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पंजाब में जिला मुख्यालय रूपनगर से लगभग 40 किलोमीटर दूर शिवालिक पहाडि़यों की गोद में सतलज नदी के पूर्वी किनारे पर बसा आनंदपुर साहिब सुप्रसिद्ध स्थल है। देश के पांच उच्चतम सिख संस्थानों में शुमार इस गुरुद्वारे का निर्माण 1665 में गुरु तेग बहादुर जी ने कराया था। यहां गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने मामा पालचंद के संरक्षण में शुरुआती शिक्षा-दीक्षा के साथ न सिर्फ स्वयं अस्त्र-शस्त्र चलाने में प्रवीणता हासिल की, वरन् आनंदपुर को एक अजेय सैन्य केन्द्र के रूप में विकसित किया। उन्होंने 1699 में बैसाखी के दिन यहां खालसा पंथ की बुनियाद रखी और इस स्थान को केशगढ़ साहिब का नाम दिया। यहां से उन्होंने न सिर्फ स्थानीय पर्वतीय राजाओं को पराजित कर अपने शौर्य का परिचय दिया, वरन् दो बार मुगल बादशाह औरंगजेब की सेना को भी हार का स्वाद चखाया। हालांकि बाद में मुगल सेना ने छल से चमकौर में उनके काफिले पर आक्रमण कर दिया जिसमें उनके दोनों बड़े पुत्र वीरगति को प्राप्त हुए। जबकि मुगल सेना के हत्थे चढ़े छोटे दोनों पुत्र इस्लाम न स्वीकारने पर दीवार में जिंदा चिनवा दिए गए। इस स्थान पर गुरु जी से जुड़े कई ऐतिहासिक अवशेष सुरक्षित हैं। इनमें उनकी दुधारी तलवार, अमृत तैयार करने के लिए इस्तेमाल किया गया लोहे का कटोरा और मुगल बादशाह बहादुरशाह द्वारा गुरु को भेंट की गई एक बंदूक और कई अन्य वस्तुएं शामिल हैं। कालान्तर में महाराजा रणतीत सिंह ने इस गुरुद्वारे का पुनर्निर्माण और सौंदर्यीकरण कराया था।
दमदमा साहिब
बठिंडा (पंजाब) से 28 किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्व में तलवंडी में स्थित दमदमा साहिब तख्त भी सिखों के प्रमुख तीर्थों में शामिल है। यह स्थान गुरु गोबिंद सिंह की काशी के रूप में जाना जाता है। मुगलों से युद्ध के बाद वे यहां नौ महीने रुके थे। गुरु गोबिंद सिंह नहीं चाहते थे कि सिख समाज में कोई भी व्यक्ति अनपढ़ रहे। इसलिए उन्होंने इस स्थान को एक शिक्षा केन्द्र के रूप में विकसित किया और अक्षर ज्ञान के साथ-साथ विभिन्न शैक्षिक गतिविधियों के संचालन का केंद्र बनाया। गुरु जी के आदेश और मार्गदर्शन में उनके एक सहयोगी भाई मीणा सिंह ने सिख समाज को 'गुरुमुखी' सिखाने के उद्देश्य से इस स्थान पर 'पवित्र मात्रा' नामक एक ग्रंथ की भी रचना की थी। कहा जाता है कि गुरु जी के जीवनकाल में यहां देशभर के सिख समाज के लोग शिक्षा ग्रहण करने आते थे। इस गुरुद्वारे में गुरु के कई पवित्र लेख और शैक्षिक वस्तुएं आज भी संग्रहीत हैं। पंजाब सरकार द्वारा यहां स्थापित किए गए एक स्तंभ पर इस स्थल से जुड़ीं गुरु गोबिंद सिंह की विभिन्न गतिविधियां और उपलब्धियां अंकित हैं।
श्री पांवटा साहिब
हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में दक्षिणी ओर की तरफ यमुना नदी के तट पर स्थित गुरुद्वारा पांवटा साहिब गुरु गोबिंद सिंह और उनके एक प्रमुख शिष्य बंदा बहादुर की स्मृतियों से जुड़ा है। पांवटा का शाब्दिक अर्थ है 'पैर जमाने की जगह'। लोग इसे पौंटा साहिब भी बुलाते हैं, जो पांवटा का ही अपभ्रंश है। गुरु गोबिंद सिंह जी पांवटा साहिब में करीब चार साल रहे थे और यहीं उन्होंने 'दसम ग्रंथ' समेत कई साहित्यिक रचनाएं की थीं। इस गुरुद्वारे को उनके ऐतिहासिक कवि दरबार का दर्जा हासिल है। कहते हैं कि उस समय के प्रसिद्ध सूफी संत बुद्धूशाह को गुरु साहिब ने यहां पवित्र कंघा और सिरोपा बख्शीश दी थी। कलगीधर पातशाह यहां खुद वाणी की सृजना किया करते थे। उन्होंने 'जाप साहिब', 'चण्डी दी वार', 'नाममाला', 'बछित्तर' नाटक आदि अनेक रचनाएं इस स्थान पर कीं। उनके इस दरबार में 52 कवि भी काव्य रचनाएं किया करते थे। कहते हैं कि यहां कवियों की विनती पर गुरुजी ने यमुना को शांत होकर बहने को कहा था। तब से यमुना जी आज भी गुरुजी का हुक्म मान यहां शांति से बह रही हैं।
इस पवित्र स्थल पर सोने से बनी एक पालकी है जो कि एक भक्त द्वारा गुरु जी को भेंट दी गई थी। साथ में गुरुद्वारा परिसर में बने एक संग्रहालय में गुरु जी की कलम और उनके हथियार संरक्षित हैं। इस पवित्र स्थान पर गुरु गोबिंद सिंह जी खुद अपनी दस्तार (पगड़ी) सजाते थे और दूसरे सुंदर दस्तार सजाने वालों को देखकर प्रसन्न होते और उन्हें सम्मानित भी करते थे। उनके द्वारा शुरू की गई वह परंपरा आज भी कायम है। यहां बैसाखी और होला-मोहल्ला के त्योहारों पर सुंदर आयोजन किए जाते हैं जिनकी रौनक देखते ही बनती है।











