ताकत कल की
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ताकत कल की

Written byArchiveArchive
Jul 25, 2016, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 25 Jul 2016 14:42:36

क्या एक अनूठी क्रांति घट रही है भारत में। ऊर्जा के मैदान में बाजी मारने की क्र्रांति। कोयले, पानी और पेट्रोल से ऊर्जा पाने के रास्तों से आगे बढ़ते हुए देश में नए जोश से भरे कुछ उद्यमियों ने बीड़ा उठाया है उन तरीकों को खोजने का, जिनसे रीन्युएबल यानी नवीकरणीय ऊर्जा पाई जा सकती है, क्यों कि आज की केन्द्र सरकार उनके साथ है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो देश-दुनिया में अपने भाषणों में ऊर्जा के क्षेत्र में नए प्रतिमान गढ़ने का भारत का संकल्प कई मौकों पर दोहराया है।  बात सिर्फ भाषणों तक सीमित न रहकर बहुत आगे बढ़ चुकी है। कई शहरों और गांवों में सौर ऊर्जा से बिजली जगमगा रही है, कल-कारखाने चल रहे हैं। पवन चक्कियों ने बिजली उत्पादन में अहम योगदान दिया है। गोबर गैस और कचरे से ऊर्जा बनाने के संयंत्र कमाल दिखा रहे हैं। विद्युत और ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में नए कीर्तिमानों को आंकड़े साफ बयां करते हैं। भारत में पवन चक्कियां सालाना 12,000 मेगावाट बिजली बना रही हैं। सौर ऊर्जा का उत्पादन आज 6,000 मेगावाट तक जा पहंुचा है, जिसकी प्रति यूनिट लागत 10 रु. आती थी, आज वह 4.35 रु. प्रति यूनिट तक आ गई है। चट्टानी गैसों से ऊर्जा पैदा करने के नए आयाम में भी भारत ने अमेरिका से हाथ मिलाया है। कहना न होगा कि बिजली और नवीकरणीय ऊर्जा के मामले में भारत का भविष्य सुनहरा है। इसी सुनहरे भविष्य की एक झलक दिखाने हेतु प्रस्तुत है पाञ्चजन्य का यह विशेष आयोजन।

 

राज्यवार पवन ऊर्जा

तमिलनाडुमेगावाट
तमिलनाडु

7,455. 2
मेगावाट
तमिलनाडु

3,645.4
मेगावाट गुजरात

4,450.8
मेगावाट
महाराष्ट्र

3,307.2
मेगावाट
राजस्थान

 

भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन की क्षमता 2,200 मेगावाट से बढ़कर करीब 6000 मेगावाट हो गई

वर्तमान में ऊर्जा के जो स्रोत हैं वे प्रदूषण फैलाते हैं और अधिक दिन तक चलने वाले भी नहीं हैं। इसलिए दुनिया को नवीकरणीय या वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों पर काम करना ही होगा। यह ऊर्जा प्रदूषण-रहित है और सबसे बड़ी बात है, सनातन भी है। इसका कभी क्षय यह नहीं होता है।
-डॉ. ए.के.कुरचानिया, मुख्य वैज्ञानिक, सरदार पटेल रेनेवल एनर्जी इंस्टीट्यूट, आणंद, गुजरात

अभी ऊर्जा के जो भी स्रोत हैं उनसे पर्यावरण को बहुत नुकसान हो रहा है। जैसे डीजल, पेट्रोल या कोयला। इनके इस्तेमाल से हमें ऊर्जा तो मिलती है, पर इनका जो अंश इस्तेमाल नहीं हो पाता  वह पूरे वातावरण को दूषित करता है। इन सबका सबसे अच्छा विकल्प है— सौर ऊर्जा।
-डॉ. वासुदेव प्रसाद, अध्यक्ष, ऊर्जा एवं पर्यावरण विभाग, टेरी विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

 देश में पशुधन बहुतायत में है और इसलिए भारत में गोबर की कमी नहीं है। गोबर से ज्यादा से ज्यादा बायोगैस बनाई जाए तो रसोई गैस पर भार कम पड़ेगा और कोयले की भी खपत कम होगी। इससे दो फायदे होंगेे- एक , पर्यावरण संतुलित रहेगा, दूसरा पशुधन भी सुरक्षित रहेगा।
-डॉ. एन.के.खुल्लर, निदेशक, बायोगैस विभाग एवं प्रशिक्षण केन्द्र, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना

दो वर्ष पहले सौर ऊर्जा की प्रति यूनिट लागत औसतन “10 आती थी। अब “4़ 35 प्रति यूनिट तक है।

2035 तक अमेरिका की ऊर्जा खपत की 46 प्रतिशत जरूरत 'शेल गैस' पूरी कर पाएगी

 

भारत में पवन ऊर्जा का इतिहास
भारत में पवन ऊर्जा की शुरुआत 1986 से मानी जाती है। उन दिनों महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों (रत्नागिरी), गुजरात (ओखा) और तमिलनाडु (तूतीकोरिन) में 55 किलोवाट के संयंत्र लगाए गए।
इस समय चीन पवन ऊर्जा क्षेत्र में सबसे आगे है। इसके बाद डेनमार्क और अमेरिका आते  हंै।  भारत चौथे स्थान पर  है।    
भारत में सबसे अधिक   35 प्रतिशत पवन ऊर्जा तमिलनाडु में पैदा होती है।

पवन चक्की  : ताकत झोंको की
हमारे आसपास मौजूद ऊर्जा का एक ऐसा भंडार है जिसे हम हर समय महसूस करते रहते हैं। कुछ साल पहले तक हम इसका इस्तेमाल ठीक तरह से नहीं कर पा रहे थे। लेकिन अब भारत में इस ऊर्जा से सालाना करीब 12,000 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा रहा है। हम बात कर रहे हैं पवन ऊर्जा की। यह एक ऐसी ऊर्जा है जिसे भविष्य में ऊर्जा के मुख्य स्रोत की तरह लिया जा सकता है। हालांकि दुनिया अभी सौर ऊर्जा को ही मुख्य विकल्प के तौर पर देख रही है, लेकिन पवन ऊर्जा का उपयोग भी कम नहीं है। दुनियाभर में पवन को ऊर्जा के मुख्य स्रोत के तौर पर उपयोग करने के लिए अमेरिका, जर्मनी और चीन के बीच भारी प्रतिस्पर्धा चल रही है। चीन ने पिछले कुछ साल में विंड एनर्जी में इतना काम किया है जितना आज तक किसी ने नहीं किया था। इसने 1़15 लाख मेगावाट से ज्यादा के विंड एनर्जी प्लांट लगा लिए हैं। आखिर दुनिया इसके पीछे क्यों भाग रही है? दरअसल पवन ऊर्जा से बिजली बनाने की कीमत में पिछले कुछ सालों में भारी कमी हुई है। इसकी कीमतें 12-13 रुपए प्रति यूनिट से घटकर 8-9 रुपए प्रति यूनिट तक आ गई हैं। कुछ देशों में तो यह तीन या चार सेंट ही रह गई है। बिना प्रदूषण के इस दर पर बिजली देने के कारण दुनियाभर में इस  ऊर्जा को अपनाने वालों की संख्या बढ़ रही है। एक अनुमान के मुताबिक अगले कुछ साल में इस ऊर्जा से बिजली उत्पादन की क्षमता करीब 18 लाख मेगावाट तक हो जाएगी। 

 

टिकाऊ और स्थायी विकास का रास्ता वैकल्पिक ऊर्जा से ही होकर गुजरता है। अच्छी बात है कि इसके लिए सरकार गंभीर है।  देश में अब तक बायोगैस के 48 लाख  संयंत्र लग चुके हैं। मेरी इच्छा है कि  'नेशनल बायोगैस मिशन' शुरू किया जाए और पूरे देश में एक करोड़ बायोगैस संयंत्र लगाए जाएं। इसके लिए सरकार से बात चल रही है।
-डॉ. वी.के. विजय, समन्वयक, बायोगैस विकास एवं प्रशिक्षण केन्द्र विभाग, आई.आई.टी., दिल्ली    

दिल्ली में एक व्यक्ति रोजाना औसतन 567 वाट बिजली खर्च करता है। बिजली की इतनी खपत देश में और कहीं नहीं है। इस वर्ष गर्मियों में तो दिल्ली में एक दिन में 6,260 मेगावाट बिजली की खपत हुई। ऊर्जा की इतनी खपत करेंगे तो ऊर्जा के स्रोत एक दिन जरूर खत्म हो जाएंगे। इसलिए देश-विदेश में वैकल्पिक ऊर्जा पर जोर दिया जा रहा है। इस वैकल्पिक ऊर्जा का एक मुख्य स्रोत है कचरा।
-ओमप्रकाश मिश्र, वैकल्पिक ऊर्जा विशेषज्ञ

30 अप्रैल, 2016 तक भारत में विभिन्न नवीकरणीय ऊर्जा का योगदान
क्रसं    ऊर्जा     मेगावाट     प्रतिशत
1.    पवन ऊर्जा    26,866.66     62.7
2.    सौर ऊर्जा    6,762.85     15.8
3.    बायोमॉस  ऊर्जा    4,831.33     11.3
4.    लघु जलविद्युत ऊर्जा    4,273.47     10.0
5.    कचरे से ऊर्जा    115.08     0.3
    कुल     42,849.38

 

 

ल्ल  दीपक उपाध्याय
देश में कोयला और पेट्रोलियम उत्पादों से बिजली और बाकी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सकता है? किसी से भी यह सवाल पूछो तो उत्तर मिलेगा नहीं। लेकिन आजादी के इतने साल बाद आज भी हम दूसरे देशों पर ही निर्भर हैं कि वे कब तेल देंगे या फिर कब परमाणु  ईंधन और तकनीक मिलेगी कि हम उससे बिजली बनाएं या फिर अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकें। लेकिन अब वैकल्पिक ऊर्जा की नई खोजों और भारत में इनकी उपलब्धता ने कम से कम हमारे लिए ऐसे रास्ते दिखा दिए हैं जिनसे आने वालेे वर्षों हम ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर हो सकते हैं। और पर्यावरण को पहंुच रहे नुक्सान को कम कर सकते हैं।
फिलहाल एक असंभव को पिछले करीब दो वर्ष में संभव होते हुए भी दुनिया ने देखा है। कैसे? यह हम आपको समझाते हैं। करीब दो  वर्ष पहले सौर ऊर्जा की प्रति यूनिट लागत यानी एक यूनिट बिजली बनाने की लागत औसतन 10 रुपए आती थी। लेकिन मांग बढ़ने और पारंपरिक तरीकों से बिजली बनाने की लागत में बढ़ोतरी के बाद से कंपनियों का रुझान सौर ऊर्जा की तरफ बढ़ने लगा। इसका असर यह हुआ कि पिछले दो वर्ष में ही सौर ऊर्जा के इस्तेमाल से बनने वाली बिजली की कीमत 4़ 35 रुपए प्रति यूनिट तक आ गई। दो साल पहले किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि सौर ऊर्जा से बनने वाली बिजली इतनी सस्ती हो सकती है।
उज्जैन में महाकाल के दर्शन के बाद अगर आप सड़क मार्ग या रेल से दिल्ली आ रहे हैं तो जैसे ही घाटी का इलाका शुरू होगा, वैसे ही आपको बड़ी-बड़ी पवन चक्कियां दिखनी शुरू हो जाएंगी। इन विशाल मशीनों ने इस पूरे इलाके पर कब्जा कर रखा है। दिखने में ये चाहे जैसी लगें, इनका काम ऐसा है कि पूरा इलाका इन मशीनों को आशीर्वाद देता है। जब से ये मशीनें इस इलाके में लगी हैं, तब से यहां बिजली की किल्लत बहुत कम हो गई है। सबसे ज्यादा फायदा तो किसानों को हुआ है, जो फसल बुआई के समय बिजली की कमी से परेशान रहते थे। इलाके में रहने वाले योगेश सोनी बताते हैं, ''यह पूरा इलाका बिजली की कमी से बेहद परेशान था और फिर एक दिन इलाके में एक ऊंचे पहाड़ पर बड़ी-बड़ी मशीनें आनी शुरू हुईं। फिर अखबार में खबर आई कि यहां पवन चक्की लगने जा रही है।''
जानकार बताते हैं कि इन पवन चक्कियों की मध्य प्रदेश में कुल क्षमता करीब 1000 मेगावाट हो चुकी है। ये पवन चक्कियां न सिर्फ हवा से बिजली बना रही हैं, बल्कि इनके जरिए राज्य की बिजली व्यवस्था से एक बड़ा बोझ कम हो जाता है। अब आप पूछेंगे कैसे? इन पवन चक्कियों के माध्यम से स्थानीय बिजली की जरूरतों को पूरा किया जाता है।
इससे बिजली पर दूर से लाने वाला खर्च नहीं होता है जो कि कई बार 20-30 प्रतिशत तक होता है। यानी इन चक्कियों से इतनी बिजली तो सीधे-सीधे बच जाती है। दूसरा जिले के मुख्य बिजली अधिकारियों को अपनी बिजली की जरूरतें पहले से राज्य मुख्यालय में भेजनी होती हैं। इसके बावजूद खेती के मौसम के समय बिजली की जरूरतें पूरी नहीं हो पाती थीं। लेकिन अब राज्य के कई हिस्से बिजली के मामले में न सिर्फ आत्मनिर्भर हो गए हैं, बल्कि ये दूसरे जिलों को भी बिजली दे रहे हैं।
भारत सरकार में गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के लिए काम कर रहे मंत्रालय के सचिव उपेंद्र त्रिपाठी कहते हैं, ''सरकार ने इस क्षेत्र को मिशन के तौर पर ले रखा है और हमारे काम की वजह से पिछले कुछ साल में बदलाव भी बहुत आया है। इस क्षेत्र में ऋण का एक बड़ा मुद्दा था। लेकिन अब सरकार के प्रयासों से बड़ी परियोजनाओं के अलावा छोटी-छोटी परियोजनाओं, जैसे भवनों की छत पर से सौर ऊर्जा दोहन की योजनाओं को भी आरबीआई ने ऋण प्राथमिकता में डाल दिया है। अब इस तरह के प्रोजेक्ट लगाने वाले के दस लाख रुपए तक के ऋण पर न सिर्फ ब्याज कम लगेगा, बल्कि ये जल्दी भी दिया जाएगा।''
इस तरह की कोशिशों से अगले कुछ वर्षों में सौर और बाकी गैर-पारंपरिक ऊर्जा की क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा।  

 

 

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