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समन्वय की शक्ति

Written byArchiveArchive
Jan 24, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 24 Jan 2017 12:38:44

26 दिसंबर को नई दिल्ली में 'पाञ्चजन्य' और 'ऑर्गनाइजर' ने संयुक्त रूप से गणतंत्र दिवस से पूर्व पर अपने वार्षिक आयोजन 'सुरक्षा पर संवाद' के अंतर्गत रक्षा से जुड़े मुद्दों पर गहन मंथन किया। इसमें रक्षा तैयारियों, चुनौतियों, संभावित खतरों, समन्वय और भारतीय सशस्त्र बलों को बेहतर करने संबंधी मुद्दों पर चर्चा हुई। 26 दिसंबर को नई दिल्ली में 'पाञ्चजन्य' और 'ऑर्गनाइजर' ने संयुक्त रूप से गणतंत्र दिवस से पूर्व पर अपने वार्षिक आयोजन 'सुरक्षा पर संवाद' के अंतर्गत रक्षा से जुड़े मुद्दों पर गहन मंथन किया। इसमें रक्षा तैयारियों, चुनौतियों, संभावित खतरों, समन्वय और भारतीय सशस्त्र बलों को बेहतर करने संबंधी मुद्दों पर चर्चा हुई।

 

प्रतिनिधि

प्रारंभिक सत्र में सीमा सुरक्षा बल के पूर्व आईजी श्री अनिल कंबोज ने कहा कि जम्मू-कश्मीर की समस्या उभरने से हमारा सारा ध्यान इधर ही केंद्रित रहा और हमने भारत के उत्तर-पूर्व तथा मध्यवर्ती क्षेत्रों में उपद्रव कर रहे उग्रवादी-माओवादी गुटों पर ध्यान ही नहीं दिया, जो आज सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं। जहां तक अन्य मुद्दों का सवाल है, उन्हें संभालने के लिए हम किसी सुगठित योजना के बजाए तात्कालिक निर्णय के आधार पर काम करते हैं। पूर्व सैन्य अधिकारी और उपन्यासकार कर्नल करण खर्ब ने कहा कि सबसे बड़ा खतरा शायद देश के अंदर है, न कि सीमा पार। राष्ट्रवाद और देशभक्ति हमारी नैतिक ताकत हैं। 1971 के दौरान राजनीतिक मंच पर विरोधी खेमे ने भी इंदिरा गांधी के देश को मजबूत करने के प्रयासों का समर्थन किया था, पर आज की राजनीति में वैसी उदारता नहीं दिखती।

टाइम्स ऑफ इंडिया की पत्रकार इंद्राणी ने कहा कि जहां तक भारत का संबंध है, वह अपनी सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं को सार्वजनिक करने से परहेज करता है। भारत में एक विश्लेषक चीन के बारे में जितना लिख सकता है उतना भारत के संबंध में नहीं, क्योंकि चीन ने अपनी नीतियों को भारत की तुलना में ज्यादा सार्वजनिक कर रखा है। एडमिरल (सेनि) शेखर सिन्हा ने कहा कि चीन के बारे में कुछ भी नहीं छिपा है और उनके सिद्धांत बहुत स्पष्ट हैं। 'ऑर्गनाइजर' के संपादक श्री प्रफुल्ल केतकर ने कहा कि हम अपने ज्यादातर खतरों का आकलन अमेरिकी दृष्टिकोण के आधार पर करते हैं। लिहाजा, जब तक हम अपने नजरिए से उन बिन्दुओं को नहीं देखेंगे, तब तक वास्तविक मसले का हल मुश्किल है। खतरों से जुड़ी हमारी धारणाओं का यह अमेरिकी कलेवर गंभीर चिंता का विषय है।

सुरक्षा तैयारियों और समन्वय पर बात करते हुए एडमिरल सिन्हा ने कहा कि सभी सेवाओं से अधिकारियों को लेकर मुख्यालय एकीकृत रक्षा स्टाफ की स्थापना की गई है जो प्रत्यक्ष रूप से किसी भी मंत्रालय के अधीन नहीं है।                                                                                                         आईडीएस का गठन कारगिल की लड़ाई के बाद पेश सुब्रमण्यम समिति की रिपोर्ट के बाद हुआ था। अभी यह स्टाफ समिति के प्रमुख के अधीन ऐसा मंच है जिसके जरिए तीनों सेनाओं की गतिविधियों से संबंधित विचार-विमर्श किया जाता है। रक्षा खरीद संबंधी सभी मुद्दों पर वास्तव में आईडीएस में ही विचार किया जाता है। उसके बाद ये रक्षा खरीद परिषद को भेजे जाते हैं। आईडीएस के अंतर्गत एक एकीकृत अंतरिक्ष प्रकोष्ठ है जो तीनों सैन्य सेवाओं के लिए भेजे गए संचार उपग्रहों सहित सभी अंतरिक्ष आधारित कामकाज देखता है। वे संयुक्त युद्ध अभ्यास, संयुक्त प्रशिक्षण, राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, कॉलेजों और आईडीएस के अंतर्गत आने वाले अन्य सभी विषयों पर भी ध्यान देते हैं। अगर इन मुख्यालयों का एक प्रमुख नियुक्त किया जाए तो समन्वय संबंधी सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। उन्होंने सुझाव दिया कि सेना की तीनों कमानों के वरिष्ठ अधिकारियों को उनकी पदोन्नति की शर्त के तौर पर एक साल के लिए आईडीएस में काम करना अनिवार्य कर दिया जाए ताकि वे कमान के संचालन से अलग निकल कर समन्वय की बारीकियों को समझ सकें।  

रक्षा विशेषज्ञ श्री आलोक बंसल ने कहा कि यह स्पष्ट करना होगा कि यह कोई सेना, वायु सेना, नौसेना या थल सेना का नहीं, बल्कि एक संयुक्त कार्यमंच है। प्रशिक्षण को भी संयुक्त सेवाओं के अंतर्गत लाना चाहिए। तभी हम मौजूदा समस्याओं को हल कर सकते हैं। हमें ऐसा माहौल बनाने में मदद करनी चाहिए। यह सिर्फ राजनीतिक प्रतिष्ठान द्वारा ही किया जा सकता है और इसलिए हमारे नेताओं को भी प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है।

एयर मार्शल (सेनि) पी.के. राय ने एक कमांडर के रूप में अपने अनुभव के आधार पर कहा कि अंदमान-निकोबार कमान भारतीय थल सेना, वायु सेना, नौसेना और तटरक्षक बलों की एक एकीकृत कमान है। यह भारत की एकमात्र संयुक्त कमान है जिसमें स्टाफ का पद बारी-बारी से थल सेना, नौसेना और वायु सेना के सबसे लंबी सेवा वाले तीन सितारा सैन्य प्रमुख को दिया जाता है और वह चेयरमैन ऑफ द चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी को सीधे रिपोर्ट करता है। प्रमुख रक्षा चिंताओं के अलावा संयुक्त-समन्वय की कमी से लोकलेखा को भी काफी नुकसान उठाना पड़ता है।

अनिल कंबोज ने अर्धसैनिक बलों और सशस्त्र बलों के बीच समन्वय के बारे में बात की। बीएसएफ के एक अधिकारी के रूप में जम्मू-कश्मीर में काम करने के दौरान हुए अपने अनुभव को याद करते हुए उन्होंने कहा कि शुरू में अनुभवी आईपीएस अधिकारियों के अधीन सेना और बीएसएफ के बीच में एक अच्छा समन्वय था। बाद में मुख्यत: राजनीतिक हस्तक्षेपों और समन्वय की कमी से स्थिति खराब होने लगी। सीमा पर बाड़ लगाने के लिए रक्षा मंत्रालय के पास, हालांकि अच्छे ठेकेदार थे, पर गृह मंत्रालय ने उन्हें अनुमति देने के बजाय खुली निविदा आमंत्रित कर दी जिसमें अनुभवहीन ठेकेदारों ने अनुबंध हासिल कर लिया। लेकिन उनसे शुरुआत में सही तरीके से काम हो ही नहीं सका। फिर बीएसएफ के इंजीनियरों ने उन कायार्ें को पूरा किया। जम्मू क्षेत्र में बीएसएफ अब सेना के संचालन कमान के अंतर्गत नहीं आती।

गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के बीच समन्वय की कमी के बारे में बात करते हुए श्री कंबोज ने कहा कि सेना के सुझावों के आधार पर गृह मंत्रालय को भेजे गए सभी प्रस्ताव ठुकरा दिए गए। उन्होंने एक चौंकाने वाला रहस्योद्घाटन किया कि यूपीए के शासनकाल में तत्कालीन गृह मंत्रालय के कारण ही सीमा सुरक्षा बल ने सशस्त्र बल विशिष्ट शक्ति अधिनियम का विवादास्पद विरोध प्रकट किया था। जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में उन्हें कहना पड़ा था कि उक्त अधिनियम को हटा देना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनके बयान ने तत्कालीन सेना कमांडर को हैरान कर दिया था। बाद में उन्हें उनसे माफी मांगनी पड़ी थी। उन्होंने बताया कि जम्मू-कश्मीर में बीएसएफ के आईजी के तौर पर उनकी राय भी सेना की ही तरह उस अधिनियम को निरस्त करने के खिलाफ थी। लेकिन मुझे गृह मंत्रालय से मिले निर्देश के तहत बात कहनी थी। उन्होंने कहा कि 2011 में यूपीए के दूसरे शासनकाल में चिदंबरम गृह मंत्री थे। सीमा क्षेत्र विकास निधि भी समन्वय की कमी से किसी और मद में चली जाती है। दूसरे सत्र की शुरुआत में आलोक बंसल द्वारा देश में पुलिस बल में कार्यरत पुरुषों और महिलाओं की दुर्दशा और भारतीय नागरिकों को पुराने कानूनों और जर्जर बुनियादी ढांचे के जरिए न्याय दिलाने की व्यवस्था पर दिए गए वक्तव्य पर कर्नाटक कैडर की आईपीएस अधिकारी और अब आईडीएसए के साथ काम कर रहीं श्रीमती प्रभा राम ने कहा कि पुलिस की बुनियादी समस्या भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 है जो एक पुराना ब्रिटिश अधिनियम है जिसे 1857 में आजादी की पहली लड़ाई के तुरंत बाद लागू किया गया था। आजादी के सात दशकों के बाद भी उसमें वास्तविक सुधार नहीं हुआ है। भारत में जनसंख्या-पुलिस अनुपात विश्व का   न्यूनतम है।

धन के अवैध या अनधिकृत हस्तांतरण से उपजे गंभीर खतरों के बारे में बात करते हुए श्रीमती प्रभा ने कहा कि पुलिसकर्मियों सहित लोगों को पता नहीं है कि यह प्रणाली कैसे काम कर रही है। लेनदेन का एक बहुत बड़ा हिस्सा हवाला के जरिए एक तय नियम के तहत नहीं होता। हवाला के माध्यम से बड़े पैमाने पर आपराधिक धन आ रहा है। भारत में नोटबंदी के बाद 'बिटकॉइन' की कीमत में जबरदस्त उछाल आया है।

हमारे पास इस्लामी आतंकवाद के मुकाबले खड़ी करने के लिए कोई कहानी नहीं है जबकि मुसलमान युवकों को मनगढ़त तस्वीरों के जरिए कट्टरपंथी बनाया जा रहा है। हमें उनका मुकाबला करने के लिए एक वैकल्पिक तस्वीर पेश करनी होगी। सीमावर्ती क्षेत्रों में भी पुलिस का काम बहुत मुश्किल भरा है जो एक गंभीर चिंता का विषय है। पुलिस बल के आधुनिकीकरण, डिजिटाइजेशन और साइबर सुरक्षा के बारे में 'पाञ्चजन्य' के संपादक श्री हितेश शंकर के उठाए सवालों का जवाब देते हुए श्रीमती प्रभा ने कहा कि इस संबंध में कैरियर को ज्यादा आकर्षक बनाने और साइबर सुरक्षा पर काम करने वालों को अधिक प्रोत्साहन देने की जरूरत है।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ विशाल सारस्वत ने सुझाव दिया कि पुलिस को ऐसे काम निजी एजेंसियों से आउटसोर्स कराने चाहिए। क्रिप्टोग्राफी से जुड़े लोगों की जानकारी और संवाद में बढ़ोतरी होनी चाहिए। श्रीमती प्रभा ने 'मालवेयर' संबंधी आशंकाओं को साझा किया और कहा कि आयातित हार्डवेयर के साथ कंप्यूटर वायरस आ सकते हैं जिन पर बहुत ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

रा. स्व. संघ के अ. भा. सह-संपर्क प्रमुख श्री अरुण कुमार भी सत्र में उपस्थित थे। दिन भर के विचार मंथन को समाप्त करते हुए संघ के अ. भा. सह प्रचार प्रमुख श्री जे़ नंदकुमार ने कहा कि सुरक्षा संबंधी जिन आशंकाओं और चुनौतियों का हम सामना कर रहे हैं, वे बेहद गंभीर हैं और उनका समाधान तुरंत होना चाहिए। सांसदों और नेताओं को इस दिशा में शिक्षित करना होगा। जब हम नागरिकों को पुलिस की तरह व्यवस्था को दुरुस्त रखने में अपना योगदान देने के लिए तैयार करने जैसे सुझावों पर विचार करते हैं तो राजनीतिकरण के भंवर में घुटती व्यवस्था में हमारे उद्देश्य भी दम तोड़ देते हैं। उन्होंने वक्ताओं के बहुमूल्य सुझावों की सराहना की और विचार विमर्श के आधार पर जरूरी कदम उठाने की बात कही। श्री प्रफुल्ल केतकर और हितेश शंकर ने सभी प्रतिभागियों और वक्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।

 

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