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मुस्लिम नाटो की घोषणा के पीछे सउदी अरब क्या चाहता है, यह तो कुछ समय के बाद साफ हो पाएगा। लेकिन पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष राहिल शरीफ को इसका मुखिया बनाए जाने के प्रस्ताव का पाकिस्तान में ही विरोध हो रहा है। शिया गुस्से में हैं। हैरानी की बात है कि आईएस के आतंक से पीडि़त कई देशों को इसका सदस्य नहीं बनाया गया
प्रशांत बाजपेई
' ना ट' शब्द सुनकर सबके कान खड़े हो जाते हैं। यह दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य गठबंधन है, और इसीलिए जब 'मुस्लिम नाटो' का जिक्र आए तो चर्चाओं का बाजार गर्म होना स्वाभाविक है। कुछ अरसा पहले सऊदी अरब ने घोषणा की कि 'आतंकवाद' से लड़ने के लिए एक 'इस्लामी नाटो' (इस्लामिक मिलिटरी एलायन्स टू फाइट टेररिज्म) बनाया जा रहा है, जिसमें सऊदी अरब, तुर्की, मिस्र, कतर, नाइजीरिया, मलेशिया समेत 34 देश शामिल होंगे। इस गठबंधन की घोषणा करते हुए सऊदी युवराज और रक्षा मंत्री 30 वर्षीय मुहम्मद बिन सलमान ने कहा कि इस इस्लामी सैन्य गठबंधन का उद्देश्य धरती पर अनाचार और मौत फैलाने वाले समूहों को खत्म करना है जो मासूम लोगों को आतंकित करते हैं। लेकिन सऊदी अरब का ताकतवर पड़ोसी ईरान इस मासूमियत पर भरोसा करने को तैयार नहीं हो सका। सवाल उठना लाजमी था कि ईरान, इराक और सीरिया जैसे महत्वपूर्ण देशों को बाहर रख कर आतंकवाद से लड़ाई कैसे लड़ी जाएगी? वह भी तब जबकि इस्लामिक स्टेट की पूरी शक्ति इराक और सीरिया में ही केंद्रित है। पाकिस्तान ने काफी समय तक खुद को इस रस्साकशी से दूर रखा। अब ताजा खबर यह है कि वह इस गठबंधन का हिस्सा है और पाकिस्तान फौज के सेवानिवृत्त हुए जनरल राहिल शरीफ इस मुस्लिम नाटो की कमान संभालेंगे। इस खुलासे के बाद नयी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गईं। सवाल उठा कि सारी दुनिया में आतंक का निर्यात करने वाली पाकिस्तानी फौज के मुखिया रह चुके राहिल इस महत्वपूर्ण ओहदे पर बैठ कर क्या गुल खिलाएंगे? पाकिस्तान के अंदर पूछा गया कि क्या पाकिस्तानी फौज और सरकार ने ईरान को भरोसे में ले लिया है? भारत के मीडिया में कुछ लोगों ने इसे पाकिस्तान का 'मास्टर स्ट्रोक' और मोदी की पश्चिम एशिया नीति का जवाब बतलाया।
सुन्नी मुस्लिम नाटो
सऊदी अरब की अपनी चिंताएं हैं। अरब की गुलाबी क्रांति (अरब स्प्रिंग) के बाद अरब राजनीति में आए मोड़ ने सऊदी खानदान को बेचैन कर रखा है। उत्तर में इस्लामिक स्टेट उसे चुनौती दे रहा है। पूर्व में चिर प्रतिद्वंद्वी ईरान है। दक्षिण में यमन में वह शिया विद्रोहियों से उलझा हुआ है। अमेरिका से उसके समीकरण भी गड़बड़ाए हुए हैं। जब मिस्र में हुस्नी मुबारक गृह युद्ध में उलझे हुए थे तब अमेरिका ने सऊदी इच्छाओं का ध्यान नहीं रखा। सीरिया में सऊदी अरब की नीति इस्लामिक स्टेट को हटाकर उतने ही कट्टर दूसरे सुन्नी आतंकियों को सत्ता में लाने की रही है। सीरिया के वर्तमान शासक बशर-अल-असद उसे फूटी आंख नहीं सुहाते। ओबामा प्रशासन असद को हटाना चाहता था लेकिन इस्लामिक स्टेट के विकल्प के रूप में दूसरा इस्लामिक स्टेट खड़ा करने में हिचकता रहा। इसे ही लेकर रूस के साथ उसकी नोक-झोंक चलती रही। शिया पेशमर्गा लड़ाकों के विनाश का इच्छुक तुर्की इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों की पनाहगाह बन गया। भड़के हुए रूस ने इस्लामिक स्टेट समेत सऊदी अरब समर्थित दूसरे सुन्नी जिहादियों पर बम बरसाने शुरू कर दिए। दूसरी तरफ अमेरिका में ट्रम्प सत्ता में आ गए, जिनके अंदर जिहादियों के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर कोई हिचक नहीं है। दूसरी तरफ ईरान ने अपने परमाणु अस्त्र कार्यक्रम को ठंडे बस्ते में डालकर अमेरिका से संबंध सुधार लिए हैं। अमेरिकी सीनेट में 9/11 के हमले में सऊदी भूमिका को लेकर चर्चा हो चुकी है। यानी दशकों से चले आ रहे सुन्नी मुस्लिम देशों और पश्चिमी शक्तियों के गठबंधन के समापन की शुरुआत हो चुकी है। सउदी अरब के सीमान्त में शियाओं पर अत्याचार, और शिया नेता अल-निमार का सिर कलम किए जाने से तनाव और बढ़ा है।
दूसरी चुनौती जिहाद के जिन्न की तरफ से है। पहले जिहाद काफिरों के विरुद्ध था, जिसकी घोषणा और नेतृत्व सुल्तान अथवा राज्य के हाथ में था। फिर नयी धारा खड़ी हुई कि कोई भी मुसलमान व्यक्तिगत तौर पर जिहाद के लिए हथियार उठा सकता है। इस तरह जिहाद सुल्तानों और खलीफाओं के हाथ से फिसल गया। काफिरों और कुफ्र की परिभाषा विस्तृत होती चली गई। अब अल कायदा और इस्लामिक स्टेट ने अरब जगत के सुल्तानों को काफिर और उनके शासन को कुफ्र घोषित कर रखा है। सउदी अरब के हजारों युवा बगदादी की तरफ से लड़ रहे हैं। तेल के दम पर फले-फूले ये शाही खानदान जानते हैं कि इस्लाम के नाम पर रेत भी उबलने लगती है। इसीलिए ये समय रहते जंग की कमान अपने हाथ में लेने की कवायद कर रहे हैं। युद्ध के मैदान के दांव-पेच और सामरिक समीकरण भी इन शाही खानदानों को मौका लपकने के लिए ललचा रहे हैं। सबसे ज्यादा उत्कंठित सऊदी अरब ही है। इस समय इस्लामिक स्टेट को सीरिया की फौजों ने रोककर रखा है। रूस और ईरान समर्थित शिया लड़ाके उत्तर से दबाव बना रहे हैं। अमेरिका समर्थित कुर्द लड़ाके भी मोर्चा संभाले हैं जबकि पूर्व में इराक की सेना उसे कड़ी टक्कर दे रही है। ऐसे में दक्षिण की तरफ हटता इस्लामिक स्टेट जॉर्डन और सऊदी अरब में ही घुसपैठ करेगा। सउदी सत्ता से नाराज भितरघाती बगदादी को आर्थिक मदद देते आए हैं। इस्लामिक स्टेट के आत्मघाती हमले की गूंज कुवैत से लेकर मक्का तक गूंज रही है।
कितना इस्लामी, कितना असरदार?
मुस्लिम जगत के अन्दर से ही सवाल उठाया जा रहा है कि इस्लाम के नाम पर विभाजित मुस्लिम देशों की सेनाएं साथ खड़े होकर कौन सा तीर मार लेंगी। इस्लाम की सर्वमान्य परिभाषा क्या है? आखिरकार गैबन, टोगो, बेनिन जैसे देश, जो मुस्लिम बहुल नहीं हैं परंतु ओआईसी (ऑर्गनाजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन) के सदस्य हैं। ईरान, इराक और सीरिया जैसे ओआईसी के प्रभावशाली देशों को इस मुस्लिम नाटो से बाहर रखा जाना इसकी क्षमताओं पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है। शिया-सुन्नी धड़ों में विभाजित पश्चिम एशिया की राजनीति पश्चिम (अमेरिका तथा यूरोप) के विरोध के मुद्दे पर जितनी जनभावनाएं भड़का लेती हैं, उसका एक अंश भी अल कायदा और इस्लामिक स्टेट के विरुद्ध नहीं भड़का सकी हैं। यानी 'काफिर' अमेरिका के खिलाफ नारे लगवाना आसान काम है परंतु अपनी वर्जनाओं के खिलाफ जाना बेहद कठिन है। मामला इन राज्यों द्वारा स्वीकृत इस्लामी धारणाओं का भी है। 19-20 के अंतर को छोड़कर इस्लामिक स्टेट, और उसके खिलाफ लड़ रहे दूसरे सुन्नी जिहादी तथा सऊदी अरब, कतर व कुवैत जैसे देशों की विचारधाराएं एक जैसी हैं। इनके सरकारी पाठ्यक्रम भी अत्यंत कट्टर ज्वलनशील सामग्री से भरे हुए हैं। ये देश जिस आतंकवाद से लड़ने के लिए गठबंधन बना रहे हैं, उस आतंकवाद को पोषित करने वाली खाद इनके विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में बिखरी पड़ी है। शियाबहुल ईरान और उनके सुन्नी दुश्मन बगदादी के दरिंदे समलैंगिकों की समान उत्साह और प्रतिबद्घता से हत्याएं करते हैं।
इन तमाम विडंबनाओं के बीच लड़ाई के मोर्चे का दृश्य इस प्रकार है। मुस्लिम नाटो का नेता सऊदी अरब इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ने को प्रतिबद्ध है लेकिन इस्लामिक स्टेट से खूनी जंग लड़ रहे सीरिया के बशर-अल-असद को भी मिटाना चाहता है। मुस्लिम नाटो का दूसरा शक्तिशाली देश तुर्की अब बगदादी के खिलाफ लड़ने की कसमें खा रहा है, लेकिन बगदादी के खिलाफ बहादुरी से लड़ रहे पेशमर्गा लड़ाकों को नेस्तनाबूद करने पर तुला हुआ है। ईरान, सऊदी अरब इराक की जमीन पर इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ते दिखते हैं जबकि यमन में एक-दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं। अरब जगत इस्लामिक स्टेट के विरुद्ध है, लेकिन इसके खिलाफ लड़ रहे दूसरे खतरनाक सुन्नी आतंकियों को पैसा और हथियार मुहैया करवा रहा है। ईरान शिया आतंकी गुट हिज्बुल्ला को पाल-पोस रहा है। रूस सभी सुन्नी गुटों पर कार्रवाई करना चाहता है तो अमेरिका हिज्बुल्ला को काबू करना चाहता है। इस सबके बीच सारी दुनिया में आतंकवाद निर्यात करने वाली पाकिस्तानी फौज का पूर्व मुखिया इस आतंक विरोधी इस्लामी नाटो का नेतृत्व करने आया है।
जाहिर है कि यह गठबंधन प्रारंभ से ही पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों से ग्रस्त है। मुस्लिम उम्मा की एकता का स्वप्न देखने वाले आशाजीवियों की उम्मीदें कितने समय तक जीवित रह पाएंगी, कहना मुश्किल है। राहिल शरीफ को यह नेतृत्व स्वीकार करना चाहिए या नहीं, इसको लेकर पाकिस्तान के अंदर चर्चाएं जोरों पर हैं। शिया नेता बिफरे हुए हैं। भारत का इस उठापटक से सीधे तौर पर कोई लेना-देना नहीं है। अन्य एशियाई शक्तियों की तरह भारत भी इससे सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए संतुलन साध सकता है।











