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बदलाव को बेचैन

Written byArchiveArchive
Feb 13, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 13 Feb 2017 14:46:28

इस बार चुनाव में जो भी होगा, बड़ा बदलाव ही होगा। उत्तर प्रदेश में इस बार बहुत कुछ पहली बार हो रहा है। पहली बार विकास मुद्दा बना है। लेकिन हवा-हवाई चीजों को विकास बताने और परिवारवाद के ड्रामे से राजनीतिक सवालों को ढकने की कोशिश हो रही है। एक व्यक्ति का भय दिखाना कुछ दलों का एकमात्र घोषित राजनीतिक एजेंडा है। पहली बार मुस्लिम वोट बैंक को लेकर घमासान है

रुचि सक्सेना

उत्तर प्रदेश को आप किस रूप में देखते हैं? लूट, हत्या, राहजनी, बलात्कार, नकल, घूस, बेरोजगारी और अराजकता का उत्तर प्रदेश? चाचा-पिता-बुआ और 'पुत्तर' का उत्तर प्रदेश? समाजवादी और जातिवादी प्रयोगों का प्रदेश? चंद तस्वीरों को विकास बताते नेताओं के पोस्टरों का प्रदेश? अब, इस चुनाव में उत्तर प्रदेश का एक और चत्रि भी उभरा है। जनता के असली सवालों से मुंह छिपाने के लिए नए-नए स्वांग करने का प्रयोग प्रदेश? या अपने असली सवालों के प्रति जागरूक जनता के मौन का प्रदेश।
इस चुनाव में तीन पक्ष हैं। भारतीय जनता पार्टी, अखिलेश यादव-कांग्रेस गठबंधन और मायावती। इनमें से अंतिम दो में मुस्लिम वोट बैंक को लेकर जबरदस्त संघर्ष है। दोनों को लगता है कि मुस्लिम वोट बैंक का एकमुश्त उनके साथ रहना उनके अस्तत्वि के लिए बेहद आवश्यक है। वरष्ठि भाजपा नेता और केंद्रीय सामाजिक एवं अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत कहते हैं कि अस्तत्वि बचाने के लिए समाजवादी पार्टी-कांग्रेस के बीच अपवत्रि गठबंधन हुआ है। गैर मुस्लिम मतदाताओं को ये दल या तो मात्र जाति के रूप में देखते हैं या अपना बंधक वोट बैंक मानते हैं या उसकी परवाह करना जरूरी नहीं समझते।
अखिलेश यादव को इस बात का श्रेय जरूर दिया जाना चाहिए कि उन्होंने राहुल गांधी को एक ऐसे नेता की हैसियत अता फरमाई है, जो उनकी समझ से उनकी पार्टी को मुस्लिम वोट दिला सकने में सक्षम हो सकता है। भले ही राहुल गांधी अपनी पार्टी को मुस्लिम या गैर-मुस्लिम कोई भी वोट न दिला पाते हों। अखिलेश यादव की रणनीति साफ है। वे जानते हैं कि मुस्लिम वोट बैंक स्ट्रैटेजिक वोटिंग में वश्विास रखता है। भाजपा को हराने के लिए जिसका पलड़ा भारी दिखेगा, वह उस तरफ वोट कर सकता है। सत्ता के बल, पारिवारिक कलह के ड्रामे से चर्चा में बने रहना और कांग्रेस को साथ ले आने तक के हर कदम पर उनकी कोशिश यही है कि मुस्लिम वोट बैंक को यह वश्विास दिलाया जा सके कि स्ट्रैटेजिक वोटिंग के सबसे उपयुक्त पात्र वही हैं। गठबंधन के बाद राहुल गांधी ने कहा भी कि ''हम सर्फि मोदी को हराने के लिए एकजुट हुए हैं।'' समाजवादी पार्टी के नेता और सांसद रामगोपाल यादव ने भी कहा कि सांप्रदायिक ताकतों को उत्तर प्रदेश में सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन करना जरूरी था। मतलब बात अब तुष्टीकरण के पुराने हथकंडे से कहीं आगे जा चुकी है। अब उसके लिए पार्टियां अपना चेहरा और चोला तक बदलने के लिए तैयार हैं।
और मायावती? मुस्लिम वोट बैंक की उनके पक्ष में स्ट्रैटेजिक वोटिंग उनके लिए भी वजूद बचाने की लड़ाई है। मायावती यह भी जानती हैं कि मुस्लिम वोट बैंक के बारे में अखिलेश यादव क्या जानते हैं। लिहाजा उन्होंने एक चौथाई मुस्लिम उम्मीदवार उतारने से लेकर कुख्यात मुख्तार अंसारी परिवार की पार्टी का विलय कराकर और मोदी का डर बैठाने की कोशिशों से लेकर तमाम हथकंडे खोल दिए हैं।   
मायावती कहती हैं,  ''इस (कांग्रेस) पार्टी ने आजादी के बाद यूपी में लगभग 37 सालों और केंद्र में 54 सालों तक राज किया है। अब यह पार्टी अपने उसूलों को ताक पर रखकर अराजक, भ्रष्ट पार्टी समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ रही है।''
 लेकिन उसूलों की परवाह किसे है? ये यूपी है बहनजी! माने एक ऐसा सूबा, जो खुद पर राज नहीं करता, बल्कि उस पर राज किया जाता रहा है। कैसे भी, किसी भी ढंग से। वश्विास न हो, तो मुस्लिम वोट बैंक की इस अंधी दौड़ पर नजर डाल लीजिए।
लेकिन उत्तर प्रदेश इस एक वोट बैंक की खींचतान के अलावा भी है। पहले दौर के वोट पड़ने से मात्र चंद दिन पहले उत्तर प्रदेश का नजारा गवाही देता है कि नेताओं से विपरीत आम जनता की इस बात में कोई खास रुचि नहीं है कि मुस्लिम वोट बैंक की स्ट्रैटेजिक वोटिंग किसके पक्ष में होगी। लोगों के अपने सवाल हैं, अपने मुद्दे हैं।
उदाहरण के लिए गन्ने का मुद्दा लें। मेरठ-बागपत की गन्ना पट्टी के किसानों के साथ थोड़ा समय बिताकर, कुरेद कर बात करने पर उनका दर्द सामने आता है। करीब एक दर्जन किसानों के साथ बातचीत से यह अनुमान निकालना सरल था कि ये किसान किसी के बंधक वोट नहीं हैं। उन्हें अपना हित समझ में आता है और वे यह भी समझते हैं कि उम्मीद किससे बांधी जा सकती है।
यह स्थिति कुछ-कुछ 2014 के लोकसभा चुनाव जैसी है। वोटर शांत है। यह उसके मन में बहुत उथल-पुथल हो चुकने के बाद की शांति है। लेकिन उथल-पुथल के मुद्दे और उनकी दिशा बल्किुल एक जैसी है, साझा है।
मुलायम सिंह यादव के पारिवारिक इलाके मैनपुरी-चंबल क्षेत्र से लेकर गोमती किनारे तक का लखनऊ  छान लीजिए। आप साफ महसूस कर सकते हैं कि अपनी सुरक्षा को लेकर पूरा भरोसा शायद किसी को भी नहीं है। यहां तक कि पुलिस वालों को भी नहीं। गजब है यूपी। अपनी-अपनी जरूरत के मुताबिक आम इंसान हथियारबंद है और पुलिस निहत्थी है। महिलाएं, नकदी, गाड़ी, जेवर, दुकान, धंधा और यहां तक कि खड़ी फसल भी-सब हमेशा किसी न किसी खतरे के साये में रहते हैं। अराजकता को, गुंडागर्दी को जीवन की एक सच्चाई में बदल दिया गया है। हर डेढ़ दिन में एक बार हमलों का शिकार होती रही पुलिस ने भी इसके साथ जीना सीख लिया है। और पुलिस? वह हर मौके पर सर्फि तब पहुंचती है, जब उसके पास करने के लिए कुछ न बचा हो। कारण? वही, डर। उत्तर प्रदेश वश्वि के उन गिने-चुने इलाकों में शामिल होगा, जहां गुंडों को नहीं, पुलिस को डर ज्यादा लगता है। जनता की तो परवाह ही किसी को नहीं है।
इस संवाददाता ने इसी कथित 'मुलायम पट्टी' में कुछ पुलिसकर्मियों का मन टटोलने की कोशिश की। जातिगत पहचान से कहीं परे, खुद पुलिस वाले भी अपने इस हश्र से दुखी हैं। समाज की नजरों में बुरी तरह गिर जाने की भी पीड़ा उनके मन में है। अपने बंधे हाथ और भोथरे हथियार उन्हें भी चुभते हैं। वोट उनका भी है। वोट वे भी डालेंगे।

पूर्वी उत्तर प्रदेश। जाति यहां एक सच्चाई है भी और नहीं भी है। विकास से परे बने रहना यहां नियति बना हुआ नजर आता है। भयंकर बेरोजगारी की हालत। आप वोटर से वोट की बात करें, लेकिन वह घूम-फिर कर आपसे और आपमें अपने लिए रोजगार की संभावना तलाशने लगता है। अपराध जगत एक उद्योग की तरह स्थापित है। यह हालत नई नहीं है। लेकिन उसे सहते रहने के लिए तैयार लोगों की संख्या जरूर अब बहुत कम बची लगती है। लोग सवाल करते हैं, जवाब चाहते हैं। खुल कर नहीं बोलते, लेकिन मौका मिले तो बोल भी देते हैं।
पूरे यूपी में बिजली मजाक का विषय है। लगभग प्रशासन की तरह। खेती और उद्योग ही नहीं, पढ़ने की कोशिश करते बच्चे और युवा भी इसकी छुपन-छुपाई से हताशा महसूस करने लगे हैं। कहीं 24 घंटे भी बिजली आती होगी, यह बात उन्हें परी कथा जैसी लगती है।
सड़क। गांवों को, कस्बों को जोड़ने वाली और गांवों और कस्बों को शहरों से जोड़ने वाली हर सड़क लगभग बदहाल है। महामार्ग से उतरने के बाद कोई आधा किलोमीटर की पट्टी ऐसी नहीं नजर आई, जो गड्ढों या जाम से मुक्त हो। लोग सहजता से सह रहे हैं, लेकिन उन्हें यह भी पता है कि इसे सुधारा जा सकता था। यह सारी हालत सिर्फ सतह पर है। इसके भीतर झांक कर देखें। जातियों के सच में और जातिगत वंचनाओं के सच में। सबसे बड़ा अपराध गरीबी है, दूसरी विवशता है। अत्याचार और भेदभाव एक साथ भी हमला करते हैं और अकेले-अकेले भी। लोग बदायूं में शौच के लिए निकली चचेरी बहनों की पेड़ से लटकती लाशें मिलने की घटना को भूले नहीं हैं। उसका उल्लेख भी करते हैं। उनके पड़ोस में घटी घटना भी बताते हैं और यह भी बताते हैं कि बलात्कार पर सख्त कानून बनाने के मसले पर मुलायम सिंह यादव ने क्या कहा था-'लड़के हैं, लड़कों से गलतियां हो जाती हैं।' हाल ही में जब अखिलेश यादव ने सार्वजनिक सभा में ऐलान किया कि वह कटिया मारकर बिजली चुराने वालों की अनदेखी करने के पक्ष में हैं, तो समाजवादी पार्टी के ताजा चेहरे की कलई खुल गई। आगरा के बाह जनपद में सड़क किनारे एक चाय दुकान पर बातचीत में छह में से कम से कम तीन लोगों ने खुलकर कहा, अखिलेश तो मुलायम की फोटोकॉपी हैं। हर अपराध को सरकार की खुली छूट रहनी है।
दरअसल यूपी में अपराध और राजनीति के बीच अपनी एक केमिस्ट्री और अपना एक अर्थशास्त्र कायम हो चुका है। अपराध करने वालों का पक्ष लेना भी राजनीति है, और खासतौर पर कमजोर वगोंर् के प्रति अपराध होते रहें, उन्हें पीडि़त बनाया जाता रहे, वह भी राजनीति है। दोनों राजनीति के लिए जरूरी है- अपराध होते रहें। खासतौर पर बलात्कार और हत्या जैसे कांड। इनसे राजनीति करने में दोनों दलों को सुविधा रहती है। थावरचंद गहलोत बताते हैं, राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 2014 में पूरे देश में दलितों के विरुद्ध 47,064 अपराध हुए। इनमें 8,075 मामले अकेले उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए। यूपी में दलित उत्पीड़न के हर रोज औसतन 20 मामले दर्ज किए गए। देशभर में दलितों के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न के मामले में अकेले यूपी की हिस्सेदारी 17 फीसदी से भी ज्यादा है। यह तब है जबकि उत्तर प्रदेश में दलितों के साथ नाइंसाफी का आलम यह है कि यहां के थानों में दलितों की शिकायत तक दर्ज नहीं की जाती। थानों पर थानाध्यक्षों की नियुक्ति में 21 प्रतिशत आरक्षण होने के बावजूद प्रदेश के थानों में उनकी बहुत कम नियुक्ति की गई है। 2015 में उत्तर प्रदेश दलितों और महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक राज्य रहा। 2015 में उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध का आंकड़ा 10़ 9 फीसदी था, जबकि दलित उत्पीड़न के  18़ 6 फीसदी मामले दर्ज हुए। बुलंदशहर में हुए सामूहिक दुष्कर्म ने राज्य में बिगड़ती कानून व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी थी।
वैसे मामले थाने में दर्ज न होने के क्षेत्र में यूपी लगभग पूरी तरह जातिनिरपेक्ष है। माने मामला थाने में दर्ज तब तक नहीं होता, जब तक ऐसा करना खुद पुलिस के लिए कोई मजबूरी न बन जाए। हालांकि इस मामले में थाने धर्मनिरपेक्ष नहीं रहे हैं। खुद पुलिस वालों ने निजी बातचीत में यह स्वीकार किया कि उन्हें ऊपर से निर्देश रहे हैं कि अगर अभियुक्त किसी खास मजहब का हो, तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज न की जाए, चाहे मामला बलात्कार का हो या हत्या का। आजम खां को तो यह कहने के लिए बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी है कि यूपी में बलात्कार राजनीतिक होता है। अपराधों को इससे बढ़कर हरी झंडी और क्या होगी।
पानी की चर्चा जरूरी है। अगर आप साफ पानी पीने के आदी हैं, तो यूपी में नल से मिलने वाला पानी हानिकारक साबित हो सकता है। जहां पानी का नल ही नहीं है, वहां आप विशुद्घ रूप से ईश्वर की कृपा पर निर्भर हैं। संक्षेप में, इसमें बुंदेलखंड की हालत को नहीं जोड़ा जा रहा है, जहां पानी ही नहीं मिल पाता। न इंसान को, न खेत को, न मवेशियों को। वहां गांवों में बचे लगभग सारे लोग क्या करते हैं, यह लिखना यहां उचित नहीं होगा। हालांकि इस सबको 'क्या करें, यही नियति है' आदि के तौर पर स्थापित मान लिया गया है।
लेकिन इस बार यूपी का मतदाता बदलाव की उम्मीद देख रहा है। बुंदेलखंड में, सूखे के चरम दिनों में पानी से भरी दस ट्रेनें आई थीं, जिन्हें लौटा दिया गया था। यूपी का मतदाता अब एक इतिहास को न ढोने की उम्मीद कर रहा है। एक भविष्य की उम्मीद। एक बदलाव की उम्मीद। उम्मीद है कि यह बदलाव
बड़ा होगा।    

(साथ में मेरठ से अजय मित्तल)
 

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