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भारत सरकार भिक्षावृत्ति की परंपरा का त्याग करे

Written byArchiveArchive
Apr 24, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 24 Apr 2017 14:25:23

पाञ्चजन्य
वर्ष: 13  अंक: 46
30 मई ,1960
इतिहास के पन्नों से

-पं. दीनदयाल उपाध्याय-
आज खाद्यान्न का अभाव भारतीय जनता और सरकार के लिए सिर-दर्द बन गया है। ऐसी परिस्थिति में संयुक्त राज्य अमेरिका की लोक-विधि 480 के अंतर्गत 607 करोड़ रुपए के गेहूं का कर्ज भारत को प्राप्त होने का स्पष्ट अर्थ है भारत की सामान्य जनता का अमेरिका के प्रति कृतज्ञता की अनुभूति।
श्री एस.के. पाटिल को नियमत:  इस बात का गर्व हो सकता है कि उन्होंने समय पर अपूर्व सहायता प्रदान की। अमेरिका ने इस समझौते को कितना महत्व दिया है, यह तो इसी से स्पष्ट है कि राष्ट्रपति आइसनहावर ने स्वयं अमेरिकी सरकार की ओर से समझौते पर हस्ताक्षर किया, जबकि इस अवसर पर भारतीय पक्ष से केवल खाद्य एवं कृषि मंत्री श्री पाटिल ही उपस्थित थे।
लद्दाख और नेफा क्षेत्र में चीनी आक्रमण के कारण जहां भारत के लोग धीरे-धीरे अमेरिका के प्रति अपना अनिच्छा भाव त्याग रहे हैं वहीं, पर यह खाद्यान्न समझौता भी एक कुशल राजनीतिक कार्य ही समझा जाएगा क्योंकि इससे अमेरिका को भारत में अनेक मित्र बनाने की सुविधा मिलेगी। यही कारण है कि भारत में अमेरिकी राजदूत श्री एल्सवर्थ बन्कर ने अनेक बार यह घोषणा की कि भारत-अमेरिकी मैत्री बहुत आगे बढ़ चुकी है।
अमेरिकी राजदूत ने इस बात को भी गुप्त नहीं रखा कि उनकी सरकार का यह निर्णय राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित था। वह यह भी अनुभव करते हैं कि ंअमेरिका की लोकविधि 480 के द्वारा  भारत की आंतरिक आर्थिक अवस्था दृढ़ होगी जिससे इसके राजनीतिक जीवन में स्थायित्व उत्पन्न होगा और भविष्य में वह प्रगति कर सकेगा।
लोक विधि 480 क्या है
यह अनुमान लगाना गलत होगा कि अमेरिका द्वारा दी गई सहायता केवल 'दातव्य' वस्तु है अथवा कोई नीति से संबंधित है और इससे अमेरिका को कोई आर्थिक लाभ नहीं होगा। वस्तुत: यह विधि (480) 1954 में अमेरिकी कांग्रेस द्वारा इस निमित्त कार्यान्वित की गई थी जिससे अमेरिकी कृषि का विकास और स्थायित्व बढ़े, साथ ही साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार में कृषि संबंधी उपयोगी वस्तुओं का व्याप बढ़े।
31 दिसम्बर, 1959 तक 1,978 करोड़ रु. लागत की कृषि विषयक उपयोगी सामग्रियां 38 विभिन्न देशों को बेची गईं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि उक्त समझौता दोनों देशों के लिए आर्थिक दृष्टि से लाभकर है। विभिन्न दल इसके साथ चाहे जिस प्रकार का राजनीतिक लक्ष्य जोड़ें किंतु हमें तो इसे यथार्थवादी दृष्टिकोण से देखना है। यदि इस समझौते से हमारी चरम आवश्यकता ठीक समय से पूर्ण हो रही है तो अमेरिका को भी अपनी अधिशेष कृषि संबंधी सामग्री के लिए आगामी वर्षों में एक अच्छा विपणि (मार्केट) मिल रहा है।

—हमारी जम्मू-कश्मीर की चिट्ठी—
बख्शी खां ने शेख अब्दुल्ला की भाषा बोलना प्रारंभ कर दिया
—नेशनल कांफ्रेंस का पक्षपात-विरोधियों की आलोचना-मूख्यमंत्री का दौरा-सराकरी पैसे से पार्टी का प्रचार-जम्मू— प्रजापरिषद् के कार्यकर्ताओं को धमकी-'संगर' जी का मुंह तोड़ उत्तर-श्री डोगरा की जन्मभूमि में-मुख्यमंत्री की सभा से जनता गायब?

कश्मीर के मुख्यमंत्री बख्शी गुलाम मुहम्मद के हाल के भाषणों की आलोचना करते हुए जम्मू-कश्मीर प्रजा-परिषद् के महामंत्री श्री ऋषिकुमार कौशल ने कहा कि श्री बख्शी के भाषणों की भाषा से हमें पुरानी बातें स्मरण आ रही हैं। यह भाषा शेख अब्ब्दुल्ला की भाषा के समान ही है जिसे वे 1953 में अपने अध:पतन के पहले बोला करते थे।
यहां नेशनल कांफ्रेंस के कार्यकर्ता सामाजिक एकता को छिन्न-विछिन्न करने का प्रयास कर रहे हैं। परंतु हमारे मुख्यमंत्री महोदय उनके प्रति उदार हैं। जो लोग उक्त कार्यकर्ताओं के शिकार हैं उन्हीं की आलोचना श्री बख्शी साहब भी करते हैं। अत: राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए यदि बख्शी साहब की इस भाषा को देश के विचारक नेताओं ने समझने का प्रयास नहीं किया तो परिणाम बुरा ही होगा।
पिछले दिनों मुख्यमंत्री बख्शी गुलाम मुहम्मद ने राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के प्राय: सभी प्रमुखों के साथ जम्मू और कठुआ जिले के अधिकांश भागों का दौरा किया। उनके साथ पुलिस के अधिकारी और अन्य उच्चाधिकारी भी थे, जिनकी संख्या लगभग 75 थी।
नेशनल कांफ्रेंस के दर्जन के लगभग कार्यकर्ता भी इस दौरे में सम्मिलित रहे। यद्यपि यह दौरा पूर्णत: सरकारी था और इसका सारा प्रबंध भी सरकारी कर्मचारियों के द्वारा ही किया जाता था, तथापि मुख्यमंत्री ने इस दौरान सभी भाषण नेशनल कांफ्रेंस के मंच से दिया। जनता की उपस्थिति प्राय: सब स्थानों पर अत्यंत थी। पंडित प्रेमनाथ डोगरा के जन्म स्थान इस्मायल पुर के भाषण में तो मुश्किल से 10 लोग उपस्थित थे। इसके अतिरिक्त कुछ स्कूली बच्चे भी थे जो साज सजावट से आकर्षित होकर आ जगे थे। मुख्यमंत्री के स्वागतार्थ लोगों को एकत्रीकरण में अधिकारी वर्ग पूर्णत: विफल रहे।
सस्ती ख्याति के अर्जन के लिए प्रत्येक स्थान पर नेशनल कांफ्रेंस के नाम पर कार्यकर्ताओं द्वारा कुएं खुदवाने और स्कूल बनवाने की मांग रखी गई और मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में उसे स्वीकार किया। उन्होंने पुराने 'महाराजाओं' और नवाबों तथा अन्य लोगों के लिए भी अनुदान दिया। सार्वजनिक भाषणों में मुख्यमंत्री ने खुलकर विरोधी दलों की आलोचना की और नेशनल कांफ्रेंस को शक्तिशाली बनाने का आह्वान किया।

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