आवरण कथा : उत्तर तलाशता प्रदेश
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आवरण कथा : उत्तर तलाशता प्रदेश

Written byArchiveArchive
Feb 20, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 20 Feb 2017 14:09:42

 

उत्तर प्रदेश में विकास की रफ्तार इसी तरह सुस्त रही तो देश की बराबरी पर इसे आने में दो-चार साल नहीं, बल्कि कई दशक लग जाएंगे। विकास के पैमाने पर यह देश के बाकी राज्यों के मुकाबले लगतार पिछड़ रहा है। क्या पिछड़ेपन की यह छटपटाहट बदलाव की पटकथा लिखेगी?

-मनोज वर्मा-

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से कोई बीस किलोमीटर दूर मोहनलालगंज में डिहवा नाम का एक गांव है। इसे मजदूरों के गांव के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यहां अधिकतर लोग दिहाड़ी मजदूर हैं। लखनऊ  से सत्ता चलाने वालों को सूबे में विकास नजर आता है। उनकी नजर से देखा जाए तो काम बोलता है, लेकिन डिहवा के लोग रहने के लिए घर और रोजगार चाहते हैं। उनके विकास के एजेंडे में न तो लैपटॉप है और न ही साइकिल। वे बच्चों के लिए एक अच्छा स्कूल और बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं चाहते हैं। लेकिन मुफ्त में कुछ भी नहीं। गांव में विकास की बात तो होती है, लेकिन चुनाव आते ही विकास के मुद्दे को जाति और वर्ग के पैबंदों से ढकने की कोशिशें  होने लगती हंै। मगर फिर भी गांवों में सभी का एक ही सवाल है, रोजगार। इसका जवाब डिहवा के लोग सरकारी योजनाओं में तलाशते हैं। उन नारों में तलाशते हैं जो समाजवादी सरकार में लोगों को रोजगार देने के दावे करते हुए लगते हैं। यह हाल लखनऊ  से सटे गांव का है। इससे दूर बुंदेलखंड की बात की जाए तो इस क्षेत्र में व्याप्त कुपोषण, भुखमरी और आर्थिक तंगी जैसी समस्याएं विकास और 'काम बोलता है' जैसे नारों को मुंह चिढ़ाती नजर आती हैं। कारण, पिछले एक दशक में कुपोषण, भुखमरी और आर्थिक तंगी से आजिज आकर बुंदेलखंड के बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर, जालौन, झांसी और ललितपुर के 32 लाख से अधिक मजदूर-किसान घर-बार छोड़कर दूसरे शहरों या राज्यों को पलायन कर गए हैं। असल में बुंदेलखंड की यह तस्वीर मनमोहन सिंह की अगुआई वाली (यूपीए-2) सरकार की एक रिपोर्ट में आज भी दबी हुई है। उस समय केंद्रीय मंत्रिमंडल की आंतरिक समिति ने 2009-10 में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बंटे बुंदेलखंड के 13 जिलों से लाखों किसान-मजदूरों के पलायन का जिक्र करते हुए यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को सौंपी थी। इस रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड के बांदा जिले से 7,37,920, चित्रकूट से 3,44,801, महोबा से 2,97,547, हमीरपुर से 4,17,489, जालौन से 5,38,147, झांसी से 5, 58,377 और ललितपुर जिले से 3,81,316 किसान-मजदूरों के पलायन का जिक्र है। इस आंतरिक समिति में जल संसाधन विकास विभाग तथा कृषि एवं सहकारिता विकास विभाग के प्रतिनिधि शामिल थे। समिति ने बुंदेलखंड के संतुलित विकास के लिए कुछ सुझाव भी दिए थे। इनमें बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण के गठन के अलावा केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना, बेतवा नदी पर बांध बनाने और उद्योगों की स्थापना के लिए केंद्रीय उत्पाद शुल्क, आयकर, सीमा शुल्क और सेवा करों में 100% छूट देकर संतुलित विकास करने की सिफारिश की गई है। 

यूपी के हिस्से वाले बुंदेलखंड में सात जिले हैं। इन जिलों में विधानसभा की 19 सीटें हैं, जिनमें बांदा की नरैनी, हमीरपुर की राठ, जालौन की उरई और ललितपुर की महरौनी सीट अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ सपा और मुख्य विपक्षी दल बसपा को सात-सात, कांग्रेस को चार और भाजपा को एक सीट पर जीत मिली थी। किसानों के हक की लड़ाई लड़ने वाले 'बुंदेलखंड तिरहार विकास मंच' के अध्यक्ष प्रमोद आजाद का कहना है कि उन्होंने कमासिन के कठार पंप कैनाल को चालू करने की मांग को लेकर किसानों के साथ दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर लखनऊ और बांदा जिला मुख्यालय में 37 बार धरना-प्रदर्शन किया है। राज्य सरकार सिंचाई सुविधा तो नहीं दे पाई, अलबत्ता उन्हें डेढ़ माह की जेल जरूर नसीब हुई। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक आपदा से बड़ी समस्या यहां आवारा जानवरों की है, जो बची-खुची फसल रात में चट कर जाते हैं। किसान नेता और बांदा जिला पंचायत के पूर्व अध्यक्ष कृष्ण कुमार भारतीय ने कहा, ''अब भी सभी दल चुनाव जीतने के लिए किसानों के साथ छल कर रहे हैं। कर्ज, मर्ज और आपदा में मरने वालेे किसानों की       लंबी फेहरिस्त है। इससे भी कहीं ज्यादा     लंबी फेहरिस्त बुंदेलखंड से पलायन करने वालों की है।''

उत्तर प्रदेश ने देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री दिए हैं। आबादी के लिहाज से यह देश का सबसे बड़ा प्रदेश है, लेकिन विकास के मामले में इसकी गिनती निचले पायदान से शुरू होती है। बीते पांच साल में प्रदेश की विकास दर का आंकड़ा एक बार भी राष्ट्रीय औसत को नहीं छू सका। वहीं, बीते एक दशक में मध्य प्रदेश और बिहार जैसे बीमारू राज्यों ने लंबी छलांग लगाते हुए दस फीसदी से अधिक की विकास दर हासिल कर ली। अगर प्रदेश में विकास की रफ्तार इसी तरह सुस्त रही तो देश की बराबरी पर आने में इसे एक दो साल नहीं, बल्कि कई दशक लग जाएंगे। प्रदेश सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2012-13 से 2015-16 के दौरान राज्य की विकास दर 3़9% से 6.6% के बीच रही, जबकि देश की विकास दर इस अवधि में 5.6% से 7.6% के बीच थी। यहां प्रति व्यक्ति आय देश के मुकाबले लगभग आधी है। अस्सी के दशक में प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय और देश की प्रति व्यक्ति आय में खास फासला नहीं था, लेकिन बाद के दशकों में यह अंतर तेजी से बढ़ता गया। राजस्थान जैसा राज्य जिसकी प्रति व्यक्ति आय कुछ समय पहले तक यूपी से कम थी, आज आगे निकल गया है।

सूबे में विकास की बात पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कहते हैं, ''राजनीति को एक तरफ रखिए। उसके बाद ईमानदारी से देखिए कि उत्तर प्रदेश विकास के किस पायदान पर खड़ा है। अगर देश की विकास दर को दोहरे अंक में ले जाना है तो उत्तर प्रदेश की विकास दर को भी दोहरे अंक में ले जाना होगा। कारण, पिछले 15 साल में दूसरे राज्यों ने जितना विकास किया है, उसके मुकाबले उत्तर प्रदेश में संभावनाओं के बावजूद विकास नहीं हो पाया। प्रदेश को विकास के रास्ते पर ले जाने के लिए सुशासन और बेहतर कानून, कृषि और औद्योगिक क्षेत्र के विकास पर केंद्रित करना होगा।'' दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री मायावती अपनी सभाओं में कहती हैं कि उनकी सरकार ने विकास की जो योजनाएं शुरू की थीं, उन्हें अखिलेश सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया। लिहाजा उत्तर प्रदेश पिछड़ गया, जबकि अखिलेश यादव की सरकार विकास के दावे करती है। लेकिन आम आदमी नोएडा, लखनऊ और सैफई से बाहर दूसरे इलाकों में वैसी ही विकास की संभावनाओं को तलाशता है तो उसे कोई उत्तर नहीं मिलता। पीलीभीत के व्यवसायी श्याम तिवारी कहते हैं कि राज्य में चाहे सरकार किसी की भी रही हो, विकास और काम दलों के नारों में ही रहा है। पीलीभीत तक आधी-अधूरी रेलवे लाइन पहुंचने में ही 70 साल लग गए।

2011 की जनसंख्या के अनुसार यूपी की 77 फीसदी से अधिक आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। 60 फीसदी लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर कृषि कार्य से जुड़े हैं। सूबे की लगभग 80 फीसदी कृषि भूमि पर सिंचाई की सुविधा है जो विश्व की सबसे ऊपजाऊ भूमि में से एक है। लेकिन पैदावार देश की औसत उपज से भी कम है। हालांकि बुंदेलखंड में केवल 40 फीसदी भूमि पर सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं। प्रदेश में देश की कुल आबादी के 17 फीसदी लोग रहते हैं, जबकि देश के कुल कृषि क्षेत्र का करीब 13 फीसदी इस राज्य में है। साल 2005-06 से 2014-15 तक राज्य की कृषि जीडीपी विकास दर 3़2 फीसदी प्रति वर्ष रही, जबकि राष्ट्रीय औसत 3़6 फीसदी प्रति वर्ष है। वहीं, मध्य प्रदेश में यह दर 9़7 फीसदी और छत्तीसगढ़ में 6़6 फीसदी रही। यहां तक कि बिहार में भी यह 4़6 फीसदी सालाना रही। इससे भी ज्यादा 2011 में गरीबी रेखा पर आई तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट चौंकाती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, सूबे की 30 फीसदी आबादी गरीब है, जबकि देश का औसत आंकड़ा 22 फीसदी है।

तमाम दावों के बीच किसानों को फसल की पूरी कीमत नहीं मिलती। यूपी में सबसे ज्यादा गेहूं उत्पादन होता है, लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य अन्य राज्यों की अपेक्षा कम है। इसके अलावा, गन्ना किसानों का भुगतान भी बड़ा मुद्दा रहा है। हालांकि गन्ने के मामले में राज्य सलाह कीमत (एस़ए़पी़) केंद्रीय कीमत से अधिक है। लेकिन बीते तीन सालों से चीनी की कीमतें कम हैं तो कंपनी ने किसानों को एस़ ए़ पी़ भी नहीं दी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कहते हैं कि कृषि क्षेत्र में मध्य प्रदेश की विकास दर दस साल में दोगुनी से अधिक हो गई जबकि, यूपी में दस साल में यह दर सबसे कम रही।  दरअसल अस्सी के दशक में यूपी के शुद्घ घरेलू उत्पाद (एनएनपी) में वृद्घि की दर देश से अधिक थी, लेकिन नब्बे के दशक से यह राष्ट्रीय दर से नीचे चल रही है। यूपी का सकल घरेलू उत्पाद करीब 11,72165 करोड़ रुपये है। इसी प्रकार मार्च 2016 वित्त वर्ष में प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय 48,584 रुपये थी। वहीं, देश की प्रति व्यक्ति आय 93,293 है जिसने वित्त वर्ष 2016-17 में 1 लाख से ज्यादा रहने का अनुमान है। दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय 93,293 रुपये है। सांख्यिकी एवं प्रोग्रामिंग कार्यान्वयन मंत्रालय के आंकड़ों (2013-14) के मुताबिक, प्रति व्यक्ति शुद्घ राज्य घरेलू उत्पाद (एनएसडीपी) के मामले में यूपी देश के पांच सबसे गरीब राज्यों में शामिल है। प्रदेश में जो निवेश आ भी रहा है उसमें से करीब 50 फीसदी पश्चिमी यूपी के कुछ जिलों तक ही सीमित है। देश में दो सालों के दौरान 42 मोबाइल निर्माता कंपनियों ने इकाइयां लगाईं। इनमें 25 कंपनियों ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा को चुना। निवेश और नए उघोग-धंधों के मामले में बुंदेलखंड, रुहेलखंड और पूर्वांचल जहां थे, वहीं खड़े हैं। भारतीय उद्योग संघ के कार्यकारी निदेशक पी़सी वर्मा कहते हैं कि प्रदेश का ध्यान उद्योग पर है ही नहीं। नीतियां बहुत हैं, लेकिन सब कागजों तक ही सीमित हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और आर्थिक मामलों के जानकार मनोहर सिंह के मुताबिक, विकास के लिए यूपी में सबकुछ है, लेकिन बीते एक दशक में इसके पिछड़ने की मुख्य वजह राजनीतिक दल हैं जो जाति और मजहब की राजनीति करते हैं। इसलिए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 1998-99, राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2012-13 और रैपिड सर्वे ऑन  चिल्ड्रन 2013-14 के आंकड़ों का निष्कर्ष यह है कि यूपी स्वास्थ्य और पोषण के मामले में उच्चाधिकार प्राप्त समूह (ईएजी) के तीन अन्य राज्यों बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के मुकाबले काफी पीछे है। नवजात मृत्यु दर, परिवार नियोजन, संस्थागत प्रसव और टीकाकरण के मामले में भी यह इन राज्यों से पीछे है। केंद्र सरकार ने 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत की थी। इसके लक्ष्यों को हासिल करने में भी यह अन्य राज्यों से पीछे है। प्रदेश की कम से कम आधी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं चौबीसों घंटे काम नहीं करती हैं। लगभग समूचा सूबा दिल्ली की स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर है। वहीं, शिक्षा का आलम यह है कि करीब 40 फीसदी बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा कुछ समय पहले जारी डाईस रिपोर्ट, जो शिक्षा हेतु जिला सूचना व्यवस्था पर आधारित होती है, प्राथमिक शिक्षा की कलई खोलती है। रिपोर्ट के मुताबिक, प्राथमिक शिक्षा के लिए चलाई जा रही महत्वाकांक्षी योजनाओं के बावजूद एक साल में यूपी के स्कूलों में सात लाख बच्चे घट गए। कहीं स्कूलों में शौचालय नहीं हैं तो शिक्षकों की भी भारी कमी है।

यूपी बिजली उत्पादन में तमिलनाडु, गुजरात, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों से बहुत पीछे है। देश के बिजली उत्पादन में इसका योगदान मात्र 6.65 फीसदी है। सूबे के बिजली घरों में हमेशा कोयले की समस्या बनी रहती है। ऊपर से बिजली चोरी कोढ़ में खाज की तरह है। तमाम कोशिशों के बावजूद प्रदेश में मांग के मुकाबले केवल 9,000 से 11,000 मेगावाट तक ही बिजली उपलब्ध है। इसी कारण आपात कटौती की जा रही है। आजादी के 70 साल बाद भी सूबे में 24   घंटे बिजली क्यों नहीं मिलती? इसके लिए दोषी कौन है?  बिजली के कारण उद्योग बंद हो रहे हैं। विकास की लम्बी उपेक्षा ने निश्चित ही प्रदेश की जनता में अनकही छटपटाहट भरी है। क्या मौजूदा चुनाव में ऊंचा उठता मतदान का ग्राफ इसी आक्रोश की अभिव्यक्ति है।

 

 

अगर देश की विकास दर को दोहरे अंक में ले जाना है तो उत्तर प्रदेश की विकास दर को भी दोहरे अंक में ले जाना होगा। कारण, पिछले 15 साल में दूसरे राज्यों ने जितना विकास किया है उसकी तुलना में उत्तर प्रदेश में संभावनाएं होने के बावजूद विकास नहीं हो पाया।

—अमित शाह, राष्ट्रीय अध्यक्ष, भाजपा

 

हमारी सपा सरकार ने उत्तर प्रदेश के विकास को दिशा दी है। इसलिए हमारा काम बोलता है।

—अखिलेश यादव, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश

 

 मेरी सरकार ने उत्तर प्रदेश में विकास की जो योजनाएं शुरू की थीं उन्हें अखिलेश की समाजवादी पार्टी की सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया।  लिहाजा उत्तर प्रदेश पिछड़ गया।

—सुश्री मायावती पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा प्रमुख

 

कर्ज,मर्ज और आपदा में मरने वाले किसानों की लंबी फेहरिस्त है। इस फेहरिस्त से कहीं ज्यादा बुंदेलखंड से पलायन करने वाले हैं।

—कृष्ण कुमार भारतीय, किसान नेता

विकास के लिए उत्तर प्रदेश के पास सबकुछ  है। लेकिन पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश विकास में पिछड़ा है तो इसकी वजह वो राजनीतिक दल हैं जो जाति और मजहब की राजनीति करते हैं।

—मनोहर सिंह, वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार

 

ल्ल   बिजली उत्पादन में उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों से बहुत पीछे है।

ल्ल   देश के बिजली उत्पादन में  प्रदेश की भूमिका महज 6.65% है।

ल्ल   पिछले एक साल में उत्तर प्रदेश के प्राथमिक स्कूलों में सात लाख बच्चे कम हो गए।

ल्ल   उत्तर प्रदेश पोषण के मामले में बिहार,मध्य प्रदेश और राजस्थान से भी पीछे है।

ल्ल   प्रति व्यक्ति घरेलू उत्पाद मामले में यूपी देश के 5 सबसे गरीब राज्यों में शामिल है।

ल्ल   उत्तर प्रदेश कृषि विकास दर के मामले में मध्य प्रदेश से पीछे है।

ल्ल   उत्तर प्रदेश की विकास दर देश की विकास दर से कम है।

ल्ल   राज्य की 30 फीसदी जनसंख्या गरीब है, जबकि देश में यह औसतन 22 प्रतिशत है।

ल्ल   स्वास्थ्य योजनाओं और टीकाकरण के मामले में भी प्रदेश कई राज्यों से पीछे

ल्ल   प्रति व्यक्ति आय के मामले में भी उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय आंकडों की तुलना में पीछे 

 

 

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