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गाथा दृढ़ता और पराक्रम की

Written byArchiveArchive
Dec 19, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 19 Dec 2016 14:38:10

 

21 से 23 दिसंबर, 1704 के दौरान तीन दिन तक गुरु गोबिंद सिंह और मुगलों की अगुवाई वाली गठबंधन सेना के बीच यह युद्ध लड़ा गया था। इस युद्ध से जहां किसानों के बीच संगठित सैन्य विचारधारा प्रवाहित हुई थी, वहीं इतिहास में दो सबसे ताकतवर साम्राज्यों (मुस्लिम और अफगान) का पतन भी हुआ था। साथ ही, एक नई शक्ति-सिख साम्राज्य का उदय भी इसी युद्ध के बाद हुआ था। 

 

जयबंस सिंह
पश्चिमी जगत के इतिहास में उन युद्धों का विस्तृत विवरण मिलता है जिन्होंने वहां के इतिहास को बदल डाला। वे युद्ध वहां की लोकगाथाओं का भी अंग बने हैं। 1777 की साराटोगा की लड़ाई और 1815 का वाटरलू का युद्ध ऐसे ही दो उदाहरण हैं। इसी तरह भारत के इतिहास को बदलने वाले महान युद्धों का लेखा-जोखा एकत्र किया जाए तो चमकौर के युद्ध का बहुत बड़ा महत्व है। 21 से 23 दिसंबर, 1704 के दौरान तीन दिन तक गुरु गोबिंद सिंह और मुगलों व राजपूत सरदारों के बीच यह युद्ध लड़ा गया था।
इस युद्ध से जहां किसानों के बीच संगठित सैन्य विचारधारा प्रवाहित हुई थी, वहीं इतिहास में दो सबसे ताकतवर साम्राज्यों (मुस्लिम और अफगान) का पतन भी हुआ था। साथ ही, एक नई शक्ति—सिख साम्राज्य का उदय भी इसी युद्ध के बाद हुआ था। इस लड़ाई से सिखों के दसवें और अंतिम गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह की विरासत सबके सामने आई थी, जिसके जरिए दुनिया ने बेहतरीन योद्धाओं और सबसे परोपकारी समुदाय का उदय होते देखा था।
चमकौर के युद्ध में अपने दो बेटों और 40 अनुयायियों के साथ गुरु गोबिंद सिंह ने मिट्टी की दीवारों वाली एक छोटी-सी हवेली में मुस्लिम अगुवाई वाली गठबंधन सेना के खिलाफ मोर्चाबंदी की थी। उस दौरान दुश्मन की 1,000 सैनिकों की सेना पैदल और घुड़सवार सैनिकों सहित ढेरों बंदूकों से लैस थी।
गुरु गोबिंद सिंह जी प्रतिष्ठित परिवार से संबद्ध थे। सिखों के आध्यात्मिक गुरु होने के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व में एक संत, सिपाही, बुद्धिजीवी, कवि और दूरदर्शी दार्शनिक के गुण भी थे। गुरु गोबिंद सिंह द्वारा अपनाई गई नीतियों की जड़ें उनके प्रपितामह और सिखों के पांचवें गुरु श्री अर्जुन देव के सिख पंथ पर अडिग रहने के कारण मुगलों द्वारा प्रताड़ना देकर जान से मार देने की घटनाओं में थीं। गुरु अर्जुन देव की शहीदी के कारण ही शांतिप्रिय कृषक समुदाय को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए हथियार उठाने पड़े थे।
गुरु अर्जुन देव के सुपुत्र गुरु हरगोबिंद जी को उनके उत्तराधिकारी के तौर पर सामयिक एवं धार्मिक शक्तियां सौंपी गई थीं। वह पंथ के पहले संत-सिपाही बने और राजशाही के साथ-साथ सशस्त्र सेना की भी कमान संभाली थी। इसी दौरान मुगल शासकों के वर्चस्व के साथ संघर्ष की नींव भी पड़ी थी। गुरु हरगोबिंद जी के बाद के तीनों गुरुओं—गुरु हर राय, गुरु हरकिशन एवं गुरु तेग बहादुर ने भी अपनी सेनाएं रखीं परंतु वे मूलत: शांतिप्रिय थे। लेकिन गुरु गोबिंद सिंह जी की परवरिश ऐसे माहौल में हुई थी जहां उनकी शिक्षा में आध्यात्मिक एवं अन्य आयामों के साथ-साथ शस्त्रकला भी सिखाई जाती थी।
मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा कश्मीरी पंडितों को जबरन इस्लाम कबूल कराने से बचाने के लिए गुरु गोबिंद सिंह के पिता गुरु तेग बहादुर ने 11 नवंबर, 1675 को शहादत को गले लगाया था। छोटी उम्र में पंथ के आध्यात्मिक नेता बनने के बाद ही गुरु गोबिंद सिंह ने अपने समुदाय को हर तरह के जुल्म और शोषण का विरोध करने वाली ताकत के तौर पर तैयार किया था। उनकी सेना में सिख और मुस्लिम, दोनों थे। उन्होंने मुगलों एवं अन्य शोषकों के खिलाफ कुछ लड़ाइयां भी लड़ीं। इनमें से सबसे मशहूर आज के देहरादून के निकट पौंटा में 18 सितंबर, 1688 को लड़ी गई भंगानी की लड़ाई थी। इसके अलावा, उन्होंने हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा के निकट 20 मार्च, 1691 को नादौन की लड़ाई भी लड़ी थी।

उस समय तक गुरु गोबिंद सिंह जी को पता चल चुका था कि उनका पंथ और अन्य निरीह लोग मुस्लिम शासकों का विरोध करके ही अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकते हैं। अत: इसी कारण उन्होंने 30 मार्च, 1699 को खालसा पंथ की स्थापना की थी।
खालसा को केश, कंघा, कड़ा, कृपाण एवं कच्छ जैसी पांच विशिष्ट पहचान दी गई थी। खालसा को सशस्त्र एकजुटता और असहाय लोगों की सुरक्षा के लिए एकमत से निर्णय लेने हेतु तैयार किया गया था। भारतीय सशस्त्र सेनाओं को पोशाक, प्रशिक्षण एवं अनुशासन संबंधी एकरूपता देने के लिए पश्चिमी इतिहासकार अपने देशों को श्रेय देते हैं। जबकि सच यह है कि गुरु गोबिंद सिंह जी औपनिवेशिक ताकतों के भारत आने से कहीं पहले यह विशिष्ट पहचान दे चुके थे। गुरु गोबिंद सिंह जी की शहीदी के बाद लंबे अरसे तक खालसा सेना खुद को दुश्मन से अलग पहचान देने के लिए इन प्रतीकों का इस्तेमाल करती रही; इसके आधार पर वह अपने गुरु की विरासत और उनके द्वारा दी गई जिम्मेदारी को दिल-दिमाग में रखते हुए युद्धभूमि में सक्रिय रही।
खालसा के गठन के बाद बड़ी संख्या में लोग इसकी ओर आकर्षित हुए। गुरु गोबिंद सिंह जी की बढ़ती ताकत देखकर पहाड़ी राजशाही सकते में आ गई और उसे दबाने के लिए उन्होंने मुगलों से गुहार लगाई थी। तत्पश्चात् मुगलों और पहाड़ी राजकुमारों की गठबंधन सेना ने सिख सेनाओं पर हमला बोला जो उस समय सामरिक तौर पर पांच किलों में फैली हुई थी। उस दौरान गुरु गोबिंद सिंह अपने परिवार की महिलाओं और छोटे बच्चों के साथ आनंदपुर साहिब के दुर्ग में थे।
हमलावर सेना को तुरंत जीत हासिल नहीं हुई और गुरु गोबिंद सिंह जी को उनकी सेनाओं से अलग करने के लिए हमलावर सेना को आनंदपुर साहिब के किले को घेरना पड़ा। परंतु इसके बावजूद खालसा सेना नहीं झुकी। हमलावर सेना पर तोपों से हमला हुआ और उन पर छापामार हमले भी हुए जिनमें उनकी रसद खालसा सेना के हाथ आई और हमलावर सेना को भारी नुकसान पहुंचा। दुर्ग पर हमले के उनके सभी प्रयास नाकाम रहे।
सात महीने तक युद्ध के हालात बने रहे थे। इस दौरान मुगल-राजपूत सेनाओं की व्यूह रचना तितर-बितर हो गई और उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा था। परिस्थिति को देखते हुए औरंगजेब ने गुरु गोबिंद सिंह, उनके परिवार और अनुयायियों को सुरक्षित वहां से चले जाने का शांति संदेश भेजा था; अन्य राजाओं ने भी संदेश में अपनी सहमति जताई थी।
गुरु गोबिंद सिंह इस प्रस्ताव को मानने को तैयार नहीं थे क्योंकि वह जानते थे कि दुश्मन भी अपनी अंतिम सांसें ले रहा है और जल्दी ही सर्दियां शुरू होने के कारण उसे अपना घेरा उठाना पड़ेगा। फिर भी, महिलाओं और बच्चों की हालत देखते हुए और अपनी माता के दबाव में उन्हें वह प्रस्ताव मानना पड़ा।
लिहाजा, दिसंबर की एक सर्द रात को गुरु गोबिंद सिंह जी अपने परिवार के साथ आनंदपुर साहिब किले से निकले। उनके खुले में पहुंचने की देर थी कि दुश्मन ने सरसा नदी के किनारे फिर उन पर हमला बोल दिया। पीछे चल रहे सिख योद्धा जिस बहादुरी के साथ लड़े उसकी इतिहास में कोई और मिसाल नहीं मिलती। इसी कारण गुरु अपने दो बड़े बेटों—अजित सिंह और जुझार सिंह एवं 40 खालसा सिपाहियों के साथ नदी पार कर सके थे। दुर्भाग्यवश, इस आपाधापी में उनकी माता गूजरी और दोनों छोटे बेटों, जोरावर सिंह एवं फतेह सिंह उनसे बिछड़ गए। उन्हें बाद में सरहिंद के शासक ने पकड़ लिया था और दोनों साहिबजादों को जिंदा दीवार में चिनवा दिया। गुरु के पीछे चल रही सैन्य टुकड़ी भी उस मुठभेड़ में काम आई थी। इसके बाद, गुरु के दल ने चमकौर की हवेली में शरण ली थी। दुश्मन गुरु गोबिंद सिंह और उनके सिपाहियों से इतना डरा हुआ था कि उसने एक बार फिर उन्हें वहां से सुरक्षित निकल जाने की पेशकश की, लेकिन गुरु ने उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया। इसके बाद घेराबंदी और मुठभेड़ का एक और अमिट अध्याय लिखा गया था।

सिख लड़ाकों ने हवेली की चारदीवारी में से शत्रु पर तीरों की बरसात कर दी थी। छोटी-छोटी टुकडि़यों में वे बाहर निकल कर उन पर तेजी से हमले करते रहे। वे हमले आज के आत्मघाती हमलों जैसे ही थे। इससे दुश्मन खेमे में अफरातफरी मच गई। मरने से पहले खालसा योद्धा बड़ी संख्या में शत्रुओं का सफाया कर रहे थे। गुरु गोबिंद सिंह के युवा बेटे अजित सिंह और जुझार सिंह भी अंतिम सांस तक लड़ते रहे थे। अंत में केवल 11 खालसा सिपाही बचे थे, उनकी शक्ति पूरी तरह से क्षीण हो चुकी थी, ऐसे में उन्होंने गुरु को खालसा प्रतिज्ञा याद दिलाई जिसके बाद गुरु को किले से निकल जाने की अपने 5 अनुयायियों की सलाह माननी पड़ी। इसके बाद शेष बचे खालसा सैनिक अंतिम सांस तक लड़े। उनमें से एक ने दुश्मन को धोखा देने के लिए गुरु की पोशाक पहन ली थी। ऐतिहासिक सत्य यह है कि गुरु गोबिंद सिंह को वहां से निकालने में उनके कई अनुयायियों ने मदद की थी, जिनमें मुस्लिम भी थे; बाद में माछीवाड़ा में एक और लड़ाई हुई थी जिसके बाद वह दीना नामक सुरक्षित स्थान पर पहुंचे थे। दीना में उन्होंने औरंगजेब के नाम जफरनामा नामक ऐतिहासिक पैगाम लिखा था।
जफरनामा में गुरु गोबिंद सिंह ने लिखा कि औरंगजेब अपने चाटुकार सेनापतियों और सिपहसालारों का गुलाम है। इसके बाद औरंगजेब को एहसास हुआ कि उससे बहुत बड़ी गलती हुई है। प्रायश्चित के लिए उसने गुरु को भेंट के लिए बुलाया। इससे पहले कि गुरु गोबिंद सिंह जी की औरंगजेब से भेंट होती, उसका दक्खन भारत में निधन हो गया था। दूसरी ओर सरहिंद के नवाब द्वारा भेजे गए दो हत्यारों ने गुरु पर चाकू से हमला कर दिया, जिसमें जख्मी होकर बाद में उनकी मृत्यु हुई थी। सरहिंद के नवाब को अपनी धोखाधड़ी की पोल खुल जाने का डर था।
दरअसल, चमकौर की लड़ाई से मुगल सेनाओं के नैतिक पतन, कायरता और कमजोरी का साफ पता चलता है। सैन्य शक्ति में अपने से कहीं कमजोर प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिए की गई धोखाधड़ी से साफ है कि वे सीधे तौर पर लड़ने की हिम्मत नहीं रखती थीं। मिट्टी से बने किले में मात्र 40 सिख योद्धाओं पर हमला करने में नाकाम रहने से उनके सैन्य नेतृत्व की भी पोल खुलती है। समूचे घटनाक्रम से यह भी जाहिर होता है कि मुगल शासक लोगों को डरा-धमका कर अपनी बात मनवाते थे। यह भी कि प्रबल विरोध होने पर वे लड़ने की हिम्मत भी नहीं रखते थे। दूसरी ओर, सिख वैचारिक  मार्ग पर चलते हुए जांबाज सैन्य शक्ति बनकर अपने गुरु द्वारा दिखाए शहीदी के मार्ग पर निडर होकर लड़े थे और इसी कारण संख्या में कम होने के बावजूद वे पराक्रम में आगे रहे।
(लेखक सुप्रसिद्ध रक्षा विशेषज्ञ, स्तंभकार और समालोचक हैं)

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