सरस्वती की धार
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सरस्वती की धार

Written byArchiveArchive
Jul 4, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 04 Jul 2016 12:35:41

12 जून, 2016  

ारण कथा 'सरस्वती के लोग' से एक बार फिर से सिद्ध हो गया है कि सरस्वती नदी का अस्तित्व है। वामपंथी इतिहासकार यूं तो शुरू से ही सरस्वती नदी के अस्तित्व को नकारते आ रहे हैं लेकिन हैरानी की बात यह है कि एक के बाद एक साक्ष्यों की झड़ी लगने पर वे या तो पुरानी अतार्किक बातों पर अड़े हैं या चुप्पी साधे बैठे हैं। हाल ही में राखीगढ़ी में मिले प्रमाण इतिहास की स्थापित लीक से हटकर हैं और संभवत: यही बात इस चुप्पी की वजह है।
—रामकुमार ठाकुर, रायपुर (छ.ग.)

बढ़ते कदम
रपट 'करार से बहार(5 जून, 2016)' से केन्द्र सरकार की कुशल कूटनीति का पता चलता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अफगानिस्तान और ईरान के साथ सांस्कृतिक, आर्थिक संधिपत्र पर हस्ताक्षर करके एक इतिहास रचने का काम किया है। चाबहार बंदरगाह के माध्यम से अफगानिस्तान, सऊदी अरब और ईरान व भारत के व्यापारिक संबंधों में सुधार आने के साथ-साथ इन देशों के मध्य लोगों के बीच मैत्री की भावना मजबूत होगी। प्रधानमंत्री शुरु से ही पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को सुधारने में लगे हुए हैं, उसका परिणाम भी दिख रहा है कि पड़ोसी देश भी भारत का सम्मान कर रहे हैं।
—डॉ. जसवंत सिंह, कटवारिया सराय (नई दिल्ली)

ङ्म वर्षों से अपने नापाक इरादों को लेकर विभिन्न माध्यमों से भारत की सीमाओं, आन्तरिक सुरक्षा, विकास, व्यापार, विदेशी मामलों  आदि को प्रभावित करने वाली घटिया चालों में लिप्त पाकिस्तान व चीन की अब घेराबंदी चालू हो गई है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसे दूरदृष्टि वाले व्यक्ति ने इन राष्ट्रों से विभिन्न दूरगामी लाभ वाले समझौते करके इनको कठघरे में खड़ा करने की बिसात तैयार कर रहे हैं। चाहे वह चाबहार बंदरगाह हो, एनएसजी की सदस्यता की दावेदारी हो या फिर अमेरिका से नजदीक होते रिश्ते। मोदी हर मोर्चे पर भारत की दमदार छवि प्रस्तुत कर रहे हैं।
—प्रेम शर्मा, रजवास, टोंक (राज)

सेकुलर दलों की हकीकत
लेख 'क्या ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है (24 अप्रैल, 2016)' एक ओर पूरा विश्व आतंकवाद के खतरे से जूझ रहा है वहीं दूसरी ओर भारत में मुस्लिम वोट बैंक के लालच में कांग्रेस पार्टी अलगाववादियों का समर्थन करती नजर आती है। बाटला हाउस कांड हो या फिर असम में बंगलादेशियों की घुसपैठ के खुलेआम समर्थन की बात या फिर कश्मीर सभी जगहों पर उसने तुष्टीकरण की नीति को आगे करके वोट बैंक की राजनीति की है। एक समय तो ऐसा लगने लगा था कि असम देश से कट जाएगा पर अब भाजपा सरकार बनने के बाद मन को पूरी तरह विश्वास हो गया है कि ऐसा कुछ नहीं होगा। असम में अब देशद्रोही गतिविधियां समाप्त होंगी, यहां के लोग मुख्यधारा में शामिल होंगे।
—मयंक सिंह, बेगूसराय (बिहार)

ङ्म    अभिव्यक्ति की आड़ लेकर कुछ लोग दुश्मन देश के पैरोकारों की वकालत करते हैं। जे.एन.यू प्रकरण में यह बात खुलकर सामने आई। एक आतंकी देश के दुश्मनों के लिए आदर्श हो सकता है किसी भी देशभक्त भारतीय के लिए नहीं। अभिव्यक्ति का ढिंढोरा पीटकर देशभक्ति के अर्थ बदलने के कुप्रयास हो रहे हैं। देश की जनता को चाहिए कि ऐसे लोगों को पहचाने और उन्हें खुलकर जवाब दे। किसी भी देशविरोधी कदम को सख्ती से कुचला जाना चाहिए।
—जोगिन्द्र ठाकुर, कुल्लू (हिमाचल प्रदेश)

सावरकर का अद्वितीय योगदान
लेख 'सावरकर जोत से देशभक्ति का उजास(12 जून, 2016)' से एक बात स्पष्ट होती है कि वीर सावरकर का भारत की आजादी के संघर्ष में अद्वितीय योगदान है। सावरकर एक मजबूत और सशक्त राष्ट्र चाहते थे। वे तुष्टीकरण के एकदम खिलाफ थे।  कांग्रेसराज में उनकी उपेक्षा किसी से भी छिपी नहीं है। लेकिन राजग सरकार ने फिर से उनका सम्मान किया और देश को संदेश दिया कि भाजपा देशभक्तों को याद रखती है। उनका सम्मान ही सर्वोपरि है। भारत की जनता वीर सावरकर को कभी भुला नहीं सकती।
—बी.एल.सचदेवा, आईएनए बाजार (नई दिल्ली)

कब मिलेगा न्याय
रपट 'तरीखों में दफन न्याय' उस हकीकत से रूबरू कराती है जिसे देश की जनता अरसे से भुगतती आई है। अदालतों में कई दशकों तक सुनवाई के बाद फैसला आने के इंतजार में हजारों लोग हैं। वैसे भी कहा गया है कि देर से मिला न्याय न्याय नहीं होता है। सरकार और कानून मंत्रालय को चाहिए कि वह कुछ ऐसी व्यवस्था बनाएं जिससे देश के लोगों को समय से न्याय मिल सके।
—राममोहन चन्द्रवंशी, हरदा (म.प्र.)

खतरे में चौथा स्तंभ
रपट 'खबर सच है (22 मई,2016)' से एक बात यह स्पष्ट होती है कि वर्तमान में पत्रकारिता आसान नहीं रही है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में आए दिन पत्रकारों  पर हमलों और उनकी हत्याओं की खबरें आती रहती हैं। कुछ दिन उस पर हो-हल्ला होता है जिसके बाद वे खबरें दब जाती हैं और मामला रफा-दफा हो जाता है। यह किसी भी लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इस खराब माहौल में कोई पत्रकार कैसे सच खबर लिख सकता है। अगर वह सच लिखता भी है तो उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। केन्द्र और राज्य सरकारों को पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीरता से सोचना होगा क्योंकि यह सरकार और देश की जनता की आंख और कान हैं।
—अनुज वर्मा, रीवा (म.प्र.)

अंक में 'मीडिया में एकाधिकार लोकतंत्र के लिए खतरा' रामबहादुर राय का लेख वास्तविकता से पूर्ण है। उन्होंने ठीक ही कहा कि कुछ लोगों का मीडिया पर एकाधिकार है और उनके कहने पर भी खबरें परोसी जाती हैं। जबकि चाहिए ये कि जो पाठक और दर्शक चाहते हैं वह खबरें दी जाएं।  यह बिलकुल सच है कि पत्रकारों की आजादी भी कहीं न कहीं गुम होती जा रही है। वह अखबार मालिकों की कठपुतली बनकर रह गए हैं।
—शिवमंगल चव्हाण, विदर्भ (महाराष्ट्र)

बढ़ता जनाधार
रपट 'नया दौर(29 मई, 2016)' अच्छी लगी। असम में भारतीय जनता पार्टी ने शानदार विजय प्राप्त करके देश को एक संदेश दिया है कि देश की जनता का भाजपा के शासन पर पूरा विश्वास है। किसी को विश्वास नहीं था कि असम में भाजपा की सरकार बनेगी। असल में राज्य के लोगों ने कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति और भ्रष्टाचार युक्त शासन को हराया है। असम की विजय ने केन्द्र में भाजपा सरकार के दो वर्ष के कार्यकाल में हो रहे विकास कार्यों के प्रति अपनी मुहर लगा दी है। पांच राज्यों में हुए चुनाव में भाजपा का जनाधार और मत प्रतिशत भी बढ़ा है। प्रधानमंत्री के प्रति देश की जनता का भरोसा बढ़ा है।
—रानी खेतान, विकासपुरी (नई दिल्ली)

ङ्म    असम का चुनाव महज दो राजनीतिक दलों का चुनाव नहीं, बल्कि राज्य की अस्मिता और सम्मान का चुनाव था। इस चुनाव में राज्य की अस्मिता की विजय हुई है। विदेशी घुसपैठियों ने इस राज्य के अस्तित्व को संकट में डाल दिया जिससे यहां की मूल संस्कृति प्रभावित होने लगी। भाजपा ने इसे ही अपनी प्राथमिकता में लेकर चुनाव लड़ा। असम के चुनाव परिणामों ने सिद्ध किया कि मतदाताओं ने राष्ट्रवाद और संस्कृति के पक्ष में मतदान किया।
—मनोहर मंजुल, पिपल्या-बुजुर्ग (म.प्र.)

ङ्म    असम में भाजपा के चुनाव जीतने से असमिया स्वाभिमान का जयघोष हुआ है। वर्षों से कई संगठन यहां की अस्मिता को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे और उसका परिणाम अब जाकर दिखा। यहां की जनता ने विकास पर मुहर लगाई है। उन्होंने सर्बानंद सोनोवाल और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बातों पर भरोसा जताया है। असम के लोगों ने कांग्रेस के शासन को देखा है और यह भी देखा है कि कैसे कांग्रेस ने वोट के लालच में असम की संस्कृति की अनदेखी कर तुष्टीकरण की नीति के कारण लोगों के साथ विश्वासघात किया। बंगलादेशी घुसपैठियों को प्रश्रय दिया। खैर, कांग्रेस को जनता ने जवाब दे दिया है लेकिन अब भाजपा का काम करने का समय है।
—अनुराग निगम, नासिक (महा.)
उन्माद की राह पर बंगाल
बंगाल में फिर हिन्दुओं के एकजुट न होने के कारण ममता के हाथों में राज्य की कमान चली गई। पश्चिम बंगाल की हालत किसी से छिपी नहीं है। वामपंथी शासन से ही यहां मुस्लिमों को बढ़ावा दिया जा रहा है। ज्योति बसु ने बंगलादेश के घुसपैठियों को यहां का नागरिक बनवाकर 30 वर्षों तक राज किया और राज्य की सूरत ही बिगाड़ दी। ठीक इसी राह पर ममता बनर्जी चली आ रही हैं। राज्य के दर्जनों विधानसभा क्षेत्रों पर मुस्लिमों का कब्जा है। इसका परिणाम हम कुछ दिन पहले ही देख चुके हैं कि कैसे मुस्लिमों ने मालदा में आतंक मचाया था। हिन्दुओं को चाहिए कि वह समय रहते एकजुट हो जाएं।
           —हरेन्द्र प्रसाद साहा, कटिहार(बिहार)

पाया बड़ा मुकाम
बीस उपग्रह छोड़कर, पाया बड़ा मुकाम
सारी दुनिया है चकित, देख हमारे काम।
देख हमारे कंाम, रंग हो गया फीका
झांक रहे हैं बगलें रूस और अमरीका।
कह 'प्रशांत' यदि मौका मिले, कमाल दिखा दें
भारत वाले धरती से आकाश मिला दें॥
—प्रशांत

 

पुरस्कृत सेकुलर खेमा
व्याकुल सेकुलर खेमा
रपट 'पाठ्यक्रम पर हंगामा कैसा (12 जून, 21016)' कांग्रेस की कुत्सित मानसिकता को उजागर करती है। विश्व के हर पराधीन देश ने स्वाधीनता प्राप्त करने के पश्चात अपने विद्यालयों के पाठ्यक्रम में वे सब चीजें जोड़ी  हैं जिन्हें पढ़कर बच्चों को देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले बलिदानियों, पराधीनता के कारणों का पता चल सके और अपने गौरवशाली इतिहास की जानकारी मिल सके। कोई भी स्वाभिमानी देश अपने ऊपर हमला करने वालों को महिमामंडित नहीं करेगा। भारत में अभी तक जो इतिहास पढ़ाया गया है वह मन में हीन भावना पैदा करने वाला ही रहा है। देश के इतिहासकारों का दायित्व बनता था कि वे देश की आने वाली पीढ़ी को देश की पराधीनता और उसके इतिहास से ठीक ढंग से परिचित कराएं। पर इतिहास बताने के नाम पर यहां वामपंथी इतिहासकारों द्वारा कोरा झूठ परोसा गया। वर्षों से हमारे बच्चे उसी झूठ को पढ़ते आए हैं। आज उनकी मानसिकता भी इसी कारण बिगड़ गई हैं। उन्हें इतिहास का ठीक ढंग से भान ही नहीं है। सच और झूठ में उन्हें कोई फर्क ही नजर नहीं आता। स्वयं की कमजोरियां, विदेशी आक्रांताओं की बहादुरी और उनके तथाकथित योगदान को इस तरह पढ़ाया गया जैसे देश का यही इतिहास रहा हो। विदेशी आक्रमणकारियों के कारण हिन्दू समाज में पैदा हुई बुराइयों को इस तरह दर्शाया गया कि ये बुराइयां प्रारंभ से ही समाज में हों। स्वयं को हिन्दू होने पर गर्व हो, भारतवासी होने पर गर्व हो, देश के हुतात्माओं पर गर्व हो, जब ऐसा इतिहास पढ़ाए जाने की शुरुआत हो रही हो तो स्वघोषित सेकुलर खेमे का व्याकुल हो उठना स्वाभाविक है।  
—कमलेश कुमार ओझा, 1426, दक्षिणपुरी(नई दिल्ली)

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