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उन्माद को पोसती ममता

Written byArchiveArchive
Jan 30, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 30 Jan 2017 13:02:04

1 जनवरी, 2017  

नेताओं ने देश डुबाया
टूट-फूट का चल रहा, सभी दलों में जोर
सुबह खड़े इस ओर हैं, शाम मिले उस ओर।
शाम मिले उस ओर, नीति-सिद्घांत भुलाए
है चुनाव ठेकेदारी, सो गले लगाए।
कह 'प्रशांत' इन नेताओं ने देश डुबाया
राजनीति के प्रति घृणा का भाव जगाया॥
— 'प्रशांत'

आवरण कथा 'चिंगारी मजहबी उन्माद की' पढ़कर आक्रोश पैदा होती है। पश्चिम बंगाल के धूलागढ़ में हिंदुओं पर अत्याचार किया गया बेहद निंदनीय है। हिंदुओं को ऐसी घटनाओं का प्रतिकार करना चाहिए। दादरी पर विलाप करते राजनीतिक दल मालदा और पश्चिम बंगाल के कई क्षेत्रों में हिंदुओं पर हो रहे जुल्म पर चुप्पी साधे हुए हैं। क्या निर्दोष हिंदुओं पर हमले और अत्याचार, अत्याचार नहीं हैं?  क्या यही सेकुलर राजनीति है?
—मनोहर मंजुल, प.निमाड़ (म.प्र.)

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके नाकारा प्रशासन तंत्र की विफलता धूलागढ़ में स्पष्ट देखने को मिली। जिहादी मुसलमान हिंदुओं के घर जलाते रहे, बहन-बेटियों पर अत्याचार करते रहे लेकिन स्थानीय प्रशासन मूक दर्शक बना रहा। यहां तक कि एक बड़े अधिकारी यह कहते दिखाई दिए,''सभी हिंदू यहां से भाग जाएं नहीं तो ये सभी को मार डालेंगे।'' क्या यही है राज्य का प्रशासन? जिस पुलिस पर राज्य की सुरक्षा का जिम्मा है वह इस तरह से कुछ लोगों के सामने घुटने टेक देगी? असल में यह सब ममता सरकार का दवाब था जिससे पुलिस के हाथ बांध रखे थे।
 —रानू नरोत्तम, आसनसोल (पश्चिम बंगाल)

 केजरीवाल जैसे नेता जो वेमुला से लेकर अखलाक तक के घरों में अपने घडि़याली आंसू बहा आए, लेकिन मालदा या धूलागढ़ के दंगे में हताहत हुए हिंदुओं की उन्हें कोई खबर ही नहीं है। अभी तक उनके कानों पर ही मफलर पड़ा था पर अब उन्होंने आंखों पर भी मफलर डाल लिया है। राजनीति में इसे बेशर्मी की पराकाष्ठा ही कहेंगे।
—रश्मि कुमारी, मेल से

दुर्भाग्य से कुछ दलों की पूरी राजनीति ही तुष्टीकरण पर टिकी है। राजनीति तो वैसे ही मैली है लेकिन मीडिया का काम तो समाज में घटी हर घटना को हूबहू रखना है। लेकिन वह भी आजकल राजनीतिक दलों की कठपुतली हो गया है। देश में अन्य समुदायों पर हुए हमले या अत्याचार की खबरों को वह कई-कई दिनों तक चलाता है लेकिन पश्चिम बंगाल में हुए दंगे को उसने 1 मिनट भी दिखाना ठीक नहीं समझा। क्या? क्या इस तरह के पक्षपात कार्य से वह अपनी विश्वनीयता तो नहीं खो रहा?
—सूर्यप्रताप सिंह सोनगरा, रतलाम (म.प्र.)

धूलागढ़ की हिंसा ने यह साबित कर दिया है कि ममता बनर्जी तुष्टीकरण की राजनीति में वामपंथियों को पछाड़ना चाहती हैं। पश्चिम बंगाल में जिस तरह से उन्मादियों ने हिंदुओं के घरों को जलाया ऐसा बिना राजनीतिक संरक्षण के संभव ही नहीं है। ऐसी घटनाओं से कई बार लगता है कि अब हिंदू होना किसी गुनाह से कम नहीं है। पाकिस्तान में भी ऐसे ही हिंदुओं पर अत्याचार होते हैं तो फिर पाकिस्तान और हिंदुस्थान में क्या अंतर रह जाता है?
—रमेश कुमार मिश्र, अम्बेडकर मिश्र (उ.प्र.)

देश में स्वतंत्रता के बाद से अनेक बार हिंदुओं को बेघर होने, बर्बाद होने के पड़ाव देखने पड़े हैं। लेकिन जो सेकुलर दल किसी मुस्लिम या ईसाई के मरने भर से कोहराम मचा देते हैं, हिंदुओं की पीड़ा पर उनकी घिग्घी बंध जाती है। आखिर इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि मुसलमानों की जहां-जहां जनसंख्या बढ़ती है वहीं पर दंगे होते हैं? कश्मीर, केरल, उत्तर प्रदेश, बिहार के उदाहरण प्रत्यक्ष हैं। दरअसल मुसलमानों को खुश रखने के लिए ही ममता सरकार हिंदुओं पर ऐसे अत्याचार करा रही हैं। लेकिन समय आने पर बंगाल की जनता को अपने ऊपर हुए हमलों को जवाब  देना होगा।
—अनुप्रिया सिंह, मेल से

आज देश में जिस तरह से हिंदुओं पर चुनकर हमले हो रहे हैं, उसके लिए कहीं न कहीं हिंदू ही दोषी हैं। क्योंकि अत्यधिक सहिष्णु बनने और भाईचारा बढ़ाने के कारण ऐसा हो रहा है। अधिकतर सरकारें हिंदू विरोधी हैं। उन्हें हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों से कोई मतलब नहीं। उन सबका सोचना है कि हिंदू पर अत्याचार होता है तो होने दो। आखिर ऐसा क्यों? इसका जवाब है कि हिंदू एकमुश्त वोटबैंक नहीं है। न वह संगठित होगा और न ही इस तरह के अत्याचार रुकेंगे। हिंदुओं को सोचना होगा, नहीं तो यह आग ऐसेही        बढ़ती रहेगी, अगर समय रहते इसे न बुझाया गया।
—महेश चन्द गंगवाल, अजमेर(म.प्र.)

जनहित में लिया फैसला
'नकद न्यूनतम अर्थव्यवस्था' (1 जनवरी, 2017)' आलेख से स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री ने जिस तरह से नोटबंदी का साहसिक फैसला लिया, ऐसा पिछली सरकारें नहीं कर पाईं। आम जनता का भी इस फैसले को भरपूर समर्थन मिला। यही कारण है कि राजग सरकार के इस फैसले और जनता के समर्थन को विपक्षी पार्टियां हजम नहीं कर पा रही हैं, इसलिए उन्हें यह फैसला कांटे की तरह चुभ रहा है। अर्थशास्त्रियों ने भी इस फै सले की सराहना की और इसे भारत के सुनहरे भविष्य को साकार करने के लिए उचित बताया। यही कारण रहा कि तमाम परेशानियों के बाद भी बड़े से लेकर बुजुर्ग तक इस फैसले का समर्थन करते दिखाई दिए।
—यशवंती कुमारी, सैय्यर गेट,झांसी (उ.प्र.)

काली कमाई करने वालों के लिए नोटबंदी का फैसला दिन में रात का नजारा दिखा गया। हालांकि ऐसे लोगों ने हाथ-पांव मारकर अपने काफी पैसे को सफेद कराने का भरपूर प्रयास किया और लोग कुछ हद तक लोग सफल भी हुए हैं। वैसे अधिकतर वे लोग इस फैसले से सहमे दिखाई दिए जिन्होंने काली कमाई करके पैसों का अंबार लगाया था लेकिन
मोदी जी ने एक ही झटके में उसे रद्दी में बदल दिया। राष्ट्र के हित में लिए गए ऐसे फैसले सत्तारूढ़ दल को जनता के मनों में स्थान दिलाते हैं।
—रचित अग्रवाल, सिरोही (राज.)

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बुजुुर्ग मां स्वयं पैसे निकालने बैंक गईं। क्या इससे भी ज्यादा आदर्श और कहीं हो सकता है। जो लोग इसे भी ड्रामेबाजी कह रहे हैं तो राहुल गांधी जो बैंक में पैसे निकालने और लोगों को भड़काने गए, वह क्या था? दरअसल ऐसे लोगों की मानसिकता के कारण ही देश अब तक आगे नहीं बढ़ सका। देश क्योंकि इनका काम सिर्फ अपने स्वार्थ पर ही निर्भर है। जहां स्वार्थ होता है, बस उन्हें वहीं राजनीति दिखाई देती है।
—अरुण मित्र, रामनगर (दिल्ली)

इंसानियत के पहरुए
  '… नहीं रहता हिन्दू-मुस्लिम का भेद' मोरारी बापू जी का साक्षात्कार मन को भा गया। देश में वैसे तो बहुत से संत-फकीर हैं लेकिन मोरारी बाबू के आभा मंडल पर जो तेज विद्यमान हैं वैसा किसी और के चेहरे पर नहीं दिखाई देता। वाणी की मिठास, स्वभाव में सहजता, ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं, यह बापू की कथा में ही दिख सकता है। वे श्रीरामचरित मानस की जो वे व्याख्या करते हैं, उसका कोई सानी इस नहीं है। अद्भुत वक्ता हैं वे। उनका एक-एक शब्द राममय है।
—अखिलेश मंडल, नासिक (महा.)

संत वह जो समाज को जोड़े, समाज को सही रास्ता दिखाए, आपसी सौहार्द कायम रखे, अपने देश और संस्कृति को आने वाली पीढ़ी में भरने का काम करे। मोरारी बापू अपनी कथा के माध्यम से यह सभी कार्य करते हैं। साक्षात्कार में उन्होंने बड़ी ही बेबाकी से अपने जीवन चरित और समाज पर आधारित प्रश्नों के जवाब दिए हैं। उनके जैसे वक्ता देश में बहुत ही कम हैं। इसीलिए वे समाज में सबके प्यारे हैं।
—श्रीधर शुक्ल, मुरादाबाद, मेल से

संस्कृति रक्षक
रपट 'योगी योद्धा (25 दिसंबर, 2016)' पठनीय है। धर्म और संस्कृति की रक्षा करने का जो उदाहरण गुरु गोबिंद सिंह ने प्रस्तुत किया है वह अतुलनीय है। उन्होंने अपने जीवन में शास्त्र की रक्षा करने के लिए शस्त्र उठाने का जो संदेश दिया, वह सदैव प्रासंगिक रहेगा और हिंदुओं के लिए मार्गदर्शक की भूमिका में रहेगा। यह संग्रहणीय अंक जहां गुरु गोबिंद सिंह जी के कार्यों का बखान करता है, वहीं उनकी शक्ति और साहस से भी परिचित कराता है और उनके जीवन के सभी पक्षों को भी समाने रखता है। गुरुजी ने अपने धर्म की रक्षा के लिए जो समर्पण किया, यहां तक कि अपने बेटों तक की कुर्बानी देने में तनिक देरी नहीं ऐसे महापुरुष के योगदान को देश युगों-युगों तक नहीं भुला पाएगा।
—आशीष जड़धारी, गुरुग्राम(हरियाणा)

हिंदू रक्षक गुरु गोबिंद सिंह जी ने जो मंत्र समाज को दिया उसे आज फिर से याद किया जाना चाहिए। उन्होंने कभी अत्याचार को नहीं सहा बल्कि उसका अच्छे से प्रतिकार किया। देश में आए दिन हिंदुओं पर होते अत्याचार से मन खिन्न होता है। ऐसे में हिंदुओं को गुरु गोबिंद सिंह जी के जीवन से सीख लेनी चाहिए, ताकि जो उनका साहस और शौर्य मर गया है वे फिर से जागे और वह शेर की भांति समाज में जीवन जी सकें।
—टी.एस.पाल, संभल(उ.प्र.)

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बुजुुर्ग मां स्वयं पैसे निकालने बैंक गईं। क्या इससे भी ज्यादा आदर्श और कहीं हो सकता है। जो लोग इसे भी ड्रामेबाजी कह रहे हैं तो राहुल गांधी जो बैंक में पैसे निकालने और लोगों को भड़काने गए, वह क्या था? दरअसल ऐसे लोगों की मानसिकता के कारण ही देश अब तक आगे नहीं बढ़ सका। देश क्योंकि इनका काम सिर्फ अपने स्वार्थ पर ही निर्भर है। जहां स्वार्थ होता है, बस उन्हें वहीं राजनीति दिखाई देती है।
—अरुण मित्र, रामनगर (दिल्ली)

इंसानियत के पहरुए
 '… नहीं रहता हिन्दू-मुस्लिम का भेद' मोरारी बापू जी का साक्षात्कार मन को भा गया। देश में वैसे तो बहुत से संत-फकीर हैं लेकिन मोरारी बाबू के आभा मंडल पर जो तेज विद्यमान हैं वैसा किसी और के चेहरे पर नहीं दिखाई देता। वाणी की मिठास, स्वभाव में सहजता, ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं, यह बापू की कथा में ही दिख सकता है। वे श्रीरामचरित मानस की जो वे व्याख्या करते हैं, उसका कोई सानी इस नहीं है। अद्भुत वक्ता हैं वे। उनका एक-एक शब्द राममय है।
—अखिलेश मंडल, नासिक (महा.)

संत वह जो समाज को जोड़े, समाज को सही रास्ता दिखाए, आपसी सौहार्द कायम रखे, अपने देश और संस्कृति को आने वाली पीढ़ी में भरने का काम करे। मोरारी बापू अपनी कथा के माध्यम से यह सभी कार्य करते हैं। साक्षात्कार में उन्होंने बड़ी ही बेबाकी से अपने जीवन चरित और समाज पर आधारित प्रश्नों के जवाब दिए हैं। उनके जैसे वक्ता देश में बहुत ही कम हैं। इसीलिए वे समाज में सबके प्यारे हैं।
—श्रीधर शुक्ल, मुरादाबाद, मेल से

संस्कृति रक्षक
रपट 'योगी योद्धा (25 दिसंबर, 2016)' पठनीय है। धर्म और संस्कृति की रक्षा करने का जो उदाहरण गुरु गोबिंद सिंह ने प्रस्तुत किया है वह अतुलनीय है। उन्होंने अपने जीवन में शास्त्र की रक्षा करने के लिए शस्त्र उठाने का जो संदेश दिया, वह सदैव प्रासंगिक रहेगा और हिंदुओं के लिए मार्गदर्शक की भूमिका में रहेगा। यह संग्रहणीय अंक जहां गुरु गोबिंद सिंह जी के कार्यों का बखान करता है, वहीं उनकी शक्ति और साहस से भी परिचित कराता है और उनके जीवन के सभी पक्षों को भी समाने रखता है। गुरुजी ने अपने धर्म की रक्षा के लिए जो समर्पण किया, यहां तक कि अपने बेटों तक की कुर्बानी देने में तनिक देरी नहीं ऐसे महापुरुष के योगदान को देश युगों-युगों तक नहीं भुला पाएगा।
—आशीष जड़धारी, गुरुग्राम(हरियाणा)

 हिंदू रक्षक गुरु गोबिंद सिंह जी ने जो मंत्र समाज को दिया उसे आज फिर से याद किया जाना चाहिए। उन्होंने कभी अत्याचार को नहीं सहा बल्कि उसका अच्छे से प्रतिकार किया। देश में आए दिन हिंदुओं पर होते अत्याचार से मन खिन्न होता है। ऐसे में हिंदुओं को गुरु गोबिंद सिंह जी के जीवन से सीख लेनी चाहिए, ताकि जो उनका साहस और शौर्य मर गया है वे फिर से जागे और वह शेर की भांति समाज में जीवन जी सकें।
—टी.एस.पाल, संभल(उ.प्र.)

 

प्रतिकार करने का समय
आवरण कथा 'चिंगारी मजहबी उन्माद की(1 जनवरी, 2017)' से मन व्यथित हो गया। धूलागढ़ में 13 और 14 दिसंबर को कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा जिस तरह से दंगा-फसाद किया गया, वह सब देखकर तकलीफ होती है। भद्रजनों की धरती कहे जाने वाले बंगाल में हिंदुओं के साथ ऐसा अत्याचार समस्त देश के हिंदुओं को आक्रोशित करने के लिए काफी है। जिस तरह आज पश्चिम बंगाल में ममता सरकार की नाक के नीचे हिंदुओं पर असहनीय अत्याचार हो रहे हैं, उससे प्रतीत हो रहा है कि कहीं न कहीं जम्मू-कश्मीर जैसी कहानी दोहराई जा रही है। जम्मू-कश्मीर में भी मुसलमानों ने कश्मीरी हिंदुओं को आतंकित करके उनको उनके घरों से ही खदेड़ा था जो आज तक विस्थापित हैं। ठीक इसी तरह आज बंगाल में भी कुछ ऐसा ही माहौल है। पश्चिम बंगाल के अधिकतर क्षेत्र धीरे-धीरे मुस्लिम बहुल होते जा रहे हैं। इससे वहां हिंदुओं का रहना मुश्किल होता जा रहा है। आए दिन उनको परेशान किया जाता है। छोटी-छोटी बात में दंगा-फसाद जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। और इंतहा तब हो जाती है कि जब क्षेत्र की मस्जिदों से खुलेआम मुल्ला-मौलवियों द्वारा हिन्दुओं को भगाने और मारने के लिए मुसलमानों को उकसाया जाता है। आश्चर्यजनक ये है कि इतने पर भी किसी भी लेखक या बड़ी हस्ती ने दुख जताना तो दूर की बात, बयान तक देना ठीक नहीं समझा। जबकि दादरी में एक अखलाक के मरने पर देश में कोहराम मच गया था। मीडिया ने भी इस मामले में अपनी नकारात्मक छवि दिखाई और हिन्दुओं की पीड़ा से उसे भी कोई मतलब नहीं रहा।
—सुनील कुमार चौहान, परसिया, बदायूं (उ.प्र.)

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