इतिहास दृष्टि : 16 अगस्त, 1946जिन्ना की सीधी कार्रवाई था खुला जिहाद
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इतिहास दृष्टि : 16 अगस्त, 1946जिन्ना की सीधी कार्रवाई था खुला जिहाद

Written byArchiveArchive
Aug 8, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 08 Aug 2016 14:55:59

ब्रिटेन की लेबर सरकार ने मार्च, 1946 में तीन कैबिनेट मंत्रियों के एक दल को भारत भेजा। इसने भारत को आजादी देने के विषय में जो प्रस्ताव दिए, उनके अनुसार हिन्दू-बहुल एवं मुस्लिम-बहुल राज्यों को अलग-अलग वर्गों में रखा जाना था और इन राज्यों को यह अधिकार दिया गया कि वे यदि चाहें तो भारत संघ से बाहर निकल सकते थे। यानी कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव में पाकिस्तान के बीज छिपे थे।
किन्तु जिन्ना असंदिग्ध शब्दों में पाकिस्तान योजना की स्वीकृति चाहते थे। उन्होंने 27 जुलाई, 1946 को मुस्लिम लीग कार्यकारिणी से चर्चा करने के बाद बम्बई में घोषणा की कि भारत में मुस्लिम राष्ट्र जन्म लेने के लिए छटपटा रहा है, किन्तु अंग्रेज व कांग्रेस दोनों किसी न किसी रूप में रोड़े अटका रहे हैं। उनके अनुसार लीग को इस बात के लिए विवश कर दिया गया था कि वह संवैधानिक उपायों का सहारा लेना छोड़कर सीधी कार्रवाई द्वारा अपना अभीष्ट हासिल करे। जब पत्रकारों ने यह जानना चाहा कि क्या इसका अर्थ हिंसक उपाय अपनाने से है तो जिन्ना ने कहा कि वे हिंसा-अहिंसा के बीच की नैतिक सूक्ष्मताओं में उलझना नहीं चाहते। हां, सीधी कार्रवाई के लिए उन्होंने 16 अगस्त की तिथि अवश्य घोषित की।
ध्यान दीजिए कि जिन्ना ने स्पष्ट रूप से नहीं कहा कि लीग हिंसा करेगी। उन्होंने जिहाद शब्द का तो कहीं जिक्र तक नहीं किया। यह तो बाद की घटनाओं से जाहिर हुआ कि सीधी कार्रवाई जिहाद का ही दूसरा नाम थी। 16 अगस्त की तारीख चुनने के पीछे कारण यह था कि उस दिन रमजान मास की 18 तारीख पड़ती थी। रमजान मास के दौरान ही इस्लाम के प्रवर्तक ने बदर की लड़ाई (624 ई.) में महत्वपूर्ण जीत हासिल की थी। सूक्ष्म रूप से नए जिहादियों को संदेश दे दिया गया कि काफिरों को वैसे ही रगड़ देना है जैसे पैगंबर ने बदर में मक्का के कुरैशों को पराभूत
किया था।
कलकत्ता का नरमेध
हिन्दू समाज 16 अगस्त से पूर्व सीधी कार्रवाई के सही आशय को समझ नहीं पाया। समझ लेता तो संभवत: अपने बचाव का कुछ प्रयास करता। पर लीग को तो अपनी योजना की वास्तविकता हृदयंगम थी। ज्यों-ज्यों 16 अगस्त का दिन निकट आता गया, लीग ने सभी छोटे-बड़े शहरों में सभा-जुलूस शुरू कर दिए। सरकारी निषेधों का उल्लंघन किया गया। बंगाल  और सिंध की लीगी सरकार ने 16 अगस्त की छुट्टी घोषित कर दी। बंगाल के प्रीमियर एच.एस. सुहरावर्दी ने धमकी दी कि यदि केन्द्र में कांग्रेस को सत्ता सौंपी गई तो वे अपने प्रांत को स्वतंत्र घोषित कर देंगे।
उन दिनों अनेक प्रांतों में पुलिस बल में मुसलमान बहुसंख्यक थे। सिंध  और पंजाब में 70-70 प्रतिशत तथा संयुक्त प्रांत तथा बंगाल में 50-50 प्रतिशत पुलिसवाले मुस्लिम थे। इस स्थिति ने मंडराते संकट की विकरालता को और बढ़ा दिया था। फिर बंगाल का प्रीमियर तो घोर जिहादी मानसिकता का था। उसने कलकत्ता में 16 अगस्त के नरमेध के लिए स्वयं सारी तैयारियां मुकम्मल कीं।
प्रदेश सरकार का गृह विभाग भी इस सुहरावर्दी नामक शख्स के पास ही था। उसने कलकत्ता के 24 पुलिस थानों में से 22 में मुस्लिम थानेदार तैनात कर दिए। शेष दो थानों में ऐंग्लो-इंडियन अधिकारी थे।  कलकत्ता के आस-पास से तमाम मुस्लिम गुंडे राजधानी बुला लिए गए। उन्हें बंदूकें व अन्य घातक हथियार खुद सरकार की ओर से मिले। पेट्रोल पंपों से पेट्रोल लेने के लिए कूपन प्रदान किए गए। हावड़ा में मुस्लिम गुंडों की टोलियों की कमान कलकत्ता के मेयर शरीफ खां ने अपने हाथ में ले ली। यूं तैयारी हुई 16 अगस्त को लीगी सरकार द्वारा प्रायोजित जिहाद की।
सीधी कार्रवाई दिवस की शुरुआत कलकत्ता में लीग के बड़े-बड़े जुलूसों से हुई। इनमें 'दीन-दीन', 'अल्लाहो अकबर' तथा 'लड़ के लेंगे हिन्दुस्तान' के नारे लग रहे थे। फिर एक विशाल सभा में वक्ताओं ने हिन्दुओं के विनाश की शपथ ली। इसके साथ ही जिहाद की स्पष्ट घोषणा कर दी गई। सभा से लौटती सशस्त्र भीड़ ने हिन्दुओं पर सैकड़ों स्थानों पर हमले किए। पूरे दो दिन तक हत्या, लूटपाट, आगजनी, हिन्दू महिलाओं का अपहरण, बलात्कार का दौर बेरोकटोक चलते रहे। पुलिस या तो निष्क्रिय रही, या हमलावरों का साथ देती नजर आयी। खुद प्रीमियर सुहरावर्दी पुलिस नियंत्रण कक्ष में बैठ उपद्रवों का संचालन कर रहा था। उधर अंग्रेज गवर्नर एफ. बरौज अंधा-बहरा बना रहा।
कुछ अंतराल के पश्चात हिन्दुओं की समझ में आ गया कि यदि संपूर्ण विनाश से खुद को बचाना है तो आत्मरक्षा ही एकमात्र साधन है। सो तीसरे दिन उन्होंने संगठित प्रत्याक्रमण शुरू कर दिए। जल्दी ही मुस्लिम उपद्रवी पस्त होने लगे। उन्हें करारा जवाब मिला। आखिर तो कलकत्ता एक हिन्दू-बहुल नगर था। ज्यों ही मुसलमान पिटने शुरू हुए, गवर्नर ने सेना बुला ली। उसे उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने का आदेश था। सब मिलाकर चार दिन में 10,000 लोगों की हत्या हुई और 15,000 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। एक लाख लोगों को बेघरबार करने के बाद उपद्रव रुका।
'स्टेट्समैन' के ब्रिटिश संवाददाता किम क्रिस्टेन ने लिखा है, ''युद्ध के अनुभव ने मुझे कठोर बना दिया है, किन्तु वह भी इतनी भयानक विभीषिका वाला नहीं होता। यह दंगा या महज उन्माद नहीं था। इसके लिए तो शब्द मध्ययुग में से खोजना होगा।''
कलकत्ता में सेना के कमांडिंग ऑफिसर ने वाइसराय लॉर्ड वैवल तक इस महापराध में सुहरावर्दी की सीधी संलिप्तता की खबर पहुंचाई। वैवल ने स्वयं कलकत्ता आकर विनाशलीला के बाद कराहते हुए नगर को नगर देखा। तब उनकी सोच इन शब्दों में प्रगट हुई थी, ''मुस्लिम लीग को किसी तरह केंद्र की अंतरिम सरकार, जो इस बीच 2 सितम्बर, 1946 को नेहरू के नेतृत्व में शपथ ले चुकी थी, में शामिल कर जिम्मेदारी देनी होगी, वरना भविष्य में ऐसी विनाशलीला की पुनरावृत्ति संभव है।'' 26 अक्तूबर को पांच लीगी सदस्य केंद्र सरकार में शामिल हो भी गए, पर जैसा कि आगामी घटनाओं ने साबित कर दिया, लीग ने अंतरिम सरकार को ही सीधी कार्रवाई का एक फ्रंट बना डाला।
 नोआखाली और तिप्परा
अक्तूबर के मध्य में लीग ने बंगाल में दो स्थान-नोआखाली और तिप्परा-सीधी कार्रवाई हेतु चुने। यहां हिन्दू बेहद अल्पसंख्या में थे तथा कलकत्ता के समान हिन्दू प्रत्याक्रमण की संभावना नहीं थी। इसलिए जिहादियों ने मनमाना तांडव किया। नृशंसता की सभी सीमाएं पार हो गईं। महिलाओं की आंखों के सामने उनके पति, भाई, पुत्र, पिता को बेरहमी से कत्ल कर दिया जाता और उनके हत्यारों से ही उन्हें निकाह करना पड़ता। उसके पूर्व कलमा पढ़ाकर और गोमांस खिलाकर इन महिलाओं को मुस्लिम बनाया जाता। इस काम के लिए मुल्ला-मौलवी दल-बल के साथ चलते थे।
जब वरिष्ठ कांग्रेसी नेता आचार्य कृपलानी ने गवर्नर एफ. बरौज से हिन्दू महिलाओं की नारकीय दुर्दशा, उनके अपहरण, बलात्कार और जबरिया निकाह की चर्चा की तो उसका निर्लज्ज उत्तर था- इसमें अस्वाभाविक क्या है? हिन्दू महिलाएं मुसलमान महिलाओं से ज्यादा रूपवती होती ही हैं।
नोआखाली-तिप्परा में छिड़ा विध्वंस कई सप्ताह चला और केन्द्रीय मंत्रिमंडल में लीग के प्रवेश के बाद भी रुका नहीं। लीग द्वारा प्रशिक्षित सशस्त्र 'मुस्लिम नेशनल गार्ड' सब जगह मुस्लिम गुंडों का नेतृत्व करते। सबसे पहले हिन्दू नेताओं, जमींदारों व प्रभावशाली लोगों को चुन-चुन कर मारा जाता। उनकी संपत्ति लूटी जाती। महिलाओं को अगवा किया जाता। फिर सर्वसाधारण हिन्दू का नंबर आता। उसके साथ भी यही दोहराया जाता। नरमेधों की झड़ी लग गई।
राज्य प्रशासन कहीं नजर नहीं आ रहा था। वी.पी. मेनन के अनुसार सरकारी तंत्र पूरी तरह उदासीन रहा। वाइसराय से हिन्दुओं को बचाने की अपीलें बेकार गईं। वैवल ने कहा कि केन्द्र द्वारा राज्यों की स्वायत्तता में दखलअंदाजी नहीं की जानी चाहिए। मानो एक आंख वाले वैवल को आर्य हिन्दू समाज दिखता ही नहीं था। केवल हिन्दू महासभा के लोग ही डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में हिन्दुओं के घावों पर मरहम लगाने पहुंचे। गांधी जी का दौरा भी हिन्दुओं में विश्वास नहीं भर सका था। वे नोआखाली के कांग्रेस-समर्थित विधायक गुलाम सरवर द्वारा अगवा हिन्दू लड़कियों को वापस नहीं करा पाए।
बिहार में प्रतिक्रिया और सैन्य दमन
नवम्बर में बिहार के हिन्दुओं में बंगाल की प्रतिक्रिया हुई। बंगाली हिन्दू लड़कियों को अगवा कर बिहार भी ले जाया गया था। इसके पक्के समाचार मौजूद थे। हिन्दुओं के लिए यह असहनीय स्थिति थी। हिन्दुओं ने मुसलमानों से हिन्दू बंगाली लड़कियों को मुक्त करने की अपील की, पर उन्होंने उनकी अपील ठुकरा दी। बंगाल में काम कर रहे बिहारी हिन्दू श्रमिक भयंकर त्रासदी का शिकार बन चुके थे। इस कारण भी बिहार में रोष था। तीसरे, बिहार में भी लीग ने पत्रक बांटकर मुसलमानों को जिहाद के लिए उकसाना शुरू कर दिया था। इन सब वजहों से आग भड़क उठी और मुस्लिम गुंडों को निशाना बनाकर निबटाया गया।
बंगाल की तुलना में बिहार में सरकार और केन्द्रीय नेताओं के आचरण में धरती-आकाश का अंतर था। बंगाल में तो सारी हिंसा राज्य सरकार द्वारा प्रायोजित थी। वायसराय ने सर्वाधिक पीडि़त नोआखाली तथा तिप्परा में सेना भेजने से यह कहकर इनकार कर दिया था कि इससे राज्य की स्वायत्तता प्रभावित होगी। किंतु बिहार में हिन्दू प्रतिक्रिया को कुचलने के लिए वैवल ने न सिर्फ सेना भेजी, बल्कि कई स्थानों पर हिन्दू भीड़ पर वायु सेना द्वारा बम भी गिराए गए।
 नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, आचार्य कृपलानी आदि तमाम शीर्ष नेता हिन्दुओं को शांत करने बिहार पहुंचे। गांधी जी भी आ गए। इन सबके समझाने से हिन्दू न सिर्फ शांत हो गए, अपितु उजड़ चुके मुसलमानों के पुनर्वास में लगे। उन्होंने उनके लिए चंदा इकट्ठा किया। हिन्दू महिलाओं ने अपने आभूषण दिए। हिंदू समाज द्वारा मुस्लिम शरणार्थियों के लिए भोजन-वस्त्र का प्रबंध किया गया। यह सारा परिदृश्य बंगाल से एकदम उलट था। वहां के हिन्दुओं के नसीब में ऐसी कोई सहायता नहीं थी। पर यहां यह उल्लेख भी जरूरी है कि गांधी जी आदि नेताओं के कहने पर बिहार में मुस्लिम शरणार्थियों के पुनर्वास और सहायता का कार्य  प्रभार एक मुस्लिम मंत्री अब्दुल कय्यूम अंसारी को दिया गया। लेकिन अंसारी ने शरणार्थी शिविरों को नए-नए षड्यंत्रों का अड्डा बना दिया। इस तरह का अनुभव 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों में भी दिखाया।
आगे चलकर इस सीधी कार्रवाई का विस्तार  पंजाब-सिंध में भी हुआ। देश के बड़े हिस्से में रक्तपात की भीषण घटनाएं हुईं। कांग्रेस नेतृत्व ने इसी कारण विभाजन की मांग के आगे घुटने टेक दिए। 1945-46 के चुनाव में देश की अखंडता के नाम पर वोट मांगने वाले नेहरू ने 1960 में पत्रकार लेआनार्ड मोस्ले के सामने स्वीकार किया था कि लीग द्वारा भड़काई आग ने कांग्रेस को विभाजन मानने पर विवश किया।
सीधी कार्रवाई से मुस्लिम लीग की मानसिकता  दुनिया के सामने बाहर आई , लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज भी उस मानसिकता को पहचाना नहीं जा रहा है।    

-अजय मित्तल

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