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कठघरे में आयेाग

Written byArchiveArchive
Jun 27, 2016, 12:00 am IST
inArchive

उत्तर प्रदेश/भर्ती पर तलवारसपा राज में लटकीं भर्तियां, भरता आक्रोश

दिंनाक: 27 Jun 2016 13:41:46

उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनावों में समाजवादी मुलायम के युवा पुत्र अखिलेश ने युवाओं को ऐसे सब्जबाग दिखाए कि उनका वोट सपा को मिला, लेकिन सत्तासीन होने के चार वर्ष बाद आज वही युवा रोजगार के अभाव में उनके विरुद्ध एकजुट 

 

सुनील राय
उत्तर प्रदेश  में वर्ष 2012  चुनाव  का  दौर था  और अखिलेश यादव रथ लेकर चुनाव प्रचार करने निकले  थे। उनके रथ पर गगनभेदी नारा लगता था-'जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है' अखिलेश ने युवाओं के लिए दिल खोल कर वादे किये। बरसों पुरानी परिपाटी  पर चल रही समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र में उन्होंने युवाओं का ध्यान रखते हुए बदलाव करवाया। सपा ने यह तय किया कि अब वह अंग्रेजी भाषा का विरोध नहीं करेगी। कंप्यूटर तकनीक को  बढ़ावा देगी। शिक्षित बेरोजगार युुवकों को बेरोजगारी भत्ता देगी। हाई स्कूल और इंटर उत्तीर्ण करने वाले छात्रों को लैपटाप देगी।  चुनाव सभाओं में अखिलेश के यह घोषणा करते ही कि शिक्षित बेरोजगार  युवकों को भत्ता मिलेगा, रोजगार कार्यालयों पर पंजीकरण कराने के लिए इस कदर भीड़ उमड़ी कि प्रदेश के कई जनपदों में उसपर काबू पाने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा। प्रदेश के बेरोजगार युवकों का अखिलेश यादव ने विश्वास जीत लिया था। युवकों को विश्वास हो गया था कि सपा की सरकार आने  पर  शिक्षित बेरोजगार युवकों को रोजगार मिलेगा। जिसे रोजगार नहीं मिलेगा, उसे भत्ता मिलेगा।
अखिलेश की  हर जनसभा में युवा खूब उमड़े और उन्होंने वोट भी दिया, चुनाव बाद सपा को प्रचंड बहुमत मिला और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने। सपा सरकार की कार्य प्रणाली कुछ ऐसी रही कि लगातार रिक्त पद विज्ञापित हुए मगर अलग-अलग पदों की हजारों नियुक्तियों के विवाद अदालती लड़ाई में ऐसे लटके कि आज चार वर्ष बाद भी बेरोजगार युवक नौकरी की बाट जोह रहे हैं।
बसपा के शासन में वर्ष 2011 में दारोगा भर्ती  विज्ञापित हुई  थी, उसकी नियुक्ति प्रक्रिया चल रही थी, उसमें अभ्यर्थियों के  लिए 10 किमी. की दौड़ का नियम तय किया गया था। जैसे ही वर्ष 2012 में सपा  की सरकार आयी उसने दारोगा भर्ती के नियमों में  परिवर्तन कर दिया। नियमों में परिवर्तन करते हुए नई अधिसूचना जारी की गई थी जिसके मुताबिक पुरुष अभ्यर्थियों के लिए 35 मिनट में 4.8 किमी. और महिला अभ्यर्थियों के लिए 20 मिनट में 2.4 किमी. की दौड़ का मानक तय किया गया था। इससे पहले पुरुष अभ्यर्थियों के लिए 60 मिनट में 10 किमी. और महिला अभ्यर्थियों के लिए 35 मिनट में 4.8 किमी. का मानक तय किया गया था।
प्रदेश सरकार के इस नए नोटिफिकेशन को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। याचिका में आरोप लगाया गया कि  पुराने नियम के हिसाब से कई अभ्यर्थी दौड़  चुके थे, इस तरीके से भर्ती प्रक्रिया के बीच में  बदलाव नहीं किया जा सकता इससे कई अभ्यर्थी  प्रभावित होंगे। मामला उच्च न्यायालय में गया और वहां पर नियम  में बदलाव के लिए जारी अधिसूचना पर रोक लगा दी गई, अदालत में  विचाराधीन होने की वजह से नियुक्तियां लटक गईं। अदालत में सुनवाई  चली और सितम्बर 2013 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि दारोगा भर्ती की दौड़ की परीक्षा में किया गया बदलाव गैरकानूनी है।
दारोगा की दौड़ की परीक्षा में एक अभ्यर्थी  की दौड़ते समय मौत हो गई थी, इस कारण प्रदेश सरकार ने 10 किमी. दौड़ पर रोक लगा दी थी और दौड़ के नियमों में परिवर्तन कर दिया था। हाल ही में शुरू हुई  सिपाही  भर्ती में भी प्रदेश सरकार ने लोक-लुभावन व्यवस्था दी, यह मामला भी अदालत में गया और स्थगनादेश पारित हो गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 34,000 कांस्टेबलों की भर्ती  चयन प्रक्रिया के परिणाम घोषित करने पर रोक लगा दी। अभी तक यह होता आया था कि सिपाही की भर्ती की परीक्षा में लिखित और शारीरिक परीक्षा कराई जाती थी, इस  बार प्रदेश सरकार ने केवल शारीरिक परीक्षा के आधार पर  पुलिस में सिपाही भर्ती करने का फैसला किया और इस सिपाही भर्ती में भी नियमों में परिवर्तन पद विज्ञापित होने के बाद किया गया।
वर्ष 2015 के दिसम्बर माह में  उत्तरप्रदेश पुलिस  में महिला और पुरुष सिपाही  के लिए 34,000 पद विज्ञापित किए गए। इस विज्ञापन के अनुसार चयन प्रक्रिया शुरू की गई मगर बीच में बदलाव करते हुए केवल मेरिट और शारीरिक परीक्षा के आधार पर  सिपाही का चयन करने की बात की गई जिसके खिलाफ उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की गई। याचिका में दलील दी गई कि विज्ञापन जारी होने के बाद चयन प्रक्रिया प्रारंभ मानी जाती है, इसके बीच में नियमों में बदलाव नहीं किया जा सकता, जिसके बाद इलाहाबाद  उच्च न्यायालय ने कहा कि विभाग चाहे तो चयन प्रक्रिया जारी रख सकता है लेकिन बिना अदालत की अनुमति के परिणाम सार्वजानिक नहीं कर सकता। इस तरह से 34,000 सिपाहियों की भर्ती पर रोक लग गई।

प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद, माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड में अध्यक्ष और सदस्यों का मामला कुछ इस कदर विवादित रहा कि बीते चार वषार्ें में कोई भी भर्ती  प्रक्रिया  शुरू नहीं की जा सकी। सरकार बनने के बाद डॉ. धनंजय गुप्ता को कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया। गुप्ता पहले  बोर्ड में सदस्य के पद पर थे। 2013 के  फरवरी माह में  डॉ. देवकीनन्दन शर्मा को  माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। करीब 11 महीने का उनका कार्यकाल ठीक-ठाक चल  रहा था मगर अस्वस्थता के चलते उन्होंने  यह पद छोड़ दिया। इसके बाद बोर्ड के ही सदस्य डॉ. आशा राम को अध्यक्ष नियुक्त किया गया पर उनके कार्यकाल में  विवादों की शुरुआत हुई। उन्होंने जो वेतन आहरित किया था, उसका भी मामला विवादित रहा और उसकी शिकायत शासन तक की गई। आशा राम  का बोर्ड के सचिव से विवाद हो गया और उन्होंने सचिव के कमरे में ताला लगवा दिया। अध्यक्ष और सचिव का विवाद भी शासन के संज्ञान में पहुंचा। वर्ष 2013 में प्रधानाचायार्े  के पद के अभ्यर्थियों के लिए लिखित परीक्षा कराई गई थी, उसका साक्षात्कार होना था। डॉ. आशा राम पर यह आरोप भी लगा कि उन्होंने उन प्रधानाचायार्े के पद के अभ्यर्थियों को बिना बुलावा पत्र भेजे साक्षात्कार शुरू करा दिया था। जैसे ही यह जानकारी  लोगों को पता लगी कि विवाद बढ़ गया। विवाद ज्यादा बढ़ने पर डॉ. आशा राम  को अध्यक्ष पद से हटा दिया गया।
वर्ष 2014 से वर्ष 2015  के बीच बोर्ड में कोइ अध्यक्ष नहीं रहा, इसलिए इस सत्र को ही शून्य कर दिया गया, इस दौरान कोई पद नहीं विज्ञापित किया गया। इस तरह से करीब डेढ़ वर्ष तक बोर्ड में कोई भी चयन प्रक्रिया नहीं हुई। उसके बाद डॉ. परशुराम पाल को अध्यक्ष नियुक्त किया गया, इन्होंने कुछ  कामकाज आगे बढ़ाया मगर कुछ  ही महीनों के कार्यकाल के बाद उन्हें अचानक पद से हटा दिया गया। आरोप है कि बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती की एक जनसभा में डॉ. परशुराम पाल का होडिंर्ग लगा था, किसी ने उस होडिंर्ग का फोटो खीचकर सपा के कुछ  प्रमुख नेताओं के यहां पहुंचा दिया, जिसके बाद उन्हें पद से बर्खास्त कर दिया गया था।
इसके बाद बोर्ड में सदस्य के पद पर  आसीन अनीता यादव को अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गयी। कुछ महीनों के कार्यकाल के  बाद सनिल कुमार को  बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। इनकी नियुक्ति को लेकर भी  इलाहबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गयी। विवाद बढ़ने पर सनिल कुमार भी अध्यक्ष पद से बर्खास्त कर दिए गए।
इसी बीच इलाहाबाद  उच्च न्यायालय में एक याचिका और  दायर हुई जिसमें यह आरोप लगाया गया कि बोर्ड में जो भी सदस्य काम कर रहे हैं, वे इतनी योग्यता नहीं रखते कि प्रधानाचार्य  पद के अभ्यर्थियों का साक्षात्कार ले सकें। प्रधानाचार्य पद के अभ्यर्थी का साक्षात्कार जिन सदस्यों द्वारा लिया जा रहा था, उनमें से दो सदस्य ऐसे थे जो इससे पहले इंटर कॉलेज के एल टी ग्रेड के शिक्षक थे और हाई स्कूल के छात्र-छात्राओं को ही पढ़ा सकने के लिए पात्र थे। बोर्ड की सदस्य आशालता सिंह इंटर कॉलेज की शिक्षक थीं, एक अन्य सदस्य ललित श्रीवास्तव भी माध्यमिक शिक्षक के पद पर नियुक्त थे और उसके पहले लिपिक थे। सरकार ने इन लोगों को बोर्ड का सदस्य बना दिया। ये लोग बाकायदा इंटर कॉलेज के  प्रवक्ता और प्रधानाचार्य पद के अभ्यर्थियों का साक्षात्कार ले रहे थे। याचिका की सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने इन सदस्यों को प्रथम दृष्टया अयोग्य  माना और इनके काम करने पर रोक लगा दी। अभी कुछ दिन पहले इस मामले में एक नाटकीय परिवर्तन आया, याची अभिलाषा मिश्र ने अचानक अपनी याचिका मीडिया में सार्वजनिक कर दी। इसके बाद से आयोग के दोनों  सदस्यों ने यह मानते हुए कि अदालत की रोक हट गई है, अपना कामकाज शुरू कर दिया है। मगर उसके बाद प्रतियोगी  छात्र संघर्ष समिति ने एक नई याचिका दायर की और उच्च न्यायालय से यह गुहार लगाई कि इन दोनों सदस्यों के काम करने  पर रोक लगायी जाय और उच्च न्यायालय ने उस  याचिका की  सुनवाई  करते  हुए  दोनों सदस्यों के काम काज पर फिर एक बार रोक लगा दी।
अभी हाल ही में शासन  ने सेवानिवृत्त आई ए एस, हीरा लाल गुप्ता को बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया है। उन्होंने अपना काम शुरू कर दिया है।  संपर्क करने पर उन्होंने बताया कि उनके पहले जो कुछ भी बोर्ड में हुआ, उसके बारे में वे कुछ नहीं बता सकते और अभी तक जो अखबारों में छपता रहा है, वही उनका 'वर्जन' है। बहरहाल, माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड के  प्रशासनिक अधिकारी समर बहादुर सिंह ने बताया कि प्रधानाचार्य के 550 पद वर्ष 2011 में विज्ञापित हुए थे। जिसमंें चयन प्रक्रिया को लेकर विवाद उच्च न्यायालय में पहुंचा। इसमें साक्षात्कार हो चुका था मगर परिणाम घोषित करने पर अदालत से रोक लगी हुई है  वर्ष 2013  में करीब 900 पद विज्ञापित हुए थे, ये नियुक्तियां रुकी हुई थीं, अब  उन पदों के  लिए साक्षात्कार शुरू हो गए हैं। समर बहादुर सिंह ने बताया कि माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड से  वर्ष 2016 में प्रवक्ता और  प्रधानाचायार्ें के करीब  550 पद विज्ञापित होने वाले है। शासन द्वारा बनाया गया एक आयोग  और है जिसे उच्चतर शिक्षा सेवा  आयोग के नाम से जाना जाता है। उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग, स्नातकोत्तर और स्नातक महाविद्यालयों में प्रवक्ता और प्राचायार्े की नियुक्ति करता है।
प्रदेश में सपा की  सरकार बनने के बाद उच्चतर शिक्षा आयोग में  अध्यक्ष के पद पर रामवीर सिंह यादव को नियुक्त किया गया। आयोग में रूदल सिंह और डॉ. अनिल कुमार सिंह को सदस्य नियुक्त किया गया। इन तीनों लोगों की नियुक्तियों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी। अदालत ने अध्यक्ष और दोनों सदस्यों को अयोग्य घोषित करते पद से बर्खास्त कर दिया। अब नतीजा  यह है कि बोर्ड में केवल एक सदस्य है रामेन्द्र  बाबू चतुर्वेदी। कोरम के अभाव में किसी भी नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पा रही है।  जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग आधिनियम 1980 की धारा 4़ 2 ( क ) के अनुसार आयोग का सदस्य वही हो सकता है जो उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा का पूर्व या वर्तमान सदस्य हो, जिसने न्यायाधीश या उसके समक्ष कोई अन्य पद धारण किया हो अथवा भारतीय प्रशासनिक सेवा का पूर्व या वर्तमान सदस्य हो जिसने राज्य सरकार के सचिव या  राज्य सरकार के अधीन उसके समकक्ष पद धारण किया हो। अथवा किसी विश्वविद्यालय का वर्तमान या पूर्व कुलपति या किसी विश्वविद्यालय का वर्तमान या पूर्व प्राध्यापक। स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य पद का 10 वर्ष का अनुभव रखने वाला व्यक्ति अथवा स्नातक महाविद्यालय के प्राचार्य पद का 15 वर्ष का अनुभव रखने वाला व्यक्ति आयोग का सदस्य बन सकता है। 2004 में प्रदेश सरकार ने एक मानक यह जोड़ दिया कि आयोग का सदस्य ऐसा व्यक्ति भी बन सकेगा जिसने राज्य सरकार की राय में शिक्षा में बहुमूल्य योगदान दिया हो।
बहरहाल, बर्खास्त हुए अध्यक्ष और दोनों सदस्यों को पांच वर्ष से ज्यादा का शिक्षण का अनुभव नहीं था, अब शासन ने अवकाश प्राप्त आई ए एस, प्रभात मित्तल को आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया है। बेसिक शिक्षा विभाग में प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों की नियुक्तियां हुई हैंं। हालांकि गत 3 वर्ष में करीब 3 लाख भर्तियां की गईं लेकिन सपा राज में विवादों की तलवार इनपर लटकती रही। बेसिक शिक्षा विभाग की विवादित भर्ती को सवार्ेच्च न्यायालय से राहत मिली लेकिन प्रदेश सरकार ने शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी)  की अनिवार्यता के बाद भी करीब डेढ़ लाख  शिक्षामित्रों को अध्यापक के पद पर नियमित कर दिया। पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इन शिक्षामित्रों की नियुक्ति को गलत ठहराया।
बहरहाल पद विज्ञापित होने के बाद नियमों में हेर-फेर और नियुक्तियों की इस अधरझूल ने युवाओं में आशा की बजाय आक्रोश बढ़ाया है। अब जवानी किस ओर जाएगी और जमाना किस ओर यह सपा को देखना है। 

 

सरकार बनने के बाद डॉ. अनिल यादव, उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष नियुक्त किये गए थे, उन्होंने लोकसेवा आयोग की नौकरियों में त्रिस्तरीय आरक्षण  व्यवस्था लागू कर दी जिसके बाद प्रारंभिक व मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार तीनों में आरक्षण दिए जाने का प्रावधान था। इस त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ पूरे प्रदेश के छात्रों ने आन्दोलन किया। इसके चलते कई दिनों तक इलाहाबाद और उसके आसपास के जनपदों में कानून व्यवस्था  बे-पटरी हो गई थी, आन्दोलनकारी छात्रों ने बसों में आगजनी और शॉपिंग माल में तोड़फोड़ की। छात्रों की तरफ से इस मामले को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई, अदालत ने त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था पर रोक लगा दी। इसी बीच मुलायम सिंह यादव ने दखल दिया और लोकसेवा आयोग की त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था को रद्द करवा दिया। मगर लोकसेवा आयोग की कार्य प्रणाली में कोई सुधार नहीं हुआ , हद तो तब हो गई जब  29 मार्च, 2015 को रविवार के दिन लोकसेवा आयोग की प्रारंभिक परीक्षा आयोजित कराई जा रही थी, शाम को दूसरी पाली की परीक्षा होनी थी। पहली पाली की परीक्षा के पहले ही  पर्चा लीक हो गया। पहले  तो आयोग यह मानने  को तैयार ही नहीं हुआ कि पर्चा लीक भी हुआ है, उस समय के सचिव, रिजवान उल  रहमान  ने कहा था  कि ''कोइ पर्चा लीक नहीं हुआ है, हम लोग दूसरी पाली की परीक्षा कराने जा रहे हैं।'' उधर पर्चा लीक होने के बाद हजारों की संख्या में अभ्यर्थियों ने दूसरी पाली का  प्रश्नपत्र इस प्रत्याशा में छोड़ दिया कि प्रश्नपत्र लीक हो चुका है  सो, अब तो दोनों पाली का प्रश्नपत्र निरस्त हो  जाएगा। अगले दिन 30 मार्च, 2015 को  देर शाम तक आयोग में बैठक चली,  बैठक के बाद आयोग ने यह माना कि पर्चा लीक हुआ था और उसने पहली पाली की परीक्षा निरस्त कर दी। उधर प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति मांग करने लगी कि हजारों अभ्यर्थियों ने दूसरी पाली की परीक्षा छोड़ दी है इसलिए उस परीक्षा को भी निरस्त किया जाए। मगर आयोग ने दूसरी  पाली की परीक्षा निरस्त नहीं की जिसके चलते सड़कों पर छात्रों का आन्दोलन उग्र हो गया। त्रिस्तरीय आरक्षण और फिर प्रश्नपत्र लीक मामले  के बाद अनिल यादव सुर्खियों में आ चुके थे, उनके सरकारी आवास के बाहर हर  समय पुलिस तैनात रहती थी और वे पुलिस सुरक्षा के साथ निकलते थे, उन्हें डर था कि  उग्र छात्र उन पर हमला कर सकते थे। उन्होंने  आयोग की समस्त सूचनाओं पर पहरा लगा दिया था। उसके बाद  प्रतियोगी  छात्र संघर्ष समिति ने आयोग अध्यक्ष के खिलाफ मुहिम छेड़ दी। छात्रों द्वारा जुटाई गई जानकारी के आधार पर यह  आरोप लगा कि अनिल यादव  के गृह जनपद आगरा में उनका  आपराधिक इतिहास है और उनकी नियुक्ति राजनीतिक प्रभाव के चलते हुई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सामने वह दस्तावेज भी रखा गया जिसमें सभी आवेदकों ने अध्यक्ष पद के लिए आवेदन अपने घर से भेजा था मगर डॉ. अनिल यादव का आवेदन समाजवादी पार्टी के केन्द्रीय  कार्यालय से कार्मिक विभाग को फैक्स किया गया था। आयोग की वजह से प्रदेश सरकार की खूब किरकिरी हुई। आन्दोलन कर रहे  छात्रों ने आयोग की दीवार पर 'यादव आयोग' लिख दिया। आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अनिल यादव ने आयोग  की कार्य प्रणाली को  अपारदर्शी बनाने में कोई  कसर नहीं छोडी थी। परीक्षा परिणाम की उन्होंने ऐसी व्यवस्था बनाई थी जिसमें प्रत्येक अभ्यर्थी केवल अपना ही परिणाम देख सकता था। अध्यक्ष की कार्य प्रणाली विवादित होने लगी, उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया  और उनके  आपराधिक इतिहास को लेकर प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति ने इलाहबाद उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की, जिसकी सुनवाई पूर्ण होने पर उच्च न्यायालय ने अपने  फैसले में कहा कि 'डॉ. अनिल  यादव  की नियुक्ति के समय उनका आपराधिक रिकार्ड छिपाया गया था और चयन  प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी।' इसके बाद अनिल यादव को अध्यक्ष पद  छोड़ना पड़ा।  उनके हटने के बाद सरकार ने डॉ. अनिरुद्घ सिंह यादव को  आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया है।
प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के अवनीश पाण्डेय का आरोप है कि अनिल यादव के कार्यकाल में इतना ज्यादा भ्रष्टाचार हुआ है, उसकी जांच जब तक सीबीआई से नहीं कराई जाए , तब तक सच्चाई सामने नहीं आयेगी, हम लोग इस संबंध में गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिल कर यह मांग कर चुके है कि लोकसेवा आयोग  द्वारा की जा रही नियुक्तियों की जांच सीबीआई  से कराई जाय। पाण्डेय ने बताया कि जन सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत मांगे गए जवाब में आयोग ने उत्तर दिया है कि आयोग द्वारा की गयी भर्तियों के संबंध में इलाहाबाद  उच्च न्यायालय में इस समय 406 याचिका दाखिल हैं। इसमें जनहित याचिका नहीं जोड़ी गयी हैं। जन सूचना अधिकार में  मांगी गई जानकारी के क्रम में आयोग ने यह भी बताया कि नियुक्ति  संबंधी  जो विवाद अदालत में चले  हैं, उनकी पैरवी  करने के लिए आयोग को वर्ष 2013 – 14 में 29 लाख 98 हजार रुपया खर्च करना पड़ा है। आयोग को वित्तीय वर्ष 2014- 15 में 46 लाख 96 हजार रुपया कानूनी पैरवी के लिए देना पड़ा। इसी प्रकार वर्ष  2015-16 में आयोग को 33 लाख 69 हजार रुपया खर्च करना पड़ा। इस तरह से तीन वषार्े में  लोकसेवा आयोग ने केवल मुकदमेबाजी के  चक्कर में  एक करोड़ से ज्यादा रुपया खर्च किया है।

झोलाछाप डॉक्टर को बनाया

लोकसेवा आयोग का सदस्य

इलाहाबाद सेवानिवृत्त आईएएस सूर्य प्रताप सिंह कई वषार्े तक अमेरिका में रहे हैं, कुछ वर्ष पहले जब वे उत्तर प्रदेश लौटे तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उन्हें प्रमुख सचिव माध्यमिक शिक्षा  के पद पर तैनात कर दिया। मगर माध्यमिक शिक्षा विभाग के मंत्री उनसे नाराज हो गए जिसके बाद उन्हें हटा दिया गया।
सूर्य प्रताप सिंह ने लोकसेवा आयोग के एक सदस्य की योग्यता पर गंभीर सवाल खड़ा किया है। दूरभाष पर हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि एक झोलाछाप डॉक्टर जो नीम हकीम वाली दावा दिया करते थे, वे किसी तरह से सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के संपर्क में आ गए थे। सुनने में आया है कि वैद्य उन्हें भी  कुछ दवा दिया करते थे। उन्होंने काफी दिनों तक अपनी आयुर्वेद दवाओं का  जाल फैलाकर कुछ ऐसा  चक्कर चलाया  कि सपा सरकार ने उस वैद्य को लोकसेवा आयोग का सदस्य बना दिया। उनका आरोप है कि डॉ. जयराम प्रसाद वैद्य पहले आयुर्वेद क्लीनिक चलाते थे और नीम हकीमी वाला इलाज किया करते थे। सपा  सरकार से  निकटता होने के बाद उन्होंने जिद की कि जहां पर आयोग के अधिकारी बनाए जाते हैं उन्हें उसी जगह पर सदस्य बनाया जाय। वैद्य को 18 जून 2014 को लोक सेवा आयोग का सदस्य बनाया गया।
सूर्य प्रताप सिंह का कहना है कि जब उन्हें सदस्य बनाया गया  तो उन्होंने अपने जानने वालो को बहुत  दिनों  तक बताया ही नहीं कि वे कहां पर है। जब लोगों ने वैद्य से पूछा कि वे कहां पर हैं तो उसने बताया कि उनकी नियुक्ति इलाहाबाद के अस्पताल में हुई है। कुछ समय के बाद वैद्य ने लोगो को  बताना शुरू किया कि वह अब ऐसी जगह पर पहुच  गए हैं जहां से लोगों को मजिस्ट्रेट बनाया जाता  है। लोकसेवा आयोग  की वेबसाईट पर उसने सदस्यों का जो विवरण दिया गया है डॉ. जयराम वैद्य का नाम लिखा हुआ है। सूर्य प्रताप सिंह का आरोप है कि ऐसे सदस्यों जो इस पद के लिए पात्रता नहीं रखते थे, उनकी योग्यता की जांच कराई जाए। इसकी भी जांच करायी जाए कि उनकी सदस्य के पद पर नियुक्ति, राजनीतिक आधार पर की गयी है या योग्यता के आधार पर।

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