूटिंग टीम के लगभग डेढ़ सौ लोगों को गोपनीयता की शपथ दिलाई गई। इसके अलावा उन सभी से एक लिखित बांड भी भरवाया गया। बांड में यह स्पष्ट उल्लेख था कि अगर टीम का कोई व्यक्ति इस दृश्य से जुड़ी कोई बात लीक करेगा तो उसे आर्थिक जुर्माना और सजा दोनों हो सकती हंै। कई दिन तक तो शूटिंग के दौरान सभी लोगों के मोबाइल फोन तक बंद रखवाए गए थे।

शायद बाहुबली नहीं मरता
जब बाहुबली की शुरुआती पटकथा लिखी जा रही थी तो उसमें कटप्पा के हाथों बाहुबली को मारने की योजना नहीं थी, बल्कि इस दृश्य की जगह कहानी कुछ और ही थी। लेकिन कहानी में थोड़ी नाटकीयता लाने की गरज से इस दृश्य को जोड़ा गया, वह भी सबसे आखिर में। कटप्पा का बाहुबली को मारने वाला दृश्य कागज और थर्माेकोल की मदद से फिल्माया गया था।

दो मिनट के लिए सौ दिन खर्च
बाहुबली 2 का सबसे मुश्किल दृश्य दो ही मिनट का था लेकिन उसे फिल्माने में लगे पूरे सौ दिन। वह था आखिरी लड़ाई का दृश्य। क्लाइमेक्स में युद्ध का फिल्मांकन काफी महंगा रहा। वीएफएक्स और तकनीकी को ही लें तो इसी पर करीब 90 करोड़ रुपये खर्च हुए। सेट बनाने और कला संयोजन पर करीब 68 करोड़ रु. का खर्च आया।
कल्पना में वास्तविकता का एहसास
एक काल्पनिक कथानक पर बनी फिल्म को दर्शकों के सामने इस तरह प्रस्तुत करना जैसे वह वास्तविकता में ही अपने आसपास ऐसा होते हुए देख रहा है, आसान काम नहीं था। इसके लिए पहले एक विशेष वीआर सुपर कैमरा बनाया गया। फिर उससे पूरी फिल्म शूट हुई। अन्य तकनीकी सुविधाएं तैयार करने में एक वर्ष का समय लगा।
जैसा देश, वैसी भाषा
दुनियाभर में जोरदार कामयाबी की नींव पहले ही रख ली गई थी। तेलुगू, तमिल, हिंदी, मलयाली भाषाओं के अलावा फिल्म अंग्रेजी में भी प्रस्तुत की गई। लेकिन दुनिया के अन्य देशों में अच्छे कारोबारी नतीजे लाने के लिए फिल्म को अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषाओं में भी प्रदर्शित किया गया, जैसे जर्मनी, फ्रांस, चीन, जापान आदि देशों में बाहुबली 2 उन देशों की भाषा में भी डब की गई।
आगे बढ़ाई गई प्रदर्शन की तारीख
पहले बाहुबली 2 फिल्म 28 अप्रैल को नहीं बल्कि 14 अप्रैल को रिलीज होनी थी। लेकिन विदेश में फिल्म के कारोबार पर असर पड़ने का खतरा था। अप्रैल के पहले हफ्ते में हॉलीवुड की एक्शन एडवेंचर फिल्म ‘फ ास्ट एंड फ्यूरियस 8’ रिलीज होने जा रही थी जिसमें विन डीजल और वेन जॉनसन जैसे कलाकार हैं। इतनी बड़ी फिल्म से विदेशी बाजार में बेवजह टक्कर लेना कोई अक्लमंदी का सौदा नहीं था इसलिए बाहुबली 2 को 28 अप्रैल को रिलीज किया गया ताकि विदेश में फिल्म ज्यादा से ज्यादा कारोबार कर सके।

पैसों की कमी से जूझी बाहुबली 2
निर्माता के लिए सबसे मुश्किल काम था फिल्म के लिए धन का प्रबंध। बड़ी और खर्चीली फिल्मों में ऐसा अक्सर होता है। खासकर तब जब खर्च पहले ही आपके अनुमान से अधिक हो चुका हो। बाहुबली के पहले और दूसरे भाग को मिलाकर करीब साढ़े चार सौ करोड़ रुपए की लागत आई है। बाहुबली 2 की ही लागत करीब ढाई सौ करोड़ रुपए है। तो शूटिंग के दौरान निर्माता के पैसे खत्म हो गए थे। अब क्या किया जाए? बाजार में कोई आसानी से पैसा देने को तैयार नहीं हो रहा था क्योंकि फिल्म पर पहले ही बहुत खर्च हो चुका था। निर्माता को एक समय तो ऐसा भी लगने लगा था कि कहीं पैसों की कमी के कारण फिल्म की शूटिंग बंद ही न करनी पड़े। लेकिन उनको यह भी पता था कि इस फिल्म को बंद करने का विकल्प उनके पास नहीं है। निर्माता शोबु यरलागड्डा के शब्दों में, ‘हमें रामोजी फिल्म सिटी और दूसरे कुछ फाइनेंसर ने पैसा दिया जिससे हम बाहुबली 2 पूरी कर दर्शकों के सामने ला सके।’ खैर… अंत भला तो सब भला। आज दुनिया जमकर धनवर्षा कर रही है बाहुबली पर।

हालांकि फिल्म के कहानीकार के.वी. विजयेन्द्र प्रसाद ने साफ कहा है कि फिल्म पूरी तरह से फिक्शन यानी कल्पना पर आधारित फिल्म है। पर उस कल्पना का कोई तो आधार होगा? वह बताते हैं, ‘‘मैंने बाहुबली को महाभारत के कृष्ण से प्रभावित होकर लिखा है।’’ अब जरा बाहुबली-2 के कुछ पात्रों के चरित्र पर एक नजर डालें। जरा गौर से देखें तो फिल्म में बिज्जलदेव के चरित्र में आपको महाभारत के मामा शकुनि की झलक साफ मिलेगी। भल्लालदेव हू-ब-हू दुर्याेधन जैसा लगेगा। दुर्याेधन में भी शूरवीर योद्धा के सारे गुण थे। उसी तरह भल्लालदेव भी है। उसे लगता है कि उसके साथ कुछ गलत हुआ है और उसके भीतर किसी भी तरह से साम्राज्य हासिल करने की भूख है। महेंद्र बाहुबली कुछ-कुछ कृष्ण की तरह है तो कहीं कहीं राम के चरित्र की झलक भी दिखती है। अब बारी आती है कटप्पा की। कटप्पा का चरित्र देखने से साफ है कि वह नौकरी की खातिर नहीं, पारिवारिक वफादारी निभाने को नहीं, बल्कि समर्पण भाव से माहिष्मति राज्य की सेवा कर रहा है…हनुमान की तरह। इससे चरित्रों का अभिप्रेरित होना स्वाभाविक भी है क्योंकि रामायण और महाभारत भारतीयों के रोम-रोम में बसे हैं। जीवन और वर्तन में हैं। इसी शुद्ध भारतीयता की सुगंधि में बंधा पूरा विश्व आज बाहुबली 2 पर मुग्ध है। भारतीयता की सुवास इतने मनोरंजन के साथ पहुंचाई गई है कि उसे अब तक की सबसे बड़ी हिट भारतीय फिल्म का दर्जा मिलना तय है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक इसने करीब 800 करोड़ का कारोबार तो कर ही लिया है, महज सात दिन में। लेकिन भविष्य का तो अनुमान ही लगाया जा सकता है। अंतिम आंकड़े कुछ समय बाद ही पता चलेंगे।
कुछ समय पहले पाञ्चजन्य से बातचीत में आध्यात्मिक गुरु पवन सिन्हा ने कहा था, ‘‘कृष्ण का महाभारत में योगेश्वर स्वरूप सामने आता है और उनका एक ही संदेश है-राष्टÑ सर्वाेपरि, धर्म सर्वाेपरि। देखा जाए तो बाहुबली का पूरा विषय इसी पर केंद्रित लगता है। हां, भारत की सनातन परंपरा में धर्म पूजा पद्धति या संप्रदाय से जुड़ा नहीं है बल्कि वह मनुष्य को और बेहतर व कुशल बनाने की प्रक्रिया का विज्ञान है। आज के दौर में पांच सौ से दो हजार लोग केवल सेट बनाने और उसे इधर से उधर करने में रोज जुटाये जाएं, यह आसान काम नहीं है। राजमौलि कहते हैं, ‘‘चूंकि कहानी वजनदार थी इसलिए हमें सेट भी भव्य चाहिए थे। फिर अधिक लोगों की जरूरत तो पड़नी ही थी।’’ और क्या जीवंत माहिष्मति बनाया है उन्होंने। एक-एक चीज असली की तरह बोलती, तो नकली चीजों से असली जैसा एहसास दिलाने के लिए उपकरण और तकनीक भी नवीनतम लगाई गई। भयावहता है तो वह समग्रता से है। जहां आकर्षण है वह भी संपूर्णता से है। पात्र अभिनय करते नहीं, बल्कि अपने किरदार को जीते दिखते हैं। प्रभास बाहुबली ही लगे हैं और राजमाता बिल्कुल राजमाता। ऐसे ही अन्य प्रमुख व अन्य पात्र भी। राजमौलि कहते हैं, ‘सांड से लेकर फिल्म में दिखने वाले सभी जानवर मशीनी हैं। इसके अलावा तरह-तरह के चेहरे बनाने में भी टीम को खासा परिश्रम करना पड़ा।’ पर्वत की ऊंचाई से गिरता जलप्रपात दर्शकों को हतप्रभ करता है।
फिल्म की सफलता के बाद सहृदयता आप फिल्म के पात्रों में ही नहीं, फिल्म बनाने वालों के वास्तविक जीवन में भी देख सकते हैं। फिल्म देखने के बाद सुपरस्टार रजनीकांत ट्वीट करते हैं, ‘‘बाहुबली 2 भारतीय सिनेमा का गौरव है।’’ राजमौलि को ईश्वर की संतान बताते हुए वह कहते हैं, ‘‘मैं उन्हें सलाम करता हूं।’’ रजनीकांत की प्रतिक्रिया से राजमौलि फूले नहीं समाते और तुरंत जवाबी ट्वीट करते हैं, ‘‘थलइवा, मुझे ऐसा लग रहा है जैसे भगवान ने स्वयं मुझे आशीर्वाद दिया है। आपकी प्रतिक्रिया से बढ़कर हमारे लिए कुछ भी नहीं है। हमारी पूरी टीम का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच गया है।’’ यह एक बानगी है जहां बड़ा छोटे को आशीर्वाद देता है तो छोटा उसको श्रेष्ठ मानकर उसका वैसा ही सम्मान करता है।
संक्षेप में कहें तो भारतीय सिने इतिहास में बाहुबली-2 देश का गौरव है जो वृहद् स्तर पर विश्व को वास्तविक भारतीय सभ्यता, संस्कृति, जीवन और दर्शन से दुनिया को परिचित करवाती है। यह अपने कथ्य, प्रस्तुतिकरण और भव्यता से अंतरराष्टÑीय मानकों को छूने का सपना सच करके दिखाती है। देश विदेश में समीक्षकों से लेकर नेताओं, फिल्म-साहित्य-कला से जुड़ी तमाम हस्तियों ने इस फिल्म की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।  

‘‘6 साल का था तब श्रीकृष्ण की कहानी पढ़कर खो सा गया था’’
एस.एस. राजमौलि। पूरा नाम कोडुरी श्रीसैला श्रीराजमौलि। जन्म 10 अक्तूबर, 1973. पटकथा लेखक और निर्देशक। तेलुगू फिल्म उद्योग में कोटागिरा वेंकेटश्वर राव के सहायक के रूप में कॅरियर शुरू किया। राजमौलि ने ज्यादातर तेलुगू फिल्मों का ही निर्देशन किया। मगधीरा (2009), ईगा (2012), बाहुबली : द बिगनिंग (2015) और बाहुबली : द कनक्लूजन (2017)। मगधीरा और ईगा के बाद राजमौलि ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मगाधीरा को तो देश में बहुत सफलता मिली। ‘बाहुबली : द बिगनिंग’ बनाकर 43 साल के राजमौलि ने 2015 में ही यह साबित कर दिया था कि वे केवल दक्षिण भारतीय फिल्मों के ही निर्देशक नहीं हैं बल्कि ऐसी फिल्म बना सकते हैं जिसके पीछे पूरा देश एक हो सकता है। बाहुबली 2 तेलुगू, तमिल, मलयालम और हिंदी भाषा में एक साथ प्रस्तुत की गई। यह भारतीय फिल्म उद्योग की सबसे महंगी फिल्म होने के साथ ही सबसे ज्यादा कमाई का नया कीर्तिमान रचने जा रही है।
राजमौलि के बारे में कुछ बातें खास हैं। जैसे बचपन में स्कूली किताबें उन्हें मजबूरी में पढ़नी पड़ती थीं। मन लगाकर तो वह अमरचित्र कथा और फैंटम ही पढ़ते थे। शायद उसी का प्रभाव रहा कि उन्हें सुपरहीरो जैसी फिल्में ज्यादा पसंद हैं। कृष्ण का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव है, जिनकी कहानी उन्होंने छह साल की उम्र में पढ़ी थी।
  बाहुबली-2 के बारे में क्या कहेंगे?
बाहुबली-2 मेरे करियर की सबसे संतोषजनक फिल्म है। पहले मेरी फिल्में हीरो केंद्रित होती थीं। लेकिन बाहुबली में मैंने एक साथ 7 मजबूत किरदारों को स्क्रीन पर पर्याप्त जगह दी है। हर फिल्म मेरे लिए पहली फिल्म होती है। और बाहुबली कोई सुपरहीरो वाली फिल्म नहीं है, यह एक कालखण्ड की फिल्म है। इसमें राजा, रानी हैं, योद्धा हैं, दर्शकों के लिए भावनात्मक दृश्य हैं। यह पूरी तरह से एक काल्पनिक पर ताजा कहानी है।

 बाहुबली में राजमाता शिवगामी नवजात महेंद्र बाहुबली की जान बचाने के लिए उन्हें तूफानी रात में बाढ़ से उफनती नदी में ऊपर उठाकर ले जाती हैं? इसकी प्रेरणा कहां से मिली?
मेरी कहानी वासुदेव अपने सिर पर भगवान श्रीकृष्ण को लेकर चलते हैं नदी में… वहीं से प्रेरित है। बचपन से ही लगता था कि यदि यह परदे पर सही ढंग से फिल्माई जाए तो लोगों को मंत्रमुग्ध कर सकती है। कक्षा एक में रहा होऊंगा तभी से पिताजी ने अमर चित्रकथा और फैंटम कामिक्स पढ़ने को दीं। छह साल की उम्र में मैंने भगवान श्रीकृष्ण की कहानी पढ़ी थी और जैसे उसी में खो गया था। एकदम मंत्रमुग्ध। अभी भी मेरी अलमारी में आपको कॉमिक्स मिल जाएंगी। फैंटम की कहानी परदे पर उतारने की मेरी ख्वाहिश कभी नहीं रही। हां, जब श्रीकृष्ण की कहानी पढ़ता था तो लगता कि जनता भी उनको बहुत पसंद करती है। सच कहूं तो स्कूली किताबें मैंने मजबूरी में पढ़ीं और कॉमिक्स दिल से। कॉमिक्स की आज भी मेरे मन पर गहरी छाप है। उस समय तो कॉमिक्स पर आर्ट वर्क भी गजब का होता था। श्रीकृष्ण की कहानी तो बहुत की रोमांचक और    रंगीन है।

बाहुबली : द बिगनिंग, मगाधीरा और ईगा के लिए आपको खूब पुरस्कार मिले हैं। उनके बारे में बताएं।
हां, लेकिन मैं पुरस्कार लेने के लिए काम नहीं करता। मैं सिर्फ एक अच्छी कहानी बनाने की कोशिश करता हूं। मेरी फिल्में दर्शकों के लिए हैं। मेरे लिए तो यही पुरस्कार है कि दर्शक मेरी फिल्मों को पसंद करते हैं। कहानी ही मेरी फिल्म की रीढ़ होती है। इसलिए कहानी पर मैं खूब मेहनत करता हूं। जी-जान लगा देता हूं। कहानी का आधार ऐसा हो जो देखने-सुनने वाले के दिल से जुड़ जाए। मैं ऐसा मानता हूं और मेरी जो कुछ भी क्षमता है उसके हिसाब से मैं यही करने की कोशिश कर रहा हूं।

टेक्नोलॉजी का प्रयोग लोगों को कितना प्रभावित करती है?
फिल्म के साथ लोगों का भावनात्मक जुड़ाव होना चाहिए। वह है तो फिल्म कामयाब है। जहां तक टेक्नोलॉजी की बात है तो वह सिर्फ एक कहानी को अच्छे ढंग से पेश करने का जरिया भर है। इससे ज्यादा इसकी अहमियत नहीं है। बाहुबली में भी यही है। इसकी कहानी लोगों को पसंद आ रही है।

 बाहुबली में तमाम ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने पहले इस क्षेत्र में खास कामयाबी नहीं पाई। आप कलाकारों का चुनाव कैसे करते हैं?
मैं कहानी के किरदार के हिसाब से देखता हूं। मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कलाकार की पिछली फिल्म कैसी थी या कलाकार का ‘ट्रैक रिकार्ड’ कैसा है।

आपकी फिल्मों में पुनर्जन्म खूब होता है। बाहुबली में भी है। कोई खास वजह?
सच यह है कि मैं पुनर्जन्म में विश्वास नहीं रखता। लेकिन इसके माध्यम से अपने भीतर के ड्रामा और एक्शन को कहानी में पिरोकर बेहतर तरीके से पेश कर सकता हूं। पुनर्जन्म महाभारत में भी है और रामायण में भी। मैं समझता हूं कि ऐसी कहानी देखने से लोगों में रोमांच पैदा होता है। बस इसीलिए मुझे पुनर्जन्म पर कहानियां बनाना अच्छा लगता है। इसमें सारे के सारे चरित्र या किरदार सुपरहीरो जैसे हो जाते हैं। जैसा कि हम कहते हैं न-लार्जर दैन लाइफ।
              प्रस्तुति : अ. वि.

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