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जीएसटीसमझदारी की सहमति

Written byArchiveArchive
Aug 16, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 16 Aug 2016 13:15:28

संसद में जीएसटी में शुरुआती अड़चनों के बाद इस मानसून सत्र में इस पर जिस तरह समझदारी से सबने इसके लाभ को समझा और सरकार का साथ दिया, वह देशहित में एक बड़ा कदम था। कर-प्रणाली के सरलीकरण से कर-जंजाल से मुक्ति मिलेगी। राज्य मुनाफे की स्थिति में होंगे और ज्यादातर वित्त-व्यवहार ऑनलाइन होने से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा
 आलोक पुराणिक
गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स ने अपनी यात्रा के कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव पार कर लिये हैं। समझदारी की सहमति की बदौलत राज्यसभा में संविधान संशोधन बिल पारित हुआ, फिर लोकसभा ने भी उसे समर्थन दिया। अब गेंद राज्यों के पाले में है। लंबी यात्रा है। देर-सवेर जीएसटी फलीभूत होगा। लोकतंत्र में किसी भी मसले पर देरी संभावित है, फिर भारत में तो कई स्तर पर लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं हैं। केंद्र सरकार के कर अलग, राज्य सरकार के कर अलग, जिला नगर पालिका, महानगरपालिका के कर अलग, ग्राम पंचायत के कर अलग। जितनी सरकारें उतने कर। सरकार के बुनियादी कामों में एक काम कर वसूलना है। जितनी सरकारें, उतने कर। यानी भारत जैसी बहुविध सरकारों की व्यवस्था में कोई एकीकृत कर व्यवस्था बनाना बहुत मुश्किल काम है।
 इधर कर, उधर कर
कई कर केंद्र सरकार के खजाने में जाते हैं, वसूली भी केंद्रीय व्यवस्था के तहत ही होती है। आयकर केंद्रीय कर, की वसूली केंद्र सरकार करती है। कस्टम केंद्रीय कर वसूली केंद्र सरकार करती है। सर्विस टैक्स केंद्रीय कर वसूली केंद्र सरकार करती है। मनोरंजन कर राज्य सरकारों का कर है। हर शहर की सीमा पर चुंगी की वसूली का कोई ताल्लुक केंद्र सरकार से नहीं है, यह स्थानीय सरकार को जाता है।
सीधा कर बनाम परोक्ष कर
आयकर सीधा कर यानी डायरेक्ट टैक्स है, देने वाले की जेब से सीधा जाता है सरकार के पास। पर उत्पाद शुल्क परोक्ष कर है इनडायरेक्ट टैक्स है, क्योंकि हम सीधे सरकार को यह कर नहीं देते। हम जो मोटरसाइकिल, कार या कोई और निर्मित चीज खरीदते हैं, उसकी कीमत में उत्पाद शुल्क शामिल होता है यानी उत्पाद शुल्क हमसे वसूला जाता है, पर सीधे हम नहीं देते, इसलिए  उत्पाद शुल्क को इन-डाइरेक्ट टैक्स यानी परोक्ष कर कहते हैं। जीएसटी सुधार सारा का सारा परोक्ष कर सुधार है। आयकर पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। यानी आयकर वैसे ही रहेगा, यह ना समझा जाये कि सारे कर जा रहे हैं, सिर्फ एक ही कर गुड्स एंड सर्विस टैक्स रहेगा। लगभग सारे परोक्ष कर, यानी इनडायरेक्ट टैक्स जाने की संभावना है। परोक्ष कर सारे के सारे बने रहेंगे।
ये कर जायेंगे
उत्पाद शुल्क, मनोरंजन कर, लग्जरी कर, वैल्यू एडिड टैक्स, चुंगी वगैरह जायेंगे और इनकी जगह जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स आ जायेगा। शराब अभी जीएसटी से बाहर है यानी शराब की कर व्यवस्था वही रहेगी, जो अभी है। शराब कई राज्यों के लिए राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत है।
क्या है जीएसटी
सवाल है कि आखिर जीएसटी है क्या और इसकी जरूरत पड़ क्यों रही है।
इस समय देश में कई स्तर की सरकारें और कई स्तरों के कर हैं। केंद्र से लेकर राज्य तक, राज्य से लेकर पंचायत स्तर के कर इस वक्त हैं। एक राज्य से दूसरे राज्य में माल ले जाने पर कर है। किसी शहर में घुसने के लिए 'एंट्री टैक्स' है। बच्चे की कोचिंग फीस दें, तो उस पर सर्विस टैक्स लगता है। मोबाइल का जो बिल आता है, उस पर सर्विस टैक्स लगता है। ब्यूटी पार्लर की रसीद गौर से देखने पर     साफ होता है कि वहां भी कर है, सर्विस   टैक्स फिलहाल 15 प्रतिशत है। भारतीय अर्थव्यवस्था के  सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का60 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा  है। 100 से ज्यादा सेवाओं पर सेवा कर लिया जा      रहा है। गुड्स यानी साज-सामान कार, ट्रक, बाइक से लेकर सिगरेट वगैरह पर कर लगता है, उसे उत्पाद शुल्क कहते हैं। ये दर अलग-अलग हैं। किसी चीज पर यह दर कम है, किसी पर ज्यादा है। अब गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स यानी जीएसटी के तहत योजना है कि सारी वस्तुओं और सेवाओं को एक ही तरह के कर के दायरे मे लाया जाये, उसे कहा जाये गुड्स एंड सर्विस टैक्स। यानी कुल मिलाकर कर व्यवस्था में मच रही अव्यवस्था को ठीक किया जाये।
जीएसटी पर हाल में आयी अरविंद सुब्रह्मणयम समिति की रिपोर्ट से पता लगता है कि अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं पर कर की दर 18 प्रतिशत के आसपास हो सकती है। अरविंद सुब्रह्मण्यम वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। इसका मतलब यह हुआ कि हर सेवा पर कर की दर बढ़ सकती है यानी 15 प्रतिशत से बढ़कर 18 प्रतिशत हो सकती है और बहुत संभव है कि तमाम उत्पादों पर लगने वाले कर की दर कम हो जायेगी।
मोटे तौर पर अनुमान यह है कि सिगरेट जैसी चीजों पर, जिनका उपभोग बढ़ाना सरकार का लक्ष्य नहीं है, जिन्हें 'खराब वस्तु' कहा जा सकता है, 40 प्रतिशत कर लग सकता है। तमाम बहु-प्रयुक्त चीजों पर 18 प्रतिशत का कर लग सकता है। गरीबों के लिए उपभोग के सामान को करमुक्त या न्यूनतम कर यानी 12 प्रतिशत के आसपास रखा जा सकता है। पर अभी ये सभी अनुमान हैं। वास्तविक कर दरें बजट में ही सामने आ पायेंगी।
गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स केंद्र और राज्य स्तर पर अलग-अलग वसूला जायेगा यानी दो तरह के गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स होंगे-एक राज्य स्तर का जीएसटी, दूसरा केंद्र के स्तर का जीएसटी।

मध्यवर्ग की जेब और जीएसटी
मोटे तौर पर माना जाये कि कर वहीं से लिया जायेगा, जहां पर आय है। यानी कोई भी सरकार गरीबों पर कर नहीं लगा सकती। उदाहरण के लिए, तंबाकू सेहत के लिए खतरनाक है, यह बात मान्य होने के बावजूद, गरीबों की बीड़ी पर कर नहीं लगता और मध्यवर्ग और इससे ऊपर के वर्ग की सिगरेट पर कर को लगातार बढ़ाना हरेक वित्त मंत्री अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी मानता है।
यानी मध्यवर्ग को कुछ ज्यादा बोझ के लिए मानसिक तौर पर तैयार रहना चाहिए क्योंकि उसके उपभोग में सेवाएं बड़ी मात्रा में शामिल होती हैं। सेवाओं के महंगे होने के आसार इसलिए हैं कि वर्तमान में सेवाकर 15 प्रतिशत है। अनुमान के मुताबिक यह बढ़कर 18 प्रतिशत होगा। कोई भी सरकार, वह केंद्र की हो चाहे राज्य की हो, अपने राजस्व में कमी नहीं चाहेगी। इसलिए कुल मिलाकर मोटे तौर पर कर संग्रह में फर्क आने की उम्मीद नहीं है। यह उम्मीद भी ठीक नहीं है कि सब कुछ सस्ता ही होने वाला है। साफतौर पर सेवा कर की दर 15 प्रतिशत से बढ़कर 18 प्रतिशत होगी, तो ये सारी सेवाएं महंगी ही होंगी। बीमा खरीदना, रेस्टोरेंट में खाना खाना, बच्चे की कोचिंग-ये सब महंगे होने के आसार हैं। यहां साबुन, पेंट, वाशिंग पाऊडर वगैरह सस्ता हो सकता है। अभी तमाम पेंट, साबुन कंपनियां करीब 24-25 प्रतिशत की दर से कर देती हैं। नयी जीएसटी व्यवस्था में यह कर दर गिर 18 प्रतिशत तक हो सकती है। यानी इन कंपनियों की खासी बचत हो सकती है। मोबाइल हैंडसेट महंगे हो सकते हैं। पूरी सस्ताई-महंगाई का विश्लेषण कर ढांचे के सामने आने पर ही संभव है, पर ऐसी उम्मीद लगाना बेकार है कि जीएसटी के आने के बाद सर्वत्र सस्ताई हो जायेगी। किन्हीं सेवाओं में महंगाई, किन्हीं चीजों में सस्ताई, कुल मिलाकर जेब से बतौर कर उतनी ही रकम निकलेगी, जितनी अब तक निकलती आ रही है। कोई भी सरकार यही चाहेगी।
खाने-पीने की चीजें महंगी नहीं
एक अध्ययन के मुताबिक अर्थव्यवस्था की जनसंख्या का शीर्ष 60 प्रतिशत हिस्सा अपने कुल खर्च का 25़ 9 प्रतिशत खाने पर खर्च करता है। कुल जनसंख्या का नीचे का 40 प्रतिशत हिस्सा अपने कुल खर्च का 38़ 3 प्रतिशत खाने पर खर्च करता है। मोटे तौर पर इन आंकड़ों का आशय यह है कि शीर्ष वाली जनसंख्या के कुल खर्च का करीब एक चौथाई खाने पर जाता है, और नीचे की जनसंख्या के कुल खर्च का एक तिहाई से भी अधिक खाने पर जाता है। लोकतंत्र में नीचे के पायदान की जनसंख्या के जीवन को महंगा बनाने की हिम्मत आम तौर पर किसी सरकार में नहीं होनी चाहिए। इसलिए खाने की चीजें महंगी नहीं होंगी, ऐसा माना जा सकता है।
जीएसटी काउंसिल के बावजूद
चूंकि जीएसटी का असर केंद्र और राज्य, दोनों स्तर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा, इसलिए यहां केंद्र और राज्य दोनों स्तर के प्रतिनिधित्व का प्रावधान है। यानी कुल मिलाकर इस व्यवस्था से यह साफ होता है कि कराधान के अधिकार केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों के प्रतिनिधित्व से तय होंगे। पर यहां मामला इतना सीधा नहीं है। इस आशय के स्वर उठने शुरू हुए हैं कि जीएसटी के बाद आय के लगभग सारे स्रोत केंद्र के हाथों में होंगे। राज्य सरकारों का अधिकार तो बहुत कम हो जायेगा। कोई भी नयी व्यवस्था जब लागू होती है, तो डर और अनिश्चितताएं होती हैं। केंद्र सरकार ने वादा किया है कि पांच साल तक किसी भी नुकसान की भरपाई की जायेगी पर यह आश्वासन काफी नहीं है, इसे लेकर राजनीतिक खींचतान होगी ही। खास तौर पर वे सरकारें तो खींचतान करेंगी ही, जहां केंद्र से अलग दलों की सरकारें हैं। जीएसटी में किसी प्रस्ताव के समर्थन या विरोध पर राजनीतिक सौदेबाजी की आशंकाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता। पश्चिम बंगाल इधर विकट वित्तीय समस्याओं से जूझ रहा है। वहां वर्तमान वित्त मंत्री कह रहे हैं कि हमसे पहले की वामपंथी सरकार लगातार कर्ज लेकर हमारे लिए बहुत बड़ा दायित्व छोड़ गयी है। इसे हम कैसे चुकायें? हमें केंद्र से राहत मिलनी चाहिए। इस राहत को जीएसटी के साथ न जोड़ दिया जाये, ऐसी राजनीतिक परिपक्वता की उम्मीद की जानी चाहिए। दरअसल कोई भी व्यवस्था उतनी अच्छी या खराब होती है, जितने अच्छे या खराब, परिपक्व या अपरिपक्व राजनेता उनसे चलाने वाले होते हैं। जीएसटी भी इसका अपवाद नहीं है।
जीएसटी का असर
सवाल यह है कि जीएसटी के मसले पर देरी के नुकसान क्या हैं। नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च (एनसीएईआर)   ने दिसंबर, 2009 में 13वें वित्तीय आयोग के लिए एक रिपोर्ट तैयार की थी, इस रिपोर्ट का शीर्षक था-'मूविंग टू गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स इन इंडिया-इंपेक्ट ऑन इंडियाज ग्रोथ एंड इंटरनेशनल ट्रेड'। इस रिपोर्ट में एनसीएईआर ने बताया था कि जीएसटी लागू होने पर विकास दर में दशमलव 9 प्रतिशत से लेकर 1़ 7 प्रतिशत विकास दर अतिरिक्त हासिल की जा सकेगी। इसका मोटा-मोटा आशय यह हुआ कि भारतीय अर्थव्यवस्था की जो विकास दर 7़ 5 प्रतिशत अनुमानित की जा रही है, वह बढ़कर 9 प्रतिशत सालाना हो सकती है। 9 प्रतिशत सालाना विकास दर का मतलब हुआ कि भारत में रोजगार ज्यादा होगा। आय ज्यादा होगी।
अर्थव्यवस्था ज्यादा कुशलता की ओर जायेगी। जीएसटी के दायरे में करीब 20-25 लाख करदाता आयेंगे। अरविंद सुब्रह्मण्यम ने जीएसटी की अपनी रिपोर्ट में साफ किया है कि आधुनिक भूमंडलीय कर इतिहास में भारतीय जीएसटी अभूतपूर्व होगा। दरअसल भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार इतना बड़ा है कि यहां जो भी कुछ भी राष्ट्रीय स्तर पर होता है, वह अभूतपूर्व होने की ही संभावना रखता है।
अर्थव्यवस्था कुशलता की ओर तमाम वजहों से जायेगी। अभी उदाहरण के लिए किसी चीज का कच्चा माल महाराष्ट्र से आता है, उसका अंतिम स्वरूप आंध्र में बनता है और वह बिकता तमिलनाडु में है, तो इससे जुड़े तमाम सौदों में तीन राज्यों के करों के मसले शामिल होंगे। तीन स्तर पर करों को निपटाने में समय, ऊर्जा का व्यय होता है। एक कर हो, उसमें ही सारे राज्यों के कर समाहित हो जायें, तो करदाता के लिए यह राहत की बात होगी।
वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रहण्यम जीएसटी पर पेश अपनी रिपोर्ट में साफ करते हैं कि जीएसटी लागू होने से भारत को सही मायने में एक होने में मदद मिलेगी। यानी तमाम साज-सामान एक राज्य से दूसरे राज्य कर-जटिलताओं के बगैर आ-जा पायेगा। 'मेक इन इंडिया बाई मेकिंग वन इंडिया'-इस मुहावरे को अरविंद प्रयुक्त करते हैं। एक राज्य के ट्रक बिना तमाम एंट्री-टैक्स, कर वगैरह की चौकियों पर रुके अगर तेज गति से चलें, तो पूरी अर्थव्यवस्था को उसका फायदा मिलेगा।
कराधान व्यवस्था में जीएसटी बहुत बड़ा कदम है। इसकी वास्तविक कठिनाइयां, समस्याएं इसके लागू होने पर सामने आयेंगी। पर कुल मिलाकर उपभोक्ता यह उम्मीद ना पालेंे कि बहुत सस्ताई आने वाली है। कोई भी सरकार ऐसा नहीं होने देगी। अपने कर राजस्व को कायम रखने के लिए वह उपभोक्ताओं, करदाताओं की जेब से अधिकतम कर वसूलने के लिए ही प्रतिबद्ध होगी। हां, जीएसटी से अफसरशाही, भ्रष्टाचार की समस्याओं से निजात मिल सकती है। पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री अमित मित्रा का मानना है कि जीएसटी से लघु उद्यमियों को लालफीताशाही से राहत मिलेगी।

यह हमारी प्रतिस्पर्धात्मकता में आड़े आने वाली गंभीर अड़चन का समाधान करने वाला है। जीएसटी के न होने की सूरत में हमें कराधान के अनेक जगहों और अनेक न्यायाधिकार क्षेत्रों का सामना करना पड़ता है। चुकाए जा चुके करों के समायोजन संबंधी अधूरी प्रणाली से काम चलाना पड़ता रहा है, जिससे लागत बढ़ जाती है। इसके अलावा करों के दोहराव-कर के ऊपर कर-की समस्या का भी सामना करना पड़ता है। इतना ही नहीं, केंद्रीय बिक्री  कर तथा प्रवेश करों, जिनका समायोजन नहीं किया जाता, के कारण कारोबारी बोझिलता इस कदर बढ़ जाती थी कि अंतर्राज्यीय कारोबार का सिलसिला गड़बड़ा जाता है। जीएसटी वजूद में आने के बाद यह सिरदर्द एक ही बार में खत्म हो जायेगा। कारोबारी सुगमता बढ़ेगी। आयातित सामानों की तुलना में हमारे उत्पाद पहले से कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे।

हाल ही में वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज इंंवेस्टर सर्विस ने अपनी नई अध्ययन रिपोर्ट में बताया कि भारत में जीएसटी लागू होने से निवेश की चमकीली संभावनाएं आकार ग्रहण करेंगी। इसी तरह वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (एसौचैम) ने कहा कि यदि जीएसटी 1 अप्रैल, 2017 से लागू होता है तो देश के लिए यह ब्रह्मास्त्र बन सकता है। इससे देशी-विदेशी निवेश बढ़ेगा और आने वाले दिनों में जीडीपी में बढ़ोतरी होगी।

जीएसटी से लाभ ही लाभ

1986 से लेकर वर्ष 2000 के बीच दुनिया के चार देशों में जीएसटी लागू  हुआ।
विश्व  में 150 से ज्यादा देशों में जीएसटी जैसी कर व्यवस्था लागू है।
केन्द्र एवं राज्यों में लागू बीस से ज्यादा अप्रत्यक्ष कर जीडीपी के बदले जीएसटी लागू होगा।
दस लाख से ज्यादा कुल कमाई  वाले कारोबारी जीएसटी के दायरे में आएंगे।
1.5 करोड़  तक कुल कमाई करने वाली कंपनियों पर कर लगाने का अधिकार राज्य सरकारों का।
कर चोरी की घटनाओं में कमी आएगी।
मजबूत और समग्र आईटी प्रणाली भारत में जीएसटी तंत्र की बुनियाद  होगी। इसलिए करदाता सेवाएं जैसे पंजीकरण, रिटर्न्स, भुगतान आदि करदाताओं को ऑनलाइन मुहैया होंगी, नियमों का अनुपालन ज्यादा सुगम और पारदर्शी होगा।
अधिकांश वस्तुओं पर करों का बोझ कम होगा। इससे उपभोक्ताओं को लाभ होगा।
उपभोक्ताओं के लिए प्रभावी कर दर 30 फीसद से गिरकर 18-19 फीसद  हो जायेगी।  इसके अलावा राज्य से राज्य के मध्य अवरोध हट जाने के कारण उपभोक्ताओं को 'कर पर कर' नहीं देना पड़़ेगा।
राज्यों ने वस्तुओं पर बिक्री कर (वैट) लगाने का अपना अधिकार तथा केंद्र सरकार ने उत्पाद शुल्क  और सेवा कर लगाने का अपना अधिकार  छोड़ने पर सहमति जताई है।  इसके बदले राज्यों को राष्ट्रीय स्तर पर संग्रहीत एकीकृत जीएसटी से उन्हें कुछ हिस्सा मिलेगा।
इस व्यवस्था से दक्षता, प्रतिस्पर्धा और समग्र कर संग्रहण के रूप में अतिरिक्त लाभ मिलने का भी अनुमान है।
वस्तुओं और सेवाओं के लिए एकीकृत और अखंडित राष्ट्रीय बाजार मुहैया हो जायेगा।  साथ ही ऐसे बाजार तक लघुस्तरीय उद्यमी तक की पहुंच सुगम्य हो जायेगी।
नेशनल काउंसिल फॉर एप्लाइड  इकोनॉमिक रिसर्च और अनेक आर्थिक संस्थाओं का आकलन है कि सतत आधार पर राष्ट्रीय जीडीपी में एक फीसद अंक की वृद्धि संभव है।
भारत में 20 तरह के कर लगते हैं लेकिन इसके लागू होने के बाद सिर्फ एक ही  कर  लगेगा।
अब उत्पादन और खपत की कड़ी में अंतिम छोर पर कर लगाया जायेगा।
सामान के शहर में प्रवेश पर लगने वाला कर एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स और अन्य राज्यस्तरीय करों की
जगह लेगा।
अब कर वे राज्य सरकारें वसूलेंगी जहां उत्पाद की खपत होती है।
उत्तर प्रदेश और बिहार को इसके लागू होने के बाद अधिक संसाधन मिलेंगे क्योंकि वहां उपभोक्ताओं की संख्या ज्यादा है।
कर संबंधित 75 लाख मामले ऑनलाइन आ जाएंगे।
कर प्रशासन पहले से आसान होगा।
दुनिया के जिन देशों में वस्तु एवं सेवाकर जैसी व्यवस्था है, उनमें से अधिकांश देशों में जीएसटी लगाने के बाद सकल घरेलू उत्पाद  में लगातार वृद्धि हुई है। ऐसे में भारत में भी जीएसटी लगने के बाद वृद्धि  होगी। 

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अभिषेक बनर्जी की चार्टर्ड उड़ानों पर तृणमूल कांग्रेस में उठने लगे सवाल

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