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पाठकों के पत्र – रक्षा क्षेत्र में बढ़ते कदम

Written byArchiveArchive
Aug 8, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 08 Aug 2016 13:14:10

आवरण कथा 'ताकत का नया तेज' से स्पष्ट है कि भारत की रक्षा शक्ति में दिन-प्रतिदिन इजाफा हो रहा है। तोपखाने से लेकर मिसाइल तक में देश नए आयाम छू रहा है। पिछली सरकारों में योजनाएं खूब बनीं पर धरातल पर काम शून्य के बराबर हुआ। पर इस सरकार का काम धरातल पर दिख रहा है।
                   

—आशुतोष सिंह, रामपुर (उ.प्र.)

– देशी लड़ाकू विमान, तेजस का वायु सेना के बेड़े में शामिल होना देश के लिए गर्व की बात है। रक्षा मंत्री ने साक्षात्कार में बड़ी बेवाकी से सभी मुददें पर अपनी बात रखी है। रक्षा क्षेत्र में मेक इन इंडिया से लेकर सीमा पर आतंकी गतिविधियों का मुंहतोड़ जवाब देना उनकी रणनीति में शामिल है। इस प्रकार की रणनीति से तीनों सेना के आत्मविश्वास में बढ़ोतरी हुई है। यह इन्हीं कोशिशों का परिणाम है कि हमारे सैनिक सीमा पर आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं।
—कृष्ण वोहरा, सिरसा (हरियाणा)

आतंकी के पैरोकार
रपट 'कायदा जिहादी, सोच वहाबी' (10 जुलाई, 2016) के मुताबिक हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकी बुरहान वानी को सुरक्षा बलांे ने जैसे ही मार गिराया, घाटी में अलगावादियों और आतंकी समर्थकों का कोलाहल शुरू हो गया। पत्थरबाजों ने सेना को जमकर निशाना बनाया और आतंकी के जनाजे में हजारांे की भीड़ के जरिए शक्ति प्रदर्शन किया। जो लोग कहते हैं कि यह गुस्साए लोगांे की प्रतिक्रिया थी तो यह बिलकुल गलत है,जब अलगाववादियों की पूर्व नियोजित चाल थी। अलगावादी ऐसे समय की प्रतीक्षा में थे कि जब वे शांत घाटी को अशांत कर सकें। इस समय भारतीय सेना ने त्वरित कार्रवाई की उसकी जितनी भी सराहना की जाये, कम है।
 — कमलेश कुमार ओझा, पुष्पविहार (नई दिल्ली)

–   जो लोग आतंकी के जनाजे मंे शामिल हुए। वे भी आतंक के पोषक हैं। सेना की कार्रवाई में आतंकियों के चुन-चुन कर मारे जाने से सीमा पार से बौखलाहट के समाचार आ रहे हैं। घाटी में इस बार सेना ने कड़ी कार्रवाई करके आतंकियों के हिमायतियों को कड़ा संदेश दिया कि आतंकी गतिविधियों का साथ देने वालों को सेना बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करने वाली, भले वे देश के नागरिक क्यों न हों।
 — इंदु मोहन शर्मा, राजसमंद (राज़)

–   आतंकी वानी के मारे जाने के बाद जिस तरह से मीडिया का रुदन शुरू हुआ, वह बहुत ही दु:खदायी है। मीडिया से अपेक्षा थी कि वह इस घटना के साथ देश और समाज को घाटी में पनप रहे आतंक और आतंकियों की करतूत के बारे में बताएगा लेकिन उसने तो उलटा काम किया। वह आतंकी और पत्थरबाजों के प्रति पूरी सहानुभूति निभा रहा था। आखिर देश-समाज मीडिया से यही अपेक्षा करता है? वैसे अलगाववादियों और आतंकियों को एक बात अब समझ में आ जानी चाहिए कि सरकार बदल चुकी है।
  — अनुश्वरी चौहान, जयपुर(राज.)

–  दो दिन पहले कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बयान दिया कि कश्मीर में जनमत संग्रह कराया जाना चाहिए। क्या यह पाकिस्तान के साथ सुर में सुर मिलाना नहीं है? हममें से किसी ने इसका विरोध नहीं किया, यह हैरत की बात है। कम से कम अब तो आम नागरिकों को समझना होगा कि कांग्रेसी नेताओं की मानसिकता क्या है? अगर हम इनका समर्थन करते हैं तो देश से गद्दारी करते हैं।
 —  हरिहर शर्मा, शिवपुरी (म़ प्ऱ)
    
हिंदुओं को बांटने की साजिश
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जब गुजरात के ऊना में पीडि़त दलित समुदाय के लोगों से मिलने पहुंचे तो उन्होंने कहा कि ''मुझे शमिंर्दगी है कि आज भी हमारे यहां ऐसा होता है''। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भारतीय जनता पार्टी पर भी निशाना साधा। कुछ भी हो, राहुल गांधी संघ की आलोचना करने में बिल्कुल भी समय जाया नहीं करते। किसी न किसी बहाने संघ की आलोचना करना उनका नैतिक कर्त्तव्य बनता जा रहा है। लेकिन इतने  सबके बाद भी कुछ नहीं हो पा रहा। उनके इस विरोध पर जनता उनका मखौल उड़ाती है। अच्छा यही होगा राहुल संघ की आलोचना करना बंद करें और देशहित में काम करें।
  — आशीष रावत,  विनोद नगर, (दिल्ली)

–   देश में बीस करोड़ से ज्यादा दलित हैं और उनकी राजनीति करने वाले दलों व नेताओं की संख्या भी कम नहीं है। दलितों के मुद्दों को सियासत के लिए ही इस्तेमाल किया गया और आज भी किया जा रहा है, यह बिल्कुल सत्य है। यद्यपि केन्द्र और राज्य सरकारों ने इस समुदाय के कल्याण के लिए अनेक योजनाएं चला रखी हैं लेकिन फिर भी दलित सियासत में सुपरस्टार बनने की होड़ सी चल पड़ी है। दलित समाज के प्रति भेदभाव की स्थिति के लिए तथाकथित दलित की बेटी, बहन, मसीहा आदि नेता जिम्मेदार हैं, जिन्हें दलित कल्याण से अधिक दलित वोट से लगाव है। स्थिति यह है कि समाज में सद्भाव की जगह पर नेता उलटे दलितों की भावनाओं को भड़काने में ले हुए हैं।     
—जोगिन्द्र ठाकुर, कुल्लू (हि.प्र.)

बेवुनियाद विरोध
आवरण कथा 'योग के ध्वजवाहक' (26 जून, 2016) से स्पष्ट होता है कि योग एक वैश्विक अभियान बन रहा है। एक तरफ असरदार असहमति में लोकतंत्र के प्राण बसते हैं तो वहीं दूसरी तरफ असरहीन असहमति की स्वेच्छाचारिता में लोकतंत्र को कमजोर करने की कुचेष्टा परस्पर संबंधों को बढ़ाने में बाधा बनती हैं। स्वच्छ भारत मिशन, जीएसटी विधेयक और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के विरोध की राजनीति ने हमारे लोकतंत्र के परिपक्व होने की योग्यता को बड़ी ठेस पहुंचायी है। जिस योग से पूरी दुनिया को जोड़ने में हमारा राष्ट्र गौरव को
प्राप्त हुआ हो आखिर ऐसे गौरवशाली राष्ट्र
में योग से वियोग की दु:खद राजनीति भी
हो सकती है?      
    —हरिओम जोशी, भिंड (म़ प्ऱ)   

भारत की बढ़ती उपलब्धि
रपट 'भारत की बढ़ी धमक, चीन की घटी हनक' (10 जुलाई, 2016) भारत की शक्ति की दर्शाती है। परमाणु आपर्तिकर्ता समूह में चीन के विरोध के कारण भारत की सदस्यता कुछ समय के लिए लटक गई। पर एमटीसीआर जिसके दरवाजे चीन के लिए भी बंद रहे, में स्थान ग्रहण कर भारत ने अपनी क्षतिपूर्ति कर ली है। भारत ने दो साल पहले का आवेदन किया और सदस्यता प्राप्त कर ली। अब अत्याधुनिक मिसाइल तकनीक व सामान, जैसे हमें क्रायोजेनिक इंजन, और प्रीडेटर ड्रोन सरलता से मिल सकेंगे। हम अपने ब्रह्मोस तथा अग्नि जैसे प्रक्षेपास्त्र बिना आपत्ति बेच भी सकेंगे। एनएसजी में भारत का रास्ता रोकने वाला चीन एमटीसीआर में प्रवेश के लिए अब भारत की चिरोरी करेगा।
                     —अजय मित्तल, खंदक, मेरठ  
   
… और कई हैं कैराना
रपट 'घर हुआ पराया' (19 जून, 2016) उत्तर प्रदेश में समाजवादी सरकार की तुष्टीकरण की पोल खोलती है। हाल ही में कैराना हिंदुओं के पलायन के कारण सुर्खियों में रहा। मुसलमानों की गुंडागर्दी और उन्माद की वजह से हिंदू अपना घर-परिवार छोड़कर दूसरी जगह बसने को मजबूर हो रहे हैं। यहां पर दिन-प्रतिदिन मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ती जा रही है शासन-प्रशासन कैराना जैसी घटनाओं पर मौन रहता है लेकिन जब कोई अनहोनी हो जाती है तब जागता है। शासक को हालात अगर ठीक करने हैं तो ऐसी घटनाओं पर नजर रखनी होगी और समाज विरोधी तत्वों पर कड़ाई से कार्रवाई करनी होगी।
— शानू कुमार, मेल से

ङ्म    दो दशक पहले कश्मीर में भी उन्मादी मुसलमानों ने कश्मीरी पंडितों के सामने ऐसे हालात पैदा कर दिये थे। इसलिए कैराना का मामला कोई नया नहीं है। देश में जहां भी मुसलमान ज्यादा हो जाते हैं, वहां हिंदुओं की बहन, बेटियों की इज्जत-आबरू पर हमले होना चालू हो जाते हैं। उनका अपहरण कर लेना, बंधक बनाकर रखना, यौन शोषण करना आम बात हो जाती है। यहां तक कि बहुत से क्षेत्रों में हिंदुओं के लिए कारोबार करना ही कठिन हो जाता है। और अगर कोई इन घटनाओं का विरोध करता है तो उसकी हत्या करने में देर नहीं होती।
   —श्रीकान्त वर्मा, मेल से

ङ्म    मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में कानून नाम की कोई चीज नहीं होती। ये लोग खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाते हैं। एक तरह से बेखौफ होकर काूनन तोड़ना इनकी आदत हो गयी है। भारत के मुसलमानों में राष्ट्रीयता की भावना पैदा हो व अन्य मत-पंथों के प्रति  सहिष्णुता आए, इसके लिए मुसलमानों को आगे आना होगा और समाज के लोगों को विश्वास में लेना होगा।

—आऱ सी़ अग्रवाल, मेल से

 

 पुरस्कृत पत्र
ये कैसा मजहब?
घाटी में अलगाववादियों की मंशा पूरी हुई। पाकिस्तान ने भी हिंसा की आग में घी डालने का काम किया और कश्मीरी युवाओं को जमकर बहकाया। रपट 'कायदा जिहादी, सोच वहाबी(10 जुलाई,2016)' आतंकियों की पूरी करतूत का पता चलता है। अलगाववादी काफी दिन से शांत पड़ी घाटी में अशांति लाना चाहते थे। बुरहान वानी उन्हें हथियार के रूप में मिला था। उसके बहाने अलगावादी गुटों ने युवकों को जमकर भड़काया और इस्लाम,अल्लाह के नाम पर पता नहीं क्या-क्या झूठीं बतें बताईं। इस सबका असर यह हुआ कि उग्र प्रदर्शनकारियों ने शांत पड़ी घाटी को फिर से अशांत कर दिया। यह बिल्कुल सच है कि कश्मीर सहित समूची घाटी में आतंकी घटनाओं के पीछे इस्लाम की शिक्षाएं काम कर रही हैं। कुछ दिन से ऐसे भी समाचार आए कि कश्मीर में मुल्ला-मौलवी मदरसों में  बच्चों को कट्टरपंथ की शिक्षा दे रहे हैं। उन्हें यह बता रहे हैं कि भारत ने कश्मीर पर जबरदस्ती कब्जा कर रखा है और आगे चलकर तुम लोगों को इसे आजाद कराना है। आज विश्वस्तर पर इस्लाम का रूप स्पष्ट तौर पर दिखाई दे रहा है। चारों ओर कहर बरपा रहा है। मानवता तार-तार हो रही है लेकिन इस्लाम को अभी भी शंाति का मजहब कहा जा रहा है। असल में कुछ लोग आतंकियों को सिरफिरा कह रहे हैं जबकि वे इनकी असलियत को नहीं जानते। इन घटनाओं को बड़ी ही सूझबूझ के साथ अंजाम दिया जा रहा है। इनमें पढ़े-लिखे युवक शामिल हैं और इनके ऊपर इस्लाम का भूत सवार है। इनके इरादे साफ हैं। भारत सरकार को पूरी तरह सचेत और सन्नद्ध होकर इस निशाचरी आपदा से निपटने के लिए दृढ़ संकल्प लेना चाहिए।        

—प्रो. रामबाबू मिश्र, अशोकपुरम,कायमगंज, फर्रूखाबाद (उ.प्र.)

प्रति सप्ताह पुरस्कृत पत्र के रूप में चयनित पत्र को प्रभात प्रकाशन की ओर से 500 रु. की पुस्तकें भेंट की जाएंगी।

हिंदू सारे एक
ऊंच-नीच कुछ है नहीं, हिंदू सारे एक
युगों-युगों से है यही, सत्य हमारी टेक।
सत्य हमारी टेक, भेद जो बतलाते हैं
वे हैं प्राणी मूढ़, जगत को भरमाते हैं।
कह 'प्रशांत' हैं हम सारे प्रभु की संतानें
लानत है उन पर, जो भेदभाव को मानें॥
—प्रशांत

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