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सब रंग अपने लिए

Written byArchiveArchive
Jun 27, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 27 Jun 2016 15:15:46

गृह मंत्रालय ने तीस्ता जावेद सीतलवाड़ द्वारा संचालित सबरंग ट्रस्ट के एफ. सी. आर. ए. लाइसेंस  को रद्द कर दिया है। एन.जी.ओ. संचालकों ने निजी जरुरतों के लिए विदेशी चंदों का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया। तीस्ता पर गुलबर्ग सोसायटी के लोगो ने भी गबन के आरोप लगाए हैं। ऐसे में इनसे और इनके पैरोकारों पर सवाल खड़ा होता है

आऱ के़ सिन्हा

तीस्ता सीतलवाड़ का असली चेहरा देश के सामने आ रहा है। वे 2002 के गुजरात दंगों के पीडि़तों को 'इंसाफ' दिलाने की कथित तौर पर 'लड़ाई लड़ रही हैं'। अब पता चल रहा है कि तीस्ता सीतलवाड़ के एनजीओ 'सबरंग ट्रस्ट' को जो विदेशी चंदा मिलता रहा है, खासकर अमेरिकी गुप्तचर संस्था सीआईए द्वारा संचालित और वित्त पोषित फोर्ड फाउंडेशन द्वारा, उसका इस्तेमाल वे अपनी मौज-मस्ती के लिए करती रही हैं। इसके चलते गृह मंत्रालय ने उनके एनजीओ का विदेशी चंदा नियमन कानून (एफसीआरए) के तहत उन्हें प्राप्त लाइसेंस रद्द कर दिया है। तीस्ता और उनके पति जावेद आनंद, दोनों विदेशी चंदों का इस्तेमाल अक्सर महंगे होटलों में खाना खाने, महंगी दुकानों से केक और मिठाइयां मंगवाने, कान साफ करने वाली रुई, गीले वाइप्स, क्लिपर, सैनेटरी नैपकिन जैसी विशुद्ध निजी चीजों की खरीद के लिए करते थे।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक आदेश जारी कर कहा है कि सबरंग ट्रस्ट का स्थायी पंजीकरण तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया गया है, क्योंकि एनजीओ की ओर से प्राप्त विदेशी चंदों का इस्तेमाल उन उद्देश्यों के लिए नहीं हो रहा था जिनके लिए उसे किया जाना चाहिए था और जिसके लिये उसे अनुमति प्राप्त थी।
संदिग्ध व्यक्तित्व
 यह तो एक छोटी-सी बानगी है तीस्ता सीतलवाड़ के संदिग्ध व्यक्तित्व की। ऐसा पहली बार नहीं है जब तीस्ता और जावेद आनंद पर पैसे के गलत तरीके से इस्तेमाल के आरोप लगे हों। इसके बावजूद ये दोनों देश की कथित मानवाधिकार और प्रगतिशील सेकुलर बिरादरी के खासमखास हैं। ये इनके पक्ष में हमेशा आंखें बंद करके खड़े रहते हैं।
इससे पहले तीस्ता सीतलवाड़ और जावेद आनंद पर आरोप लगे थे कि उन्होंने अमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी के फंड में हेराफेरी की। गुजरात उच्च न्यायालय ने इनकी गिरफ्तारी के आदेश भी दिए। पर सर्वोच्च न्यायालय ने इनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। मामला अभी भी चल रहा है। गुजरात पुलिस का आरोप है कि सीतलवाड़ ने 2008 से लेकर 2012 तक     अपने एनजीओ के माध्यम से 9़ 75 करोड़ रुपये एकत्र किए। उसमें से 3़ 75 करोड़ रुपये महंगे कपड़ों, जूतों, विदेश यात्राओं वगैरह पर खर्च कर दिए। इतने गंभीर आरोपों के बावजूद देश की सेकुलर बिरादरी और मानवाधिकारों के नाम पर लंबे-चौड़े सेमिनार करने वाले संगठन और एक्टिविस्ट तीस्ता के हक में खड़े रहते हैं। क्यों? इसका  जवाब  उन्हें कभी न कभी तो देश की जनता को देना ही होगा ।
जालसाजी और घोटाले
'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का पाठ पढ़ाने वाले जालसाजी और घोटाले के आरोप झेल रही तीस्ता-जावेद जोड़ी को लेकर जार-जार आंसू बहाते हैं। फिल्मकार आनंद पटवर्धन इन दोनों पति-पत्नी के पक्ष में खुलकर सामने आने वाले सेकुलरों में से एक हैं। वे कहते हैं, ''इनके साथ नाइंसाफी हो रही है। सरकार इन्हें घेरने की कोशिश कर रही है।'' यह कैसी बात? खुद को जन-धड़कन से जुड़ा फिल्मकार बताने वाले पटवर्धन यह कैसे भूल जाते हैं कि तीस्ता पर कितने गंभीर आरोप हैं। उनकी जमानत याचिका को उच्च न्यायालय तक खारिज कर चुका है।
सेकुलरों की इस जमात में एक तुषार गांधी भी हैं। वे गांधी जी के प्रपौत्र हैं। तुषार गांधी तीस्ता-जावेद की सुरक्षा को लेकर परेशान रहते हैं। वे इनकी अतिरिक्त सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। पर यह सवाल तो पूछा ही जाएगा कि उन्होंने  कभी मुंबई की महिला पत्रकार शिरीन दलवी की सुध क्यों नहीं ली, जिसके खिलाफ मुस्लिम संगठन लामबंद हैं?  उन्हें क्यों कभी शिरीन के दुख-दर्द को जानने में दिलचस्पी नहीं हुई? मजाल है कि मानवाधिकार से जुड़ा कोई संगठन या सेकुलरवादी शिरीन के पक्ष में बोला हो। जरा देखिए, इन दोहरे मापदंडों को। एक तरफ कपिल सिब्बल तीस्ता के लिए सर्वोच्च न्यायालय में पैरवी करते हैं और को भरोसा देते हैं कि वे पुलिस के साथ जांच में सहयोग करेंगी। बावजूद इसके तीस्ता पर पुलिस के साथ जांच में सहयोग ना करने के आरोप हैं। मालूम नहीं कि शिरीन को लेकर कोई वकील सामने भी आएगा या नहीं।
विधवा शिरीन दलवी अपनी बेटी और बेटे के साथ अपना घर-बार छोड़कर अज्ञात स्थान पर छिपी हैं। मुस्लिम संगठनों की ओर से उन्हें धमकियां दी जा रही हैं। व्हाट्सएप पर उन्हें संदेश आ रहे हैं कि 'माफी नहीं मिलेगी।' इक्का-दुक्का लोगों को छोड़कर कोई भी उनके पक्ष में आवाज उठाने के लिए तैयार नहीं है। शिरीन दलवी का 'गुनाह' मात्र इतना था कि उन्होंने फ्रांस की पत्रिका 'शार्ली एब्दो' का वह आवरण अपने अखबार 'अवधनामा' में छापा था आतंकवादियों ने जिसके कई पत्रकारों की उनके दफ्तर में घुसकर हत्या की थी। 
दंगा पीडि़तों के नाम पर मौज
यह देखकर हैरानी होती है कि मुंबई के पॉश जुहू इलाके में एक बड़े बंगले में रहने वाली तीस्ता को लेकर कितनी सहानुभूति रखी जाती है जबकि वहीं सीधी-सरल गरीब महिला पत्रकार के लिए कोई खड़ा तक नहीं होता। तीस्ता को समर्थन-सहानुभूति तब मिल रही है, जब उन पर गंभीर घोटाले के आरोप हैं। तीस्ता सीतलवाड़ एक दौर में पत्रकार भी रही थीं। उसके बाद वे सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय हो गईं। इसमें कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन, दंगा पीडि़तों के नाम पर जमा पैसे पर मौज-मस्ती करना ज्यादती ही नहीं, घोर अमानवीय और घटिया कृत्य है। तीस्ता के दादा एम़ सी़ सीतलवाड़ देश के पहले अटार्नी जनरल थे। इस तरह की पृष्ठभूमि वाली महिला पर इतने संगीन आरोप लगें, यह वास्तव में शर्म की   बात है। तीस्ता ने अपने दादा के नाम को भी लजित किया है।

आज यह तथ्य सब जानते हैं कि अमदाबाद के गुलबर्ग सोसायटी गबन मामले में गुजरात उच्च न्यायालय ने तीस्ता सीतलवाड़ और जावेद आनंद की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इस मामले में इन पर पर गुजरात दंगा पीडि़तों की मदद के लिए जमा किये गये करीब डेढ़ करोड़ रुपये गबन करने का आरोप है। जस्टिस जे.बी. परदीवाला ने अपने फैसले में कहा था कि आरोपी इस मामले में सहयोग नहीं कर रहे हैं। गुलबर्ग सोसाइटी के 12 लोगों का आरोप है कि तीस्ता ने फंड का गलत इस्तेमाल किया।
सवाल है कि क्या सेकुलर जमात तीस्ता के साथ मिली हुई है? क्या उनकी नजरों में हेराफेरी या गबन कोई अपराध नहीं है? इस तरह के अपराधों का समर्थन तो वही करेगा जो इससे खुद किसी न किसी रूप में जुड़ा हो या उसे भी आर्थिक लाभ में हिस्सेदारी हो।
उल्लेखनीय है कि यह वही जमात है,जो संसद पर हमले के गुनहगार अफजल की फांसी की सजा को उम्र-कैद में तब्दील करवाने के लिए दिन-रात एक कर रही थी। ये लोग जेएनयू में उसकी बरसी मनाते  हैं और वहां  'पाकिस्तान जिंदाबाद', 'भारत तेरे टुकड़े होंगे-इंशाल्लाह, इंशाल्लाह' जैसे घोर भारत विरोधी नारे भी लगाते हैं। अफजल को ये महिमामंडित करते हैं। कौन भूला होगा कि तीस्ता के साथ खड़ी बिरादरी ने आतंकी याकूब मेमन को फांसी हो या नहीं, इस सवाल पर वास्तव में देश को बांट-सा दिया था। इसी बिरादरी से जुड़े देश के जाने-माने लोगों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर याकूब को फांसी की सजा से बचाने की अपील की थी। हालांकि, यह बात समझ से परे है कि याकूब के लिए तो इन लोगों के मन में सहानुभूति का भाव पैदा हो गया था, जबकि सारा देश इनसे घृणा कर रहा था, पर इन्होंने उन सैकड़ों निदार्ेष लोगों के बारे में कभी बात नहीं की जो मुंबई बम धमाके में बेवजह मारे गए थे। उनका क्या कसूर था? इस सवाल का जवाब इस जमात को देना ही होगा।
पंजाब में आतंकवाद के दौर को जिन लोगों ने करीब से देखा है, उन्हें याद होगा कि तब भी एक स्वयंभू मानवाधिकारवादी बिरादरी पुलिस वालों के मारे जाने पर तो शांत रहती थी, पर मुठभेड़ में मारे जाने वाले आतंकियों को लेकर कोहराम मचाने से पीछे नहीं रहती थी। इन्हें कभी पीडि़तों के अधिकार नहीं दिखे। इन्हें मारने वाला हमेशा ही अपना ही लगा। उसके मानवाधिकार और जनवादी अधिकारों पर ये आंसू बहाते रहे।
 इसी तरह जब छतीसगढ़ में नक्सलियों की गोलियों से कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की जघन्य हत्या से सारा देश सन्न था, तब भी ऐसे 'मानवाधिकारवादियों' की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न आना बहुत सारे सवाल छोड़ गया था। हमारे मानवाधिकारवादी आम नागरिकों के मानवाधिकारों के हनन पर तो खामोश हो जाते हैं, पर अपराधियों के मानवाधिकारों को लेकर जोर-शोर से आवाज बुलंद करते हैं। इसका कारण क्या है? क्या विदेशी फंड तय करता है कि ये किसके मानवाधिकारों पर मुंह खोलेंगे? अरुंधती राय से लेकर महाश्वेता देवी और तमाम किस्मों के स्वघोषित बुद्धिजीवी और स्वघोषित मानवाधिकार आंदोलनकारियों के लिए अफजल से लेकर अजमल कसाब तक के मानवाधिकार हो सकते हैं, पर नक्सलियों की गोलियों से छलनी छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी नेताओं और सीआरपीएफ के जवानों के मानवाधिकारों का कोई मतलब नहीं है।
क्या सिर्फ मारने वाले का ही मानवाधिकार है, मरने वाले का कोई अधिकार नहीं है? याद नहीं आता कि आंध्र प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक नक्सलियों ने जो नरसंहार किए, इन मानवाधिकारवादियों या जेएनयू बिरादरी ने  उन पर कभी दो आंसू बहाए। कुछ साल पहले झारखंड के लातेहर में नक्सलियों ने  सीआरपीएफ के कुछ जवानों के शरीरों में विस्फोटक लगाकर उनको उड़ा दिया था। इस तरह की हत्या पहले कभी नहीं सुनी थी। पर मजाल है कि महाश्वेता देवी, अरुंधती राय या बाकी किसी मानवाधिकारवादी या जेएनयू बिरादरी ने उस कृत्य की निंदा की हो। क्या इन जवानों के माता-पिता, पत्नी या बच्चे नहीं थे? क्या इनके कोई मानवाधिकार नहीं थे?
 यह समझने में कोई भूल नहीं कर सकता कि तीस्ता  सीतलवाड़ और उनके हक में खड़े होने वालों के खाने और दिखाने के दांत अलग-अलग हैं। ये विदेशों के प्रायोजित फंड लेकर मौज-मस्ती करने और पूरे विश्व में देश की छवि धूमिल करने के अतिरिक्त और कुछ  नहीं करते।   (लेखक राज्यसभा सांसद हैं) 

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