''भारत की विजय गाथा बताने का समय''
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''भारत की विजय गाथा बताने का समय''

Written byArchiveArchive
Mar 6, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 06 Mar 2017 13:29:05

 

'वे दिन गए जब मुख्य धारा में वामपंथी और देशद्रोही लोगों का दखल था  और उनका हम विरोध करते थे। मुख्य धारा में अब राष्ट्रभक्त बैठे हैं। इसलिए अब हमें अपनी विजय गाथा लोगों के सामने रखनी है।' यह कहना है भारतीय शिक्षण मंडल के अखिल भारतीय संगठन मंत्री मुकुल कानिटकर का। पाञ्चजन्य संवाददाता अश्वनी मिश्र ने उनसे भारत बोध सम्मेलन की संकल्पना,उद्देश्य एवं शिक्षा व्यवस्था से जुड़े अनेक प्रश्नों पर बातचीत की। प्रस्तुत हैं वार्ता के प्रमुख अंश:-

भारत बोध कार्यक्रम की संकल्पना के बारे में बताएं?
भारत बोध कार्यक्रम भारतीय शिक्षण मंडल की प्रेरणा से हुआ। वास्तविकता में विषय यह है कि किसी भी राष्ट्र की जो राष्ट्रीयता होती है, वही बाकी सारी बातों को प्रभावित करती है। राष्ट्रीयता पर विचार करते समय केवल भावनाओं को ध्यान में रखकर नहीं चला जा सकता। क्योंकि किसी भी देश में वैचारिक स्तर पर, खासकर शैक्षिक स्तर पर जो विद्वान हैं, राष्ट्र को परिभाषित करने का काम उनका होता है। लेकिन पिछले 200 वर्षों में भारत में मुख्यधारा में ऐसा नहीं हुआ  बल्कि इसके उलट ही विरोध हुआ है। इसलिए हमने यह विषय लिया कि हम केवल राष्ट्रवाद की बात न करें, बल्कि अकादमिक रूप से उस पर काम करें। शोध कार्य के साथ इसे प्रस्तुत करने के लिए इस सम्मेलन का आयोजन किया गया। खुशी इस बात की है कि बड़ा अच्छा प्रतिसाद मिला है। उद्घाटन सत्र में राष्ट्रपति महोदय ने भी इस विषय को जिस सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और मौलिकता  के भाव के साथ रखा, उससे यह बात पता चलती है कि बोध तो सबके मन में है ही, केवल जगाने की बात है।

आधुनिक शिक्षा में भारत के गौरव को विस्मृत ही किया गया। समय-समय पर इसके गलत परिणाम भी नजर आए। भारतीय शिक्षण मंडल की ओर से इस दिशा में क्या प्रयास किए जा रहे हैं?
भारतीय शिक्षण मंडल का जन्म ही इस काम के लिए हुआ कि शिक्षा का भारतीयकरण हो। इसको 4 स्तरों पर करने की आवश्यकता है। सबसे पहले कि आज शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य ही अभारतीय हो गया है। जब तक राष्ट्र निर्माण, मनुष्य निर्माण परिपूर्ण सामूहिक शिक्षा का उद्देश्य पूर्ण नहीं होता, तब तक बाकी शिक्षा व्यवस्था ठीक नहीं हो सकती। जब उद्देश्य भारतीय हो जाएगा तो उसकी नीति भी भारतीय होनी चाहिए। जब हम नीति में भारतीयता की बात कहते हैं तो सारे बिन्दु आते हैं- स्वायत्तता, जिसका एक बहुत बड़ा मुदद है। दूसरा, विकेंद्रीकरण होना चाहिए, क्योंकि केन्द्रीयकृत नीति नहीं हो सकती। तीसरा काम है पाठ्यक्रम। आज पूरा का पूरा पाठ्यक्रम अभारतीय है। इस पर ज्यादा जोर देने की आवश्यकता है। चौथी बात है पद्धति की, क्योंकि इसमें भी भारतीयता का भाव लाने की जरूरत है। भारत की पद्धति अनुभव केंद्रित ज्ञान की पद्धति थी, इसलिए वह आनंददायी थी। आज न अनुभव है, न ज्ञान है और न आनंद। मैंने जैसा बताया वह बदल सकता है, क्योंकि यह शिक्षक के हाथ में है। इसलिए हमने शिक्षकों को तैयार करना शुरू कर दिया है। हमारा मानना है कि पद्धति बदलने से काफी बदलाव आ जाएगा।

आज भी विभिन्न राज्यों में  विद्यालय स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक विकृत इतिहास पढ़ाया जाता है। क्या समग्र रूप से इसकी समीक्षा की आवश्यकता है?
केवल इतिहास की बात नहीं है। मूल बात यह है कि अपना इतिहास पढ़ाया ही नहीं जाता। हम देश पर राज करने वाले विदेशियों का लिखा इतिहास पढ़ा रहे हैं। इसलिए इतिहास दृष्टि की तो आमूलचूल समीक्षा करने की आवश्यकता है। दूसरा, भाषा के विषय हैं, उनमें कविताएं कौन-सी पढ़ाई जाएंगी? अंग्रेजी में कौन-सी कविताएं बच्चे पढ़ेंगे? क्योंकि 'रेन-रेन गो अवे' जैसी कविता का यहां क्या स्थान है? राजस्थान में 'रेन-रेन गो अवे' पढ़ाने का क्या मतलब है? वर्षा उनको नहीं चाहिए जिन्होंने यह कविता लिखी, लेकिन हमको तो वर्षा चाहिए। अब भूगोल की बात करें तो सीबीएसई में हम छात्रों को मिसिसिपी, अमेजन पढ़ा रहे हैं, लेकिन घर के पास की नदी के बारे में उसे जानकारी नहीं है। शिक्षा शास्त्र के तीन महत्वपूर्ण नियम हैं। पहले निकट का पढ़ाओ, फिर दूर ले जाओ। ज्ञात से अज्ञात की ओर ले जाओ। सरल से कठिन की ओर ले जाओ। पर आज तीनों का पालन नहीं हो रहा है। इसलिए केवल इतिहास नहीं, स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर पाठ्यक्रम के सभी विषयों की समीक्षा की जानी चाहिए।

नई शिक्षा नीति के निर्माण में शिक्षण मंडल महत्वपूर्ण भूमिका में नजर आता दिखता है। इस नीति के अन्तर्गत क्या भारतीय संस्कृति, परंपरा, इतिहास और महापुरुषों के प्रेरणास्पद जीवन चरित्रों को स्थान मिलेगा?

देखिए, ऐसी अपेक्षा तो कर रहे हैं। हमारे कार्य की सोच और दृष्टि जिस तरह की है तथा सरकार के रुख को देखते हुए लगता है कि नई शिक्षा नीति में राष्ट्र की धरोहर, राष्ट्र की सांस्कृत्किा जड़ों को पोषित करने वाली शिक्षा होगी जो भविष्य के भारत की नींव रखेगी। यह केवल राजनीति की बात नहीं है। हमें यह समझना चाहिए कि पिछले कुछ वर्षों से इस देश का मानस बदल रहा है। राष्ट्र को सांस्कृतिक धारा में नई ऊर्जा आती दिखी।  पहले पराभव की ही बात होती थी। 11 मई, 1998 को पोकरण विस्फोट हुआ तब विज्ञान, तकनीक और प्रतिरक्षा स्तर पर भारत का आत्मविश्वास जागा कि हमने इतना बड़ा काम कर दिया और अमेरिका को पता तक नहीं चला। उसी दिन रात को सी.आई.ए. के प्रमुख को हटना पड़ा था, जो बहुत बड़ी बात थी। उसकी परिणित हुई 21 जून, 2015 को जब अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस पर दुनिया के 193 देशों ने सूर्य नमस्कार किया। तो पूरे देश में एक परिवर्तन हो रहा है। और वह शिक्षा व्यवस्था में परिलक्षित होना चाहिए। नई शिक्षा नीति में ये आकांक्षाएं आनी चाहिए। 15 साल पहले इंजीनियरिंग का विद्यार्थी यह समझता था कि उच्चतर शोध या ऊंची पढ़ाई केवल विदेश में हो सकती हंै पर अब आप किसी निजी कॉलेज के इंजीनियरिंग छात्र से पूछें तो वह कहता है कि जो दुनिया में हो सकता है, वह भारत में हो सकता है। यह चमत्कार मन के परिवर्तन से हुआ।
ल्ल वामपंथी इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को पिछली सरकारों के इशारों पर तोड़ने-मरोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आगे ऐसा न हो,इसके लिए क्या प्रयास होने चाहिए?
वास्तविकता में हमको अपनी पूरी मानसिकता बदलनी पडे़गी। अब वे दिन गए जब मुख्यधारा में वामपंथी और देशद्रोही लोग बैठे थे और हम उनका विरोध कर रहे थे। अब हम मुख्यधारा में बैठे हुए हैं और वे विरोध करेंगे। अब हमें अपना काम करना है। इसलिए षड्यंत्रों की बात पर विचार भी नहीं करना चाहिए। हमें अपनी विजय गाथा लोगों के सामने रखनी है। आप राणा प्रताप की बात करें जो मुगल शासकों के चहेते होंगे वे विरोध करेंगे।  वामपंथी सारी दुनिया में काल के गाल में समा रहे है। रूस से चले गए, चीन में वामपंथ नाम की चीज नहीं रही, भारत में बंगाल से गए, केरल में कहने के लिए बचे हैं। जेएनयू में 20-22 या 25 बचे हैं, उनका दुर्लक्ष्य कर देंगे तो मीडिया उनको दिखाना बंद कर देगा तो वैसे ही ओझल हो जाएंगे।
    प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के विकास के लिए शिक्षण मंडल के पास क्या दिशा है?
देखिए, शिक्षण मंडल के पास दो-तीन महत्वपूर्ण बिन्दु हैं जिसे करना जरूरी है। पहली बात, शिक्षा व्यवस्था की धुरी शिक्षक होता है। यह राष्ट्र विश्व गुरु तब बना था जब इस देश में गुरु सबसे वंदनीय था और उसे गोविंद से भी ज्यादा महत्व दिया जाता था। आज किसी नीति-रीति के कारण दुर्दशा नहीं हुई, दुर्दशा शिक्षकों के सम्मान न होने के कारण हुई। समाज में शिक्षकों को उचित सम्मान मिलना चाहिए। आज शिक्षक भाव लेकर पढ़ाता है। शिक्षण मंडल की पहली योजना है कि शिक्षक स्वाभिमानी हो और समाज उसका आदर करे। सरकार को चाहिए कि वह शिक्षा में से प्रशासन को हटा दे। शिक्षा अफसरशाही मुक्त हो। एक शिक्षक प्रधान सचिव क्यों नहीं बन सकता? आप ये कर दो तो पूरी शिक्षा व्यवस्था बदल जाएगी। दूसरा काम यह हो सकता है कि चुनाव आयोग की तरह एक स्वायत्त शिक्षा आयोग बने- शिक्षा संचालन आयोग। जो आदेश या सुझाव न दे। इसमें शिक्षाविदों को रखा जाए जिनके हाथ में पूरी शिक्षा व्यवस्था हो। न कोई राजनीतिक हस्तक्षेप हो और न अफसरशाही। फिर देखिए पांच साल मंे भारत फिर से विश्व गुरु के पद पर आसीन हो सकता है।
भारत के अनेक विश्वविद्यालयों में जो शोध होते हैं, उनमें से अधिकतर का केन्द्र बिन्दु पश्चिम ही होता है। इस पद्धति को बदलने के लिए क्या करने की आवश्यकता है?
भारतीय शिक्षण मंडल ने चार साल पहले 'पुनरोत्थान के लिए अनुसंधान' नाम से एक विशाल अभियान छेड़ा था। हमने विश्वविद्यालयों के पीएचडी गाइड से बात कर मार्गदर्शकों के साथ कार्यशालाएं लेनी शुरू कीं। इस दौरान उनसे शोध का उद्देश्य, पद्धति और प्रस्तुति के बारे में पूछा। चौथी महत्वपूर्ण बात जिस पर हमने चर्चा शुरू की भारत में सालाना 18 हजार छात्र पीएचडी करते हैं, उनमें कितना शोध देश के काम का है? कितना शोध लोगों की समस्याओं को ठीक करने वाला है? इस पर चर्चा शुरू की और अच्छा प्रतिसाद मिला। 

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