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अपने वनवास काल में भगवान श्रीराम ने माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या से रामेश्वरम तक की यात्रा की थी। 14 वर्ष के वनवास में श्रीराम जहां-जहां गए, अब वे स्थल पवित्र तीर्थ बन गए हैं। इन स्थानों से जन-जन को जोड़ने के लिए 9 फरवरी से एक यात्रा शुरू हुई, जो 65 दिन तक चलेगी। दिल्ली से शुरू हुई यह यात्रा सबसे पहले अयोध्या जी जाएगी। इसके बाद उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु के विभिन्न स्थानों से होते हुए रामेश्वरम तक जाएगी। यात्रा दल में शामिल लोग 13 अप्रैल को दिल्ली पहुंचेंगे, इसके साथ यह यात्रा पूर्ण होगी। यह यात्रा श्रीराम सांस्कृतिक शोध संस्थान न्यास के तत्वावधान में हो रही है। इस न्यास के सूत्रधार हैं डॉ. राम अवतार। उन्हीं की अगुआई में यह यात्रा संपन्न होगी। आयकर विभाग में सहायक निदेशक (राजभाषा) रहे डॉ. राम अवतार ने वर्षों तक शोध करके राम वनगमन यात्रा मार्ग पर स्थित तीर्थों को ढंूढा है। इसके लिए वे सन् 2002 से अब तक इन स्थलों की 10 यात्राएं कर चुके हैं। अब 11वीं बार यात्रा कर रहे हैं। वे कहते हैं, ''इस यात्रा में उपरोक्त राज्यों के गांवों, नगरों, जंगलों और पहाड़ों में स्थित उन सभी 249 स्थानों पर पूजा-अर्चना की जाएगी, जो पहले की यात्राओं के दौरान खोजे गए हैं।'' उन्होंने आगे कहा, ''आज नगरवासियों, ग्रामवासियों और वनवासियों के बीच संवादहीनता है। इससे भाईचारा कम होने का खतरा है, वहीं भारतीय संस्कृति को हानि हो रही है। भागवान राम ने गिरिवासियों और नगरवासियों को एकसूत्र में बांधा था। आज एक बार फिर से देश के सभी लोगों को एक करना होगा। इस यात्रा से नगरवासियों और गिरिवासियों के बीच मेलजोल बढ़ेगा।''
इस यात्रा के शुरू होने के पीछे एक दिलचस्प बात है। डॉ. राम अवतार के शब्दों में ही, ''मैं बचपन में अपनी ताई, चाची, बहन, भाभी तथा अन्य महिलाओं से श्रीराम वनवास के गीत सुनता रहता था। इन गीतों में सीता जी और लक्ष्मण जी द्वारा वनों में झेले गए कष्टों का इतना जीवंत चित्रण होता था कि गीत गाने वाली महिलाएं रोने लगती थीं। मैं भी अकेले में रोता रहता था। अंत में एक दिन मैंने राम वनगमन मार्ग पर जाने का निश्चय कर लिया। इसके बाद इस मार्ग की जानकारी लेने के लिए अनेक पुस्तकों का सहारा लिया, लेकिन कोई खास जानकारी नहीं मिली। अंतत: वाल्मीकि रामायण का मार्ग की दृष्टि से अध्ययन किया तो एक धंुधली-सी रेखा तैयार हुई और उसी के सहारे यह यात्रा करने का निर्णय लिया।''
वे फिर कहते हैं, ''हजारों वर्ष पुराने इस यात्रा मार्ग को ढंूढना इतना आसान नहीं था। इस मार्ग को खोजने में लोककथाओं, गीतों और किंवदंतियों के अलावा जंगलों और पहाड़ों पर स्थित मंदिरों और आश्रमों की भी मदद ली गई। शोध यात्रा में अनेक ऐसे तीर्थस्थल मिले, जो लुप्त होने के कगार पर हैं।''
इस यात्रा से स्थानीय लोगों को जोड़ने के लिए उन्हें अनेक वस्तुएं भेंट की जाती हैं। जैसे-गंगा जल, जय श्रीराम अंकित भगवा टोपी, रामजी और हनुमानजी के लॉकेट, साहित्य, हनुमान चालीसा और आरती की पुस्तकें।
यात्रा दल में मुख्य रूप से छह-सात रामभक्त शामिल हैं। यात्रा जहां भी जाएगी, वहां के लोग उसमें शामिल होंगे। इसकी तैयारी वहां के कार्यकर्ता काफी समय से कर रहे हैं। यात्रा दल में शामिल श्रद्धालुओं का उत्साह देखकर ऐसा लगता है कि पहले की यात्राओं की तरह ही यह यात्रा भी अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल रहेगी। – अरुण कुमार सिंह
यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव
9 फरवरी : हनुमान मंदिर, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली से प्रारंभ
10 फरवरी : अयोध्या जी
14 फरवरी : श्रृंगवेरपुर (प्रयाग)
17 फरवरी : कामद गिरि (चित्रकूट)
19 फरवरी : अत्रि आश्रम (म.प्र.)
20 फरवरी : शरभंग आश्रम (म.प्र.)
26 फरवरी : रामरेखा धाम (छत्तीसगढ़)
3 मार्च : राजीव लोचन (छत्तीसगढ़)
8 मार्च : मल्लिकेश्वर (ओडिशा)
10 मार्च : पर्णशाला (तेलंगाना)
11 मार्च : स्कंद आश्रम, कंदकूर्ति, तेलंगाना (डॉ. हेडगेवार का पैतृक गांव)
13 मार्च : पंचाप्सर, लातूर (महाराष्ट्र)
18 मार्च : अगस्त्य आश्रम, पिंपलनेर (महाराष्ट्र)
19 मार्च : पंचवटी, नासिक (महाराष्ट्र)
21 मार्च : श्रीराम वरदायिनी, तुलजापुर (महाराष्ट्र)
24 मार्च : शबरी आश्रम, बेलगाम (कर्नाटक)
25 मार्च : किष्किंधा (कर्नाटक)
30 मार्च : तिरुचिरापल्ली (तमिलनाडु)
3 अप्रैल : रामेश्वरम (तमिलनाडु)
9 अप्रैल : रामटेक, नागपुर (महाराष्ट्र)
10 अप्रैल : भरभरा (म.प्र.)
13 अप्रैल : हनुमान मंदिर, कनॉट प्लेस (नई दिल्ली)









