| दिंनाक: 01 Aug 2016 14:20:58 |
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आज हम 70वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। इन 70 वर्ष में देश ने हर क्षेत्र में प्रगति की है, लेकिन मुझे लगता है कि सामाजिक क्षेत्र में जो प्रगति होनी चाहिए थी, वह नहीं हुई है। समाज में आज भी अनुसूचित जाति के लोगों के साथ सम्मान का व्यवहार नहीं हो पा रहा है, यह दु:खद है। समान व्यवहार के लिए सरकार, धर्मगुरु और सामाजिक संगठन प्रयत्न कर रहे हैं। इसके बावजूद परिणाम संतोषजनक नहीं निकल पा रहा है। बाबा साहेब आंबेडकर ने भविष्य देखा था। इसीलिए उन्होंने इस वर्ग के लोगों से कहा था पढि़ए और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कीजिए। इस समाज के कल्याण के लिए ही केन्द्र और राज्य सरकारों ने उन्हें विभिन्न क्षेत्रों में आरक्षण दिया हुआ है। इन प्रयासों की वजह से ही महानगरों और शहरों में जातिगत असमानताएं बहुत हद तक दूर हो गई हैं, लेकिन दुर्भाग्य से गांवों में हालत नहीं बदली है। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी छुआछूत जैसी बातें देखने को मिल जाती हैं। अनुसूचित जाति के लोगों के लिए अलग कुआं, अलग श्मशान घाट अभी भी हैं। उनकी जमीन हड़पना, लड़ाई झगड़े में घर जलाना, उनको दबा कर रखना, अपमानित करना आम बात है। बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु आदि राज्यों में ये घटनाएं खूब दिखती हैं।
हालांकि सरकार ने उनके अधिकारों की रक्षा के लिए अनेक कानून बनाए हैं, लेकिन लोग इन कानूनों को ठेंगा दिखा रहे हैं। इसलिए हाल के दिनों में अनेक राज्यों में अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचार की घटनाएं हुई हैं।
जहां तक 12 जुलाई को गुजरात में हुई घटना का सवाल है, यह एक शांत और सुसंस्कृत राज्य है। इसके बावजूद गुजरात में ऊना जैसी घटनाएं हो रही हैं, जो चिंता बढ़ा देती हैं। ऊना कांड को लेकर सरकार ने जिस तेजी से कार्रवाई की है उससे लगता है कि पीडि़तों को पूर्ण न्याय मिलेगा। ऊना के पास एक गांव में कुछ कथित गोरक्षकों ने मरी हुई गाय की खाल उतारने में लगे लोगों की पिटाई की थी। पीटने वालों ने गाय मालिक की भी बात नहीं सुनी, जिसने कहा था, यह मेरी गाय थी और मैंने ही इन्हें खाल उतारने के लिए कहा था। लेकिन पीटने वाले पीटते ही रहे और अब इसकी गूंज संसद तक में सुनाई पड़ रही है। यह घटना बहुत ही निंदनीय, अक्षम्य और अमानवीय है। इस सिलसिले में दस लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पीडि़तों को अनेक सुविधाएं देने की घोषणा की गई है। उन्हें मुआवजे के तौर पर चार लाख रुपए की राशि दी गई है। यह सब तो ठीक है, लेकिन सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि अनुसूचित जाति के लोगों के साथ दुर्व्यवहार न हो। जब तक इस वर्ग के लोगों के प्रति सम्मान का भाव नहीं होगा तब तक भेदभाव नहीं मिटेगा। (लेखक प्रसिद्ध गुजराती पत्रिका 'साधना' साप्ताहिक के संपादक हैं) – मुकेश भाई शाह