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आज मीडिया इतना सशक्त और प्रभावी है कि उस पर प्रतिबंध लगाना आसान नहीं है। लेकिन मीडिया को देशहित से जुड़े किसी मसले पर मर्यादा लांघने का हक भी नहीं दिया जा सकता है। आज जो लोग हायतौबा मचा रहे हैं, उन्हें आपातकाल के वे दिन याद करने चाहिए, जब मीडिया का गला घोट दिया गया था
आर.के. सिन्हा
त दिनों केन्द्र सरकार ने कहा कि पठानकोट हमले के संदर्भ में सीमा लांघने पर एनडीटीवी के प्रसारण पर एक दिन की रोक लगेगी। इस पर खूब हाय-तौबा मचाई जा रही है, विधवा विलाप किया जा रहा है। रोक को अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ कर देखा जा रहा है। रोक का विरोध करने वालों से आप बहस करो तो वे आपको 'मोदी का आदमी' का तमगा दे देते हैं। हालांकि सारा देश जानता है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अराजकतवादी आजादी परोसता रहा है एनडीटीवी। सारे देश को मालूम है एनडीटीवी कैसी पत्रकारिता करता है। कारगिल की लड़ाई के दौरान इसकी संपादक और एंकर बरखा दत्त की पत्रकारिता के कारण भारतीय सेना के कई जवानों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी थी। तब किसी ने उफ्फ तक नहीं की, न चैनल ने न ही सिद्धांत बघारने वाले तथाकथित बड़े टिप्पणीकारों ने। 2 जी घोटाले में इसी चैनल की महिला पत्रकार का दलाली में नाम आया, कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? कश्मीर में पत्थरबाजों की वकालत भी इसी चैनल ने की और जेएनयू प्रकरण पर अपना स्क्रीन इसी चैनल ने काला किया।
अब सरकार ने कार्रवाई की तो लगे चिल्लाने आजादी.. आजादी.. आजादी..। एनडीटीवी के पक्ष में आंसू बहाने वालों से पूछा जाना चाहिए कि क्या देश की सुरक्षा संबंधी संवेदनशील सारी जानकारी चैनलों और सोशल मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक करने की इन्हें छूट दे दी जाए, ताकि दूसरे मुल्कों को हथियारों के भंडारण और संहारक हथियारों की जानकारी घर बैठे मिल सके? प्रश्न यह है कि क्या प्रेस की स्वतंत्रता असीमित है? अथवा क्या इसकी अपनी कुछ मयार्दाएं भी हैं? स्वतंत्रता का मतलब बेशक प्रत्येक व्यक्ति को विचार और अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए और राज्य के द्वारा उसकी किसी प्रकार की विचारधारा अथवा भावों की अभिव्यक्ति पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए। आज अपने देश में यही हो भी रहा है।
निश्चित रूप से किसी विचार का दमन करना सत्य का दमन करने के समान है। लेकिन, क्या अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता की आड़ में किसी को देशहित के साथ समझौता करने की इजाजत मिल जानी चाहिए? बिल्कुल नहीं। यह किसी भी राष्ट्र और समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। सरकार ने पठानकोट की रिपोर्टिंग के लिए एनडीटीवी को सांकेतिक दंड दिया है। एनडीटीवी से उसे कोई निजी खुंदक नहीं है। मुझे मालूम चला है कि उसे ढेर सारे सरकारी क्षेत्र की कंपनियों के विज्ञापन भी मिल रहे हैं। अगर सरकार के मन में उसे क्षति ही पहुंचानी होती तो वहां पर सरकारी उपक्रमों के विज्ञापन धड़ल्ले से न आ रहे होते।
एनडीटीवी पर हुई कार्रवाई को प्रेस की आजादी का गला घोंटना कहने वालों को जरा आपातकाल के काले दिनों का स्मरण कर लेना चाहिए। कायदे से तब हुआ था प्रेस की आजादी का दमन।
आपातकाल का दौर
आपातकाल का जिक्र आते ही मुझे सबसे पहले याद आती है 25 और 26 जून, 1975 के बीच की रात। 26 जून, 1975 की सुबह देश को मालूम चला कि श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया है। तब खबरिया चैनल, इंटरनेट या ट्विटर नहीं थे। इसलिए सारे देश को आपातकाल के लगने के संबंध में सुबह के अखबारों की सुर्खियों से पता चला था। आपातकाल में मीडिया पर कठोर सेंसरशिप लगा दी गई, तो भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पूरी तरह ग्रहण नहीं लग सका। सेंसरशिप के बदले में भूमिगत बुलेटिनों ने कुछ हद तक इसकी क्षतिपूर्ति की। कुछ अखबारों ने संपादकीय का स्थान खाली छोड़कर या उस स्थान पर काली स्याही पोतकर सरकार का विरोध किया। आपातकाल के दौरान एक ओर जहां सत्ता और सरकार की चापलूसी करने वाले पत्रकार थे, वहीं दूसरी ओर प्रेस की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले पत्रकार भी बड़ी भारी तादाद में थे। कुलदीप नैयर, देवेंद्र स्वरूप, पंडित भानुप्रताप शुक्ल, दीनानाथ मिश्र, अच्चुतानन्द मिश्र, श्याम खोसला, सूर्यकांत बाली, के.आर. मलकानी जैसे पत्रकारों ने तो जेल की यातनाएं भोगीं या भूमिगत रहकर आन्दोलन चलाया। इमरजेंसी में मेरी किताब 'जनांदोलन' को जब्त कर लिया गया था। उसकी प्रतियों को जला दिया गया। उन दिनों मैं लोकनायक बाबू जयप्रकाश नारायण के साथ दिन-रात काम कर रहा था।
बेशक सेंसरशिप के कारण सरकार और समाज के बीच सूचनाओं का प्रसारण इकतरफा हो रहा था। सरकार की घोषणाओं की खबरें जनता तक पहुंच जाती थीं। इसके विपरीत आपातकाल के विरोध की खबरें सरकार तक नहीं पहुंच पाती थीं। एनडीटीवी पर हुई कार्रवाई की तुलना आपातकाल से करने वालों को याद रखना चाहिए कि तब करीब पौने चार हजार अखबारों के डिक्लेरेशन जब्त कर लिए गए थे। सवा तीन सौ पत्रकारों को मीसा में बंद कर दिया गया था। उन्हें किसी अदालत से जमानत भी नहीं मिल सकती थी। करीब 300 अखबारों के विज्ञापन बंद कर दिए गए। और तो और, ब्रिटेन के 'टाइम' और 'गार्जियन' के भारत स्थित पत्रकारों को देश से निकाल दिया गया था। रायटर सहित अन्य एजेंसियों के टेलेक्स और टेलीफोन कनेक्शन काट दिए गए थे। पीटीआई, यूएनआई, समाचार भारती और हिन्दुस्थान समाचार का जबरन विलय कर सरकारी संवाद समिति 'समाचार' नाम की एजेंसी स्थापित कर दी थी इंदिरा गांधी ने। हिन्दुस्थान समाचार की बेहतरीन जगहों पर स्थित अचल संपत्तियों को औने-पौने दामों पर बेचा गया। नई समाचार एजेंसी पूरी तरह से सरकारी कब्जे में थी। अब क्या उस दौर जैसा कोई दमन मीडिया पर हो रहा है? एनडीटीवी पर देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने के चलते उसे सांकेतिक रूप से दंडित किया जा रहा है, तो इसमें कुछ लोगों को तकलीफ क्यों हो रही है? अब स्यापा करने वाले भूल गए कि आपातकाल घोषित होने के तुरंत बाद प्रेस-परिषद् को खत्म किया गया। दहशत और आतंक के माहौल में अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं ने सेंसरशिप को स्वीकार कर लिया था। कोई चारा भी नहीं बचा था। मुझे दहशत और आतंक के माहौल के वे दिन अच्छी तरह याद हैं। कई पत्रकार जो आन्दोलन के नेताओं के करीब थे, उन्हें बुरी तरह जलील किया गया। वामपंथी दल और तथाकथित प्रगतिशील पत्रकार-साहित्यकार आपातकाल का समर्थन कर रहे थे। मैं उन दिनों 'सर्चलाइट' और 'प्रदीप' (अब हिंदुस्तान टाइम्स और हिन्दुस्तान) का स्टाफ रिपोर्टर था। मेरी एक रिपोर्ट पर वामपंथी इतने नाराज हुए कि पूरे प्रदेश में पुलिस के संरक्षण और सहयोग से 'सर्चलाइट' और 'प्रदीप' की प्रतियां वितरित होने के पूर्व ही जलवा दीं। पटना में वामपंथियों ने जुलूस निकाला। वे 'सर्चलाइट' प्रेस तक आए। मैं उस वक्त कुछ लिख रहा था। शोरगुल सुनकर नीचे आया। मैं लगभग सभी को पहचानता था। लगभग 200 की भीड़ में बीस-तीस वामपंथी कार्यकर्ता रहे होंगे। बाकी सारे पटना पुलिस लाइन के जवान थे। वामपंथी नेताओं ने इशारा किया और सभी प्रेस के अलग-अलग कमरों में जाकर पेट्रोल डालकर आग लगाने लगे। न्यूज प्रिंट के गोदाम में आग लगते ही सर्चलाइट प्रेस की दो मंजिला विशाल इमारत धू-धू कर जल उठी। भीड़ में एक हवलदार मेरे गांव के थे। मैंने पूछा, क्या कर रहे हैं? जवाब मिला, ऊपर का आदेश है।
कितनी चाहिए आजादी
तो मीडिया को कितनी मिले अभिव्यक्ति की आजादी? इस मसले पर डॉ. आंबेडकर की राय जान लेना समीचिन होगा। उन्होंने संविधान सभा में कहा था, ''समाचार पत्र (जाहिर है तब खबरिया चैनल और सोशल मीडिया नहीं था) नागरिकों के विचारों की अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण साधन है। लेकिन, नागरिकों को व्यक्तिगत रूप से प्राप्त अधिकारों की तुलना में प्रेस को कोई विशेष अधिकार प्राप्त नहीं है।'' यानी बाबा साहेब संकेतों में कह रहे हैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अपनी सीमाएं हैं। ये असीमित नहीं हैं। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह कतई अर्थ नहीं है कि आप निरंकुश हो जाएं। कोई भी राष्ट्र और समाज अपनी अनुशासनहीन प्रेस को झेल कर सुचारू रूप से नहीं चल सकता है।
एक बात और। प्रेस की स्वतंत्रता का संविधान में कोई अलग से उल्लेख नहीं है। लेकिन, इस अधिकार की संपूर्णता के उपयोग के लिए किसी प्रकार के संशय की गुंजाइश नहीं है। वक्त आ गया है जब मीडिया को अपनी सीमाओं को स्वयं तय करना होगा।
निंदा हो
कौन रोक रहा है पत्रकारिता के माध्यम से सरकार की कठोर आलोचना करने से। आप भ्रष्टाचार, शैक्षणिक अराजकता, महंगाई, बढ़ते अपराध, अव्यवस्था वगैरह पर लिखो, विडियो क्लिप दिखाओ, बहस करो कोई नहीं रोकता। लेकिन, देश की रक्षा से संबंधित मामलों में आपको अतिरिक्त समझदारी बरतने की जरूरत होती है। समाचार को सनसनीखेज बनाने और अपनी टी. आर. पी. बढ़ाने के लिए आप राष्ट्र की सुरक्षा से समझौता तो नहीं कर सकते? राष्ट्र की सुरक्षा, एकता और अखंडता से ऊपर कुछ नहीं हो सकता।
गया पाबंदी का वक्त
केन्द्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री पद पर रहते हुए अरुण जेटली ने 18 जनवरी, 2015 को न्यायमूर्ति जे. एस. वर्मा स्मृति व्याख्यान में कहा था कि मीडिया संस्थानों पर पाबंदी का समय नहीं रहा है और प्रौद्योगिकी के चलते सेंसरशिप असंभव हो गई है। लेकिन जिस तरीके से सुरक्षा एजेंसियों के आतंकवाद निरोधक अभियानों को कवर किया जाता है, वह वर्तमान में मीडिया की जिम्मेदारी के लिहाज से एक अहम विषय है। सवाल यह उठता है कि मीडिया को सीधे मौके पर जाने की अनुमति होनी चाहिए या कुछ प्रतिबंध होने चाहिए। अब कोई भी सरकार विज्ञापन देने से मना करके मीडिया संस्थानों पर दबाव नहीं बना सकती। अब प्रौद्योगिकी ने असंभव कर दिया है कि सेंसरशिप लगा दी जाए। मान लीजिए कि आज संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल लगा दिया जाए तो भी सेंसरशिप का प्रभाव शून्य रहेगा। उपग्रह अपने आपमें भौगोलिक सीमाओं को नहीं मानते। ईमेल इस दायरे में नहीं आता। फैक्स मशीन इसकी इजाजत नहीं देती। यानी जो लोग एनडीटीवी पर उठाए कदम पर आंसू बहा रहे हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि अब सरकार के बस से बाहर है मीडिया पर सेंसरशिप लगाना। लेकिन, गैर जिम्मेदाराना ढ़ंग से स्वछंदचारी पत्रकारिता भी तो बंद होनी ही चाहिए। (लेखक राज्यसभा सांसद हैं)











