इस धमक के बाद
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इस धमक के बाद

Written byArchiveArchive
Nov 7, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 07 Nov 2016 12:17:22

पाकिस्तान में नवाज को अब न शराफत जंचती है, न राहिल को राहत। भारत के सीमावर्ती गांवों पर गोले दागने में जुटी ये जोड़ी अपनी इस हरकत से हाल-फिलहाल में बाज आती नहीं दिखती।  जवाबी कार्रवाई में भारत ने पाकिस्तान को भरपूर सबक सिखाया है

आलोक गोस्वामी /सुधेन्दु ओझा

पाकिस्तान अपनी फितरत से बाज आता नहीं दिखता….संघर्षविराम का उल्लंघन अब उसकी आएदिन की हरकत हो गई है। ऐसा वह दो वजहों से करता आ रहा है। एक, जिहादियों को गोलाबारी की आड़ में सीमा पार करके भारत में दाखिल कराने  के लिए और, दो, भारतीय सीमा चौकियों को नुकसान पहंुचाने के लिए। लेकिन इधर करीब 15 दिन से जिस तरह उसने हर रोज गोलाबारी करके सिर्फ चौकियों को ही नहीं, भारतीय सीमान्त गांवों में रह रहे आम नागरिकों को भी निशाना बनाया है, वह अंतरराष्ट्रीय कायदों के खिलाफ है। बड़ी संख्या में भारत के आम ग्रामीण हताहत हुए हैं और काफी संख्या में उन्हें घर-बार छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाने को मजबूर होना पड़ा है।
पाकिस्तान आज खिसियाकर खंभा नोंचने में माहिर देश के रूप में जाना जाने लगा है। उसकी यह फितरत तब और उभरकर सामने आई जब भारत ने नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग में आइएसआइ के एजेंट महबूब अख्तर का पर्दाफाश करके उसे देश से बाहर जाने को कहा। पलक झपकते ही इस्लामाबाद ने अपने यहां भारतीय उच्चायोग के एक अधिकारी सुरजीत सिंह को बेसिरपैर का आरोप लगाकर देश से चले जाने का फरमान सुना दिया। इतना ही नहीं, जब भारत द्वारा पाकिस्तानी उच्चायोग के 4 और कर्मियों पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के लिए काम करने का आरोप लगाया गया और पाकिस्तान ने उनके समेत कुल 6 को वापस बुला लिया। लेकिन फौरन बाद ही, इस्लामाबाद एक बार फिर हरकत में आया और बदले में भारतीय उच्चायोग के 8 अन्य अधिकारियों की सूची तैयार करके बैठ गया जिन्हें वह अपने यहां से विदा करने पर आमादा है। मीडिया में लीक हुई इस बात की खबर वहां के अंग्रेजी अखबार डॉन में छपी है।
दरअसल 18 सितम्बर को भारत के उरी सैन्य शिविर पर हमले, जिसमें भारत के 19 जवान शहीद हुए थे, के बाद दोनों देशों के बीच संबंध पाकिस्तान की जिहाद को पोसते रहने और जिहादियों का बचाव करने की फितरत के चलते पटरी से उतर गए थे। उससे पहले 2 जनवरी को पठानकोट सैन्य हवाई अड्डे पर जिहादी हमले ने भी भारत को अपने पड़ोसी के नापाक मंसूबों के बारे में पुख्ता सबूत दिए थे। लिहाजा, सर्जिकल स्ट्राइक हुई भारत की तरफ से, 8 आतंकी लॉन्च पैड ध्वस्त किए गए। उसके बाद आतंकी सरगना हाफिज सईद की गीदड़ भभकियों से उन्मादित और भारत में मौजूद सेकुलर ब्रिगेड की देशद्रोह के समकक्ष बयानबाजी से उत्साहित पाकिस्तान का मानसिक दिवालियापन आज चरम पर दिखता है। सार्क में अलग-थलग किए जाने और अरब देशों के उसके समर्थन में न उतरने के बाद तो उसकी बौखलाहट बेहद बढ़ गई है।
पाकिस्तान ने मेंढर, पुंछ और दूसरे सेक्टरों में लगातार संघर्षविराम को लांघते हुए जो गोलाबारी छेड़ी उसका जवाब देते हुए भारत ने अपनी सीमाओं की रक्षा में जवाबी गोले दागे हैं जिनमें कई पाकिस्तानी रेंजर्स हलाक हुए हैं। पाकिस्तान एक बार फिर खंभा नोंच रहा है, क्योंकि वह जानता है कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी अब उसकी उन बातों को गंभीरता से नहीं लेती कि 'भारत वार्ता से मुकर रहा है'। अमेरिका सहित तमाम पश्चिमी देश पाकिस्तानी सत्ता अधिष्ठान की दिखावटी ताकत को पहचान चुके हैं जो सिर्फ और सिर्फ सेना की कठपुतली बनकर रहने को मजबूर है। अब नवाज से ज्यादा सेनाध्यक्ष राहिल की चलती है।
वैसे पाकिस्तान के इतिहास में ऐसे दौर बहुत कम ही देखे गए हैं जब सेना का सिक्का सियासी सत्ता से कमतर रहा हो। कारण ऐतिहासिक हैं और अंदरूनी भी। वहां सही मायनों में लोकतंत्र कभी रहा ही नहीं है, बस दिखावटी सियासी सरकारें आती-जाती रही हैं। अफगानिस्तान और अमेरिका हमेशा उसकी सत्ता-नीतियों के केन्द्र में रहे हैं तो हक्कानी नेटवर्क और हाफिज सईद जैसे कट्टर मुल्लाओं और आतंकियों ने उसके सियासतदानों को अपने इशारों पर चलाए रखा है। और भी कई पहलू हैं जिनके चलते पाकिस्तान आज अपने अस्तित्व को बनाए रखने की जद्दोजहद में उलझा है। ऐसे सब पहलुओं पर एक एक करके नजर डालें तो समझ आएगा कि पाकिस्तान के गठन में जिस मानसिकता का हाथ रहा उसने इसे एक कठमुल्ला देश बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। आज के उसके हालात वही सब बयां करते हैं।
अस्तित्व बचाने का संकट

पाकिस्तान में अभी पिछले दिनों पनामा लीक के दस्तावेज हवा में लहराते हुए इमरान खान प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को इस्लामाबाद में घेरना चाहते थे। खैरियत रही कि स्थिति की गंभीरता को समझते हुए पाकिस्तानी सवार्ेच्च न्यायालय ने बीच-बचाव किया। अराजकता कुछ दिनों के लिए रुक गई वरना इमरान ने नवाज की विकेट गिराने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सवार्ेच्च न्यायालय ने तय किया है कि उसकी निगरानी में एक न्यायिक आयोग का गठन किया जाएगा। इमरान इस 'थर्ड अंपायर' का इशारा पाकर फिलहाल चुप हो गए हैं।
वहीं दूसरी तरफ, पाकिस्तानी सेना डॉन अखबार में अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में अलग-थलग पड़ने की रिपोर्ट लीक होने से शरीफ हत्थे से उखड़ गई थी। उसने नवाज सरकार को मजबूर किया कि प्रधानमंत्री कार्यालय एक बार नहीं बल्कि तीन बार स्पष्टीकरण जारी करके यह कहे कि यह खबर मनगढ़ंत थी। नवाज शरीफ ने वैसा ही किया, फिर भी सेना संतुष्ट नहीं हुई। अंतत:  शरीफ ने अपने सूचना और प्रसारण मंत्री परवेज रशीद को बलि का बकरा बनाकर सेना को मनाने का प्रयास किया। आज,ऊपरी तौर पर स्थिति सामान्य-सी भले ही दिखती है, किन्तु चिंगारी सुलग रही है। सीमा पर भारतीय सेना का दबाव पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष राहिल शरीफ की मुश्किल तो बढ़ा ही रहा है। भारत के साथ सैन्य तनाव उसे आर्थिक दिवालिएपन की तरफ धकेल रहा है, पाकिस्तान इस स्थिति को लंबे समय तक बर्दाश्त कर पाने की स्थिति में नहीं है। पाकिस्तानी मामलों के जानकारों के अनुसार पाकिस्तान सरकार में इस समय अस्थिरता अपने चरम पर है।   
संघर्ष अस्तित्व बचाए रखने का
मध्य एशिया तक पाकिस्तान की कीमत पर अपने व्यापार को बढ़ाने के चीन के मंसूबों से  पाकिस्तान में निवेश को पाकिस्तानी अपने लिए जन्नत का दरवाजा मान बैठे हैं। किसी भी वैकल्पिक निवेश के अभाव में चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर एक ऐसा झुन-झुना है जिसे बजाने के लिए पाकिस्तान मजबूर है। भारत से प्रतिस्पर्धा में वह अपने कब्जे वाले कश्मीर में सिंध नदी पर विशालकाय बांध और पनबिजली परियोजना के बारे में सोच रहा था। दियामर-भाषा परियोजना से पाकिस्तान सिंध नदी पर साठ लाख एकड़ फुट का जल बांध बनाना चाहता था। समस्या यह थी कि इस परियोजना पर आने वाली लागत में पैसा कौन लगाए। पाकिस्तान ने शुरू में अमेरिका को इस में घसीटना चाहा किन्तु उसके द्वारा पाकिस्तान से सामरिक रूप से अलग होने का निर्णय अमेरिका द्वारा बहुत पहले ले लिया गया था जिसके चलते उसने इसमें कोई रुचि नहीं दिखाई। लगभग 15 अरब डॉलर की इस परियोजना में चीन भी हाथ लगाने से कतरा रहा था जिसके चलते पाकिस्तान को मजबूरन जापान द्वारा स्थापित एशियाई विकास बैंक की तरफ रुख करना पड़ा। किन्तु हर अंतरराष्ट्रीय मसले पर चीन के साथ खड़े होने वाले पाकिस्तान को जापान किस प्रकार सहायता की बात सोच सकता था। दक्षिणी चीन सागर पर अंतरराष्ट्रीय पंचाट के निर्णय को न मानने के मसले पर पाकिस्तान चीन के रुख का पक्षधर है। दूसरा कारण यह कि इस परियोजना पर भारत ने अपनी आपत्ति दर्ज करवा दी थी कि यह विवादित स्थल पर प्रस्तावित है।
अमेरिकी प्रभाव वाले विश्व बैंक ने भी दो साल पहले इस परियोजना के लिए वित्त पोषण के आवेदन को अस्वीकृत कर दिया था, क्योंकि पाकिस्तान ने इसके लिए भारत से अनापत्ति प्रमाण-पत्र लेने से मना कर दिया था।
यह बांध गिलगित-बाल्टिस्तान में सिंधु नदी पर बनाया जाना था, जिसमें 4,500 मेगावाट की एक पनबिजली परियोजना भी होगी।             पर्यवेक्षक आने वाले समय में अमेरिकी परिधि से कटे पाकिस्तान के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। जब भारतीय प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को हाशिए पर लाने की बात कही, उसके पीछे यही कारण था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय में उसे अलग-थलग करने का विषय प्रमुख राष्ट्रों के एजेंडे में शामिल है।
संविधान बस खानापूर्ति
किसी भी देश का संविधान बहुत महत्वपूर्ण और पवित्र दस्तावेज होता है, वह नागरिकों की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को समाए होता है। मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान का संविधान खुद लिखना चाहते थे। वे पाकिस्तानी संविधान समिति के अध्यक्ष भी थे, हालांकि अपने खराब स्वस्थ्य के चलते वे इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते थे। सितंबर 1948 में उनकी मृत्यु के बाद पाकिस्तानी संविधान का काम प्रभावित हुआ। प्रधानमंत्री मोहम्मद अली और उनकी सरकार के अधिकारियों ने देश में विपक्षी दलों के सहयोग के साथ पाकिस्तान के लिए एक संविधान तैयार करने के लिए काम किया जो कि कामचलाऊ साबित हुआ। कमोबेश यही स्थिति आगे आने वाले पाकिस्तानी संविधानों की भी रही।  
3 साल चला पहला संविधान
पाकिस्तान का पहला संविधान 23 मार्च, 1956 को लागू किया गया। इसने आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान को एक इस्लामी गणराज्य घोषित भी किया (इसी के साथ पाकिस्तान विश्व का पहला इस्लामी गणराज्य बना)। इसके तहत सरकार के मुखिया के रूप में प्रधानमंत्री के साथ संसदीय प्रणाली अपनाई गई। कहा गया कि, कोई भी कानून कुरान और सुन्नत की शिक्षाओं के खिलाफ पारित नहीं किया जाएगा। अंग्रेजी, उर्दू और बंगला राष्ट्रीय भाषा बनाई गईं। इस्कंदर मिर्जा ने राष्ट्रपति पद ग्रहण किया, लेकिन राष्ट्रीय मामलों में उनकी लगातार असंवैधानिक भागीदारी के कारण, चार निर्वाचित प्रधानमंत्रियों को मात्र दो साल में ही बर्खास्त कर दिया गया। जनता के दबाव के तहत, राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा ने 1958 में तख्तापलट को वैध ठहराया और इस प्रकार यह संविधान लगभग निलंबित हो गया।
1962 का संविधान

17 फरवरी, 1960 को अयूब खान ने अपने हिसाब से पाकिस्तान के भविष्य के राजनीतिक ढांचे पर रिपोर्ट करने के लिए एक आयोग की नियुक्ति की। इसमें पूर्वी पाकिस्तान से पांच सदस्य और पश्चिमी पाकिस्तान से भी पांच सदस्य थे। यह पूर्णत: सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, वकीलों, उद्योगपतियों और जमींदारों से बना था। इस आयोग की रिपोर्ट को 6 मई, 1961 को राष्ट्रपति अयूब के समक्ष प्रस्तुत किया गया और राष्ट्रपति और उनके मंत्रिमंडल द्वारा जांच के पश्चात जनवरी 1962 में, कैबिनेट द्वारा अंत में नए संविधान के मूल पाठ को मंजूरी दे दी गई। इसे राष्ट्रपति अयूब द्वारा 1 मार्च, 1962 को लागू किया गया था और अंत में 8 जून, 1962 को यह प्रभाव में आया। इसमें अमेरिकी संविधान की नकल करते हुए प्रधानमंत्री के सारे अधिकार राष्ट्रपति को दे दिए गए। अध्यक्षीय प्रणाली के इस शासन में राष्ट्रपति देश का मुख्य कार्यकारी एवं राष्ट्राध्यक्ष था और उसे अपनी कैबिनेट के मंत्रियों को मनोनीत करने का अधिकार दिया गया था।
1956 के संविधान की तरह ही 1962 का संविधान भी अधिक समय तक नहीं रह पाया। पाकिस्तान में दूसरा मार्शल लॉ 26 मार्च, 1969 को लगाया गया था जब राष्ट्रपति अयूब खान ने 1962 के संविधान को रद्द कर सेना के कमांडर-इन-चीफ जनरल याह्या खान को सत्ता सौंप दी।
1971 में पूर्वी पाकिस्तान के विभाजन के बाद 1972 में 1970 के चुनाव के आधार पर सरकार का गठन हुआ। नए संविधान का निर्माण शुरू हुआ। 14 अगस्त, 1973 को यह संविधान लागू किया गया। इसके अंतर्गत पाकिस्तान में संसदीय शासन होना था और प्रधानमंत्री, सरकार का प्रमुख। किन्तु इस संविधान को जियाउल हक और परवेज मुशर्रफ ने इतना तार-तार कर दिया है कि इसे संविधान कहा ही नहीं जा सकता।
सेना संविधान से ऊपर
पाकिस्तान के तीनों संविधानों में चुने हुए प्रतिनिधि को सत्ता हस्तांतरण की बात है किन्तु दुर्भाग्य की बात है कि पाकिस्तानी न्यायालयों ने हर बार सेना द्वारा सत्ता हथियाए जाने को 'खुदा का दखल' (डिवाइन इंटरवेंशन) के रूप में स्वीकार कर उसे बल प्रदान किया, जिससे भविष्य में सैनिक तानाशाही का रास्ता खुल गया। आज पाकिस्तानी सेना प्रमुख पाकिस्तानी शासन तंत्र में संविधान स3े भी ऊपर है, वह स्वयंभू है तथा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों को ही अपने दबाव में     रखता है।
जिहादी मन:स्थिति की पोषक सेना  
यूं तो स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल बाद ही जिन्ना ने कबाइली आतंकवादियों के नाम पर सेना भेजकर कश्मीर पर कब्जा करने की साजिश रची थी किन्तु आतंकवादियों के माध्यम से राष्ट्र के लक्ष्य को एक नीति के रूप में अमली जामा जनरल जिया ऊल हक के समय पहनाया गया जब अमेरिका और सऊदी अरब से प्राप्त सैनिक साजो-सामान और पैसे के बल पर अफगानिस्तान से रूस को निकालने के लिए तालिबानी समूह तैयार किया गया। जिया के समय में ही पाकिस्तान ने आधिकारिक रूप से जिहादियों के उपयोग को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाया और अफगानिस्तान को भारत से युद्ध की स्थिति में 'स्ट्रेटेजिक डेप्थ' के रूप में लिया।
आतंकवादियों की पनाहगाह
पाकिस्तान ने इन जिहादियों का उपयोग अमेरिका को दबाव में रखने के लिए भी किया। उसने अफगानिस्तान में अशांति और हक्कानी नेटवर्क का पोषण उस पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए किया और आज भी कर रहा है। पाकिस्तानी सेना द्वारा ओसामा बिन लादेन को एबटाबाद के सैनिक परिसर में रखना और अल-कायदा को पेशावर शुअरा के रूप में इसीलिए बचा कर रखा गया।
अमेरिका ने पाकिस्तान की इस दोहरी चाल को समझते हुए उसके साथ अपने सम्बन्धों में ढांचागत परिवर्तन किया जिसकी पाकिस्तान को उम्मीद नहीं थी। अमेरिका ने निश्चित रूप से पाकिस्तानी करतूतों का चिट्ठा अपने 'मित्र राष्ट्रों' को भी पढ़ कर सुनाया होगा। इस समूह के दबाव का ही परिणाम है कि अभी हाल में पाकिस्तान को भारत के मोस्ट वांटेड आतंकी और जैश-ए-मोहम्मद सरगना मौलाना मसूद अजहर का बैंक खाता फ्रीज करना पड़ा है। दूसरे आतंकियों के भी लगभग 5,100 खाते पाकिस्तान द्वारा फ्रीज किए गए हैं। इन खातों में 40 करोड़ रुपए से ज्यादा रुपए थे।  
 अफीम तस्करी से सेना को आय
प्राप्त रपटों के अनुसार अफगानिस्तान से कराची होते हुए यूरोप को होने वाली मादक पदार्थों की तस्करी पर पाकिस्तानी सेना का पूरा नियंत्रण है। अफगानिस्तान का दक्षिणी हिस्सा अब भी पाकिस्तान हिमायती तालिबानियों के कब्जे में है, जहां मुख्य रूप से अवैध अफीम की खेती की जाती है।
सबसे खतरनाक देशों में पाकिस्तान
पाकिस्तान दुनिया का 5वां सबसे खतरनाक देश बन गया है। यह खुलासा अमेरिकी इंटेलीजेंस थिंकटैंक इंटेलसेंटर द्वारा जारी 'कंट्री थ्रेट इंडेक्स' यानी सीटीआई में हुआ है। नवंबर 2015 में पाकिस्तान 10वें स्थान पर था। नाइजीरिया, यमन और मिस्र जैसे देश शीर्ष-10 से बाहर हो गए हैं। रिपोर्ट 18 सितंबर तक विभिन्न देशों में आतंकवादी और विद्रोही गतिविधियों के आधार पर बनाई गई है। पाकिस्तान तीन पायदान वढ़कर सबसे खतरनाक शीर्ष पांच देशों में शामिल यह है।
परमाणु अप्रसार में पाकिस्तानी भूमिका
पाकिस्तान भले ही यह कहता रहे कि परमाणु प्रसार के अवैधानिक व्यापार में उसका वैज्ञानिक अब्दुल कादिर ही व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार था पर विश्व समुदाय के सामने कुछ और ही प्रमाण हैं। पनामालीक के जरिए ये सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि 21 जनवरी, 1998 को बहामा में वहादत लिमिटेड नाम की कंपनी रजिस्टर्ड हुई। पनामालीक के मुताबिक वहादत लिमिटेड के 4 मालिक हैं।
कराची से  अब्दुल कयूम खान और हेन्ड्रिना खान, जबकि बाकी के दो, दीना खान और आएशा खान इस्लामाबाद से हैं। अब्दुल कयूम खान पाकिस्तान के इस्लामी बम बनाने वाले अब्दुल कादिर खान का बड़ा भाई था। फरवरी 2010 में उसकी मौत हो गई। वहीं डच मूल की हेन्ड्रिना अब्दुल कादिर खान की बीवी है जबकि दीना और आएशा उसकी बेटियां हैं। पनामा की लॉ फर्म मोसैक फोंसेका के दस्तावेजों के मुताबिक रजिस्टर्ड होने के दो साल के बाद, पाकिस्तान के इस सनकी परमाणु वैज्ञानिक की यह कंपनी वहादत लिमिटेड जनवरी 2002 में अचानक ही बंद कर दी गई। अगले साल यानी 2003 में खान पर एटमी तकनीक बेचकर मोटी कमाई के गंभीर आरोप लगे।
अमेरिका के साथ छल
 

भारत बनाएगा 300 अत्याधुनिक लड़ाकू विमान
विश्वस्त सूत्रों के अनुसार भारत जल्द ही अब तक की सबसे बड़ी वायुसेना विमान संधि कर सकता है। भारत ने विदेशी निर्माताओं के सामने बड़ी तादाद में लड़ाकू विमानों की खरीद की पेशकश की है, लेकिन शर्त यह है कि निर्माताओं को यह विमान भारत में ही स्थानीय सहयोगी के साथ मिलकर बनाने होंगे। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया अभियान के तहत किया जाएगा। भारतीय वायु सेना के अधिकारियों के मुताबिक भारत में 200 सिंगल-इंजन विमान बनाने के करार की कोशिश की जा रही है।
इन लड़ाकू विमानों की संख्या 300 तक भी हो सकती है, क्योंकि वायु सेना सोवियत संघ के जमाने के पुराने लड़ाकू विमानों की जगह नए विमान चाहती है। विशेषज्ञों के मुताबिक इस पर 13 से 15 अरब डॉलर का खर्च आ सकता है और यह संभवत: देश की सबसे बड़ी वायु सेना संधि हो सकती है। पिछले महीने भारत ने फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद का समझौता किया है। वायु सेना अब लड़ाकू विमान खरीद में तेजी चाहती है। उधर एफ-16 बनाने वाली अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन जैसी कई कंपनियों ने इस कराकर में दिलचस्पी दिखाई है। लॉकहीड मार्टिन भारत में एफ-16 विमानों का उत्पादन करने की इच्छुक है, लेकिन वह यहां बनने वाले विमानों का दूसरे देशों में निर्यात भी चाहती है। कंपनी को रक्षा मंत्रालय की तरफ से एक पत्र मिला है। लॉकहीड मार्टिन ने यह पेशकश उस वक्त की है जब भारत और अमेरिका के रक्षा-संबंध ऊंचाई पर हैं।
ऐसी भी जानकारी है कि स्वीडन की ग्रिपेन एयरक्राफ्ट निर्माता कंपनी साब भी इस करार में दिलचस्पी दिखा रही है। साब ने कहा है कि वह न सिर्फ ग्रिपेन फाइटर के भारत में उत्पादन को राजी है, बल्कि यहां के विानन उद्योग को भी मजबूत करने में मदद करेगी। साब इंडिया टेक्नोलॉजीस के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक जान वाइडस्टर्म ने कहा, ''हम टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के मामले में काफी अनुभवी हैं। सहयोगियों को हम सिर्फ एसेंबलिंग तक ही सीमित नहीं रखते, बल्कि उन्हें हर तरह का सहयोग देते हैं, यही हमारे काम करने का तरीका है।'' उन्होंने इस बात की पुष्टि की है कि उन्हें भारत सरकार द्वारा चौथी पीढ़ी के विमानों के सौदे से जुड़ा पत्र मिला है।

 
 
पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध पाकिस्तान की स्वतंत्रता के पूर्व के हैं जब जिन्ना ने आर्थिक सहायता की एवज में पाकिस्तान को अमेरिका की गोद में बैठा दिया था। पाकिस्तान अमेरिका का पिछलग्गू बन गया। उसे अमेरिकी करदाताओं से इकट्ठा की गई अरबों डालर की राशि सहायता के रूप में दी गई। वह पाकिस्तान में आर्थिक विकास देखना चाहता था। पर ऐसा हो नहीं पाया। अमेरिका की आर्थिक सहायता पर पलने के बावजूद ओसामा उसकी सैनिक कॉलोनी में वषोंर् सुरक्षित छुपा रहा। परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल में अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों को पाकिस्तान में गहरी पैठ बनाने का अवसर मिला। इस के साथ ही उन्हें यह जानने का भी मौका मिला कि पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियां किस प्रकार अमेरिका की आंखों में धूल झोंक रही थीं।
अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट, रक्षा मंत्री और अमरीकी सेनाध्यक्षों का मूल्यांकन इस तरफ इशारा कर रहा था कि पाकिस्तान दक्षिण एशिया में अमेरिकी हितों का सब से एहसानफरामोश शत्रु है। इन कारणों से अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक सहायता में कई नई शतोंर् को जोड़ दिया जो केरी-लूगर विधेयक में सामने आईं।
पाकिस्तान अफगानिस्तान में रणनीतिक स्वार्थ के मोह को आज तक त्याग नहीं पाया है। पूर्व में वह भारत की तरफ अपनी सीमा नहीं बढ़ा सकता। उसे लगता है कि पश्चिम में वह कमजोर अफगानिस्तान को दबा कर अपना लक्ष्य हासिल कर लेगा, किन्तु अफगानिस्तान से उसे कड़ा प्रतिरोध मिल रहा है। पाकिस्तान को अमेरिकी सहायता बंद होने तथा अमेरिका और उसके मित्र राष्ट्रों की सहायता एजेंसियों, जैसे विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक इत्यादि के पाकिस्तान से हाथ खींचने से वह एक गंभीर संकट से दो-चार होने की राह पर है। भारत के साथ सीमा पर टकराव की स्थिति पाकिस्तान के लिए गले की हड्डी साबित हो रही है। वह भारत के विरुद्ध खुलकर युद्ध में सामने नहीं आ सकता, न ही सीमा पर आर्थिक और सैन्य तरीके से भारतीय दबाव को लंबे समय तक झेल पाएगा।      

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