पुस्तक समीक्षा : सभी कष्टों की दवा शिक्षा
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पुस्तक समीक्षा : सभी कष्टों की दवा शिक्षा

Written byArchiveArchive
Aug 22, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 22 Aug 2016 13:07:56

यह बात अनुभवसिद्ध है कि जिस भी व्यक्ति या समाज ने शिक्षा को अपनाया, वह आज एक अलग पहचान रखता है और उसकी अपनी एक विशिष्टता है। इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं डॉ. भीमराव आंबेडकर। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में पढ़ाई की और आज वे दुनियाभर मंे एक विचार प्रतिनिधि के रूप में अमर हैं। उनका मानना था कि शिक्षा समाज के सभी कष्टों की दवा है। इसलिए वे जीवनभर भारतीयों, खासकर वंचित वर्ग के लोगों को शिक्षा लेने के लिए प्रेरित करते रहे। उन्होंने केवल प्रेरणा ही नहीं दी, इसके लिए अनगिनत कार्य भी किए। इन कार्यों को लोग जान सकें, इसके लिए हाल ही में एक पुस्तक आई है- 'बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर: शैक्षिक अवदान'। इसके लेखक हैं शैक्षिक प्रौद्योगिकी विभाग राजस्थान, अजमेर में अनुसंधान अधिकारी के रूप में कार्यरत हनुमान सिंह राठौड़। पुस्तक की भूमिका में आर.ए.एस. अधिकारी रहे किशोर असवाल लिखते हैं, ''लेखक द्वारा बाबा साहेब के बारे में जो विस्तृत लेखन कार्य किया गया है, वह सराहनीय है। विशेषत: शैक्षिक परिदृश्य के परिप्रेक्ष्य में जो शोध किया गया है और जो आंकड़ों सहित उल्लेख किया है, वह नि:संदेह हम सभी के लिए ज्ञानवर्धक है। ''
बाबा साहेब की प्रेरणा से शिक्षा प्राप्त करने वाले लोग उनके बारे में क्या कहते हैं, इसके लिए लेखक ने अपने प्रास्थानिक में सुप्रसिद्ध मराठी कवि और दलित पेंथर के संस्थापक नामदेव ढसाल के एक भाषण का अंश दिया है। इसमें ढसाल कहते हैं, ''मैं डॉ. अंबेडकर को धन्यवाद देता हूं, जिन्होंने हमारा दर्जा जानवर से उठाकर इनसान के समान किया। डॉ. अंबेडकर न होते तो हम आज भी जानवर जैसे ही रहते। … यद्यपि बौद्ध लोग पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते, हिन्दू धर्म करता है, तथापि इस विश्वास के अनुसार यदि बाबा साहब पुन: जन्म लेते हैं तो हमारे जैसे कितने ही लोग अपनी चमड़ी की जूतियां बनाकर उनके पैरों में डाल देंगे, क्योंकि डॉ. अंबेडकर के कारण हम आज सम्मानजनक अवस्था में हैं।'' (पृष्ठ-9) ढसाल ने यह भाषण 30 अगस्त, 2006 को दिल्ली में 'समरसता के सूत्र' पुस्तक के लोकार्पण समारोह में दिया था।
बाबा साहेब की प्रेरणा से उस समय वंचित समाज का एक बड़ा वर्ग शिक्षित हो चुका था। इस वर्ग के जरिए ही उन्होंने वंचित समाज के अन्य लोगों तक शिक्षा पहुंचाने का कार्य किया। डॉ. आंबेडकर ने बार्शी (शोलापुर) में 24 मई, 1924 को इस वर्ग का आह्वान करते हुए कहा था, ''मेरे शिक्षित भाइयो! यदि आप चाहते हैं कि आपकी भावी पीढि़यां आपको सम्मान और आदर के साथ याद करें, यदि आप चाहते हैं कि आप जिस हालात में रह रहे हैं, आपके बच्चे और आपके पोता-पोती, नाती-नातिन उससे अच्छी स्थिति में रहें, तो कृपया आगे बढ़कर आएं। यह हमारा परम कर्तव्य है…।'' (पृष्ठ-64)
18 मार्च, 1956 को आगरा में आयोजित अनुसूचित जाति फेडरेशन की सभा में बाबा साहब ने कहा था,''सभी शिक्षित जनों का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वे अपने निर्धन एवं अज्ञानी भाइयों की सेवा करें। यह बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि जैसे ही शिक्षित व्यक्ति किसी शक्तिशाली पद पर पहुंच जाता है, वह अपने ही समाज को भूल जाता है। इसका कारण यह है कि उन्हें न अपने समाज से लगाव होता है, न अपने भाई-बंधुओं से अपनापन। उन्हें अपने गरीब अशिक्षित लोगों की थोड़ी सी भी परवाह नहीं होती। एक अन्य कारण यह भी है कि उनमें आध्यात्मिक सोच की भी कमी होती है।''(पृष्ठ-68)
बाबा साहेब कहते थे कि शिक्षा से गुलामी समाप्त होकर शिक्षित बंधु राष्ट्र निर्माण के कार्य में आगे आएंगे। मिलिन्द विश्वविद्यालय के शिलान्यास समारोह में उन्होंने कहा था, ''हिन्दू समाज में सबसे निम्न स्तर से आने के कारण शिक्षा का कितना महत्व है, यह मैं जानता हूं। निचले समाज की उन्नति का प्रश्न्न, आर्थिक मानना एक बहुत बड़ी गलती है। हिन्दुस्थान के दलित समाज की उन्नति करने का मतलब उन्हें रोटी, कपड़ा, मकान देकर पहले की तरह उच्च वर्ग की सेवा में लगा देना नहीं है। निम्न वर्ग की जिस कारण प्रगति रुकती है और उन्हें दूसरों का गुलाम होना पड़ता है, उस न्यूनता की ग्रंथि को समाप्त करना…।  उच्च शिक्षा के प्रसार बिना अन्य किसी मार्ग से यह संभव नहीं होगा।'' (पृष्ठ-69)
अस्पृश्यों के लिए मंदिर प्रवेश में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए 1933 में रंगा अय्यर ने चेन्नै (मद्रास) विधानसभा में एक विधेयक प्रस्तुत किया था। बाबा साहब ने इसका विरोध करते हुए कहा था, ''मंदिर प्रवेश जैसी छोटी-सी बात पर अस्पृश्यों को अपनी शक्ति नहीं गंवानी चाहिए। उच्च शिक्षा, ऊंची नौकरियां और अपने निर्वाह के लिए सम्मानीय मार्ग अपनाने के लिए प्रयत्न करने से अस्पृश्यों की उन्नति होगी और साथ ही स्पृश्य लोगों का अस्पृश्य समाज की ओर देखने का दृष्टिकोण भी बदलेगा। मंदिर के दरवाजे खुलते हैं या नहीं, यह निजी सवाल आपके लिए है। यदि इंसानियत की कीमत करना जानते हो तो मंदिर खोलकर मानवता दिखाओ।'' (पृष्ठ-78) इन प्रसंगों ने पुस्तक को रुचिकर बना दिया है। बाबा साहेब पर शोध करने वालों के लिए यह किताब मार्गदर्शक बन सकती है।     
—अरुण कुमार सिंह     

पुस्तक का नाम : बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर   
                       शैक्षिक अवदान
लेखक     : हनुमान सिंह राठौड़
पृष्ठ             : 128
मूल्य             : 60 रु.
प्रकाशक     : अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ
              शैक्षिक महासंघ सदन 606/13, गली सं.-9
              मौजपुर, दिल्ली- 53

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