क्रांति-गाथा-27 - बम का कारखाना
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क्रांति-गाथा-27 – बम का कारखाना

Written byArchiveArchive
Dec 26, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 26 Dec 2016 14:42:55

-शिव वर्मा-
अवसर पाकर मैं दूसरी अलमारी की ओर लपका। उसमें बम की टोपियां और रिवाल्वर थे। मरकरी फिलामेंट की बनी वे टोपियां काफी नाजुक थीं और कभी-कभी गर्मियों के दिनों में मामूली रगड़ या लापरवाही से भी आग पकड़ लेती थीं। इसलिए हम बमों पर टोपियां लगाकर नहीं रखते थे। यह हमारा आखिरी मौका था। रिवाल्वर और टोपियां हाथ आ जाने से उनके सहारे लड़ते-भिड़ते निकल भागने का प्रयास हो सकता था।
मैं टोपियों वाली अलमारी तक पहुंच ही पाया था कि एक लंबे तगड़े व्यक्ति ने मुझे पीछे से पकड़ लिया और चिल्लाया। शोर सुनकर कुछ और लोग वापस आ गये। देखते-देखते सबने मिलकर मुझे जमीन पर पटक दिया। बगैर टोपी के बम निष्प्राण था, वह छीन लिया गया। फिर तो हर भागने वाला व्यक्ति सूरमा बन गया। किसी ने बाल नोंचे, किसी ने ठोकरें लगायीं, किसी ने घूसों से मरम्मत की। एक व्यक्ति सीने पर सवार था। वह हर घंूसे के साथ गालियां देता और कहता, साला मरना चाहता था। लात, घूसों, ठोकरों का क्रम कितनी देर चला, यह मैं नहीं कह सकता। हां, इतना जरूर कह सकता हूं कि उतनी मार जीवन में मैंने न पहले कभी खायी थी और न बाद में कभी खायी।
जयदेव भी गिरफ्तार
जिस समय कमरे के अंदर लात-घूसों से मेरी मरम्मत हो रही थी उसी समय बाहर मकान के आंगन में एक और ड्रामा चल रहा था। पकड़ने की आज्ञा देने वाला उच्चाधिकारी वापस आ गया था। जयदेव को हथकड़ी पहनाकर कुछ पुलिस वालों ने आंगन में ही रोक लिया था। अधिकारी अभी तक संभल नहीं पाया था। जयदेव की ओर अपना रिवाल्वर तान कर उसने कहा, बम रख दो, वर्ना अभी गोली मार दूंगा। घबराहट में वह रिवाल्वर की नली ठीक करना भूल गया था और वह नीचे की ओर झूल रही थी। उसके हाथ बेतहाशा कांप रहे थे और उसी हालत में वह चिल्लाये जा रहा था, ''बम रख दो। मैं कहता हूं, बम रख दो नहीं तो गोली मार दूंगा।''
बुजदिल पुलिस अफसर
  अधिकारी की हालत देखकर उस वातावरण में भी जयदेव को जोर की हंसी आ गयी। गोली मारने से पहले अपना रिवाल्वर तो ठीक कर लीजिये, उसने हंसते हुए कहा। झेंप मिटाने के लिए वह जयदेव के पास से हटकर मेरे निकट आ गया। डर के कारण कमरे में घुसने का उसका साहस नहीं हुआ। घबराहट में वह अब भी उसी बदहवासी के साथ कमरे के बाहर से ही चिल्लाये जा रहा था—''बम रख दो नहीं तो गोली मार दूंगा। मैं कहता हूं उसके हाथ से बम छीन लो। बांध लो इसे, हथकड़ी डालो, जल्दी करो'', आदि। मजे की बात यह थी कि उस समय तक हम दोनों अच्छी तरह काबू आ चुके थे, फिर भी वह बुजदिल डिप्टी सुपरिटेंडेंट उस समय तक कमरे में नहीं घुसा जब तक उसे पूरा यकीन नहीं हो गया कि मेरे हाथ से बम छीन लिया गया है।
ड्रामे का पहला दृश्य समाप्त हो चुका था। हथकडि़यां डालकर हम दोनों को आंगन की एक चारपाई पर बैठा दिया गया। घर का सारा सामान बाहर निकाला गया और उसकी सूची बनाई जाने लगी। यह कई घंटों का काम था। हमें शहर कोतवाल के हाथ सौंपकर वह बुजदिल अधिकारी जिला मजिस्ट्रेट को अपनी 'बहादुरी' की रिपोर्ट देने चला गया।
कुछ ही देर में जिला मजिस्ट्रेट तथा सुपरिटेंडेंट भी आ गये। वे दोनों अंग्रेज थे। जिला मजिस्ट्रेट ने हमारे सामने ही शहर कोतवाल तथा दूसरे पुलिस वालों को उनकी बुजदिली के लिए लताड़ा। डिप्टी सुपरिटेंडेंट मिस्टर जोशी को उनकी बहादुरी पर बधाई दी और एडीशनल डिस्ट्रक्टि मजिस्ट्रेट रहमान बख्श कादरी को हमारी जिम्मेदारी देकर चला गया।
जोशी ने जिला मजिस्ट्रेट और सुपरिटेंडेंट को यह रिपोर्ट दी कि जब जवानों ने उन्हें मारने के लिए बम उठाये और उसने अपने मातहत लोगों को उन्हें पकड़ने का आदेश दिया तो सब लोग अपनी जान बचाकर भाग निकले। उस समय पिस्तौल दिखाकर उसने अकेले ही दोनों नौजवानों से बम रखवा लिये। इस प्रकार जिस शहर कोतवाल ने अपनी जान जोखिम में डालकर मुझे पकड़ा था, वह साफ काट दिया गया और सारी बहादुरी का सेहरा उस बुजदिल ने अपने सर ले लिया।
कुछ देर बाद जब वातावरण की गर्मी कुछ शांत हुई तो कोतवाल तथा कादरी ने पूछा कि जब हम लोगों के पास इतने बम तथा रिवाल्वर थे तो हम लोगों ने उन्हें मारा क्यों नहीं?
उत्तर में मैंने कह दिया कि हम लोग अपने ही भाइयों के खून से अपने हाथ रंगना नहीं चाहते थे। जिनके लिए हम लोग यह सब कर रहे हैं उन्हीं को मार कर हमारे हाथ में रह ही क्या जाएगा। हां, यदि कोई अंग्रेज सामने आया होता तो निश्चय ही अपने हथियारों का इस्तेमाल करने में हमें तनिक भी हिचकिचाहट न हुई होती।
पुलिस कोतवाल का पश्चाताप
मेरा वह उत्तर एक बहाना भर था। वास्तविकता तो यह थी कि बगैर सोचे-समझे मकान का दरवाजा खोल देने की अपनी भूल के कारण हम ऐसे घिर गये थे कि हथियार काम में लेने का हमें अवसर ही नहीं मिल सका। लेकिन बहाना होने पर भी मेरा उत्तर काम कर गया और वहां उपस्थित पुलिस के अधिकांश व्यक्तियों ने मेरी बात की सत्यता पर विश्वास कर लिया। मेरा उत्तर सुनते ही कोतवाल माथे पर हाथ रख कर जमीन पर बैठ गया। उसने कहा, ''हम लोग रोटी के टुकड़ों पर दुम हिलाने वाले कुत्ते हैं, और दो-चार कुत्तों के रहने या न रहने से कोई अंतर नहीं पड़ता। हमें बचाकर आपने नाहक अपने आपको खतरे में डाला। यह तो कुत्तों के लिये देवताओं के बलिदान की सी बात हो गयी।''
जब पुलिस-सिपाही रोये
कुछ पुलिस के सिपाही तो हमारे उत्तर पर दहाड़ मारकर रो पड़े, बोले, ''हम से तो कहा गया था कि कुछ कोकेन बेचने वालों को घेरना है। हमें क्या पता था कि इस बहाने हमारे हाथों कुछ कौमपरस्तों को फंदे में फंसाया जायगा।'' मजिस्ट्रेट कादरी साहब ने भी कहा कि इसमें संदेह नहीं कि ये लोग यदि चाहते तो हम सब लोगों को मार सकते थे।
1929 में जनसाधारण में विदेशी शासन के प्रति गहरा असंतोष था, यह मैं जानता था। लेकिन वह असंतोष पुलिस के साधारण सिपाहियों तक में पहुंच चुका है, इसका वह पहला अनुभव था। मैं ऊंचे अधिकारियों की बात नहीं कहता, लेकिन साधारण सिपाहियों में निश्चय ही मुक्ति-आंदोलन के प्रति सहानुभूति के बीज पड़ चुके थे। यह सहानुभूति पुलिस ही नहीं, सेना के अंदर भी पहुंच चुकी थी और श्री चंद्रसिंह गढ़वाली के नेतृत्व में गढ़वाली पल्टन का विद्रोह (1930) उसी का परिणाम था। यहां मैं इस बात को भी छिपाना नहीं चाहता कि कोतवाल तथा सिपाहियों के उन शब्दों ने, भावुकता के सहानुभूतिपूर्ण उन उद्गारों ने मुझे काफी बल दिया और स्वाधीनता संग्राम की सफलता पर मेरा विश्वास और गहरा हो गया।
वह आभार प्रदर्शन
दिन के लगभग तीन बजे सामान की सूची बनकर तैयार हुई। ''हम लोग आपको सीधे जेल ले चल रहे हैं,'' कादरी साहब ने आकर कहा। उन्होंने कहा, ''संभवत: कल या परसों तक पंजाब, दिल्ली तथा अपने प्रांत के गुप्तचर विभाग के अधिकारी यहां आ जाएंगे और तब आप दोनों को एक-दूसरे से मिलने नहीं दिया जाएगा। अभी मैं ऐसा प्रयास करूंगा कि जेल में आप दोनों को एक ही साथ रख दिया जाय। यह व्यवस्था शायद कल से अधिक न ठहर सके। आप बैठकर आज रात में ही सफाई के बारे में आपस में परामर्श कर लें।'' फिर कुछ रुककर बोले, ''आप लोगों ने हमारी जान न लेकर अपने ऊपर संकट ओढ़ लिया है। व्यक्तिगत तौर पर हम सब लोग इसके लिए आपके आभारी हैं।''
 हथकडि़यां : देशभक्त का श्रृंगार
हमें जेल पहुंचाने के लिए पुलिस का ट्रक आ गया था। हमारे दोनों हाथों में हथकडि़यां थीं। अस्तु, दो सिपाहियों ने सहारा देकर हमें उस पर पहुंचा दिया। बाकी लोग सामान चढ़ाने में लग गये। इस बीच क्रांतिकारियों के बम का कारखाना पकड़े जाने का समाचार सारे शहर में फैल चुका था और हजारों की संख्या में लोग हमें देखने के लिए मकान से बाहर जमा थे। उस समय उस जनसमूह को देखकर भी मेरा ध्यान उसकी ओर नहीं गया।
ट्रक पर सवार होते वक्त मैंने घूमकर अपने मकान को देखा। मैं जानता था कि आने वाले कुछ दिनों तक नियमित रूप से उसके अंदर पुलिस बैठेगी और तब पनाह देने वाला वह मकान ही हमारे साथी डाक्टर गया प्रसाद के लिए जाल बन जाएगा। डाक्टर साहब पंजाब में काफी दिन रह चुके थे और सुखदेव की गिरफ्तारी के बाद पंजाब से जो हमारे सूत्र टूट गये थे उन्हें पुन: स्थापित करने में दल के लिए वे काफी उपयोगी सिद्ध हो सकते थे। इसके अतिरिक्त उनकी गिरफ्तारी की संभावना पर चिंतित होने के मेरे कुछ और भी कारण थे।
योगेश चटर्जी का पत्र…
काकोरी केस के सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी श्री योगेश चटर्जी का एक पत्र आया था जिसमें उन्होंने जेल से बाहर आने की एक नयी योजना प्रस्तुत की थी। उससे पूर्व हम उन्हें जेल से निकालने के दो प्रयास कर चुके थे। योगेश बाबू को उस समय लखनऊ के कांग्रेसी नेता श्री चंद्रभानु गुप्त का नाम दिया था। डाक्टर साहब को रुपयों के लिए कानपुर और झांसी भेजते समय मैंने वह पत्र भी उन्हें ही दे दिया था। वैसे प्राथमिकता के नाते उस समय हम अपनी सारी शक्ति भगतसिंह और दत्त को छुड़ाने पर ही केन्द्रित कर रहे थे। फिर भी झांसी में आजाद को पत्र दिखाकर उनसे परामर्श कर लेने के लिए मैंने उनसे कह दिया था। यदि वह पत्र डाक्टर साहब के पास पकड़ा गया तो जेल में योगेश बाबू पर क्या बीतेगी, यह विचार मुझे परेशान करने लगा।
मां के आशीष का प्रतीक अंगूठी
एक सोने की अंगूठी भी परेशान कर रही थी। 1928 की बात है। परिस्थितियों ने मेरे साथ-साथ विजय कुमार सिन्हा, सुरेन्द्र पाण्डेय और ब्रह्मदत्त मिश्र को घर छोड़ कर फरार होने के लिए बाध्य कर दिया था। उस समय विजय की मां ने अपने आशीर्वाद के रूप में विजय को एक अंगूठी पहना दी थी। वह अंगूठी एक प्रकार से मां की ममता, उनका आशीर्वाद, उनकी यादगार सब कुछ थी-सबकी एक मिली-जुली प्रतीक जैसी। और फिर आगरा में जब हम दोनों एक दूसरे से अलग हुए तो विजय ने वह अंगूठी मेरी उंगली में डाल दी। यहां यह कह देना भी असंगत न होगा कि उस समय विजय का मुझ पर गहरा विश्वास था। अपने उस विश्वास के कारण कई अवसरों पर उन्होंने अपने आप को पीछे रख कर मुझे आगे बढ़ने का अवसर भी दिया था। आगे चलकर फरारी के दिनों में वही विश्वास दो हमराहियों के स्नेह में बदल गया। और सच बात तो यह है कि विश्वास की रेखा कहां से आरंभ होती है, इसका निर्णय कोई भी दार्शनिक अथवा वैज्ञानिक अभी तक नहीं कर पाया है। मैं जानता था कि विजय के निकट मां के आशीर्वाद की प्रतीक वह अंगूठी एक प्रकार का महाकवच था और जब उन्होंने मेरी उंगली में पहनाते हुए कहा, 'इसे रख लो, संकट के समय यह तुम्हारे काम आयेगी', तो मुझे ऐसा लगा मानो किसी ने अपना कवच उतारकर मुझे पहना दिया हो। उस समय मैंने वह अंगूठी ले ली। लेकिन सहारनपुर पहुंच कर मुझे लगा जैसे मैंने एक मां की ममता के प्रति अन्याय किया है। वैसे विजय की मां उस समय हम सभी क्रांतिकारियों की मां बन गयी थीं और उस नाते उस कवच को हममें से कोई भी साधिकार धारण कर सकता था। फिर भी वह दिया गया था विजय को ही। फिर संकट के समय वह उनके भी तो काम आ सकता था। मैंने पहले उपयुक्त अवसर पर उसे विजय को वापस कर देने का मन ही मन निश्चय कर लिया था।
बम का मसाला तैयार करते समय मैंने उसे उंगली से निकाल कर पर्स में रख दिया था और जब डाक्टर साहब कानपुर चले तो गलती से वह उन्हीं के साथ पर्स में चली गई थी। डाक्टर साहब के साथ यदि वह अंगूठी भी चली गई तो… मेरे सामने विजय की मां की तस्वीर आ गई। मुझे लगा जैसे अनजाने ही मैंने क्रांतिकारियों की मां के आशीर्वाद का अपमान कर डाला है।
हाथ लहराते रहे
अपनी उन सभी दिगामी उलझनों में मैं इतना खो गया था कि अपने चारों ओर खड़े हजारों व्यक्तियों की ओर मेरा ध्यान ही नहीं गया। तभी ड्राइवर ने चाबी घुमाई और जयदेव ने ऊंचे कंठ से कहा-इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद का नाश हो, सर्वहारा वर्ग चिरंजीवी हो। गाड़ी धीरे-धीरे रेंग चली। मेरा दिवास्वप्न टूट गया और सैकड़ों हाथ हवा में लहरा कर हमें विदाई देने लगे। मैंने भी जयदेव के स्वर में स्वर मिलाकर नारा दिया, इंकलाब जिंदाबाद। नारे लगते रहे, आसमान गूंजता रहा, हाथ हवा में लहराते रहे, कुछ मैले अंगोछे, कुछ रंगीन दुपट्टे बार-बार आंखें पोंछते रहे और फिर वे हमारी निगाह से ओझल हो गए।
मैंने अपने चारों ओर एक हसरत भरी निगाह डाली। उस समय बाहर की हर चीज मुझे ममता भरी निगाह से ताकती सी जान पड़ी। हर वृक्ष, हर मकान, शहर और जेल के बीच सड़क के दोनों ओर का हर खेत, खेतों की मेड़ पर कहीं-कहीं उगी घास का हर तिनका और उस घास की तलाश में इधर-उधर भटकने वाली हर गाय जैसे मुझे ही ताक रही हो। कल तक जिनकी ओर एक क्षण के लिए भी मेरा ध्यान नहीं गया था उनमें भी अचानक एक आकर्षण सा पैदा हो गया। क्या यह सब जीवन में अब फिर कभी देखने को नहीं मिलेगा? मेरा यह देश, इसके पहाड़ और नदियां, हरे-भरे खेत, खेतों पर काम करने वाले किसानों के बिरहे की तान, शाम को घर आती गायों, भैसों और बकरियों की घंटियों की आवाज, चरवाहे की बांसुरी का स्वर, सवेरे और शाम की इठलाती हुई मंद बयारें, झूमती बरसातें, बच्चों की किलकारियां, उनकी मुस्कानें, मांओं की ममता भरी निगाहें, तरुणियों की अलकें, उनके लहराते हुए रंगीन दुपट्टे, आपसी अठखेलियां और शिकवे-श्किायतें, बुजुर्गों का आशीर्वाद, क्या यह सब स्वप्न बन जाएगा? निर्दिष्ट स्थान पर आकर पुलिस की गाड़ी रुकी। सिपाही कूद कर उसके दोनों ओर कतार में खड़े हो गये।  दो सिपाहियों ने सहारा देकर हमें नीचे उतार लिया। सामने एक बहुत-बड़े फाटक पर मोटे अक्षरों में लिखा था-जिला जेल सहारनपुर। ल्ल

बांदा के नवाब का नानासाहब के नाम पत्र
सेवा में,
बिठूर के नाना साहब बहादुर
मेरे पूज्य तथा आदरणीय चाचा
आप सदैव सर्वोच्च बने रहें….
अपनी शुभकामनाएं तथा चरणस्पर्श के पश्चात मैं आपको स्मरण दिलाना चाहता हूं कि कुछ दिन पहले मैंने अपने विश्वासपात्र दूत माधोराव पंत के हाथ एक पत्र भेजा था, उसमें आपको बांदा की परिस्थिति से अवगत कराया था, साथ ही साथ आप से कुछ सैनिक तथा युद्ध सामग्री भेजने की प्रार्थना की थी…
माधोराव के प्रार्थना पत्र से यह शुभ समाचार पाकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि आप बुधवार को सिंहासनारूढ़ हो गये हैं। ईश्वर आपको चिरायु करें। मैं 21 स्वर्णमुद्रा भेंट के रूप में भेजता हूं, आशा है, स्वीकार करेंगे।
आपकी सरकार सदैव बनी रहे।
-अली बहादुर
बांदा-फाइल सं. 28-35

 मैं देशवासियों को भूख से मरता नहीं देख सकता
इतनी महंगी रोटी कौन खा सकता है? 5 रुपए का पांच सेर अनाज! उफ! अंग्रेजी राज ने हजारों भारतीयों को भूखों मार डाला! यह शासन कहता कुछ है-करता कुछ है। इसका हर काम धोखे से भरा है। एक मजबूत संगठन खड़ा करना चाहिए। लोगों को जगाने की जरूरत है-क्रांति से ही यह स्थिति बदलेगी…।
मैं अपने देशवासियों को भूख से मरता नहीं देख सकता।
अगर मुझे 5000 रुपए मिल जाएं तो मैं पूरे देश में अपने आदमी भेजकर क्रांतिकार्यों को संगठित करने में सफल हो जाऊंगा।
-शहीद क्रांतिकारी वासुदेव बलवंत फड़के की डायरी से 

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