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कला के आयाम मानव जीवन पर तेजी से प्रभाव छोड़ते हैं जिससे सामाजिक सरोकारों में बदलाव आता है। युवाओं में राष्ट्र-भावना जगे और कला क्षेत्र में यह भाव झलके, इसी भावना को पोसने के उद्देश्य से जेएनयू परिसर में पिछले दिनों 'उड़ान उत्सव' का आयोजन हुआ
अश्वनी मिश्र
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के कन्वेंशन सेंटर सभागार-1 में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा एक एकांकी का मंचन किया जा रहा था जो नाटक कश्मीर के हिन्दुओं की पीड़ा पर केंद्रित था। कलाकार इसमें घाटी के उस स्वरूप को उकेर रहे थे, जिसके कारण हिन्दुओं को अपना घर-बार छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। उन्होंने कुछ ही समय में दर्शकों को उन सभी स्थितियों से रू-ब-रू कराया, जिन्हें देखकर दर्शक सोचने पर विवश हुए। एकांकी की समाप्ति इस सवाल के साथ हुई कि घाटी में पत्थरबाज गिरोह और अलगाववादियों की पीड़ा पर तो हो-हल्ला होता है लेकिन कश्मीर के हिन्दुओं के दर्द को अनदेखा क्यों किया जाता है? उनके अधिकारों की बात क्यों नहीं की जाती? दर्शकों ने एकांकी में शामिल सभी अभिनेता छात्रों का तालियां बजाकर अभिनंदन किया। इसके बाद बारी-बारी से कई नाटकों, जो सामाजिक कुरीतियों, मैकाले की शिक्षा पद्धति, मीडिया की एक पक्षीय भूमिका, लड़कियों की शिक्षा से जुड़े थे, दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किए गए।
इन नाटकों को देखकर मन में एक सवाल उठा कि क्या यह वही जेएनयू है जो वामपंथी गढ़ के रूप में जाना जाता रहा है? यहां तो कश्मीर के हिन्दुओं की बात तक करना किसी अपराध से कम नहीं होता था! देश की अखंडता और संप्रभुता को चुनौती देने वालों को यहां से प्रश्रय दिया जाता था। लेकिन उसी संस्थान में आज कश्मीर के हिन्दुओं की बात हो रही है, भारतीय संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, परंपरा, महिला अधिकारों की गूंज उठ रही है। यानी यहां की आवो-हवा बदली है। दरअसल ये समस्त दृश्य परिसर के कन्वेंशन सेंटर में पिछले दिनों (15-17 फरवरी) उड़ान उत्सव-2017 में दिखाई दिए। इस आयोजन में देश से 2,500 से ज्यादा छात्रों ने हिस्सा लिया, जो अलग-अलग विधाओं में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए यहां आए हुए थे। उड़ान के अध्यक्ष श्री अनुपम भटनागर ने बताया,''उत्सव में हमने आठ विधाओं के छात्रों को आमंत्रित किया था, जिसमें क्रमश:-एकांकी में 45 टीमों के 700 छात्र, फिल्म निर्माण के क्षेत्र से 67 कॉलेज, रचनात्मक लेखन में 600 युवा, फोटोग्राफी में 300 विद्यार्थी, पोस्टर बनाने में 247 छात्र-छात्राएं, मूर्ति बनाने में 105 युवा, भित्ति चित्र दीवार लेखन में 246 और व्यंग्य चित्र बनाने में 242 छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया।''
इस भव्य आयोजन के उद्घाटन सत्र में फिल्म जगत की कई प्रमुख हस्तियां उपस्थित थीं। इनमें प्रमुख अतिथि के रूप में अभिनेता मुकेश खन्ना, मनोज जोशी, लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी, फिल्म निर्माता-निर्देशक नील माधव पांडा, सुदीप्तो सेन, लेखिका अद्वैता काला और एएएफटी के अध्यक्ष संदीप मारवाह प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख श्री जे.नंद.कुमार, जेएनयू के कुलपति श्री एन.जगदीश कुमार एवं दिल्ली प्रांत के सह प्रचार प्रमुख श्री अरुण अरोड़ा की उपस्थिति रही। प्रमुख अतिथियों ने भारत माता की तस्वीर के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया जिसके बाद उड़ान उत्सव-2016 की झलकियां वीडियो प्रस्तुति के जरिए दिखाई गईं। कार्यक्रम में जिस प्रकार युवाओं का हुजूम उमड़ा और बार-बार भारत माता की जय की का उद्घोष हो रहा था, उसे देखकर लग रहा था कि भारत का युवा अब जाग रहा है और वह देश की अखंडता और संस्कृति से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करेगा। शायद उन सभी का इशारा परिसर में पिछले वर्ष हुई घटना की तरफ था।
समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित फिल्म अभिनेता और महाभारत सीरियल में भीष्म पितामह का किरदार निभाकर ख्याति पाने वाले मुकेश खन्ना ने कहा,''जहां उड़ान है, वहां शक्तिमान है। और जहां शाक्तिमान है, वहां उड़ान है। आज के दौर में वही सफल होगा जो उड़ान भरेगा। अगर हम योद्धा बनकर आगे नहीं बढ़ते तो हम अपने साथ न्याय नहीं करते। इसलिए आज देश को शक्तिमानों की आवश्यकता है और मेरा युवाओं से यही कहना है कि तुम शक्तिमान बनो।'' उन्होंने युवाओं को यह मंत्र दिया कि जीवन में भागने की जरूरत नहीं है। थोड़ा ठहरो, समझो और फिर आगे बढ़ो! लोकगायिका मालिनी अवस्थी ने भारत माता की जय के साथ अपना वक्तव्य शुरू किया। उन्होंने कहा,''भारत की संस्कृति महान् है। यहां आए हुए युवा इसी यज्ञ में आहुति डालने आए हैं।''
फिल्म अभिनेता मनोज जोशी ने कहा, ''यह उड़ान है संस्कृति के सोपान की, देश को जिसने संगठित किया उस गंगा की। क्योंकि विश्व में ऐसा कोई भी राष्ट्र नहीं है जो अनेक हमलों के बाद भी अपने हजारों सालों के मूल्य संजोए हुए है।'' उन्होंने आगे कहा,''कला और संस्कृति किसी भी देश की रीढ़ होती है। और मुझे इस पर गर्व है कि यह मजबूत है।'' उड़ान की स्थापना के समय से उससे जुड़े एएएफटी के अध्यक्ष संदीप मारवाह ने कहा,''अच्छी विचारधारा के छात्र एक मंच पर एकत्र हों, इसके लिए ही उड़ान का गठन हुआ है। इसका उद्ेदश्य समाज के कटे हुए तबके के युवाओं को मंच और अवसर प्रदान करना है।''
गौरतलब है कि उड़ान उत्सव की शुरुआत सितंबर, 2016 में हुई थी। इसका पहला आयोजन 20-22 सितंबर को दिल्ली विवि. में हुआ जिसमें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के 50 से ज्यादा कॉलेजों के छात्रों ने हिस्सा लिया था। निर्णायक टीम ने इन प्रतिभागियों में से 10 टीमों से 217 छात्रों का राष्ट्रीय नाट़्य विद्यालय में तीन दिवसीय कार्यशाला के लिए चयन किया जहां कला जगत की अनेक हस्तियों ने इन्हें कला की बारीकियां समझाईं।
उड़ान के साथ शुरुआत से जुड़ी लेखिका अद्वैता काला इसके शुरुआती दौर के बारे में बताती हैं,''हरेक चीज परिश्रम से ही शुरू होती है। जब उड़ान की शुरुआत हुई तो हम भी दुविधा में थे कि इसे कैसी प्रतिक्रिया मिलेगी लेकिन विवि. में कार्यक्रम हुआ और यहां छात्रों द्वारा जो प्रतिक्रिया मिली, उससे लगा कि उड़ान का विचार सफल है।'' अद्वैता कहती हैं कि उड़ान के अब तक 4 कार्यक्रम हो चुके हुए और अब उड़ान उत्सव-2017 में युवा छात्रों की जो संख्या देखने को मिली, वह इस विचार को और मजबूत करती है।
उत्सव के दूसरे दिन अनेक विधाओं में दूर-दराज से आए छात्र अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते दिखाई दे रहे थे। सभागार-1 में छात्रों द्वारा नाटक प्रस्तुत किए जा रहे थे। इनमें प्रमुख रूप से कई ऐसे नाटक थे, जिसमें समाज की रूढि़वादिता और कुरीतियों पर तंज किया गया था। तो कई भारत की संस्कृति और सभ्यता से जुड़े थे। तो वहीं सभागार-2 में संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी में छात्रों द्वारा बनाई गई लघु फिल्में दिखाई गईं जो समाज के आस-पास होने वाली घटनाओं पर आधारित थीं। इन्हीं में से एक पंकज कुमार निर्देशित फिल्म जिसका सार था कि नशा जीवन के लिए कितना हानिकारक है। राहुल खंडालकर निर्देशित फिल्म बॉर्न टू डाइ कन्या भ्रूण हत्या पर केंद्रित थी जिसमें बताया गया कि 5 लाख लड़कियां कैसे प्रतिवर्ष जन्म लेने से पहले ही मार दी जाती हैं। फिल्म में दिखाए गए दृश्य समाज की कुरीतियों पर सवाल उठा रहे थे, क्योंकि आज जब एक तरफ बेटियां देश ही नहीं, विदेशों तक में भारत का नाम रोशन कर रही हैं तो दूसरी तरफ यह पाप भी यहां हो रहा है। निर्देशक राहुल बताते हैं, ''आए दिन मैं समाचार पत्रों में पढ़ता हूं कि बेटियों पर अत्याचार हो रहे हैं। जब एक तरफ बेटियां मेहनत के बल पर अपने आपको स्थापित कर रही हैं तो एक वर्ग अभी भी उन्हें स्वीकार करने को तैयार नहीं है। बस इसी पीड़ा को ध्यान में रखकर यह फिल्म बनाई।'' दर्शकों ने 'मुजफ्फरनगर आखिर क्यों'? और 'नभकलेवर' जैसी फिल्मों को भी खूब सराहा।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर प्रमुख अतिथि के रूप में बंगला फिल्मों के अभिनेता विक्टर बनर्जी उपस्थित थे। तो वहीं विशिष्ट अतिथियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ. मनमोहन वैद्य, अ.भा.सह प्रचार प्रमुख श्री जे.नंद कुमार, रा.स्व.संघ दिल्ली प्रांत के सह संघचालक श्री आलोक कुमार एवं उत्तर क्षेत्र के प्रचार प्रमुख श्री नरेन्द्र कुमार उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत में अभिमन्यु ने अपने साथियों के साथ- 'हे शारदे मां, हे शारदे मां' गाकर समां बांध दिया। जब निर्णायक मंडल द्वारा अलग-अलग विधाओं में विजेता टीमों की घोषणा की गई तो सभागार में छात्रों का उत्साह
देखते ही बन रहा था। फोटोग्राफी में रामलाल आनंद कॉलेज के हेमंत कुमार, पोस्टर निर्माण में कॉलेज ऑफ आर्ट की अदिति दास, फिल्म निर्माण में महाराज सूरजमल इंस्टीट्यूट के छात्रों द्वारा बनाई गई फिल्म कूड़ा घर, रचनात्मक लेखन में जेएनयू के दिग्विजय सिंह, मूर्ति निर्माण में कॉलेज ऑफ आर्ट की प्रीति, भित्तिचित्र और व्यंग्य चित्र के लिए इसी कॉलेज के निशांत प्रकाश की अदिति को प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया। इन सभी छात्रों को प्रशस्ति पत्र एवं 5 से 15,000 रुपए तक के चेक प्रदान किए गए। समारोह के अंत में विक्टर बनर्जी ने छात्रों को संबोधित किया। उन्होंने कहा,''यहां जो ये संख्या दिखाई दे रही है वास्तव में यही ऊर्जा है। हमें इस ऊर्जा को सही रास्ते पर लाना है क्योंकि आज सभ्यता और संस्कृति के विकास की जरूरत है।'' प्रकृति का नियम है कोहरा अपरिहार्य है। लेकिन देर-सवेर सूरज के साथ सुहानी सुबह और रोशनी की उम्मीद होती है। इसी उम्मीद के साथ जेएनयू के परिसर में तीन दिन तक चले उड़ान उत्सव में देश से आए सैकड़ों छात्रों के उत्साह ने यही साबित किया कि यह समुदाय अब अपनी कला और संस्कृति के उत्थान के लिए जाग चुका है।
'कला मुक्ति के लिए है'
उड़ान के जरिए युवाओं को प्रतिभा दिखाने का एक मंच मिला है। लेकिन उड़ान की मूल कल्पना क्या है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख श्री जे.नंद कुमार उड़ान उत्सव-2017 के दौरान तीन दिन तक लगातार जेएनयू परिसर में रहे। अश्वनी मिश्र ने उनसे उड़ान की मूल संकल्पना और इसके भविष्य पर बात की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:-
देखिए, उड़ान की मूल कल्पना कला, नाटक, थियेटर यानी सभी तरह की कला की अभिव्यक्ति को जो राष्ट्र को जगाने के लिए उपयोग हो सकती है, उसका एक प्रयोग है। हम इसे 'थियेटर' या 'कला मूवमेंट' कह सकते हैं। दरअसल हमारे भारत में पुराने जमाने से ही कला समृद्ध रही है। सभी प्रकार की कला चाहें वह संगीत, नाटक, नृत्य या अन्य कोई। हमारे यहां यह मानना रहा है कला मुक्ति के लिए है, परम स्वातंत्र्य के लिए है, आध्यात्मिक उन्नयन के लिए है। सभी कला के द्वारा पूरे विश्व में जो मौलिक एकता रहती है, उस एकता को खोजना, समझना, एकता के साथ एक होना। अगर कला श्रोता या दर्शक के मन में ऐसी भावना जगा सकती है तो वह कला है अन्यथा वह कला नहीं है। ठीक यही कल्पना हमारी भी है। देखने में आता कि आज देश में सभी क्षेत्रों में एक अभारतीय दृष्टिकोण छाया हुआ है। और कुछ समय से यह भी देखने में आ रहा है कि हमारी मूल कल्पना आधार पर कला संबंधित नई सोच, नए प्रयोग नहीं हो रहे हैं। हां, कुछ थोड़ा बहुत इधर-उधर हो रहा है लेकिन उसे अधिकृत रूप से समर्थन मिलता नहीं दिख रहा है। लेकिन दूसरी ओर हो क्या रहा है जो अभारतीय कला है उसे अधिक प्रश्रय दिया जा रहा है। और इसीलिए ड्रामा और थियेटर के बारे में विचार करते समय हमारे कला क्षेत्र में काम करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग भी पाश्चात्य कला, ड्रामा और वहां के थियेटर, बे्रेख्त, सेमुअल बकेट और विलियम शेक्सपीयर या अन्य ऐसे ही नाटककार उनके मन में रहते हैं। इसी कारण उनकी रचनाओं, कल्पनाओं में भारत दिखाई नहीं देता। आप अभिनव गुप्त, विशाखदत्त, स्वामी श्ंाकरदेव जैसे परम विद्वानों को इनके नाटकों में नहीं देख सकते। इसलिए अगर सही अर्थ में भारत में परंपरा के आधार पर कला की प्रस्तुति होनी चाहिए तो इसके लिए भारत की मूल कल्पना में जाने की जरूरत है। हमारे पुरुषों द्वारा संजोई गई कला को काल सुसंगत और नए प्रयोग के साथ सामने लाने की आवश्यकता है। इसी लक्ष्य को लेकर यह प्रयोग शुरू किया गया है। युवाओं, छात्रों के बीच पहला प्रयोग दिल्ली विवि. में किया गया था अब जेएनयू में एक अच्छा प्रयोग हुआ है।
सितंबर-2016 में उड़ान की शुरुआत हुई थी। समय-समय पर इसके कई कार्यक्रम भी हुए और अब उड़ान उत्सव-2017 का कार्यक्रम हुआ। अगला पड़ाव क्या होगा?
आज बौद्धिक युवा प्रतिभाओं की एक बहुत बड़ी सूची बन चुकी है। पहला उत्सव जो गत सितंबर में हुआ था। उसके बाद लगभग 140 छात्रों को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रशिक्षण दिया जा चुका है। आज कई वे युवा जो सितंबर में इसके साथ जुड़े थे, वे यहां नई प्रस्तुतियों के साथ आए और उन्होंने बड़ी ही अच्छी प्रस्तुतियां दीं। रही बात इसके पड़ाव की तो उड़ान का यह क्रम जारी रहेगा। इसी के आधार पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एवं आस-पास के विद्यालयों-महाविद्यालयों मे उड़ान की यूनिट के रूप में बच्चों को संगठित करना और नए प्रयोगों के लिए प्रेरित करने का काम उड़ान करता रहेगा।
उड़ान उत्सव में करीब 2500 से ज्यादा युवा अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए आए हैं। ऐसी प्रतिभाओं को आपका क्या संदेश है?
यहां जो भी कार्यक्रम चल रहे हैं उन सब का एक ही संदेश है-राष्ट्र जागरण। युवाओं को चाहिए कि वह इसी दृष्टि को सामने रखकर नई प्रस्तुतियां दें। साथ ही मैं यह मानता हूं कि यहां आए हुए छात्रों के मन में उड़ान यह प्रेरणा जगाने में सफल भी हुआ है। आगे भी हम इस मंच को लगातार सहयोग करते रहेंगे।
उम्मीदों की उड़ान…
है ये उड़ान
तेरे हौसलों की
तेरी जिंदगी की
तेरी खुशबुओं की
तेरी बंदगी की
है ये उड़ान।।
आशाओं की छड़ी है तेरे हाथों में
किरण सुनहरी खड़ी है तेरी राहों में
मुश्किल तो आती-जाती इक छाया है
फिर भी हमने गीत खुशी का गाया है
नई सुबह आई जीवन में, अपने जीवन जी ले तू
नई उड़ान भर ले, अब तो नए ढ़ंग से जी ले तू
है ये उड़ान
मेरे हौसलों की
मेरी जिंदगी की
तेरी खुशबुओं की
तेरी बदंगी की
'कला राष्ट्र को महान बनाती है'
देश के हर गांव की एक कथा है। हर गांव का एक इतिहास है। कोई न कोई व्यक्ति 1857 से पहले भी अपनी माटी के लिए लड़ा होगा। अनेक व्यक्तियों ने अपने समाज के लिए आहुति दी होगी। हर गांव में एक कला विधा है। तो कहने का मतलब है कि यह देश इतना भव्य है कि उस भव्यता को हम पुनर्जीवित करें और उसे आज के काल में ढालें। उड़ान का विचार छह महीने पहले स्ट्रीट प्ले से शुरू हुआ और अब कला की कई विधाओं में इसका बढ़ता दायरा देख सकते हैं। इन सभी विधाओं में काम करने वालों के लिए बहुत सारे अवसर हैं। जहां युवा अपने जीवन की उड़ान बहुत अच्छे से भर सकते हैं। उड़ान के जरिए उन्हें एक ऐसा मंच मिला है। इसलिए मैं कहता हूं कि उड़ान के माध्यम से ऐसे आयोजन राष्ट्रभर में सभी विश्वविद्यालयों में होने चाहिए। इससे इसका जो विचार और संकल्प है, वह हर छात्र तक पहुंचेगा।
प्रतिभा को मिला 'पालना'
700 छात्र-छात्राओं ने एकांकी नाटक
300 युवाओं ने फिल्म निर्माण
600 युवाओं ने रचनात्मक लेखन
300 विद्यार्थियों ने फोटोग्राफी
247 छात्र-छात्राएं पोस्टर बनाने में
105 युवा मूर्ति बनाने में
भित्ति चित्र दीवार लेखन में 246
242 छात्र-छात्राएं व्यंग्य चित्र बनाने में
'इतिहास में कोई फिक्शन नहीं होता'
'जो लोग भारत के इतिहास से छेड़छाड़ करते हैं, अगर उनमें इतना ही दम है तो वे किसी और मुल्क में ऐसा करके दिखाएं, उन्हें पता चल जाएगा।' ऐसा कहना है प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता मुकेश खन्ना का। महाभारत सीरियल में पितामह भीष्म का किरदार निभाकर ख्याति पाने वाले मुकेश खन्ना का उड़ान उत्सव में आना हुआ। अश्वनी मिश्र ने उनसे मौजूदा दौर एवं फिल्म जगत से जुड़े विषयों पर बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:-
उड़ान उत्सव के बारे में आप का क्या कहना है?
देखिए, जिसने भी 'उड़ान' का नाम रखा वह बहुत ही सही है। क्योंकि आज बहुत लंबी उड़ान लेने की जरूरत है। आज के युवाओं में एक अच्छी ऊर्जा और विचारधारा की जो आवश्यकता है वह इसके जरिए की जा सकती है।
एक कलाकार के अंदर क्या-क्या खूबियां होनी चाहिए?
कलाकार की बहुत बड़ी परिभाषा है। कला सिर्फ फिल्म से सीमित नहीं हैं, उसके बहुत आयाम हैं। कला अंदर से निकलती है। क्योंकि किसी को अगर कलाकार बनना है तो वह पहले अपने आप को परखे। शीशे के सामने खड़े होकर देखिए, कि आप जब सौ लोगों के सामने खड़े होंगे तो उसमें कहीं नजर आएंगे कि नहीं? दूसरा, धरातल पर रहना सीखें, तीसरा, कलाकार का मतलब यह नहीं है कि आप शराब- सिगरेट पिएंगे। मैं फिल्म जगत में पिछले 30-35 साल से हूं लेकिन कभी सिगरेट और बियर तक नहीं चखी। क्यों, क्योंकि मैंने अपने आपको रोका। इसलिए अगर आपको इस क्षेत्र में रहना है तो न करना सीखिए।
हाल ही में कुछ ऐसी फिल्में आईं जिन पर विवाद हुआ। आरोप लगा कि इनमें इतिहास और संस्कृति के साथ छेड़छाड़ की गई। आखिर हर बार एक वर्ग द्वारा भारत के गौरव पूर्ण इतिहास और संस्कृति से ही क्यों छेड़छाड़ की जाती है?
आपने ये प्रश्न करके मेरे जख्मों पर नमक छिड़क दिया। मैं ऐसी चीजों का एक बार नहीं पच्चीसों बार विरोध कर चुका हूं और सदैव गलत चीजों का विरोध करूंगा। मैं एकता कपूर द्वारा बनाई गई महाभारत का भी विरोध कर चुका हूं, क्योंकि उसमें बहुत सी ऐसी चीजें थीं जो नहीं होनी चाहिए थीं। जिस फिल्म की हम चर्चा कर रहे हैं, उससे इतर कई ऐसी फिल्में और ऐतिहासिक किरदारों पर आधारित सीरियल हैं जिनमें इतिहास के साथ छेड़छाड़ की जाती है। इनके निर्माताओं को पता नहीं है कि इतिहास में कोई 'फिक्शन' नहीं होता। अभी मुझे ये नहीं पता कि पद्मावती पर जो फिल्म बन रही है उसमें क्या है लेकिन अगर तथ्यों और इतिहास के साथ छेड़छाड़ की गई है तो उसे बिल्कुल रोकना चाहिए। जो लोग ऐसा कर रहे हैं उनमें दम है तो वह किसी और देश में ऐसा करके दिखाएं, उनको पता चल जाएगा।
महाभारत सीरियल को 28 वर्ष हो गए। लेकिन उसके पात्र लोगों के ह्दय में आज भी अंकित हैं। समाज के बीच जाने पर आपका क्या अनुभव रहता है?
एक छोटी सी बात मैं बताता हूं। एक दिन मैं और सीरियल में किरदार निभाने वाले शकुनि मामा लखनऊ से दिल्ली जाने वाली टे्रेन में फंस गए। सीट निश्चित नहीं थी। तो पास में ही एक बंगाल का परिवार था उनके पास कई सीटें थीं तो उसने कहा कि आपको तो सीट दे दूंगा लेकिन शकुनि को नहीं दूंगा। अब इसे देखकर मुझे बड़ा आनंद आया। यानी इस तरह का जुड़ाव किरदार के साथ आम व्यक्ति का था। उस समय जब महाभारत चल रही थी तो प्रत्येक रविवार इतने संदेश आते थे कि मन गद्गद् हो जाता था। आज भी वही छवि बनी हुई है।
आज की युवा पीढ़ी जो कला क्षेत्र में आ रही है, आप उससे कौन-सी तीन बातंे आप क्या कहना चाहेंगे?
मेरा युवाओं से कहना है कि यह बहुत ही फिसलन की जगह है। आप पूरी मजबूती के साथ मन को साधकर यहां आएं। अगर आप मुंबई जैसे किसी बड़े शहर में रहते हैं तो एक रहने का ठिकाना बनाएं, कुछ कमाई का जरिया बनाएं, क्योंकि यह जरूरी है। अगर यह नहीं होगा तो आप वह करना शुरू कर देंगे जो आप नहीं करना चाहते। साथ ही युवाओं को कड़े परिश्रम और ये सोचकर आना है कि यहां दो साल भी लग सकते हैं और 20 साल भी लग सकते हैं। संघर्ष करिए और सतत लगे रहिए, यही आपको मंजिल तक पहुंचाएगा।











