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पिछली एक सदी में यह पहला मौका है जब बाघों की संख्या में बढ़ोतरी देखने में आई है। संकेत अच्छा है परन्तु बढ़ती मानव जनसंख्या और घटते जंगलों के बीच वनराज के भवष्यि की चुनौतियां कम नहीं हैं 3,200 2010 में दुनियाभर में बाघ थे 3,890 2016 में इनकी संख्या पाई गई 2,226 भारत में सबसे ज्यादा 2226 बाघ हैं

Written byArchiveArchive
Jun 27, 2016, 12:00 am IST
in Archive

बढ़ी गुर्राहट की गूंज

दिंनाक: 27 Jun 2016 13:38:43

 नरेश बेदी

बाघ जिसे हम सामान्य भाषा में शेर कहते हैं। शेर जिसका नाम सुनते ही शरीर में सनसनी-सी दौड़ जाती है, रौंगटे खड़े हो जाते हैं। शेर की खूबसूरती, उसका रंग, उसकी चाल, इन सबको शब्दों में बयान करना मुश्किल है। इस पर वही महसूस कर सकता है जिसने जंगल में शेर को देखा है। जंगल बचेंगे तो शेर बचेंगे। जंगल नहीं होंगे, शेर का खाना नहीं होगा तो जंगल से बाहर आएगा। बाहर आएगा तो इंसानों और शेर में टकराव होना लाजिमी है। जब आप जंगल में मदमस्त चाल में विचरते हुए शेर को देखते हैं तो उस वक्त मन को जो खुशी मिलती है, वैसी खुशी तेंदुए या बल्लिी प्रजाति के किसी अन्य पशु को देखकर नहीं मिलती। तेंदुआ आपको अचानक से एक झलक दिखेगा और जंगल में गायब हो जाएगा या पेड़ पर चढ़ जाएगा। उसे देखने में वो आनंद नहीं है जो शेर को देखने में है। अव्वल तो शेर को जंगल में देखना बड़ा मुश्किल है लेकिन यदि आप जंगल में शेर को विचरते हुए देखते हैं तो स्वयं महसूस करेंगे कि उसकी चाल में जो रुआब है उस कारण वह ही जंगल का राजा कहलाने लायक है।
वर्ष 1960 में जब हम दोनों भाई बच्चे थे तो हमारे पिता हमें कार्बेट पार्क ले जाया करते थे।  उन दिनों शेर का दिखाई देना बहुत मुश्किल था। उसका कारण था उन दिनों शेरों का खूब शिकार हुआ था, शेर जंगल में न के बराबर रह गए थे। मुझे याद है, जंगल में नवाबों के विभन्नि रियासतों का राजाओं के कैंप लगे होते थे शेर का शिकार करने के लिए। हम लोग जंगल में रहने वाले  गुर्जरों से पूछा करते थे कि अरे भाई कहीं शेर तो नहीं दिखाई दिया।  जंगल में शेर के बहुत से कस्सिे होते थे लेकिन शेर किसी को दिखाई दिया हो, ऐसा बहुत कम होता था। जिम कार्बेट नेशनल पार्क हमारा पहला नेशनल पार्क बना। हमें बड़ी उम्मीद बंधी कि कम से कम अब तो शेर दिखाई देगा। हम जंगल जाते थे तो हाथी  और अन्य जानवर  दिखाई देते थे लेकिन शेर कहीं नहीं दिखता था। तब शेर को देखने के लिए जंगल में ऊंचे-ऊंचे मचान बनाए जाते थे और नीचे पाड़ा (यानी भैंस का बच्चा ) बांधा जाता था। इसके बाद रात को मचान पर बैठकर इंतजार किया जाता था कि यदि शेर ने पाड़ा मार लिया तो वह सुबह कहीं आसपास दिखाई दे जाएगा। इसके लिए हाथी पर बैठकर हांका लगाया जाता था। यदि कस्मित रही तो शेर दिखाई दे गया नहीं तो चला गया। हम जंगल में सालों घूमते रहे लेकिन शेर नहीं दिखा। कस्मित ने साथ नहीं दिया। 1970 के आस-पास की बात है जब मैंने  कार्बेट में पहला शेर देखा। हम हाथी पर बैठकर जा रहे थे तो महावत बोला, आगे शेरनी है। हमला कर सकती है, कसकर बैठे रहिए।  शेर को अपने इलाके में दखलअंदाजी पसंद नहीं है  और ऐसा हुआ भी, शेरनी दहाड़ी और हाथी को डरा दिया। हम हौदे से नीचे गिरते-गिरते बचे। मैंने तब फोटोग्राफी शुरू ही की थी, कैमरा हाथ में था और हड़बड़ाहट में बटन दब गया।
शेर का जो फोटोग्राफ कैमरे में कैद हुआ, वह मेरे जीवन का पहला शेर का फोटोग्राफ था जिसे बहुत पसंद किया गया। लोग वस्मियपूर्वक मुझसे पूछते थे, अरे, आपने जंगल में शेर देखा। मैं जहां जाता वह चर्चा का विषय हो जाता। इसके बाद 1972 में वाइल्ड लाइफ एक्ट आया। शेर को मारने पर पाबंदी लगी। उसी साल सरकार ने 'सेव टाइगर प्रोजेक्ट' शुरू किया। 1975 में मैं अपने भाई के साथ कान्हा नेशनल पार्क में काम कर रहा था। एक दिन  डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ (वर्ल्ड वाइल्ड फेडरेशन) के संस्थापक अध्यक्ष नीदरलैंड के प्रिंस बर्नाड कान्हा नेशनल पार्क आए।  वन विभाग ने प्रिंस को शेर दिखाने के लिए दिन-रात एक कर दिया तब जाकर कहीं दो दिन बाद उन्हें शेर दिखाया जा सका।
1987 की बात है। हम शेरों पर एक फल्मि बना रहे थे कान्हा नेशनल पार्क में। हमने एक शेरनी को छांटा जो बच्चे देने वाली थी। शेर की फल्मि उतारना बड़ा मुश्किल है। यदि वह शांत है तो ठीक लेकिन उसे जरा भी खतरा लगेगा तो वह हमला कर देगा। आप जिस हाथी पर बैठकर उसका पीछा कर रहे हैं। उसे डरा देगा। यह बरसात की बात थी। हमें कान्हा नेशनल पार्क से फोन आया कि शेरनी ने बच्चे दे दिए हैं आप शूटिंग के लिए आ जाइये। हम दस दिनों तक उसे तलाशते रहे। 11वें दिन हम एक पहाड़ी पर पहुंचे तो देखा,  शेरनी के तीन-चार छोटे शावक वहां थे। उनकी आंखें भी पूरी तरह नहीं खुली थी। पर मां वहां नहीं थी। हमने फटाफट ट्राइपॉड लगाया। हाथियों को पीछे किया और और शूटिंग के लिए बैठ गए। शेर की गतिविधियों को फल्मिाने के लिए कस्मित आपके साथ होनी चाहिए। मैं सांस रोककर वहां बैठा रहा, बिना कोई हरकत किए। आधे घंटे बाद शेरनी  आई, मेरी तरफ देखा, हल्का- सा गुर्राई। मैंने कैमरा नहीं चलाया कि कहीं वह हमला न कर दे। जब उसे वश्विास हो गया कि खतरा नहीं है तो वह झुकी और बच्चे को मुंह में उठा लिया और मेरी तरफ देखा। वह नीचे बैठ गई,  बच्चे को नीचे रखा और मेरी तरफ मुंह करके लेट गई। बच्चे आए और दूध पीने लगे। ये नश्चिय ही अद्भुत दृश्य था। करीब आधा घंटे बाद वह उठी और एक-एक करके अपने बच्चों को पहाड़ी से नीचे ले गई।
बाद में हमने उस शेरनी को बहुत ढूंढा लेकिन वह नहीं मिली। शेर के साथ एक और अनुभव है जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता। कान्हा नेशनल पार्क में शेर का एक छोटा बच्चा जो बीमार था, चल्लिा रहा था। उसकी मां ने उसे छोड़ दिया था। मैं उसके नजदीक गया तो देखा, उसमें कीड़े पड़े हुए थे, वह चल नहीं पा रहा था। मैं चाहकर भी कुछ कर नहीं सकता था। कुछ देर तक तो मैंने उस दृश्य को फल्मिाया लेकिन उसका चल्लिाना और उसका दर्द मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैं जंगल से बाहर सड़क पर आ गया। वन विभाग की टीम को उसकी सूचना दी। जब दोबारा वन     विभाग की टीम के साथ मैं वहां पहुंचा तो शेर का बच्चा दम तोड़ चुका था। वह मेरे जीवन का एक ऐसा दृश्य है जो कभी भूला नहीं    जिसे सकता। आज समाज में जागरूकता बढ़ी है, शिकार पर रोक लगी है। शेरों के लिए नेशनल पार्क बनाए गए हैं। यही कारण है कि आपको रणथंभौर में शेर दिखाई दे जाएगा, कान्हा में भी उदासीन शेर देखने को मिल जाएगा, लेकिन कार्बेट में ऐसा नहीं है। दरअसल जंगल में ज्यादा पर्यटन भी नहीं होना चाहिए। जंगल जानवरों के लिए है न कि आपके पिकनिक मनाने के लिए। उदाहरण के तौर पर रणथंभौर में  पर्यटन इतना बढ गया है कि शेर एक आदमियों को देखने के आदी उदासीन हो गए हैं, वे आदमियों को देखकर कोई प्रतक्रियिा नहीं देते लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए। यह गलत है। पहले भी शेर मारे जाते थे, आज भी शेर मारे जाते हैं। शिकार पर लगाम लगाना जरूरी है। शेरों के मनुष्यों के ज्यादा नजदीक आने से उनका शिकार करना आसान हो जाएगा, जो किसी भी तरह से सही नहीं है। शेर जंगल का राजा है। उसका एक सम्मान है। उसे बरकरार रहना चाहिए। हमें जंगल में ज्यादा दखल नहीं देना चाहिए। शेरों को स्वच्छ रूप से विचरण के लिए अपने प्राकृतिक प्रवासों में ही रहना चाहिए। इसलिए हमें जंगल बचाने ही होंगे। बाघों की बढ़ी संख्या को हमें सदी का उपहार मानकर उनका सम्मान करना चाहिए।
    (लेखक वन्य जीव फल्मिकार हैं)
 प्रस्तुति: आदत्यि भारद्वाज 

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