कर्मयोगी अशोक जी
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कर्मयोगी अशोक जी

Written byArchiveArchive
Nov 15, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 15 Nov 2016 16:06:52

देश में सांस्कृतिक चेतना की अलख जगाने वाले अशोक जी उस दिव्य ज्योति के समान हैं जिसने करोड़ों-करोड़ हिन्दुओं को आत्म गौरव से प्रकाशित कर दिया।प्रथम पुण्य तिथि पर प्रेरणापुरुष को शत-शत वंदन

सूर्य प्रकाश सेमवाल

न्दू हृदय सम्राट और हिन्दुत्व के पुरोधा की संज्ञा सहित विश्व हिन्दू परिषद के पर्याय पुरुष रूप में प्रतिष्ठित दिवंगत अशोक सिंहल भारत समेत पूरे विश्व में हिन्दुत्व की पताका को लहराने वाले योद्धा माने जाते हंै। विश्वभर में हिन्दुओं के सरोकारों के लिए लड़ने वाले और देश में हिन्दू समाज को सम्मान दिलाने वाले अशोक सिंहल के पिता डिप्टी कलैक्टर स्व़ श्री महावीर सिंह व मां स्व़ श्रीमती विद्यावती मूल रूप से उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद के बिजौली गांव के रहने वाले थे। उनका जन्म 27 सितम्बर, 1926 को अपने मामा के घर आगरा में हुआ था। बालक अशोक के पिता तो सम्पन्न परिवार से थे ही उनके ननिहाल वाले भी बड़े ज़मीदार थे। मां विद्यावती धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। और परिवार भी साधु-संतों की सेवा में तल्लीन रहने वाला था। मां की शिक्षा और परिवारों के संस्कारों ने प्रतिभाशाली अशोक जी को भी धर्म और समाज के प्रति आकर्षित किया। अपने छ: भाइयों और एक बहिन से अलग प्रतिभाशाली अशोक जी का मन न अपने परंपरागत उद्योग के प्रति था और न ही उनका आर्कषण सरकारी जीविका पाने का था। उनके एक छोटे भाई स्व़ भारतेन्दु सिंहल भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी बने। उनके सबसे बड़े भाई विनोद प्रकाश सिंहल शिक्षाविद् थे, जो भारतीय सैनिक सेवा में जुड़ने के बाद त्रिपुरा के प्रशासनिक सचिव रहे। दूसरे बड़े भाई प्रमोद प्रकाश सिंहल थे और अशोक जी से बड़े तीसरे बड़े भाई आनन्द प्रकाश सिंहल। जबकि दो अन्य छोटे भाई पीयूष सिंहल और विवेक सिंहल ने उद्योग क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। अशोक जी आध्यात्मिक वृत्ति के साथ संगीत में रुचि रखते थे। वह विद्यालय स्तरीय प्रतियोगिताओं मंे बहुत अच्छा गाते थे और बाद में संघ की शाखाओं में गाने के लिए उन्हें ही बुलाया जाता था। बुलन्द स्वर और सशक्त राष्ट्रवादी भाव वाले अशोक जी ने इसी कारण संघ के कई गीतों को अपना मधुर स्वर प्रदान किया। संघ की शाखा से वे विद्यार्थी जीवन में ही जु़ट गए थे। 1942 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले संघ कार्यकर्ता श्री राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) अशोक जी को प्रयाग में संघ शाखा में लाए थे। 11वीं कक्षा में पढ़ने वाले अशोक जी के सभी भाई भी शाखा में जाते थे। विद्यार्थीकाल में भी वे अपने पाठ्यक्रम से ज्यादा आध्यात्मिक व धार्मिक साहित्य में अधिक समय लगाते थे। मां की प्रेरणा से अशोक जी ने संघ के कार्य और उद्देश्यों से प्रभावित होकर श्री रज्जू भैया के साथ संघ की गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया। इन दोनों ने अन्य संघ कार्यकर्ताओं के साथ 1942 के असहयोग आंदोलन में प्रभावी भूमिका निभाई। संघ कायार्ें में सक्रिय तेजस्वी अशोक जी को उत्तर प्रदेश कांग्रेस के उस समय के वरिष्ठ नेता चन्द्रभानु गुप्त ने संघ कार्य छोड़ कुछ और करने की सलाह दी थी। 1948 में संघ पर प्रतिबन्ध लगने के बाद कांग्रेसी नेताओं के पूर्वाग्रह ने अशोक जी को संघ कार्य विस्तार के लिए और मजबूत एवं सशक्त बनाया। उनकी मां ने भी उनको राष्ट्रसेवा के कार्य में लगने के लिए आशीर्वाद दिया। अशोक जी ने 1950 में इलाहाबाद विवि. से धातु कर्म में एम़ टेक की उपाधि प्राप्त की और वे संघ के पूर्ण प्रचारक बन गए। ऐसे सुसंस्कारिक एवं सुशिक्षित, समाज व देश के प्रति अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले नौजवान अशोक जी की प्रतिभा और नेतृत्व क्षमता से द्वितीय सरसंघचालक परम पूज्यनीय श्रीगुरुजी बहुत प्रभावित हुए। उनकी पे्ररणा से युवा अशोक जी समाज और राष्ट्र की सेवा का संकल्प लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के व्रती स्वयंसेवक बने। संघ कार्य में प्रयाग, कानपुर, दिल्ली और हरियाणा में अपने प्रतिभा और क्षमता के अनुकूल संघ दायित्व निर्वाह करते हुए वे निरंतर देश की संस्कृति, परपंरा, वेद-पुराण, गो, गंगा और संस्कृत भाषा के उत्थान के लिए सतत लगे रहे। उनके मन में सदैव भारतीय विधाओं एवं धरोहरों को जीवंत एवं संरक्षित करने का भाव मजबूती से रहा। यथाशक्ति अशोक जी ने इनके प्रोत्साहन और प्रचार-प्रसार हेतु कार्य किया। संघ के द्वितीय सरसंघचालक पूज्य श्री गुरुजी अपने आत्मीय स्वयंसेवक के मन के भावों को अच्छी प्रकार पढ़ रहे थे और देश व दुनिया में राजनीतिक दुराग्रह के कारण हिन्दू समाज के बढ़ते अपमान को देखकर चिन्तित भी थे। इसी कारण श्री गुरुजी के निर्देश व संघ की योजना के अनुसार 1964 में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना की गई। लगभग दो दशक बाद 1981 में हिन्दुओं की बुलंद आवाज बन गए अशोक सिंहल जी ने पांच-छ: लाख की संख्या वाले विराट हिन्दू सम्मेलन का आयोजन दिल्ली में किया। यह आयोजन आज भी लोगों के ह्दय में अंकित है। विराट स्वरूप वाले तेजस्वी स्वयंसेवक की सामर्थ्य को संघ पहचानता था। लेकिन दुनिया को भी विशेषकर हिन्दू समाज को भी अपने स्वाभिमान व सम्मान की प्रतिध्वनि अशोक जी के रूप में सुनाई पड़ी। 1982 मंे विश्व हिन्दू परिषद में अशोक जी को संयुक्त महामंत्री का दायित्व प्रदान किया गया और 1986 में तत्कालीन महामंत्री हरमोहन लाल जी के दिवंगत होने के बाद महामंत्री का पदभार दिया गया। उसके बाद वे विहिप के कार्याध्यक्ष बने और बाद में संरक्षक भी बने। अपने समूचे जीवन में उन्होंने भारतीय संस्कृति और परंपरागत मूल्यों की रक्षा के लिए अहर्निश कार्य किया। भारत व विश्व के हिन्दुओं को संगठित करने और उनकी अधिकार की रक्षा के लिए अशोक जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन आहूत किया। अपने समर्पण से उन्होंने हिन्दू समाज में विद्यमान रूढि़यों और कुरीतियों को समाप्त कर इस देश के असंख्य वनवासियों, वंचित समुदायों और निर्बल लोगों के लिए अप्रतिम सेवा कार्य प्रारंभ किया। उनका व्यक्तित्व बहुत ही उदार और अनुकरणीय रहा है यानी जो एक बार मिला वह उनका ही होकर रह गया। स्वभाव से निश्च्छल, तीव्र मानवीय संवेदना से युक्त चेहरे पर भव्य कांति, ललाट पर स्वभाविक चमक और संघर्ष एवं क्रांति वाला स्वभाव उनके साथ सेवा कार्य में जुड़े कार्यकर्ताओं के लिए बहुमूल्य आर्कषण रहा। अशोक जी ने रामजन्मभूमि आंदोलन का नेतृत्व कर अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि स्थल को मुक्त करवाया। उन्होंने अविरल निर्मल गंगा के लिए अभियान चलाया। देश में गोमाता के सम्वर्द्धन व संरक्षण के लिए ठोस कार्य किया। वेदों के प्रचार-प्रसार के लिए वैदिक गुरुकुलों और वेदपीठों की स्थापना की। संस्कृत भाषा और प्राच्य विधाओं को प्रोत्साहित करने के लिए भारत संस्कृत परिषद के माध्यम से देश में ऐतिहासिक सम्मेलन करवाए। सन्त समाज को एक मंच पर एकत्रित कर देश में सामाजिक शुचिता के साथ समरसता का संदेश दिया। उन्होंने श्रीराम सेतु रक्षा के लिए जनमानस तैयार कर तथाकथित सेकुलरों को झुकने के लिए विवश कर दिया था।

स्व़ अशोक सिंहल आज हिन्दू समाज के बीच शरीर रूप में उपस्थित नहीं हैं किन्तु उनका विराट व्यक्तित्व और अनुकरणीय चरित्र कार्यकताओं को सदैव प्रेरित करता रहेगा। समाज और देश के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वाली इस महाविभूति को केवल हिन्दू नायक के रूप में ही नहीं अपितु भारतीय संस्कृति व परंपरा के श्रेष्ठ उन्नायक के रूप में भी याद रखना चाहिए। संघ के व्रती स्वयंसेवक महामानव अशोक जी के जो संकल्प और स्वप्न हंै उनको धरातल पर क्रियान्वित करने का सामूहिक प्रयास हम सबकी ओर से हो, ऐसा शुभसंकल्प किया जाना चाहिए। यही अशोक जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। प्रथम पुण्यतिथि पर प्रेरणापुरुष अशोक जी को शत्-शत् वंदन्।

(लेखक विहिप से जुड़ी भारत संस्कृत परिषद के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री हैं।)

 

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